आवरण कथा - हमारे जनमत की ताकत
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आवरण कथा – हमारे जनमत की ताकत

Written byArchiveArchive
Apr 17, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 17 Apr 2017 15:22:07

-प्रमोद जोशी-

सोशल मीडिया सामाजिक-विमर्श का महवपूर्ण मंच है जरूर, पर अक्सर वह निराश करता है। कई बार उत्साह का संचार भी करता है। यह मीडिया जीवन में बैठे अन्याय और अत्याचार को भी सामने ला रहा है। ऐसी जानकारियां मिल रहीं हैं, जो आसानी से उपलब्ध नहीं थीं। जानकारियों का खजाना खुल गया है। साथ में गाली-गलौज और झूठ का अम्बार भी। क्या यह वास्तव में समाज का दर्पण है? समाज और श्रेष्ठ और निष्ठ एक साथ देखना हो तो सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफॉर्म पर चले आइए।
इस विषय पर चर्चा आगे बढ़ाने के पहले हाल के एक प्रसंग का जिक्र करना उचित होगा। पाकिस्तान में कुलभूषण जाधव को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद अनायास मेरे मन में एक विचार आया और उसे मैंने फेसबुक पर लिख दिया। पोस्ट यह थी, 'पाकिस्तान को भारतीय जनमत की ताकत का अंदाजा नहीं है। बहुत भारी पड़ेगा।'
स्टेटस के प्रकाशित होते ही पहली प्रतिक्रिया आई, 'यह व्यंग्योक्ति है।' मुझे स्पष्ट करना पड़ा कि नहीं यह बात मैंने व्यंग्य में नहीं लिखी, पूरी संजीदगी से लिखी है। साथ ही सोचना पड़ा कि क्या इस बात में व्यंग्य सम्भव है? क्या और किस पर? फिर समझ में आया कि यह व्यंग्य अपने समाज पर ही सम्भव है। एक प्रतिक्रिया आई, 'पाकिस्तान को हमारे बारे में कोई गुमान नहीं है। उसे पता है कि हमारे यहां क्रांति केवल सोशल मीडिया में होती है़.़।' और फिर इस चर्चा को एक सज्जन ने राजनीतिक मोड़ दिया और 'छप्पन इंची सीने' का तंज मारा।  
सैन्यशक्ति नहीं, जनशक्ति
चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए मुझे एक और सफाई देनी पड़ी, 'मैंने यहां सेना की जगह 'जनमत की ताकत' लिखा है तो काफी सोच-समझकर लिखा है।' पर मन में यह सवाल कचोट रहा था कि क्या हमारे जनमत की भी कोई ताकत है? राजनीति शास्त्र में 'पब्लिक ओपिनियन' एक महत्वपूर्ण विषय है। व्यावसायिक नजरिए से देखें तो बाजार का सारा खेल ध्यान खींचने से जुड़ा है। उपभोक्ता बाजार के पास इसी का सहारा है। टूथपेस्ट में नमक की जरूरत है या नहीं, यह उपभोक्ता नहीं, विक्रेता तय करने लगा है। हाल के वषोंर् में 'ओपिनियन बनाने की कला' का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल चुनाव जीतने के लिए होने लगा है। पर राष्ट्रीय हितों की रक्षा व्यावसायिक कर्म नहीं है। इसलिए हमारा उस तरफ ध्यान भी नहीं है।
सवा सौ करोड़ लोगों के देश की जनता किसी सवाल पर एकमत हो तो क्या दुनिया उसकी उपेक्षा कर सकती है? पर क्या हमारा सोशल मीडिया यह काम कर सकता है? आप देख लीजिए, कुलभूषण जाधव को लेकर ट्विटर और फेसबुक पर कितने स्टेटस लिखे गए हैं। और इसीलिए सम्पादकीय नहीं लिखे गए। वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयार्क टाइम्स, गार्डियन और इकोनामिस्ट की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। हमारा जनमत होगा तो वैश्विक जनमत बनेगा। क्या हम थक गए हैं, हार गए हैं या गाफिल हैं अपनी मौज-मस्ती में?
हेतु की पर्याप्त एकता
लुई फिशर की किताब 'गांधी की कहानी' का एक प्रसंग है, 'मैं गांधीजी के कमरे में गया और मैंने उन्हें कातते हुए पाया। मैंने कहा कि मैं तो समझता था कि आपने कातना छोड़ दिया।' उन्होंने कहा, 'नहीं मैं कातना कैसे छोड़ सकता हूं? भारतवासियों की संख्या चालीस करोड़ है। इनमें से दस करोड़ बच्चे-बेघरबार आदि निकाल दो। यदि बाकी बचे तीस करोड़ रोजाना एक घंटा काता करें, तो हमको स्वराज्य मिल जाए।''आर्थिक प्रभाव के कारण या आध्यात्मिक प्रभाव के कारण?' मैंने पूछा।
'दोनों ही,' वह बोले-'यदि तीस करोड़ जनता दिन में एक बार एक समान काम करे, इसलिए नहीं कि किसी हिटलर की आज्ञा है, बल्कि एक आदर्श से प्रेरित होकर, तो स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए हमारे अंदर हेतु की पर्याप्त एकता हो जाएगी।' पुस्तक का यह हिस्सा ध्यान खींचता है। चरखा कातना या न कातना प्रतीकात्मक है, पर क्या हमारे भीतर 'हेतु की पर्याप्त एकता' स्थापित हो सकती है? क्या वह है? यदि है तो दुनिया की कोई ताकत हमारे साथ अन्याय नहीं कर सकती।
इसी हफ्ते की बात है सोशल मीडिया में एक वीडियो प्रसारित हो रहा था, जिसे बाद में टीवी चैनलों पर दिखाया गया। कश्मीर के किसी स्थान पर सीआरपी के कुछ सैनिक ईवीएम मशीनें लेकर जा रहे चुनाव कर्मियों की रक्षा में साथ-साथ चल रहे थे। उन सैनिकों पर कश्मीर के कुछ नौजवान फब्तियां कसते, थप्पड़ मारते और धक्का देते नजर आए।
सैनिकों के पास बंदूकें थीं, पर उन्होंने गोलियां नहीं चलाईं और अपमान को सहन किया। वह कहां का प्रसंग था और सीआरपी की कौन सी टुकड़ी थी, ये सब बातें स्पष्ट नहीं हो पाईं, पर इतना स्पष्ट था कि सैनिकों
ने भारतीय राष्ट्र-राज्य की खातिर अपमान को सहन किया।
कुलभूषण जाधव के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है कि वह पाकिस्तानियों के हाथ कैसे लगा, किसने पकड़ा और वह क्या कर रहा था। पर इतना साफ है कि उस पर निजी लाभ का आरोप नहीं है। भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा का आरोप है। क्या हमारे मन में 'हेतु की पर्याप्त एकता' है? इस सिलसिले में भारत सरकार क्या करेगी और हमारी रक्षा व्यवस्था किस तरह कश्मीर के मामलों को देखेगी, ऐसे तमाम सवालों के जवाबों से इतर सवाल यह है कि हम व्यापक स्तर पर इस मामले में क्या सोचते और समझते हैं?
कहां ढलता है जनमत?
कोई सामाजिक गतिविधि, सामाजिक विमर्श के बगैर सम्भव नहीं है। कम से कम आज के समाज में सम्भव नहीं है। यह सामाजिक विमर्श हम किसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत नहीं करते, यह हमारी प्रकृति है। यही संवाद किसी समाज की प्रकृति को दर्शाता है। हिटलर के जर्मनी के बंद समाज में या स्वीडन और नॉर्वे के खुले समाज में यह संवाद किसी न किसी रूप में चला  और सारी दुनिया में चलता रहेगा। बदलाव का सबसे बड़ा सहारा ही यह संवाद है। पर संवाद कारोबार भी है। टीवी की बहसों में अब हर रात हम इस विमर्श के कारोबारी रूप को देख रहे हैं। क्या हम इस बहस से संतुष्ट हैं? जर्मन समाज विज्ञानी जर्गन हैबरमास ने इस पब्लिक 'स्फीयर' की बदलती प्रवृत्ति पर काम किया है। संयोग है कि हजारे का आंदोलन जिस दौर में शुरू हुआ वह दौर सोशल मीडिया के विकास का दौर भी है। पर हमारे यहां यह बहस बीसवीं सदी के पहले दशक में राष्ट्रीय आंदोलन के साथ शुरू हो गई थी। आजादी के बाद 1962, 1965, 1971 और 1998 के युद्घ के वक्त इसने जोर पकड़ा। इसके बाद 1967 के गैर-कांग्रेसवाद, सत्तर के दशक के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, इमजेंर्सी, फिर पंजाब आंदोलन, मंदिर आंदोलन, मंडल आंदोलन से लेकर आज तक कई सतहों पर विमर्श जारी है।
इस बहस के रास्ते में कई तरह की दिक्कतें हैं। सोशल मीडिया की बहस अराजक है और औपचारिक मीडिया की बहस बेहद कारोबारी। चैनलों की बहस के विषय मार्केट तय करता है। जनता के मन में जो विचार हैं, वे अनिवार्य रूप से इस चर्चा में व्यक्त नहीं होते। विज्ञापन हासिल करने की होड़ में लगा मीडिया इन विषयों को तय करता है।
ताकत की अनदेखी
गांवों की चौपालों, कस्बों के नुक्कड़ों, चाय की दुकानों या कुछ बड़े शहरों के टॉउनहाल और इन चर्चाओं में फर्क है। फिर भी इनमें कोई बहस तो होती ही है। 'हेतु की पर्याप्त एकता' के लिए चरखा आंदोलन जैसी कोई सामाजिक गतिविधि भी नहीं है। इसलिए कभी किसी को लगे कि 'भारतीय जनमत की ताकत' एक बड़ा मजाक है, तो उसका सोचना भी जायज है। पर मेरी अब भी राय यही है कि हम अपनी ताकत की अनदेखी कर रहे हैं।
महत्वपूर्ण है यह समझना कि क्या हमारा कोई लोक या पब्लिक 'स्फीयर' है? क्या उसे होना चाहिए? क्या उसमें पब्लिक से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका 'स्फीयर' है? मसलन इन विमशोंर् में शामिल लोग क्या सामान्य-जन के मत को व्यक्त कर पाते हैं या अपने विचारों को दूसरों पर आरोपित करते हैं? तीसरे, क्या वास्तव में हम अपने व्यक्तिगत मसलों से ऊपर उठकर समूचे देश या समूचे संसार के परिप्रेक्ष्य में विचार करते हैं?
26 जनवरी और 15 अगस्त साल के दो दिन हमने राष्ट्र प्रेम के नाम सुरक्षित कर दिए हैं। तीसरा राष्ट्रीय पर्व 2 अक्तूबर है। इसी तरह चुनाव के दौरान हम अपने निजी 'स्फीयर' से बाहर आकर पब्लिक 'स्फीयर' में सोचने-विचारने का काम करते हैं।
टीवी की बहसों के नकारात्मक और सकारात्मक पहलू दोनों हैं। टीवी न होता तो क्या प्रिंस गड्ढे से वापस आ सकता था? जेसिका लाल, प्रियदर्शिनी मट्टू, तहलका, एमपीलैड, संसद में सवाल पूछने के लिए पैसा जैसे मामले इस मीडिया ने ही उठाए थे। पर जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं था, तब भी तो ये मामले उठते थे। राष्ट्रीय आंदोलन चैनलों और ट्विटर की मदद से नहीं चला।
माहौल बनाना
यह माहौल को बनाने की गतिविधि है। जैसे व्यक्तिगत जीवन में हम शोक के समय किराए की रुदालियों और खुशी के समय किराए के बैंडबाजों का इस्तेमाल करते हैं। यह कितना ही कृत्रिम हो, माहौल को बनाता है। यह हमारी संस्कृति का हिस्सा बन गया है। इस अर्थ में यह विमर्श भी कितना ही कृत्रिम हो, कुछ न कुछ सार्थक होता है। बुनियादी चीज है इसका कोर यानी हृदय। हमारा सामुदायिक जीवन क्या है? सोशल नेटवर्किंग में हम काफी आगे चले गए हैं। पर सारी नेटवर्किंग अपने व्यावसायिक हितों और स्वाथोंर् के लिए है। शाम को दारू पार्टी पर बैठने और गप्प करने को हम सोशल होना मानते हैं। जो इसमें शामिल नहीं है, वह 'अन-सोशल' है। इस अर्थ में सोशल होना व्यावहारिक रूप में ऊपर चढ़ने की सीढि़यां तलाशना है। सामाजिक जीवन की गुत्थियों को सुलझाना या सामूहिक 'एक्शन' के बारे में 'सोचना सोशल नेटवर्किंग' का अंग नहीं है।
लोग चाहें तो अपने घरों के आसपास की तमाम खराबियों को आपसी सहयोग से दूर कर सकते हैं। पर लोग ऐसा क्यों नहीं करते? हम वैचारिक कर्म से भागते हैं। उसे भारी काम मानते हैं। मामूली सी बात को भी समझना नहीं चाहते। रास-रंग हम पर हावी है। आपने गौर किया होगा, नई कालोनियों की योजनाओं में जीवन की सारी चीजें मुहैया कराने का वादा होता है। मॉल होते हैं, मेट्रो होती है, ब्यूटी सैलून, जिम और स्पा होते हैं। मल्टीप्लेक्स, वाटर स्पोर्ट्स होते हैं। धर्म स्थल भी खड़े कर दिए जाते हैं।
विचार की ताकत
इस योजना में लाइब्रेरी नहीं होती, कम्युनिटी सेंटर होते हैं तो वे शादी-बारात के लिए होते हैं, बैठकर विचार करने के लिए नहीं। ऐसे सामुदायिक केन्द्र की कल्पना नहीं होती, जो पब्लिक 'स्फीयर' का केन्द्र बने। छोटा सा ऑडिटोरियम। पढ़ने, विचार करने, सोचने और उसे अपने 'एक्शन' में उतारने को कोई
बढ़ावा नहीं। चौपाल, चौराहों और कॉफी हाउसों की संस्कृति खत्म हो रही है। इस विमर्श की जगह वर्चुअल यानी आभासी-विमर्श ने ले ली है। यह वर्चुअल-विमर्श ट्विटर और फेसबुक में पहुंच गया है। वह सरलीकरण और जल्दबाजी का शिकार है। अक्सर अधकचरे तथ्यों पर अधकचरे निष्कर्ष निकल कर सामने आ रहे हैं। एकाध गम्भीर ब्लॉग को छोड़ दें तो नेट का विमर्श अराजक है।  टीवी का विमर्श एक फार्मूले से बंध गया है तो उससे बाहर निकल कर नहीं आ रहा। यों भी टीवी की दिलचस्पी इसमें नहीं है। वह सूचनाओं को तोड़-मरोड़ कर पेश करने को ही कौशल मानता है। ऐसी तमाम वजहों से विमर्शकार एक-दूसरे से दूर हो गए हैं।
2020 में भारत दुनिया का सबसे बड़ा युवा देश होगा। हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन जाएंगे। ऐसे में क्या दुनिया हमारे जनमत की उपेक्षा कर सकेगी? हमारे देश में लोगों को अमेरिका के गली-मोहल्लों के नाम रटे पड़े हैं। क्यों? इसलिए कि अमेरिका सफल देश है, वहां आगे बढ़ने के मौके हैं। इसलिए वहां के लोगों की बात सुनी जाती है।      युद्धोन्माद भड़काना जिम्मेदार पत्रकारिता नहीं है। संतुलित जानकारी देना तो है। जनमत बनाना तो है। ऐसा कैसे सम्भव है कि सवा सौ करोड़ लोग कोई बात कहें और दुनिया उसे मानने से इनकार करे?    ल्ल 

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