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विदेशी छात्र/भारतीय संस्कृति/विदेशी तन, भारतीय मन

Written byArchiveArchive
Apr 10, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 10 Apr 2017 15:02:33

आज भारत में अनेक देशों के छात्र हिंदी, आयुर्वेद, संस्कृत और भारतीय कला का अध्ययन कर रहे हैं। इन विदेशी छात्रों में भारतीयता की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि इनमें से ज्यादातर भारतीय संस्कृति, भाषाओं और भारतीय मूल्यों को बढ़ाने का संकल्प ले रहे 

अरुण कुमार सिंह

भारत को जानने, भारतीय संस्कृति को अपनाने, यहां की कला और भाषा सीखने एवं विश्व की सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को प्रचारित करने के प्रति विदेशियों में गजब की ललक देखने को मिल रही है। यही ललक उन्हें खींचकर भारत ला रही है। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के अनुसार इस समय लगभग 6,000 विदेशी छात्र भारत में पढ़ रहे हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि इनमें हिंदी, संस्कृत और आयुर्वेद पढ़ने वाले छात्रों की संख्या सैकड़ों में है। बैंकाक की रहने वालीं मूक रत्ना जयपुर स्थित राष्ट्रीय आयुर्वेदिक संस्थान में बी.ए.एम.एस. प्रथम वर्ष की छात्रा हैं। वे कहती हैं, ''थाईलैंड में आयुर्वेद का प्रचार बहुत जोर-शोर से हो रहा है। वहां के लोग आयुर्वेदिक दवाइयों के चमत्कार से बहुत प्रभावित हैं।'' वे कहती हैं, ''थाईलैंड में आयुर्वेद का कोई अस्पताल नहीं है। भारत से आयुर्वेद की पढ़ाई करने के बाद कुछ लोग वहां क्लीनिक चलाते हैं। उन लोगों ने अनेक गंभीर बीमारियों का इलाज किया है। इससे पूरे थाईलैंड में आयुर्वेदिक दवाइयों की मांग बढ़ रही है। आने वाले समय में वहां आयुर्वेदिक अस्पताल शुरू हो जाए तो कोई बड़ा आश्चर्य नहीं होगा।'' रत्ना भारतीय संस्कृति से भी बहुत प्रभावित हैं। उनके हाथ में कलावा देखकर मैंने पूछा कि इसको बंधवाने का मतलब आप जानती हैं? प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा, ''भारत और थाईलैंड की संस्कृति में बहुत अधिक समानताएं हैं। थाईलैंड में किसी शुभ कार्यक्रम में सफेद धागा बांधा जाता है और भारत में लाल। थाईलैंड में इस धागे को तोड़ा नहीं जाता। यह जब अपने आप टूटने लगता है तो खोलकर रख दिया जाता है। मेरे कुछ भारतीय मित्रों ने बताया कि यहां भी कलावा को तोड़ा नहीं जाता।''

राष्ट्रीय आयुर्वेदिक संस्थान, जयपुर में बी.ए.एम.एस. तृतीय वर्ष के छात्र रविन्दु नुअन श्रीलंका से हैं। भरतनाट्यम के शौकीन रविन्दु किसी दक्षिण भारतीय की तरह हिंदी बोलते हैं। वे कहते हैं, ''आयुर्वेद की ज्यादातर पुस्तकें हिंदी और संस्कृत में हैं। इसलिए कामचलाऊ हिंदी और संस्कृत सीखनी पड़ी।'' रविन्दु के अनुसार  श्रीलंका में आयुर्वेद का इतिहास लगभग 2,000 वर्ष पुराना है। वहां आयुर्वेद के लिए सरकार ने एक अलग विभाग बना रखा है। अब वहां की सरकार आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार नए तरीके से कर रही है। भूटान की अपसरा भी जयपुर में आयुर्वेद की पढ़ाई कर रही हैं। वे कहती हैं, ''भूटान में आयुर्वेद का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है। इस कारण वहां आयुर्वेद के जानकारों की बड़ी जरूरत है। इसे देखते हुए भूटान सरकार अनेक छात्रों को भारत भेज रही है। उन छात्रों में मैं भी शामिल हंू।''

दिल्ली के डाबर खेड़ा स्थित चौधरी ब्रह्मप्रकाश चरक आयुर्वेद संस्थान में  काय चिकित्सा विभाग के आचार्य डॉ. योगेश कुमार पांडे कहते हैं, ''दुनिया यह समझने लगी है कि आने वाले समय में आयुर्वेद का भविष्य अच्छा है। यही वजह है कि अनेक देशों के छात्र आयुर्वेद की पढ़ाई के लिए भारत आ रहे हैं।'' उन्होंने  यह भी बताया कि श्रीलंका, नेपाल और बंगलादेश में काफी पहले से आयुर्वेद की पढ़ाई हो रही है।

विदेशी छात्रों में भारतीय नृत्य के प्रति भी गजब का झुकाव है। दक्षिण अफ्रीका की शांसी भारतीय मूल की हैं। उनके पूर्वज करीब 150 वर्ष पहले तमिलनाडु से दक्षिण अफ्रीका गए थे। इतने वर्षों के बाद भी वे लोग अपनी संस्कृति को नहीं भूले। वहां भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी के अनेक कलाकार हैं। उनकी लोकप्रियता और कार्यक्रमों से शांसी बहुत ज्यादा प्रभावित हैं। वे उन जैसा बनने के लिए ही भारत आई हैं। वे रविंद्र भारती विश्वविद्यालय, कोलकाता में कुचिपुड़ी से बी.ए. कर रही हैं।

बंगलादेश की मारिया फरिहनुपमा इसी विश्वविद्यालय से भरतनाट्यम में एम.ए. कर रही हैं। ढाका में पढ़ाई के दौरान उन्हें इंटरनेट पर भारतीय फिल्में देखने और भारतीय संगीत सुनने की लत लगी। इससे वे हिंदी सीख गईं। इसके बाद उन्होंने भारत आकर शास्त्रीय नृत्य सीखने का मन बनाया। उनकी मां भी चहती हैं कि मारिया  एक नृत्यांगना बने। मारिया योग गुरु बाबा रामदेव की प्रशंसक हैं। वे कहती हैं, ''रामदेव जी ने योग को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचा दिया। बंगलादेश में भी लाखों लोग टी.वी. देख-देख कर योग करते हैं। वहां योग केंद्र खुलने लगे हैं और जिम के शटर गिरने लगे हैं।''

मॉरिशस के यशवीन चतारु भारतीय मूल के हैं और कोलकाता के वर्धमान राज कॉलेज में बी.कॉम प्रथम वर्ष के छात्र हैं। मॉरिशस में वाणिज्य की कोई खास पढ़ाई नहीं होती। वे चाहते तो दुनिया के किसी भी देश में जाकर वाणिज्य की पढ़ाई कर सकते थे, लेकिन उन्होंने भारत को चुना। वे कहते हैं, ''भारत उनके पूर्वजों की भूमि है। इसलिए जब से होश संभाला था तब से यहां आना चाहता था। यहां आकर लगता है कि किसी तीर्थ में आ गया हूं।'' यशवीन भी बाबा रामदेव के प्रशंसक हैं। वे कहते हैं, ''मॉरिशस के लोग बाबा रामदेव के कारण ही योग और आयुर्वेद को अपना रहे हैं। भारत की तरह ही मॉरिशस में लोग योग करते हुए दिखाई देने लगे हैं।''

विदेशी छात्रों में हिंदी पढ़ने की जबरदस्त ललक  दिखती है। चीन की याओ तिनजिंग (चीनी नाम के उच्चरण दोष से बचने के लिए यहां उनका नाम आशा रखा गया है) दिल्ली स्थित केंद्रीय हिंदी संस्थान से डिप्लोमा कर रही हैं। हिंदी को समझने के लिए तिनजिंग रोजाना हिंदी गाने सुनती हैं और भारतीयों से हिंदी में ही बात करती हैं।

चीन की कुओ मेईदन (भारतीय नाम सुचित्रा) भी डिप्लोमा कर रही हैं। आने वाले समय को एशिया का बनाने के लिए मेईदन की चाहत है कि भारत और चीन दोनों देशों के बीच दोस्ती बढ़े। झंग जाई भी चीन से ताल्लुक  रखते हैं। उन्हें भारतीय नृत्य बहुत पसंद है। वे फिल्म अभिनेता रणबीर कपूर, आमिर खान और अर्जुन रामपाल की फिल्में देखना नहीं भूलती हैं। झंग कहती हैं, ''हिंदी सीखने का उद्देश्य है बॉलीवुड में काम करना। मैं जिस दिन अच्छी तरह हिंदी बोल और पढ़ लूंगी, उस दिन मेरे सपनों को पंख लग जाएंगे।''  मेक्सिको की जेमिमा केंद्रीय हिंदी संस्थान से उच्च डिप्लोमा कर रही हैं। उनकी मातृभाषा स्पेनिश है। उन्होंने अपने देश में पहले अंग्रेजी की पढ़ाई की। अब भारत में हिंदी पढ़ रही हैं। उन्हें भारतीय खाना, कपड़े, संगीत और नृत्य बेहद पसंद है। वे कहती हैं, ''हिंदी वैश्विक भाषा बन चुकी है। इसकी मांग बढ़ रही है। इसलिए मैं हिंदी पढ़ रही हूं। अपने देश लौटकर स्पेनिश भाषियों  को हिंदी और हिंदी भाषियों को स्पेनिश सिखाऊंगी।'' यूक्रेन के ओलेक्सांद्र भी केंद्रीय हिंदी संस्थान से डिप्लोमा कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस समय यूक्रेन के दो विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है।

इटली की 46 वर्षीया तिस्तआना कुछ वर्ष पहले भारत घूमने आई थीं। उस समय उन्हें  भारतीयों का व्यवहार इतना अच्छा लगा कि वे कई वर्ष तक भारत को भूल नहीं सकीं। वे कहती हैं, ''भारतीय बहुत ही आध्यात्मिक और सुंदर होते हैं। आम भारतीयों से आसानी से जुड़ने का जरिया है हिंदी।''

कोरिया की आरिम छन अपने देश में हिंदी को बढ़ाना चाहती हैं। वे कहती हैं, ''कोरिया में हजारों भारतीय आते हैं। उन्हें कोरिया की भाषा नहीं आने के कारण बहुत दिक्कत होती है। हिंदी सीखने के बाद मैं कोरिया आने वाले भारतीयों के लिए काम करूंगी।'' आरिम की दिली तमन्ना है पुलिसकर्मी अधिकारी बनना। एक पुलिस के नाते वे अपने देश में भारतीयों की मदद करना चाहती हैं। जापान की तोशिको मुराता बहुत संुदर हिंदी गाना गाती हैं। वे रजनीकांत, अर्जुन रामपाल और शाहरुख खान की फिल्में भी देखती हैं। वे कहती हैं, ''मैं जापान में भारतीयों को जापानी सिखाती हूं। हिंदी नहीं जानने की वजह से इसमें परेशानी होती थी। इस परेशानी को दूर करने के लिए मैं हिंदी सीख रही हूं।'' वहीं चिली की वलेरिया दारात कहती हैं, ''केवल भारतीय संस्कृति दुनिया को एक परिवार मानती है और इसलिए वह सबके साथ समान व्यवहार करने की बात करती है। इस महान संस्कृति को जानने के लिए मैंने हिंदी पढ़ने का फैसला किया और भारत आ गई।'' हांगकांग की लिली चान ऐसी बांसुरी बजाती हैं कि लोग दंग रह जाते हैं। यही नहीं, कथक और भरतनाट्यम में भी इनकी साधना गजब की है। अर्जेंटीना की प्रिसिला को भी हिंदी-प्रेम भारत खींच लाया। उल्लेखनीय है कि इन विदेशियों को हिंदी सिखाने के लिए भारत सरकार हर तरह की मदद करती है। यह काम भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के जिम्मे है। परिषद ही विदेशी छात्रों का चयन करती है और उन्हें भारत में शिक्षा दिलाती है।

हिंदी की शिक्षा मुख्य रूप से केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में दी जाती है। संस्थान के अध्यक्ष प्रो. कमल किशोर गोयनका कहते हैं, ''अब तक लगभग 6,000 विदेशी छात्रों को हिंदी पढ़ाई जा चुकी है। इस समय आगरा में 26 देशों के करीब 100 छात्र हिंदी की पढ़ाई कर रहे हैं।'' दिल्ली में भी केंद्रीय हिंदी संस्थान की शाखा है। यहां मुख्य रूप से उन विदेशी छात्रों को हिंदी पढ़ाई जाती है, जिनके माता-पिता दूतावासों में नौकरी करते हैं। ये छात्र अपने खर्च पर पढ़ते हैं। यहां भारत सरकार की मदद से भी कुछ विदेशी हिंदी पढ़ते हैं।

केंद्रीय हिंदी संस्थान की क्षेत्रीय निदेशक प्रो. गीता शर्मा कहती हैं, ''अपनी भाषाओं के प्रति हमारा रवैया ठीक नहीं है। भारत को  छोड़कर प्राय: हर देश अपनी मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा दे रहा है, लेकिन हम अंग्रेजी के पीछे भाग रहे हैं।''

ऐसा क्यों है? इसके जवाब में हिंदी हितरक्षक समिति के संयोजक डॉ. मुनिश्वर कहते हैं,''भाषा रोजगार का बहुत बड़ा जरिया है। भारत में स्थिति यह है कि बिना अंग्रेजी ज्ञान के कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल सकती है। इसलिए हर भारतीय अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाने की कोशिश में लगा हैं। वहीं अन्य देश अपनी भाषा को सबसे अधिक महत्व देते हैं।'' इसके बावजूद कई  देशों में हिंदी की पढ़ाई हो रही है और हिंदी वैश्विक भाषा बन चुकी है। इस समय विश्व के अनेक देशों में भारतीयों की अच्छी-खासी जनसंख्या है। लंदन के हिथ्रो हवाई अड्डे पर हिंदी मंे भी घोषणा होती है। इसी से हिंदी की व्यापकता का अंदाजा लगता है। 

भारत के सांस्कृतिक राजदूत

हिंदू हैरिटेज फाउंडेशन भारत में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों को भारतीय संस्कृति से परिचित कराने का काम कर रहा है। इसके लिए फाउंडेशन इन छात्रों को हर वर्ष सांस्कृतिक पर्यटन के लिए ले जाता है। हाल ही में 54 देशों के छात्रों को हरिद्वार और ऋषिकेश ले जाया गया था। फाउंडेशन यह काम लगभग 20 वर्ष से कर रहा है। फाउंडेशन के सचिव संजीव साहनी कहते हैं, ''इस सांस्कृतिक पर्यटन का उद्देश्य इन छात्रों को भारत का सांस्कृतिक राजदूत बनाना है। इसीलिए यात्रा के दौरान इन छात्रों को भारतीय सभ्यता, संस्कृति, गाय, गंगा और ग्राम की जानकारी दी जाती है। इसके साथ ही इन्हें 'अतिथि देवो भव' की भावना से भरा जाता है, परिवार और रिश्ते-नातों का महत्व बताया जाता है। जब ये लोग यहां से पढ़ाई कर अपने-अपने देश जाएंगे तो सनातन धर्म क्या है, भारत की संस्कृति क्या है, भारत में मेहमानों को कितना महत्व दिया जाता है, ये सब वहां बताएंगे।''

यात्रा के दौरान हरिद्वार में ये छात्र दो दिन पतंजलि योगपीठ में रहे। वहां इन लोगों ने योग किया। फाउंडेशन के कार्यकर्ता पंकज रॉय कहते हैं, ''विदेशी छात्रों के बीच काम करने से एक अलग अनुभूति होती है। अनेक छात्र ऐसे मिलते हैं, जिन्हें भारत के बारे में बड़ी गलत जानकारियां रहती हैं। जब हम लोग इन्हें भारत और भारतीय संस्कृति के बारे में बताते हैं तो भारत के प्रति इनका नजरिया बिल्कुल बदल जाता है।''

अंत में नेपाल की आस्था झा और शेरयाज आलम की। ये दोनों ग्वालियर में आयुर्वेद की पढ़ाई कर रहे हैं। आस्था जनकपुर की रहने वाली हैं और शेरयाज वीरगंज के हैं। ये दोनों ग्वालियर के जिस कॉलेज में पढ़ते हैं, उसमें नेपाल के लिए पांच स्थान आरक्षित हैं। यानी हर वर्ष नेपाल के पांच छात्र यहां आयुर्वेद की पढ़ाई करने आते हैं। इन दोनों का कहना है कि नेपाल पर प्रकृति की असीम कृपा है। यहां जड़ी-बूटियों की खानें हैं, लेकिन उनका कोई उपयोग नहीं हो रहा। इनकी इच्छा है कि भारत के सहयोग से नेपाल अपने प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग करे। इससे नेपाल में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, वहीं दूसरी ओर दोनों देशों के बीच जो सदियों पुराने संबंध हैं, उन्हें और प्रगाढ़ करने में सफलता मिलेगी।

इन छात्रों से मिलकर ऐसा लगा कि ये लोग तन से भले विदेशी हैं, पर इनके मन में भारत का वही स्थान है, जो किसी भी भारतीय के मन में होता है। इन छात्रों के जरिए वैश्विक स्तर पर एक ऐसा इन्द्रधनुष बनाने की कोशिश हो रही है, जिसमें हिंदी, संस्कृत, खानपान, कला, भारतीय संस्कृति और आयुर्वेद का रंग और गहराता जा रहा है। आने वाले समय में इन रंगों की छटा से हर कोई अभिभूत होगा।  

 मेरी मां बीमार रहती हैं। उन्होंने आयुर्वेदिक दवा का इस्तेमाल किया तो काफी हद तक तकलीफ कम हो गई है।  इसके बाद उन्होंने मुझे भी आयुर्वेदिक डॉक्टर बनने के लिए भारत भेजा।

—मूक रत्ना, थाईलैंड

आयुर्वेद हमें प्रकृति से जोड़ता है। प्रकृति से जुड़ा व्यक्ति जल्दी किसी बीमारी की चपेट में नहीं आता। आने वाला समय आयुर्वेद के लिए ही है।

—रविन्दु नुअन, श्रीलंका

आखिर वह कौन-सी बात है कि भारत में अतिथियों का बड़ा ख्याल रखा जाता है। इसको जानने के लिए मैंने हिंदी सीखने का

निर्णय लिया।

—तिस्तआना, इटली

हमारे देश में भरतनाट्यम और कुचीपुड़ी के अलग-अलग कलाकार हैं। मैं इन दोनों को अच्छी तरह सीखकर इनके मेल से नृत्य का एक अलग स्वरूप बनाना चाहती हूं।

 —शांसी, दक्षिण अफ्रीका

ढाका में पढ़ाई के दौरान इंटरनेट पर भारतीय फिल्में देखने और भारतीय संगीत सुनने की लत लगी। मेरी मां चाहती हैं कि मैं एक नृत्यांगना बनूं। उसी की कोशिश कर रही हूं।

—मारिया फरिहनुपमा, बंगलादेश

भारत की संस्कृति बहुत ही पुरानी और दिलचस्प है। इसको जानने के लिए हिंदी पढ़ रहा हूं। पढ़ाई के बाद हिंदी किताबों का यूक्रेनी में अनुवाद भी करूंगा।इस समय यूक्रेन के दो विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है।

—ओलेक्सांद्र, यूक्रेन

 इंटरनेट पर हिंदी फिल्में देखने के कारण हिंदी के प्रति लगाव बढ़ा। इसके बाद चीन में ही दो वर्ष तक हिंदी पढ़ी। अब दिल्ली में हिंदी की पढ़ाई पूरी कर भारतीय संस्कृति का अध्ययन करना चाहती हूं।

— याओ तिनजिंग, चीन

चीन और भारत के बीच व्यापार बढ़ रहा है। इस हालत में एक हिंदी अनुवादक की जरूरत बाजार से लेकर दफ्तर तक में है। इस जरूरत को देखते हुए हिंदी की पढ़ाई कर रही हंू।

—कुओ मेईदन, चीन

 भारतीय संस्कृति  सबके साथ समान व्यवहार करने की बात करती है। इस महान संस्कृति को जानने के लिए मैंने हिंदी पढ़ने का

फैसला किया।

—वलेरिया दारात, चिली 

मैं जापान में भारतीयों को जापानी सिखाती हूं। हिंदी नहीं जानने की वजह से इसमें परेशानी होती थी। इस परेशानी को दूर करने के लिए हिंदी सीख रही हूं।

—तोशिको मुराता, जापान

अब तक लगभग 6,000 विदेशी छात्रों को हिंदी पढ़ाई जा चुकी है। इस समय आगरा में 26 देशों के करीब 100 छात्र हिंदी की पढ़ाई कर रहे हैं।

—प्रो. कमल किशोर गोयनका

अध्यक्ष, केंद्रीय हिंदी संस्थान

कई विदेशी कंपनियां भारत में कारोबार कर रही हैं। उनमें काम करने वालों को हिंदी नहीं आएगी तो उनका कारोबार ठीक से नहीं चलेगा। इसलिए विदेशी छात्र हिंदी सीखना चाहते हैं।

—डॉ. मुनिश्वर, संयोजक, हिंदी हितरक्षक समिति

मलेशिया, थाईलैंड और मॉरिशस के जो छात्र भारत से आयुर्वेद की पढ़ाई करके  जाते हैं, उन्हें वहां आसानी से नौकरी मिल जाती है। इसलिए इन देशों में आयुर्वेद लोकप्रिय हो रहा है।

—डॉ. योगेश कुमार पांडे, आचार्य, च.आ., दिल्ली

हम अंग्रेजी के पीछे भाग रहे हैं। अपवाद को छोड़ दें तो नतीजा यह हो रहा है कि हमारे बच्चे न तो ठीक से अंग्रेजी  जानते हैं और न ही अपनी भाषा। इस कारण हमारी भाषा बोली बन रही है। वहीं विदेशी हमारी भाषाओं को दूर-दूर तक फैलाने का काम कर रहे हैं।

– प्रो. गीता शर्मा, क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान  

 

 

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