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पास-पड़ोस/म्यांमार – कर्म भूमि-धर्म भूमि

Written byArchiveArchive
Apr 3, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 03 Apr 2017 15:33:34

 

-श्याम परांडे
म्यांमार की सड़कों और गलियों में भोर की किरणों के स्पर्श के साथ घंटियों की सुमधुर ध्वनि लोगों को आवाज लगाकर बताती है कि भिक्खुओं की टोली आ गई। हर परिवार भिक्खुओं को भिक्षा देने के लिए तैयार रहता है। एक परिवार सिर्फ एक भिक्खु को भिक्षा दे सकता है और इसी तरह एक भिक्खु सिर्फ एक परिवार से भिक्षा ग्रहण कर सकता है। गली के प्रवेश पर बज रही घंटी संकेत देती है कि लोग भिक्षा देने के लिए तैयार रहें। स्थानीय भाषा में म्यांमार या 'म्यामां' का अर्थ है ब्रह्मा। बर्मी भाषा में 'र' का उच्चारण नहीं होता, इसलिए ब्रह्मा 'बम्मा' हो गया और यही आगे 'म्यांमा' बन गया।
पिछले साल मुझे अपने प्रवास के दौरान उस विश्वविद्यालय के एक उत्सव में हिस्सा लेने का अवसर मिला, जहां भिक्खुओं को बौद्ध धम्म में शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाता है। सनातन धर्म स्वयंसेवक संघ (एसडीएसएस) वहां भोजन, कपड़े और अन्य प्रसाद प्रदान करता है जो भिक्खु प्रोफेसर, विद्वानों और छात्रों की दी जाने वाली वार्षिक भिक्षा का हिस्सा हैं।  जीवन के सभी पहलुओं से साक्षात्कार कराने वाला वह अद्भुत अनुभव था। विश्वविद्यालय में सभी आधुनिक शिक्षण सुविधाएं हैं और यहां करीब 2000 छात्र पढ़ रहे हैं। उस दिन 400 भिक्खुओं को भोजन और कपड़े दिए गए। भारत की गुरुकुला परंपरा को ब्रिटिश राज ने नष्ट कर दिया, म्यांमार के विश्वविद्यालयों या मठों में जाने पर इस बात का एहसास होता है।
दक्षिण-पूर्व एशिया में बौद्ध धर्मावलंबी हों या हिंदू, दोनों ही पीढि़यों से संस्कार और अनुष्ठान का निरंतर पालन करते आए हैं,  जबकि जिस देश में इनका उद्भव हुआ, वहां प्रगति के नाम पर इन्हें काल के गर्त में धकेल दिया गया। भिक्खुु म्यांमार में बौद्ध धर्म की शक्ति हैं जो राष्ट्रीय नीतियों को भी प्रभावित कर सकते हैं। वहां बड़े-बड़े विश्वविद्यालय हैं जहां हजारों की संख्या में भिक्खुुओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है और सभी भिक्खुुओं का सम्मान करते हैं, यहां तक कि राजनीतिक दल और सेना भी।
इस देश में बुद्ध और हिंदू धर्म का समन्वय इतना अद्भुत है कि हर पगोडा के प्रवेश द्वार पर श्री गणेश की मूर्ति विराजमान है। पगोडा के अंदर नवग्रहों की तरह देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। हिंदू धर्मावलंबी अपने घर में हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करते हैं और पगोडा में बुद्ध की। 2001 में श्री हो. वे. शेषाद्रि के साथ मुझे म्यांमार जाने का अवसर मिला था जो उस समय रा़ स्व़ संघ के सरकार्यवाह थे। मैं उस यात्रा के अनुभव को यहां साझा करना चाहता हूं। म्यांमार के धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों के मंत्री के साथ मुलाकात के दौरान श्री शेषाद्रि ने उनसे एक प्रश्न पूछा, म्यांमार में हिंदुओं की आबादी कितनी है? मंत्री ने तुरन्त जवाब दिया, 100 प्रतिशत। यह सुनकर हम हैरान रह गए। उन्होंने आगे विस्तार से समझाया कि म्यांमार की जनसंख्या बौद्ध धर्म का पालन करती है, पर सांस्कृतिक रूप से वे हिंदू हैं। फिर उन्होंने बताया कि म्यांमार में भारतीय हिंदुओं की आबादी लगभग 2 प्रतिश्त है। इस तथ्य ने हमारे सबसे नजदीकी पड़ोसी दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ जुड़े हमारे स्नेह की डोर के पीछे की पूरी कहानी स्पष्ट कर दी।
भिक्खु हो या एक साधारण व्यक्ति, सभी के मन में एक बार भारत की पवित्र भूमि की यात्रा का सपना बसता है। इस लिहाज से म्यांमार से भारत के लिए पर्यटन की असीम संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। बौद्ध सर्किट पर्यटकों की बड़ी संख्या को आकर्षित  कर सकता है, बशर्ते उन्हें यात्रा की सुविधा उपलब्ध हो और यह समस्त पूर्वी क्षेत्र के लिए सच हो सकता है। यंगून म्यांमार की राष्ट्रीय राजधानी है, जबकि मांडले को सांस्कृतिक राजधानी कहा जा सकता है जहां बौद्ध भिक्षुओं के बड़े-बड़े मठ हैं। यह शहर सीधे वाराणसी या सारनाथ या बुद्ध सर्किट के साथ जुड़ा है।
हालांकि, सेना के शासनकाल के दौरान यह खूबसूरत देश विश्व से पूरी तरह कट गया था। बाहरी देश के लोगों को प्रवेश की अनुमति नहीं थी, खासकर पश्चिमी देशों से। विदेशी समाचार और टीवी पर पूर्ण प्रतिबंध था। बाहर से समाचार प्राप्त करने का एकमात्र जरिया बीबीसी रेडियो था, वह भी चोरी-छिपे। सभी अखबारों और टीवी समाचारों पर नजर और नियंत्रण रखा जाता था। इस तरह म्यांमार बाहर की दुनिया से पूर्णत: कट गया था और इसका सबसे नजदीकी पड़ोसी भारत सबसे दूर दिखाई देता था। भारत सरकार ने भी अपने पड़ोसी पर ध्यान नहीं दिया। सीमा के दोनों तरफ चंद लोगों ने लोकतंत्र के लिए आवाज उठाई। सिर्फ पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग-1 के शासन में ही ऐसा समय आया कि जब दोनों सरकारों के बीच दोस्ती और व्यापारकि रिश्तों को सुधारने के लिए बातचीत शुरू हुई।
म्यांमार में सैन्य शासन के कठिन वषार्ें के दौरान, सनातन धर्म स्वयंसेवक संघ ने स्थानीय समाज के साथ संबंध बनाए रखने का एक नया तरीका विकसित किया था। महात्मा बुद्ध के जीवन और उद्देेश्य पर एक प्रदर्शनी का स्वरूप तैयार किया गया जिसमें भारत से म्यांमार सहित दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक बौद्ध धर्म के विस्तार की गाथा प्रस्तुत की गई। इस प्रदर्शनी ने  बौद्ध समाज को मंत्रमुग्ध कर दिया था, लिहाजा तत्कालीन सैन्य सरकार ने आयोजकों से म्यांमार के सभी प्रमुख शहरों में इस प्रदर्शनी को आयोजित करने का आग्रह किया और इसका खर्च भी वहन किया। विभिन्न शहरों मेंं इस प्रदर्शनी को देखने के लिए हजारों लोग उमड़ पड़े। प्रदर्शनी में बौद्ध भिक्षुओं की यात्राओं को वर्ष और तिथियों के उल्लेख के साथ उकेरे नक्शे में दिखाया गया था जो इतना सजीव था कि श्रद्धालु उस पर सिक्के चढ़ा    रहे थे।
बर्मा में पहले सैन्य तख्तापलट के पूर्व वहां के निवासियों के जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं जैसे, स्वास्थ्य, इंजीनियरिंग और उद्योग, व्यापार आदि क्षेत्रों में भारतीयों की भूमिका बहुत अहम रही थी। सैन्य तख्तापलट ने इस रिश्ते पर ग्रहण लगा दिया और भारतीयों को अपनी नौकरी, व्यवसाय और कारोबार हमेशा के लिए छोड़ने को विवश होना पड़ा। अधिकांश विस्थापित समुदायों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। भारत पहुंचकर वे यहां के विभिन्न शहरों में बस गए। लेकिन अन्य विस्थापित समाजों के विपरीत म्यांमार से आए सभी लोगों ने भारत में सफल मुकाम हासिल किए। दिलचस्प बात यह है कि म्यांमार छोड़ने की मजबूरी के बावजूद वह भूमि उनके मन में खुशगवार यादों के रूप में ही बसी रही। उस देश के लिए उनके मन में कोई कड़वाहट नहीं, कोई शिकायत नहीं, सिर्फ प्रशंसा के बोल हैं।
जब मैं म्यांमार से लौटे लोगों से बात करता हूं तो उनके दिल में पल रही ख्वाहिश साफ झलक जाती है कि उन्हें पुन: वहां जाने का अवसर मिले, क्योंकि उनके लिए म्यांमार कर्म भूमि ही नहीं, धर्म भूमि भी है।    (क्रमश:)
(लेखक अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के महामंत्री हैं)

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