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समता मूलक है मूल भारतीय चिन्तन

Written byArchiveArchive
Mar 27, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 27 Mar 2017 14:17:30


एक नहीं, हमारे अनेक प्राचीन धर्मग्रंथों में ‘शूद्र’ वर्ण को सम्मानित स्थान पर बताया गया है। वे राज्य की प्रगति के सूत्रधार बताए गए हैं। शासन संचालन में उनकी महती भूमिका सर्वज्ञात थी। इस वर्ग के प्रति अस्पृश्यता या दुराग्रह रखने जैसा कोई अनुदेश या आग्रह हमारी सनातन संस्कृति में कहीं नहीं मिलता

भगवती प्रकाश

प्राचीन भारतीय हिन्दू चिन्तन के समता मूलक होने से उसमें जातीय विभेद, ऊंच-नीच व अस्पृश्यता आदि का कोई स्थान नहीं है। हमारे प्राचीन शास्त्रों में प्राणी मात्र के प्रति समता मूलक दृष्टि का निर्देश है। यथा, गीता में कहा है -मुझ परमात्मा को वे ही प्राप्त करते हैं जो समस्त जीवों के हित में संलग्न रहते हैं।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:।
                   (अ़ 12 श्रीमद्भगवद्गीता)
वस्तुत: अरबों के आक्रमण के बाद मुगल शासन व अंग्रेजों के औपनिवेशिक राज्य के अधीन देश में फैली, ऊंच-नीच, भेदभाव व अस्पृश्यता का पारस्परिक हिन्दू जीवन पद्धति में कोई स्थान नहीं था। अरब आक्रान्ताओं द्वारा बड़ी संख्या में ऐसे हिन्दू परिवारों को इस्लाम कबूलने को बाध्य करने हेतु उन पर असह्य ‘जजिया’ नामक कर लगाने, दासों से भी अधिक यंत्रणापूर्ण जीवन जीने को बाध्य करने और मैला उठाने सहित सभी प्रकार की अवमानना व अपमानजनक कार्य थोपे गए। मुगलों के काल में उसमें और वृद्धि हुई। इससे देश में करोड़ों लोगों को इस्लाम कबूलना पड़ा। अन्यथा प्राचीन हिन्दू वांड्मय में मानव ही नहीं, पशु-पक्षी व वनस्पति पर्यन्त प्राणी मात्र के प्रति करुणा दर्शाने एवं सभी को अपने जैसा मानने का आग्रह रहा है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में प्राणी मात्र में एक ही परमात्मा को देखना और कष्ट में पड़े प्राणियों को साक्षात् परमात्मा के रूप में मानकर उनकी सब प्रकार से सेवा करना सबसे बड़ा धर्म बतलाया गया है। अवर्ण-सवर्ण में भेद व ‘शूद्रों’ की हेयता दर्शाने का विचार अभारतीय है।
‘शूद्र’: प्राचीन भारत का उद्यमी वर्ग
प्राचीन काल में मूल्यवान वस्तुओं के उत्पादन में संलग्न उद्यमी वर्ग को ‘शूद्र’ कहा जाता था। वस्तुत: ‘शूद्र’ शब्द क्षुद्र से नहीं बना है: सबसे प्रथम आक्षेप यह है कि ‘शूद्र’ शब्द ‘क्षुद्र’ शब्द से बना है। यह सर्वथा तथ्यों से परे है। ‘शूद्र’ शब्द हेय नहीं है और यह क्षुद्र से नहीं बना है। अथर्ववेद में ‘‘अपने श्रम के पसीने से विविध उत्पादकीय कार्य में रत वर्ग को ‘शूद्र’ कहा गया है। अर्थात् परिश्रमपूर्वक विविध प्रकार की मूल्यवान वस्तुओं के उत्पादन में रत रहने वाले वर्ग को ‘शूद्र’ कहा गया है। यथा ‘शूद्र’ शब्द का निर्वचन निम्नानुसार है:
श्रमस्य स्वेदेन उत्पादन रत एव शूद्र:
अर्थात् अपने परिश्रम के पसीने से सब प्रकार की मूल्यवान वस्तुयें उत्पादित करने वाला ‘शूद्र’ है। इसीलिये भारत पर हुए बाहरी आक्रमणों के पूर्व, अपने उत्पादन कार्यों के प्रतिफल के फलस्वरूप ‘शूद्र’ का समाज में आर्थिक व सामाजिक स्थान अत्यन्त उच्च रहा है। इसीलिये कामन्दक नीतिसार में कहा है कि राजा को नया नगर बसाते समय ‘शूद्र’, जो विभिन्न मूल्यवान वस्तुयें उत्पादित करते हैं, व वैश्य, जो उन वस्तुओं के व्यापार से आय उत्पन्न करके राजस्व बढ़ाते हैं, को अधिक संख्या में बसाना चाहिये। इस नीति ग्रंथ में यहां तक कहा गया है कि ब्राह्मण व क्षत्रिय राज्योपजीवी हैं, उन्हें राज्य को जीविका व भृत्ति देनी होती है। इसलिये उनकी संख्या परिमित रखनी चाहिये। चूंकि मूल्यवान वस्तुओं का उत्पादन करने वाला यह वर्ग सर्वत्र फैला हुआ था और इस प्रकार के उत्पादन कार्य में संसाधन भी लगाने होते थे, इसके अनुरूप ही ऋग्वेद में ‘‘परिवार की उत्पादकीय सम्पत्ति या उत्पादन कार्य में लगी सम्पत्ति को पूंजी कहा गया है।’’ आज पूंजी की आधुनिक परिभाषा में ‘‘पूंजी मानव द्वारा उत्पादित, उत्पादन के साधनों’’ को कहा जाता है। इसमें परिवार का उल्लेख नहीं है। चूंकि ब्राह्मण को शिक्षा या अध्यापन के प्रतिफल से प्राप्त भिक्षा वृत्ति से ही जीवनयापन करना होता था। क्षत्रिय  को भी समाज रक्षण के बदले भृत्ति राजकोष से देनी होती थी। ‘क्षतात रक्षति इति क्षत्रिय’ (जो समाज को क्षति अर्थात् अन्यायपूर्ण हिंसा से बचाये वह क्षत्रिय)। सारी मूल्यवान वस्तुओं का उत्पादन करना ‘शूद्र’ का ही कार्य था। सीसा, जस्ता, तांबा, सोना आदि धातुओं के उत्पादन, उनसे विविध उपकरणों, बर्तन आदि का निर्माण, भूगर्भ से रत्न आदि निकालना, बनाना, वस्त्रोत्पादन, आभूषणों का उत्पादन, रथादि वाहनों का निर्माण, चर्म उत्पादों, धात्विक उत्पादों आदि का उत्पादन, यह सब कुछ ‘शूद्र’ वर्ग के अधीन था। इसलिये विदेशी आक्रमणों के दौर के पूर्व उनका समाज में आर्थिक वर्चस्व रहा है। अनेक श्रेणियों का यह उद्यम या पेशा तो ब्रिटिश शासन में  छिना है।
‘शूद्र’ वर्ग के विकेन्द्रित उत्पादन से समृद्धि
शिल्प सापेक्ष शूद्र जातियों में विभाजित विशाल उत्पादक वर्ग के अपने-अपने मूल्यवान उत्पादों के उत्पादन में संलग्न होने से उस परंपरानुसार ऋग्वेद ने परिवारों की उत्पादकीय सम्पत्ति को पूंजी की परिभाषा दी है। यही कारण है कि ब्रिटिश आर्थिक इतिहास लेखक एंगस मेड्सिन की पुस्तक ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक हिस्ट्री-ए मिलेनियम पर्सपेक्टिव’ के अनुसार ईस्वी वर्ष 1 से 1500 तक प्रकाशित घरेलू उत्पाद में भारत का अंश 33 से 30 प्रतिशत तक था। ऋग्वेद में शतरित्र अर्थात् बड़े जलयानों से समुद्र-पार दूर देशों से प्रचुर मात्रा में व्यापार की ऋचाएं (मंत्र रूप में वर्णन) हैं। हाल ही में तमिलनाडु के काडूमनाल नामक स्थान पर 2500 वर्ष प्राचीन औद्योगिक नगर के अवशेष मिले हैं। वहां पर प्राचीन वस्त्रोद्योग, रत्न प्रविधेयन, इस्पात उत्पादन आदि उद्योगों के अवशेष मिले हैं। इस्पात व विशेषकर स्वल्प कार्बन युक्त इस्पात उत्पादन में प्रयुक्त होने वाले विट्रीफाइड क्रुसीबल भी मिले हैं। आज हम कहते हैं कि विट्रीफाइड टाइलें विट्रीफिकेशन तकनीक से यूरोप में विकसित हुर्इं। लेकिन हमारे ‘शूद्र’ जाति के उत्पादक कौशल विशेषज्ञ, जो उस काल के उत्पादक थे, की पारिवारिक सम्पत्ति जो उत्पादन में प्रयुक्त होती थी, वही ऋग्वेद के अनुसार पूंजी की श्रेणी में आती थी और यह 2,000 वर्ष पूर्व अतीत की अनेक सहस्राब्दियों में भारत की प्राचीन समृद्धि का आधार रहा है।
‘शूद्र’ की प्राचीन समृद्घि के प्रमाण
देश में उत्पादन की प्रचुरता एवं  समग्र उत्पादन शिल्प-सापेक्ष ‘शूद्र’ जातियों या श्रेणियों द्वारा ही किया जाता था और उसके आधार पर ही राजकोष से भी अधिक धन ‘शूद्र’ जातियों के पास होता था। इसीलिये राज्य के अतिथियों का आतिथ्य भी महाभारतकाल में ‘शूद्रों’ पर अवलम्बित था। महाभारत में ‘शूद्र’ का धर्म अतिथियों के सत्कार व उनके भोजन-आवास आदि की व्यवस्था बताकर उनके महत्व को स्पष्ट किया गया है जिसका निम्न श्लोक में स्पष्ट कथन है:
सशूद्र: संशिततपा जितेन्द्रिय:। सुश्रुर्तिथिं तप: संचिनुते महत्॥ (महाभारत-अनुशासन पर्व)
एगंस मेड्सिन के अनुसार विश्व का एक तिहाई उत्पादन भारत में होने व हमारे प्राचीन वांड्मय के अनुसार समग्र उत्पादन का दायित्व ‘शूद्रों’ पर ही होने से ‘शूद्र’ राज्य की अर्थव्यवस्था का भी आधार होते थे। उसके कारण ही पूर्वोक्त कामान्दक नीतिसार आदि धर्मशास्त्रों में राज्य में ऐसी उत्पादन आय से धनी ‘शूद्रों’ को ही अधिक संख्या में रखे जाने की अनुशंसा की गई है। इसी आधार पर पुराणों के इस वचन की भी पुष्टि होती है कि ‘शूद्रों’ के सर्वाधिक धनी होने के कारण उनके मकान व भूमि के मापन का फीता या सूत्र स्वर्ण अर्थात् सुवर्णमय डोर का हुआ करता था।
पुराणों व प्राचीन वास्तु ग्रंथों आदि में ‘शूद्र’ के भवन निर्माण आदि में प्रयुक्त नापने वाला सूत्र, फीता या डोरी का स्वर्ण निर्मित तक होना बतलाया गया है जबकि ब्राह्मण का कुशा नामक घास का, क्षत्रिय का मुंज की डोरी का, और वैश्य का कपास का बताया गया है। 
ब्राह्मणस्य सूत्र दर्भजं, मौजन्तु त क्षत्रियस्य।
कार्पासं च भवैद्वैष्ये, स्वर्णनिर्मितं शूद्रस्य सूत्रम्॥
इस सुवर्णमय फीते या डोर के उद्धरण को अतिशयोक्ति नहीं कहा जा सकता क्योंकि सारी लोक कथाओं में ब्राह्मण को निर्धन ही बतलाया गया है। क्षत्रिय को भी मित साधन वाला ही बतलाया जाता रहा है। अंगे्रजों द्वारा ब्रिटेन से लाये गए माल से ही देश में ‘शूद्र’ नाम से जाने वाले वर्ग का उद्यम चौपट हुआ।
भेदभाव रहित व्यवहार : ‘शूद्र’ अछूत नहीं
वस्तुत: ‘शूद्रों’ को अछूत तो 1574 ईस्वी (सम्वत् 1631) में रामचरितमानस लिखे जाने के समय भी नहीं माना गया था। तुलसीदासजी ने 442 वर्ष पूर्व लिखे रामचरित मानस के उत्तरकांड में भी चारों वर्णों के    लोगों द्वारा साथ-साथ जल भरने, स्नानादि का वर्णन किया है, यथा :
राज घाट बांधेऊ परम मनोहर। तहां निमज्जिउ वरण चारिउ नर॥ (रामचरित मानस, उत्तर काण्ड)
इसी प्रकार सूत जाति, जिन्हें स्व-उद्यम रत ‘शूद्रों’ की जाति में गिना जाता रहा है, उन्हीं सूत जी को द्वापर युग के अन्त व कलि के प्रारम्भ में पुराणवेत्ता कहा गया है, जो ऋषियों को पुराणों का ज्ञान देते रहे हैं। ऋषियों के सम्मुख सभी पुराणों का विवेचन सूत जी ही करते, पुराणों में यह बतलाया गया है। रामायण में सुमंत दशरथ के, महाभारत में संजय व इसी प्रकार, हर काल में सूत गण राजाओं के मंत्री तुल्य पारिवारिक सलाहकार हुआ करते थे। विवाह कर्म में दूल्हे का सूत्रधार, सलाहकार, या कहें संरक्षक जैसी स्थिति में केवल नाई जाति का बंधु ही होता आया है। द्रौपदी सैरंध्री की भूमिका में राजा विराट की पत्नी की सेविका होते हुये भी उनकी निकटतम सखी रही है।
वेदाध्ययन ‘शूद्र’ का समान अधिकार
वेदाध्ययन के सन्दर्भ में भी कभी यह भी आक्षेप या आरोप लगाया जाता है कि वेदों में ‘शूद्रों’ के वेदाध्ययन का निषेध है जो सर्वथा असत्य है। वेदों में शूद्रों के लिये वेदाध्ययन के निषेध का कोई श्लोक नहीं है। इसके विपरीत यजुर्वेद 26(2) में ‘शूद्रों’ को भी वेदाध्ययन कराने का स्पष्ट सकारात्मक निर्देश है। यथा-
‘‘यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्य:। ब्रह्मराजन्याज्या शूद्रायचार्याय च स्वाय चारण्याय।
प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भूयासमयज्मे काम: समृद्धतामुपमादो नमतु॥’’ यजुर्वेद अ़ 26 मंत्र 2
अर्थ: मंैने (परमात्मा ने) जिस प्रकार यह वेद रूपी वाणी आप (ऋषियों) को दी है, उसी प्रकार आप सभी इसे, ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य व शूद्र सभी को पढ़ाओ। अपने परिवारों में (स्वाय), अरण्यों (वनों) में रहने वाले (च अरण्याय) आदि सभी को वेद पढ़ाओ। इस प्रकार वेदाध्ययन शूद्र सहित किसी के लिये निषिद्ध नहीं था।
भेदभाव रहित अपनत्व : हिन्दुत्व की कसौटी
हिन्दुत्व में मनुष्य ही नहीं, प्राणी मात्र के प्रति अगाध सद्भाव का निर्देश है। अपने से भिन्न किसी मत-मतान्तर वालों के प्रति भी हिंसा का निर्देश नहीं है। हां, ऐसे दुराचारियों से समाज की रक्षार्थ सन्नद्ध रहना धर्म कहा गया है। प्राणी मात्र के प्रति इसी प्रकार के सद्भाव की वरुण से प्रार्थना की गई है यथा-
ते दृहं मा मित्रस्य मा चक्षुषा, सर्वाणि भूतानिसमीक्षन्ताम्।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानिसमीक्षे। मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे (यजुर्वेद 36/18)
भावार्थ: हे परमेश्वर! हम सम्पूर्ण प्राणियों में अपनी ही आत्मा को समाया हुआ देखें, किसी से द्वेष न करें और जिस प्रकार एकत्रित एक मित्र दूसरे मित्र का आदर करता है, वैसे ही हम भी सदैव सभी प्राणियों का सत्कार करें।
सम्पूर्ण समाज आपस में परस्पर भेदभाव रहित व समरस व्यवहार करे, अथर्ववेद में यह स्पष्ट व असंदिग्ध निर्देश है। यथा वेदों में भोजन व जलस्रोतों के उपयोग के भेदभाव का अभाव।
समानी प्रपा सहवोऽन्नभाग: समाने योक्त्रे सहवो युनज्मि। सम्यंचे:ग्निं सपर्य तारा नाभिमिकाभित:॥
                            (अथर्व़ 3़ 30़ 06)
भावार्थ: तुम्हारी जल शाला एक हो, अन्न का विभाजन साथ-साथ हो, एक ही जुए में तुम जुडेÞ हुए हो। तुम सब प्रजाजन मिलकर ज्ञान रूप प्रभु की पूजा करो।
वेदों व उपनिषदों में मानव मात्र की भलाई की भावना रखना, सब के हित को अपना हित समझकर तद्नुकूल आचरण करना धर्म कहा गया है। उपनिषद्कार के शब्दों में-
सर्वेऽत्र सुखिन: सन्तु सर्वे सन्तु निरामया:। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत।
अर्थात : इस संसार में सबकी सबके प्रति सद्भावना रहे। सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, सभी आत्म-कल्याण को प्राप्त करें और किसी को दु:ख न हो। यह शुभ कामनायें ही सद्जीवन का मूल हैं। इसमें प्राणी मात्र का हित समाया हुआ है। इसी प्रकार धर्म की हमारे धर्मग्रंथों में जो व्याख्या की है, वह मानवता के चिरकालीन सुख व सौहार्द का मार्गदर्शन है।
उन्नत विज्ञान-प्रौद्योगिकी-अर्थव्यवस्थां
समग्र उत्पादन कार्य व उसकी प्रौद्योगिकी देश भर में उत्पादन में रुचिशील ‘शूद्रों’ के अधीन थी व व्यापार व वाणिज्य वैश्य वृत्ति में रुचिवान व्यक्तियों के अधीन होता था। जिस अथर्ववेद में अपने श्रम के स्वेद (पसीने) से मूल्यवान वस्तुओं के उत्पादक को ‘शूद्र’ नाम दिया गया है उसमें सारी उत्पादन प्रौद्योगिकी भी सूत्रबद्ध है। शब्दों के वैदिक निर्वचन तक में भी उत्पादन प्रौद्योगिकी के सूत्र हैं। इस प्रकार प्राचीन भारत में ‘शूद्र’ उपेक्षित न होकर सर्वाधिक वांछित व समृद्ध वर्ग था और भारतीय समाज एक समरस समाज रहा है। विगत 1200 वर्षों के परकीय शासन में ही ऊंच-नीच की विकृति उपजी थी।

 

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