सेनापति आजाद की स्मृति में
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सेनापति आजाद की स्मृति में

Written byArchiveArchive
Mar 20, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 20 Mar 2017 17:00:09

 


पाञ्चजन्य ने सन् 1968 में क्रांतिकारियों पर केंद्रित चार विशेषांकों की शृंखला प्रकाशित की थी। दिवंगत श्री वचनेश त्रिपाठी के संपादन में निकले इन अंकों में देशभर के क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाएं थीं। पाञ्चजन्य पाठकों के लिए इन क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाओं को नियमित रूप से प्रकाशित कर  रहा है। प्रस्तुत है 22 जनवरी ,1968 के अंक में प्रकाशित शहीद चंद्रशेखर आजाद के साथी रहे सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय के आलेख :-

आज से 36 वर्ष पूर्व का 27 फरवरी का अत्यंत मनहूस दिन। इलाहाबाद नगरी के अल्फ्रेड पार्क के चारों ओर विशाल जनसमुदाय एकत्र है। चेहरों में विषाद की छाया स्पष्ट परिलक्षित हो रही है। सभी एक ही बात का जिक्र कर रहे हैं। क्रांतिकारी सेनापति चंद्रशेखर आजाद की अद्वितीय बहादुरी, बहुत बड़ी संख्या में पुलिस द्वारा घेर लिए जाने पर भी अदम्य साहस के साथ उसका सामना करना और जीवित पुलिस के हाथों न पड़ने की प्रतिज्ञा का निर्वाह करना।
लीडर ने भी लिखा…
क्रांतिकारी आंदोलन के सर्वप्रमुख नेता श्री आजाद अंग्रेजों की पुलिस के साथ युद्ध में जिस अद्भुत वीरत्व का परिचय देते हुए शहीद हुए थे, जिस रणकौशल एवं साहस से काम किया था, उसका ऐसा चमत्कारिक प्रभाव पड़ा कि क्रातिकारियों की प्रत्येक बात की कटु आलोचना करने वाले दैनिक लीडर के मुखपृष्ठ की हेड लाइन थी ‘ए रिवाल्यूशनरी गिव्ज बैटिल टु दि पुलिस’- एक क्रांतिकारी द्वारा पुलिस से युद्ध। क्रातिकारियों की प्रत्येक बात में निंदा करने वाला लीडर उस दिन पहली बार और आखिरी बार क्रातिकारी के प्रशंसक के रूप में प्रकट हुआ था।
आजाद की महानता
क्रांतिकारी आंदोलन ने एक से एक महान व्यक्त्वि उत्पन्न किए हैं। सावरकर जैसा वक्ता, अरविंद जैसे मनीषी, हरदयाल जैसे प्रचारक, भगतसिंह जैसे बलिदानी, सूर्यसेन जैसे संगठनकर्ता, भगवतीचरण जैसे त्यागी, मानवेंद्रनाथ राय जैसे विद्वान। किन्तु आजाद की महानता अद्भुत थी। वे विद्वान न थे किंतु विद्वान उनकी सूझ-बूझ के कायल थे। वे दार्शनिक नहीं थे किंतु हमारी क्रांति की फिलॉसफी क्या हो, उसे उनसे बढ़कर कोई समझ नहीं पाया था। वे प्रचारक नहीं थे फिर भी गांधीजी के प्रचार के बावजूद तरुण उनके ही पीछे थे। वे संगठनकर्ता न थे, किंतु उनके अधीन क्रांतिकारी दल अपने चरम विस्तार पर पहुंचा था और त्याग की बात तो अब सर्वविदित है। हजारों का खर्च करने तथा लाखों लाने की क्षमता रखने वाले आजाद के माता-पिता की करुणारंचित कथा एक हद तक प्रकाशित हो चुकी है। रही वीरत्व और बलिदान की भावना, उसके संबंध में इतना ही कहना पर्याप्त है कि आजाद-युग के प्रमुख क्रांतिकारी किसी या कुछ एक साहसिक कार्यों में सम्मिलित दिखाई देते हैं, किंतु क्रांतिकारी दल की कौन सी दुर्घटना है, जिसमें आजाद का अदम्य व्यक्तित्व नहीं दमक रहा है।
वह कौन था?
काकोरी में ट्रेन लूटी गई तो अद्भुत कर्मा वह किशोर कौन था? योगश चटर्जी को छुड़ाने का प्रयास हुआ तो उसका नेतृत्व कौन कर रहा था? भगतसिंह और राजगुरु ने सौंडर्स का वध किया तो जब चननसिंह भगतसिंह को दबोच ही लेने वाला था। तब उस दानवाकार को पछाड़ कर भगतसिंह आदि को कौन बचा ले गया? बटुकेश्वर दत्त और भगतसिंह ने असेंबली में बम फेंक कर गिरफ्तार होना ही उचित माना, किंतु उन्हें अपने साथ निकाल लाने का बीड़ा कौन उठा रहा था? पुलिस की छावनियों के बीच घुस कर जेल से लाहौर षड्यंत्र के बंदियों को लड़कर निकाल लाने की योजना बनी तो तो उन आक्रमणकारियों का परिचालक कौन था?
भाई भगवतीचरण बम विस्फोट से शहीद हो गये, तब पुण्यसलिला रावी के तट पर उन्हें समाधि किसने दी? पुलिस और सी.आई.डी से भरे उस लाहौर के बहावलपुर रोड पर स्थित बंगले में दो-दो बम फूटे, उस समय साथियों को ही नहीं, साज-सामान को कौन ले गया? दिल्ली के चांदनी चौक में गाडोदिया स्टोर से और कानपुर में कलक्टरगंज कोतवाली के पीछे तथा पुलिस चौकी से सटी हुई कच्छी की दुकान से रुपया छीन लिया गया, ये दुर्धर्ष कृत्य किसके नेतृत्व में सफल हुए?
धन्य! धन्य! सालिगराम!
वीरवर सालिगराम ने अमानीवय कष्ट सहने और शौर्य का उदाहरण पेश किया। तीन गोलियों से भारत के चार शत्रुओं को भूमि पर लिटा दिया। धन्य!धन्य! किंतु पुलिस के दल-ब-दल और सहायक सेना के मुख्यालय के सामने से सबकी आंखों में धूल
झोंकता हुआ साथियों सहित यह कौन निकल गया? जगह-जगह विस्फोटकों की फैक्टरियां और बमों के खोल ढालने के कारखाने चल रहे हैं। शत्रु के जासूस भी इस दक्षता को देखकर चकित हैं। इनके पीछे किस जादूगर का हाथ है?
धोखे से वार
प्रयाग के अल्फ्रेड पार्क में एक गठीला युवक बैठा हुआ है। अचानक नाटबाबर की कमान में पुलिस दल घेरा डाल देता है। नाटबाबर को पूछना चाहिए- तुम कौन हो? लेकिन मुंह से नहीं, पिस्तौल से आवाज निकली और एक ओर ध्यान दिए बैठे युवा की जंघा की हड्डी चूर-चूर हो गई। उसने जेब में हाथ डाला कि वह भी पिस्तौल निकाले तब तक दूसरी ओर से गोली उसकी दाहिनी भुजा का चीरती हुई फेफड़े में घुस गई। आह! अब तो युवा एक मिनट भी जीवत न रह सकता-डॉक्टरों ने ऐसा ही मत बाद में दिया है।
नाटबाबर : ब्रिटिश साम्राज्य का गीदड़
लेकिन अरे, यह बायां हाथ बिजली की भांति किसका कौंधा? युवक की पिस्तौल गरजी। नाटबाबर को क्या हो गया। पिस्तौल पकड़े हुए हाथ की कलाई टूट गई। पिस्तौल जमीन पर गिर पड़ी। देखो, देखो नाटबाबर भागा जा रहा है। मोटर पर बैठकर भाग न जाए, युवक के बाएं हाथ में पिस्तौल फिर गर्जन कर उठी। मोटर का इंजन चूर हो गया। नाटबाबर प्राण बचाकर भाग रहा है। वह पेड़ के पीछे छिप गया। युवा भी खिसक कर बढ़ा। उसके सामने वाले पेड़ पर उसने आश्रय लिया है। दाहिने, बाएं, सामने, सभी ओर से गालियां आ रही हैं। लेकिन युवा तो नाटबाबर पर लक्ष्य लगा रहा है। वह कह रहा है- ओ ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधि, सामने आ जा। भारतीय क्रांतिकारी के सामने गीदड़  की तरह क्यों दुबका खड़ा है? अरे हिन्दुस्तानी सिपाही भाइयो! तुम क्यों मेरे ऊपर अंधाधुंध गालियां बरसा रहे हो? मैं तो तुम्हारी आजादी के लिए युद्ध कर रहा हूं। तुम समझो तो सही हो, तुम निर्बुद्धि चलाए जाओ गोली। मैं तुम्हें नहीं मारूंगा।
गाली बकने वाला जबड़ा चूर हो गया
ओह! यह दाहिनी ओर से कौन गोली चला रहा है। यह किसका मुंह झाड़ी के ऊपर से निकला! यह तो एस.पी. विश्वेश्वर सिंह है। इसी की गोली ने बांह और शरीर छेद किया। किंतु कापुरुष, यह तो गाली भी देने लगा। अच्छा ले! युवा के हाथ में पिस्तौल गरज उठी। विश्वेश्वर सिंह का गाली बकने वाला जबड़ा चूर हो गया। पातकी भूमि पर लुढ़क पड़ा, शत्रु भी इस करिश्मे को देख वाह-वाह कर उठे। यह सी.आई.डी के आईजी का लेख बोल रहा है। वंडरफु, वंडरफुल शॉट (आश्चर्यजनक, आश्चर्यजनक निशानेबाजी)।
अंतिम गोली
युवा के हाथ में अब केवल एक गोली शेष है। उसकी वीरता देखिए, धीरता की दाद दीजिए। गोली जंघा में घुस गई है। फिर भी प्राय: आधे घंटे से वह निशानेबाजी के अद्भुत, आश्चर्यजनक प्रदर्शन कर रहा है! इतना ही नहीं, वह यह भी गिनता जा रहा है कि कितनी गालियां खर्च हो गई हैं। अब केवल अंतिम गोली बाकी है। यह गिनती क्यों? क्योंकि उसने प्रण कर रखा है कि वह बंधन में नहीं पड़ेगा। इतना ही नहीं, उसने एक दिन लिखा भी तो था- आजाद हैं, हमेशा आजाद ही रहेंगे।
एक विश्वासघाती ने भी कहा
बायां हाथ उठा, पिस्तौल कर्णपुट के पास आई। एक धांय से आवाज हुई। गोली मस्तक में समा गई। शरीर भूमि पर लेट गया। क्रांतिकारी दल का दीपक बुझ गया। भारतीय जनता में कोहराम मच गया। वह कौन है? वह युवा कौन है? यह है क्रांतिकारी आजाद। मानवों ने कहा यह है सेनापति आजाद। और विश्वेश्वर सिंह के एक अंधेरे कोने में दुबके एक विश्वासघाती ने कहा, यह है आजाद।
आजाद की महानता का सबसे बड़ा प्रमाण है कि उनके नेतृत्व में क्रांतिकारी दल सभी दिशाओं में उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचा और उनकी मृत्यु के उपरांत समाप्त भी हो गया। जिस भारी भार को उनकी बलवान बाहें वहन करती थीं, किंतु उनके तिरोहित होने पर नाव को खेकर पार लगाना हमारी कमजोर कलाइयों के बूते की बात नहीं रही। किंतु निराशा का वरण सहज नहीं है। जेल की कालकोठरी में बंद मेरे पार्थिव शरीर का स्वामी एक रात आशा के उड़नखटोले पर उड़कर सेनपति आजाद के समीप जा पहुंचा और मेरे मानस ने इन पंक्तियों में संबोधित किया-
भ्रम में है अत्याचारी  
यदि तुमको मृतक मान बैठे,
भ्रम में हैं वे अविचारी जो
‘मिटा दिया’ कहकर ऐंठे।
तुम चिरजीवित हो
तरुणों की आशा में, उत्साहों में।
स्वतंत्रता की अगणित धारा की
बलशाली बाहों में।
इंगित करते बढ़ने को,
उधर जहां है उजियाला।
बस सेनापति! थोड़ी सी,
दे दो अपनी अंतर्ज्वाला।
और क्रांतिकारी दल का कारवां भी सो गया
बहुत दिनों बाद ज्ञात हुआ कि सेनापति ने अपनी अंतर्ज्वाला की एक चिंगारी भी तो मुझे नहीं दी। किसी और को यदि दी हो तो उसके पास भी जान पड़ता है, सुलगी नहीं, अबिलंब बुझ गई। तभी तो क्रांतिकारी दल का करवां उजियाला होते ही जो सोया तो फिर सोता ही रह गया।
उन्होंने तय किया कि समस्त फरार क्रांतिकारी ही नहीं, अपितु हजारों की संख्या में तरुणों को शिक्षा प्रचार और संगठन कार्य में निपुणता प्राप्त करने के लिए रूस भेजा जाए। मुझे, यशपाल और वैशम्मयन को इस कार्यक्रम को कार्यान्वित करवाने के लिए ही वे 1 मार्च 1931 को रूस रवाना कर रहे थे किंतु केवल दो दिनों पूर्व 20 फरवरी को उनकी मृत्यु हो जाने के कारण हम लोग इस कार्यक्रम को कार्यान्वित नहीं कर पाए।
दो अतथ्य
दो अतथ्य बातों का निराकरण कर देना यहां आवश्यक जान पड़ता है। कुछ लेखों में यह कहा गया है कि आजाद स्वयं भी रूस जाना चाहते थे, यह बात एकदम असत्य है।
रूस में नहीं मेरी हड्डियां तो यहीं गलेंगी
लाहौर-षड्यंत्र से छूटकर आने के बाद आजाद के कहने पर मैं पुन: घर छोड़ने को राजी हो गया और फरार के रूप में इलाहाबाद में उनके साथ ही घर में रहता था। उनकी प्रतिभा जैसा असाधारण विस्तार दिन दूना रात चौगुना हो रहा था, उसे देखकर मैं आश्चर्यचकित था। मेरा विश्वास है कि जिसने उनके मानसिक विकास को एक महीने पहले देखा हो, एक महीने बाद की उनकी विकसित मानसिक प्रतिभा देखकर वह पहचान नहीं सकता था कि यह वही पहले वाला व्यक्ति है। मैंने देखा जैसे-जैसे उनका उत्तरदायित्व बढ़ता जाता है, उससे भी तीव्रता से उनकी योग्यता का क्षितिज विस्तृत होता जाता है। इसलिए उन दिनों मेरी सबसे प्रबल इच्छा यह थी कि आजाद किसी प्रकार जीवित बने रहें, क्योंकि केवल वही हैं जो कि समझ पाए हैं कि हमारी क्रांति का स्वरूप क्या है और वह कैसे लाई जा सकेगी? फलत: मैं उनसे दिन-रात जब भी मौका मिलता तर्क करता- भइया! तुम रूस जाओ। तुम्हारी यह योजना तुम्हारी ही देखरेख में सफल बन सकेगी। और मेरे तर्कों का उनकी ओर से उत्तर होता था- तुम्हीं बताओ पाण्डेय, यहां और कौन है जो हजारों युवकों को भेजने का सगठन और प्रबंध कर सकेगा? और मैं चला जाऊंगा तो हमारे तरुणों के साहस का पतन हो जाएगा, क्या तुम यह नहीं समझते? भाई मेरी हड्डियां तो यहीं गलेंगी।
कम्युनिस्ट पार्टी ही विकल्प नहीं
दूसरे, कई ओर से यह सिद्ध करने की चेष्टा चल रही है कि हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोशिएशन का उद्देश्य सोशलिज्म होने के कारण उसकी परिणति अंततोगत्वा कम्युनिस्ट पार्टी में ही होनी चाहिए। तात्पर्य यह कि आजाद और भगतसिंह जैसे और ईमानदार व्यक्ति समझने-बूझने का मौका पाते तो अंत में वे कम्युनिस्ट पार्टी में ही भरती हो जाते, क्योंकि वही क्रांति की पथ निर्देशिका हो सकती है। उस समय बौद्धिक विकास पूरी तरह न हो पाने के कारण वे एच.एस.आर.ए. में बने रहे। जहां तक मैं जानता हूं, यह बात भी मिथ्या है। श्री भगतसिंह और श्री आजाद के जीवनकाल में कम्युनिस्ट पार्टी काम कर रही थी, किंतु वे उसमें भरती नहीं हुए। क्यों? वे उसकी नीति से सहमत नहीं थे। एच.एस.आर.ए. की नीति को वे देश की तत्कालीन स्थिति के अनुकूल समझते थे। तब क्या बाद को कम्युनिस्ट पार्टी की नीति सही की सीधी लकीर पर चलती गई जिसके कारण ईमानदार क्रांतिकारियों को उसके पीछे चलने के सिवाय दूसरा रास्ता नहीं था? ऐसा भी नहीं है।
विचार हीन
राजनीतिक इतिहास के विद्यार्थी जानते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी जिस नीति को पकड़ती रही है- कुछ समय के बाद वही नीति उसे गलत दिखाई पड़ने लगती गई है। सच पूछिए तो उसकी नीति का इतिहास केवल इतने शब्दों में है- यह भी ठीक नहीं, यह भी ठीक नहीं और यह भी ठीक नहीं? विचारक इस बात को विचारहीन समझते हैं कि अब भी उसकी नीति निर्मल और उद्देश्य सर्वोत्तम है। कहां और क्या गलती है- इसका निरुपण यहां नहीं हो सकता है, क्योंकि यह विवेचना इस लेख के विषय के बाहर है।
पिछलग्गूपन के प्रति ‘विनम्र सम्मति’
तब बहुत से क्रांतिकारियों ने कम्युनिस्ट पार्टी को क्यों पकड़ रखा है? मेरी विनम्र किंतु सच्ची सम्मति यह है कि इनमें विचारक और नेता की योग्यता नहीं है। न भगतसिंह और न आजाद के समय थी और न अब है। वे तब भी पीछे-पीछे घिसटते थे और अब भी घिसट रहे हैं। वे यहां के हों या वहां के, केवल इतना ही अंतर हो सकता है। मैं तो कहना यह चाहता हूं कि होना यह चाहिए था कि दल के कार्यकर्ता क्रांतिकारी दल के कार्यक्रम और उसकी फिलॉसफी को सामाजिक विकास की अवस्था और परिस्थितियों के मोड़ों के अनुरूप परिमार्जित अथवा नवनिर्मित करके एक ऐसे राजनीतिक दर्शन का निर्माण करने में समर्थ होते, जिससे प्राणोदित ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोएिशन’ ही देश को नेतृत्व प्रदान करने में समर्थ होता।
और वह कलंक कथा
मैं जितना भी सोचता हूं, लगता है आजाद का जीवनवृत्त विचारशीलों के लिए अध्ययन योग्य है। उसमें विचार योग्य तथ्यों के अंकुर हैं। और उनकी मृत्यु? क्यों हुई? कैसे हुई? क्रांतिकारी आंदोलन की वह गौरवशाली और उसके पीछे ओझल वह कालिमा की कहानी पुराने और नवीन, प्राप्त संपूर्ण तथ्यों सहित, काश वह भी लिपिबद्ध हो सकती।    ल्ल

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