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नेहरू-चाऊ मिलन

Written byArchiveArchive
Mar 14, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 14 Mar 2017 12:57:37

इतिहास के पन्नों से
पाञ्चजन्य
वर्ष: 13  अंक: 40
18  अप्रैल,1960

—:  लल्लन प्रसाद व्यास :—

19 अप्रैल इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिन माना जाएगा जब विश्वव्यापी महत्व की समस्या भारत-चीन सीमा विवाद पर वार्ता करने के लिए चीनी प्रधानमंत्री श्री चाऊ एन लाई भारत आ रहे हैं। जैसा कि प्रधानमंत्री श्री नेहरू ने कहा है कि श्री चाऊ एन लाई हमारे सम्मानित अतिथि होंगे। आतिथ्य सत्कार भारतीय धर्म और संस्कृति का एक विशिष्ट अंग रहा है अतएव भारतीय जन-मन में चीन के आक्रामक रवैये के प्रति तीव्र क्षोभ होने के बावजूद भारत आने पर उनका यथोचित सत्कार करना वांछित एवं अपेक्षित है। इतिहास में भी ऐसे अनेक उदाहरण आक्रामक और  आक्रांत देशों के नेतागण सौहार्दपूर्ण वातावरण में मिले हैं तथा उनमें मैत्रीपूर्ण समझौते हुए हैं।
प्रमुख प्रश्न- परन्तु इस समय देश के समक्ष सर्वप्रमुख प्रश्न चीनी प्रधानमंत्री के स्वागत करने या न करने का नहीं है, बल्कि यह है कि दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच जो कुछ भी समझौता हो वह राष्ट्रीय आत्मसम्मान और प्रतिष्ठा के अनुकूल हो क्योंकि उसके पूर्व सरकार के कुछ शीर्षस्थ नेताओं द्वारा समय-समय पर सीमा-विवाद के संबंध में जो उद्गार प्रकट किए गए हैं उनसे इस अनिष्टकारी आशंका को जन्म मिला है कि भारत-चीन सीमा-विवाद पर समझौते की व्यग्रता में कहीं अपने देश का कुछ भूभाग दूसरे को न सौंप दिया जाए। संभव है कि यह आशंका कालांतर में निर्मूल ही सिद्ध हो परंतु जन-समाज में इस आशंका का होना ही दुर्भाग्यपूर्ण माना जाएगा क्योंकि यह भावना देश के शासक और जनता के बीच परस्पर विश्वास और भरोसे के अभाव की द्योतक है। यही कारण है कि लोकसभा में कम्युनिस्टों को छोड़कर शेष सभी विरोधी दलों के नेताओं ने प्रधानमंत्री के पास संयुक्त रूप से एक पत्र भेजकर अपील की है कि चीनी प्रधानमंत्री से वार्ता करते समय वे दृ़ढ़ता की नीति का पालन करें तथा कोई ऐसा समझौता न करें जिससे कि देश के किसी भूभाग को चीन के हाथों सौंपना पड़े।
आशंका का जन्म- सम्पूर्ण भारत-चीन सीमा विवाद के इतिहास पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि चीन द्वारा इस अतिक्रमण और आक्रमण के पीछे एक ही उद्देश्य है और वह यह कि लद्दाख के एक बड़े भूभाग विशेषकर आक्साई चिन प्रदेश को सदैव के लिए अपने में मिला लेना क्योंकि यह प्रदेश तिब्बत से सटा हुआ होने के कारण चीन के लिए सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस प्रदेश में सिक्यिांग से तिब्बत जाने वाली 100 मील लंबी सड़क बना लेने के बाद उसके लिए इस क्षेत्र का महत्व और भी बढ़ गया है। चीन की यह मंशा उस समय पूरी तरह से प्रकाश में भी आ गई, जब नवंबर मास में उस आशय का समाचार प्रकाशित हुआ कि चीनी गणतंत्र के वर्षगांठ समारोह 'अक्तूबर मास' में भाग लेने के लिए भारतीय कम्युनिस्ट नेताओं और चीनी नेताओं में यह गुप्त मंत्रणा हुई कि चीनी मैकमहन सीमा रेखा में मान लें।

आबाद रहे हमारे नगरों का यह स्वर्ग!

—: डॉ. गोपीनाथ तिवारी:—

आज का भारतीय जीवन नगर केंद्रित बन गया है। गांव वाले नगरों की ओर दौड़ रहे हैं। गांव का बालक नगर में पढ़कर वहीं 80 रुपए पर टिक जाता है और अपने पैतृक खेतों से मुख मोड़ लेता है। वह क्लर्की की चाय और पाव रोटी खाकर टूटी कुर्सी पर बैठने को तैयार है किन्तु गाय-भैंस दुह करके ,एक सेर दूध पीने के लिए तैयार नहीं, खेत जोतकर भरपेट मोटी-रोटी खाकर दूसरों को खिसाने ने गिड़गिड़ाकर अपने राजकुमार से कहा-बेटा घर चल। देख तू मेरे घर का चांद है। मेरे पास इतनी बड़ी खेती है। मेरी हवेली पर दस बैल और चार गायें बंधी हैं। नगर के तृष्णापूर्ण जीवन से मोहित हुआ पुत्र बोला- नहीं, मैं नहीं जाऊंगा, न वहां सिनेमा, न बिजली। मैं होटल में ही खा लूंगा यदि मेरी पत्नी को न भेजा आपने। एक रिक्शेवाले का भाई बुलाने आया- भइया! अपनी खेती है, प्रतिष्ठा है, मकान है। पर नगर के जीवन पर लट्टू छोटा भाई बोला-मुझे यही छोडि़ए। मैं न जाऊंगा। मैंने छोड़ी जमीन।  मैं अंधेरे में धूल फांकने न जाऊंगा। बड़ा भाई बोला- पर तेरी कोठरी भी तो अंधेरे से ढकी है। परंतु  वह बोला- पर सारा शहर तो बिजली में हंस रहा है।
किन्तु नगर-जीवन क्या वैसा ही स्वर्ग है जैसा हम समझ रहे हैं। बाहरी तड़क-भड़क रूपी वेश्या ने हमें ऐसा मोह लिया है कि हम उधर ही देख रहे हैं, आंखें उधर से हटाते नहीं। ऐनक उतारकर देखें तो नगर के पेट में ही नहीं, मन और शरीर भी मल एवं दुर्गंध से भरा मिलेगा। कैसी आलीशान कोठी है। कम से कम दो लाख लगें होंगे। ओह! नाम भी कैसा सुंदर रखा गया है- 'राम भवन', राम का आदर्श यहां देखने को मिलेगा। ये सेठ जी किससे झगड़ रहे हैं। मजदूर कह रहा है-मेरे साढ़े आठ दिन हुए और सेठजी आठ दिन के आठ रुपए दे रहे हैं। अभी तो ये दूकान से लौटे हैं। यहां कपड़े के खरीददार से कह रहे थे-राम देखता है, मैं एक पैसा अधिक नहीं लेता। किसके लिए पाप बटोरूं। और साथ ही मुनीम को कह रहे थे— हां-हां, तेल में यह सब मिलवा देना। व्यापार में रुपया कहीं ईमानदारी से जुड़ता है? सेठजी की मोटर में ये जो टोप पहने इंजीनियर साहब पधारे हैं- इनका आतिथ्य सेठ जी के यहां जामाता से अधिक होता है, क्योंकि ठेका इन्हीं के द्वारा सेठजी को मिलता है। कितना सुंदर रूप, चंद्र देख कर लजाता है परंतु बिजली के प्रकाश में ही यह मुख आकर्षक है। दिन में चित्र कुछ और निक लेगा। पाउडर, क्रीम इत्यादि ने यह रूप दिया है। वस्त्र भी बड़े चटकीले हैं। किन्तु मेनका जी ने आठ रोज से स्नान नहीं किया है।  लवेंडर की सुगंध के पीछे सब कुछ छिपा है। यह सामने होटल है: बर्तन बड़े चमकदार हैं। बस यही सफाई है। वैसे हाथ की सफाई भी बहुत देखी जा सकती है। थाली में बचे चावलों को पुन: दूसरे ग्राहक को दे दिए जाते हैं। पानी व चाय के लिए गिलास व पियालें बस पानी में धो लिए जाते हैं।  भले ही वे किसी यक्ष्मा या दमावाले के झूठे हों।

चीन-पाकिस्तान के प्रति हमारी नीति

कम्युनिस्ट चीन और पाकिस्तान दोनों के प्रति हमारी नीति वही होनी चाहिए जो आक्रमणकारी शत्रु देश के प्रति किसी भी स्वाभिमानी राष्ट्र की होती है। आश्चर्य का विषय है कि हमने फारमोसा की सरकार को अभी तक मान्यता नहीं दी। तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए हमारा सक्रिय योगदान होना चाहिए। दलाईलामा के प्रति हमारी नीति इस उद्देश्य की पूर्ति में साधक न होकर बाधक ही सिद्ध हो रही है। पाकिस्तान द्वारा ताशकन्द घोषणा को रद्दी के टोकरे में डालने के बाद भी हमारे नेताओं द्वारा उसकी रट लगाए जाना हास्यास्पद है। ऐसा प्रतीत होता है कि सोवियत रूस की पाकिस्तान के प्रति नीति में परिवर्तन आने के कारण हम भी रूसी नेताओं को खुश करने के लिए पाकिस्तान के साथ दोस्ती का राग अलापते हैं। …पाकिस्तान के प्रति हमारी नीति उसके व्यवहार के आधार पर निश्चित न होकर रूस या अमरीका के इशारे पर तय होगी तो भारतख्ंाड में कभी शांति नहीं रह सकेगी।     —पं. दीनदयाल उपाध्याय (विचार-दर्शन, खण्ड-7, पृ. 86)

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