रार रंगीली
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रार रंगीली

Written byArchiveArchive
Mar 14, 2017, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 14 Mar 2017 12:17:32

 

होली का पर्याय होली ही है। होली के तमाम रंग-ढंग हैं, पर ब्रज की लट््ठमार होली का अपना अलग ही अंदाज है। होली एकदम उपयुक्त मौका है इस बात के लिए कि महिला व्यंग्यकार अपने व्यंग्य के लट्ठ बरसायें उस सब पर, जो अनुचित है। विसंगतियों पर लट्ठ बरसाने के लिए चार महिला लट्ठकार-व्यंग्यकार इस बार हैं हमारे साथ। तीन नहीं पांच नहीं, चार। चार का खास अर्थ है। चारों कोनोंं में जमकर विसंगतियों पर जमकर लट्ठ-व्यंग्य बरसायें महिला व्यंग्यकार, ऐसा अनुष्ठान इस बार किया गया है।

फर्जी मिठाई पर फर्जी ‘लाइक’

दोहरे चरित्र और तमाम विकृतियों पर लगातार प्रहार करती हैं अर्चना चतुर्वेदी। प्रस्तुत रचना में होली के बहाने उन्होंने उन विकृतियों पर चोट की है, जो आज फैलती जा रही हैं

लो जी, आखिरकार त्योहार भी डिजिटल क्रांति की चपेट में आ ही गए। बेचारे प्रदूषण के इल्जाम से  पहले ही बरी नही हो पा रहे थे, ऊपर से ये फेसबुक, वाट्स एप का आक्रमण और
हो गया।
बकैती का जो काम पहले पान की दुकान पर जाकर निबटाते थे,आज घर बैठे निबटा देते हैं। फेसबुक और वाट्स एप के जरिए। लोग मोबाइल हाथ में लिए घर बैठे चुनावी होली के इन रंगों का आनंद ले रहे हैं  वैसे भी सोशल मीडिया के इस युग में त्योहार तो क्या, हर रिश्ता मोबाइल और फेसबुक पर ही निबटा दिया जाता है। सामने वाले को भले ही शुभ-प्रभात न बोलें पर अमेरिका वाली मित्र को फूल भेजना नहीं भूलते जी।
आज के इस डिजिटल क्रांति युग में जो लोग ये सोचते हैं कि ़.़शरीर पर सरसों का तेल मलकर .फ़टे-पुराने कपडेÞ पहन कर ़.़ एक-दूसरे से गले मिलकर गुलाल लगाकर होली मनाई जाती है तो वे लोग आउट डेटेड यानी पुराने जमाने के माने जाएंगे जी।
एक-एक हफ्ते पहले से चूल्हे पर चढ़ीं, तरह-तरह के पकवान बनाती महिलाएं आजकल के नए लोगों को पसंद नहीं हैं जी।
़.़.़बाप रे आज के जमाने में कौन इतना समय बर्बाद करता है जी ़.़ वह भी इतना तेल-घी का खाना।  इसके चक्कर में तो घंटों पसीना बहाना पड़ेगा जिम में .. ना बाबा ना .. हम तो कम कैलोरी वाला खाना ही खाएंगे और हमारी चमड़ी रंगों से खराब हो गई तो .़ ना बाबा बहुत महंगा पड़ता है डॉक्टर के पास जाना, कौन अपना बजट बिगाड़े—यह है आज की सोच।
आज की पीढ़ी के अनुसार होली का एक ही उपयोग है-सेल्फी खींचना। ़इसमें लोगों की, रंगों की, पकवानों की, क्या जरूरत? हम बताते हैं होली कैसे मनाई जाती है।
 सबसे पहले उलटे हाथ से चुटकी भर हर्बल रंग लीजिए। अब दोनों गालों पर लगाइए ़.अच्छा सा मुंह बनाइए और अपने सीधे हाथ से मोबाइल से सेल्फी खींचिए ..़क्लिक क्लिक ..़हो गया़.़ अब हैप्पी होली वाली लाइन के साथ इन्सटाग्राम और फेसबुक पर अपलोड कर दीजिए। अच्छा क्या कहा— बिना गुजिया ़.़बिना दही-बड़े ़..़बिना कांजी के पानी के कैसी होली?
ओके ़.़.रुकिए ..गूगल इमेज से मनचाहे पकवान की इमेज डाउनलोड करें। उसके नीचे लिखना ना भूलें—मम्मी के हाथ का टेस्टी यम्मी होली स्पेशल फूड ़.़ लो आ गया सब। अब दोस्तों को वाट्स एप कर दीजिए ़.़.उधर से भी जवाब आएगा यम्मी जुबान लटकती स्माइली के साथ। मन गई न होली। अब भला क्या जरूरत है? ़इतना कुछ बनाओ और बैठकर, प्लेट सजा कर लोगों का इंतजार करो। आपके दोस्त भी आराम से घर बैठ कर ही पकवानों का परम आनंद लेंगे।
कितना फायदा है इस डिजिटल होली का देखिए। पहले आप सिर्फ अपने मुहल्ले तक ही सीमित थे, आज वाट्स एप, फेसबुक युग में पूरी दुनिया के संग होली मना सकते हैं, वह भी इको फ्रेंडली के साथ-साथ पॉकेट फ्रेंडली भी । बस एक घंटे बैठ कर होली के तरह-तरह के संदेश एक-दूसरे को भेजते चलें और फेसबुक मित्रों की पोस्ट लाइक करते रहें। उनके घिसे-पिटे जुमलों पर वाह-वाह करें ़..पकवानों की फोटो पर ़.़वेरी टेस्टी ़.़यम्मी करें ़.़.रंग लगे चेहरों को खूबसूरत और नाइस बताएं और होली मन गई।
ये हुई न नई जनरेशन स्मार्ट, ‘ना हल्द लगा ना फिटकरी और रंग चोखा ही चोखा।’
यदि भगवान कृष्ण इस डिजिटल क्रांति के दौर में जन्म लेते तो ब्रज में होला, क्या होली भी ना होती ़..ग़ुलाल की .फ़ूलों की ़…लट्ठमार होली… कोई होली ना होती..़. ना ही होती रासलीला गोपियों संग, क्योंकि कृष्ण तो सीधे- राधा संग वाट्स एप फेसबुक पर चैट करते, वहीं से होली हो जाती, ना गोकुल से बरसाने जाने की मेहनत होती, ना गुलाल उड़ता और ना लट्ठ की मार खानी पड़ती।
हुई ना कितनी किफायती और सुरक्षित होली। जल्दी से मोबाइल उठाइए और मित्रों को मिठाई और रंग भेज डालिए होली मुबारक के संदेश के साथ ़.़.हैप्पी होली।
पुराने जमाने की बातें और थीं। पुराने जमाने के काकाओं से मिलें, तो अलग बातें सामने आती हैं।
कक्का जी उदास मन से शांतचित्त घर में पड़े थे। भतीजे को आश्चर्य हुआ। जो कक्का होली पर पूरे महीने उन्मादी से दिखते, बसंत आते ही बौरा जाते, खुद को साक्षात् कन्हैया समझते (जेएनयू वाला नहीं ) और हर महिला को गोपी। ़इस साल किस-किस भाभी संग होली खेलनी है, उसका प्रोग्राम ऐसे तय करते, मानो शादी का मेनू तय कर रहे हों। वो कक्का आज देवदास बने क्यूं पड़े हैं। भतीजे ने पूछा, क्या हुआ कक्का आपका पसंदीदा त्योहार होली आ रहा है और आप ऐसे संन्यासी भाव लिए पड़े हैं? कक्का बड़े उदास भाव से बोले, ‘‘अरे भतीजे इन शहरों में काहे की होरी ़.़. यहां कहां मिलेंगी, वे गोपियां, जो घूंघट की आड़ में से हमें जवाब देती थीं।’’ अब तो हमारी राधा रानी (काकी) भी जींस पेंट में हमारे संग होरी खेलबे कूं तैयार है। अरे कक्का, अब जमाना बदल गया है, देश ने तरक्की कर ली है, शहरी  महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं, पुरुषों से बराबरी कर रही हैं।
तो ठीक ही तो है काका, जब किसी काम में पुरुषों से पीछे नहीं तो इसमें भी क्यों रहें? भतीजा मुस्कराते हुए बोला।
 कक्का बेचारे चुप हो गए थे पर भतीजा उनके दर्द को समझ रहा था। कक्का वर्षों से गांव में रहे, जहां होली महिलाओं का नहीं, पुरुषों का त्योहार होता है। कक्का जैसे लोग होली के बहाने मुहल्ले की भाभियों को छेड़ते रहे हैं। घर की महिलाएं तो चूल्हा फूंकतीं,  गुझिया, मठरी और अन्य पकवान बनातीं और पुरुष चटखारे ले-लेकर भक्षण तो करते ही हैं, उनकी कमियां भी निकालते हैं, भांग ठंडाई छनती है, कुछ दारू डकार के नाली में औंधे मुहं पड़े रहते हैं, तो कुछ पुरुष पूरे शहर का भ्रमण कर दोस्तों से मिलने के बहाने उनकी पत्नियों संग होली खेलते हैं और त्योहार मनाते हैं। इस त्योहार पर तो शरीफ से शरीफ पुरुष भी छिछोरा और रंगीन हो जाता है। भतीजा समझ गया था कक्का जैसे पुरुषवादी सोच वालों का हाजमा तो खराब होगा ही़.़ महिलाओं को यूं आजादी से पुरुषों की बराबरी कर खुश होते देख कक्का मन ही मन नारीवादियों को कोसते हुए होली के बहाने अपने जमाने की गोपियों की याद में मगन
हो गए। ल्ल

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