| दिंनाक: 14 Mar 2017 12:02:55 |
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मुंबई हमलों में (26 नवंबर, 2008) एक पाकिस्तानी आतंकी संगठन का हाथ था- अर्रर.. ये क्या कह गए हुजूर! रहे होंगे आप पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार, मगर यहां तो उनकी मिट्टी कुटवा दी! महमूद अली दुर्रानी साहब आपने सिर झुकाए-झुकाए वह नाजुक सच कह डाला जिसे नकारने की जिद में पाकिस्तान दुनियाभर में ऐंठा-ऐंठा फिरता था। निकाल दी हवा, अब उस ऐंठ का क्या होगा? एक बाबू ने सब गड़बड़ कर दिया! ऐसे कैसे चलेगा?
जो बात भारतीय रुख पर मुहर लगाती हो, आतंकियों को कसूरवार ठहराती हो, वह बात सौ टका पाकिस्तानी हो कैसे सकती है?
इस पर हम भारतीयों को पूरी आपत्ति है। 24 कैरट पाकिस्तानी जैसी बात क्यों नहीं करते? बाबूशाही को कुछ आता-जाता नहीं। अपने नेताओं से कुछ सीखो, अपनों से न सीखो तो कुछ हमारों से सीख लो। आखिर सीखने में क्या बुराई है!
घोर घुन्ना हो, हुआ करे। बाबूशाही रपट सकती है। नेताओं से सीख लोगे तो लीक नहीं छोड़ोगे। जरा इधर झांको, हमारे चाको बाबू को देखा! क्या होता है आतंकवाद! सेकुलर नेता भी कुछ होता है कि नहीं? देखो अकेले बंदे ने सबकी कैसी क्लास ली!
कैसे मार दिया सैफुल्लाह को? एकदम आतंक ही मचा रखा है? क्या सबूत है वह आतंकी था?
सुना!! इसे कहते हैं पट्टी पढ़ा नेता। बाबू भटकते हैं क्योंकि सोचने के चक्कर में रहते हैं। पर चाको जी जैसा चकाचक नेता अपने से कुछ नहीं बोलता, सोचने का चक्कर ही नहीं। परदे के पीछे से हाईकमान जो बोलता है।
हाईकमान नहीं समझे! अरे वही जिसका दिल बटला हाउस के चक्कर में दिल्ली पुलिस ने दुखा दिया था। बेचारी रात भर रोती रहीं। ये बात भी हाईकमान ने नहीं, पार्टी के एक नेता ने ही बताई। समझे, वही हाईकमान। तो बटला हाउस से हाजी कॉलोनी के पाजी सैफुल्लाह तक, बुजुर्ग पार्टी के नेताओं ने लीक नहीं, छोड़ी। और एक दुर्रानी साहब आप हैं? जरा से में हांफ गए-आतंकी हमारे थे।
अरे, कैसे तुम्हारे थे?
अरे! जब हमारे नेता यहां आतंकी को आतंकी नहीं मान रहे तो तुम्हें मुंबई के हमलावरों को अपना बताने की जिद क्यों है? क्या मियां शरीफ ने कहा है, जंजुआ ने कहा है? तुमने क्या गोद में खिलाए थे? कैसे तुम्हारे थे? ऐसी बातें ना ही करो।
चाको साहब तो खैर अपनी पार्टी की लीक के पक्के हैं। उन पर कोई मामला नहीं बनता मगर पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के बयान का क्या करें।
सीमा के उधर और इधर—दोनों तरफ बात हजम ही नहीं हो रही। एक काम करते हैं, इसे फागुन का असर मान लेते हैं। कह दिया होगा कुछ। रपट गई होगी जबान। होली है, होता है।
चाको अगर खड़े हैं तो भी और दुर्रानी लड़खड़ा गए तो भी। पक्के खिलाड़ी भंग-ठंडाई के कई लोटे खाली करके भी दांत निकाले आंखें मिचमिचाए खड़े रहते हैं।
नया मुर्गा तुलसी को भी भांग समझकर उसकी खुशबू से बेहोश होने लगता है। सो, इस बार गलती किसी की नहीं। कोई मामला नहीं। होली है, होता है। वैसे, भारत में, ब्रज में, खासकर बरसाने में, एक और होली होती है। लट्ठमार। जो मौका तक के आते हैं उनपर झपट्टे जैसी। एकदम सर्जिकल स्ट्राइक।
जिन्हें नाजुक समझते रहे वो हुल्लड़बाजों को यहां-वहां नील डालकर विदा करती हैं। तो फागुन का मजा लीजिए। होली में जबान का फिसलना जिनके लिए मामूली है, उन्हें लट्ठमार होली खेलना भी
आता है।
किसी को बुरा लगे तो कहा-सुना माफ।
होली है, आपके लिए भी, हमारे लिए भी।