| दिंनाक: 27 Feb 2017 15:55:24 |
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छत्तीसगढ़ का पिछड़ा और वनवासी इलाका है जशपुर। इसकी सीमाएं झारखंड और ओडिशा से लगी हुई हैं। जशपुर में पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, नगेशिया उरांव इत्यादि वनवासियों की संरक्षित जनजातियां निवास करती हैं। लीची, आलू, आम जैसी फसलें यहां बहुतायात में पैदा होती हैं। लेकिन इस पैदावार का कोई खास फायदा यहां के वनवासियों को नहीं मिलता। यही कारण है कि यहां का अमूमन हर वनवासी गरीबी, अशिक्षा, पलायन, मानव तस्करी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। उनकी इन समस्याओं का फायदा यहां काम कर रही मिशनरीज उठाती हैं। यहां कन्वर्जन जोरों पर है, लेकिन इस बार जशपुर यात्रा के दौरान मेरी जानकारी में एक नया तथ्य आया। वह यह कि चर्च यहां अंधविश्वास भी फैला रहा है। आमतौर पर इस इलाके में रहने वाले वनवासी उन्मुक्त जीवन जीते हैं और शुभ-अशुभ के चक्कर में नहीं पड़ते। उनका जीवन प्रकृति की लय के साथ निर्बाध गति से चलता है और उनके मन में किसी तरह का भय भी नहीं दिखता। लेकिन स्थानीय चर्च वनवासियों के मन में अच्छी-बुरी आत्माओं का खौफ पैदा करने में सफल हो रहा है। जशपुर के बगीचा प्रखंड के पंडरीपानी गांव में प्रवेश करते ही दो रंग के मकान दिखाई देते हैं। यहां के अधिकांश मकानों की पुताई काले रंग से की गई है। पूछने पर पता चला कि घरों पर बुरी आत्माओं का साया पड़े, इसलिए इनकी पुताई काले रंग से की गई है। यह चौंकाने वाली बात थी। आखिर वनवासी कब से ऐसी बातों में विश्वास करने लगे, वे तो जंगलों में उन्मुक्त जीवन जीने के आदी हैं। इसी के साथ मुझे बस्तर का एक अनुभव याद आया। एक बार मैंने एक वनवासी बंधु से पूछा कि जंगलों में उन्हें रात में डर नहीं लगता? उसका जबाव था- ''हम प्रकृति की संतान हैं। हमें किसी का डर नहीं। हमारी जीवनशैली में किसी भी तरह के डर के के लिए कोई स्थान नहीं है।'' लेकिन जशपुर में जो दिखा, वह इसके बिल्कुल विपरीत है। एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि दरअसल, इस क्षेत्र में उरांव जनजाति के अधिकांश वनवासियों का कन्वर्जन हो चुका है। अब वे सभी ईसाई मतावलंबी बन चुके हैं। ये लोग अपने घरों की पुताई काले रंग से ही करते हैं, ताकि बुरी शक्तियां उनके घरों से दूर रहें। लेकिन जो वनवासी चर्च नहीं जाते, वे अपने घरों की पुताई सामान्य रंगों से ही करते हैं।
वनवासी प्रकृति के सबसे ज्यादा करीब होते हैं। इसी कारण वे अपने घरों की दीवारों को प्राकृतिक रंगों से सजाते-संवारते हैं। लेकिन ईसाई धर्मावलंबी उनके जीवन से प्रकृति के रंगों को छीन रहे हैं। उन चटक रंगों की जगह अब काले रंग ने ले ली है। इस बारे मंे जब हमने स्थानीय चर्च से बात करनी चाही तो उसने इस पर कुछ भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। ल्ल