जश्न-ए-रेख्ता / रपट - कट्टरपंथियों की गोद में ठेली जाती उर्दू
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जश्न-ए-रेख्ता / रपट – कट्टरपंथियों की गोद में ठेली जाती उर्दू

Written byArchiveArchive
Feb 27, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 27 Feb 2017 15:28:26

देश की राजधानी दिल्ली में 17-19 फरवरी को उर्दू के बेहतरीन मंच जश्न-ए-रेख्ता का आयोजन किया गया था। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित तीन दिवसीय कार्यक्रम में उर्दू के चाहने वालों के अलावा नामचीन शायर, कवि, लेखक-साहित्यकार भी आए थे। लेकिन अत्यंत प्रतिष्ठित संस्थान में आयोजित इस अत्यंत प्रतिष्ठित साहित्यिक कार्यक्रम में एक 67 वर्षीय बुजुर्ग विद्वान को न केवल धक्का-मुक्की कर बाहर किया गया, बल्कि उनके साथ हाथापाई और मारपीट भी हुई। यह देखना वाकई दुखद था। उर्दू को नजाकत, नफासत और अदब की भाषा कहा जाता है। लेकिन उसी उर्दू के कार्यक्रम में ऐसी बेअदबी कैसे और क्यों हो गई? क्या देश में असहिष्णुता का वातावरण इतना अधिक बढ़ गया है कि एक बुजुर्ग व्यक्ति शालीनता और गरिमा के साथ अपनी बात भी नहीं रख सकता?
गौरतलब है कि रेख्ता फाउंडेशन के संस्थापक एक गैर-मुस्लिम व्यक्तित्व संजीव सर्राफ हैं। कार्यक्रम के शुरुआत में ही ऐसा कुछ हो गया था जो विवाद पैदा कर सकता था या जिसका देश में विरोध होना चाहिए था। लेकिन इसे अनसुना कर दिया गया। विवाद तो आखिरी दिन पाकिस्तानी लेखक और विचारक तारेक फतह के कार्यक्रम में पहुंचने पर हुआ। हुआ यूं कि तारेक फतह उर्दू प्रकाशन के स्टॉल पर किताबें देख रहे थे।
उसी समय अचानक कुछ युवकों ने उनके खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। हालांकि तारेक उन्हें नजरअंदाज कर किताबें देखते रहे। देखते-देखते जब विरोध करने वालों की भीड़ बढ़ने लगी तो आयोजक भी वहां आ गए। आयोजकों ने तारेक फतह से चलेे जाने को कहा, लेकिन उन्होंने जाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि यह साहित्य का सार्वजनिक कार्यक्रम है। अगर निकालना ही है तो हुड़दंग करने वालों को बाहर निकालें, न कि शांति से साहित्य का आनंद लेने वालों को। इसी बीच भीड़ ने तारेक फतह के साथ धक्का-मुक्की शुरू कर दी।
आयोजक चाहते तो हुड़दंग करने वालों को बाहर कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। आयोजकों ने पुलिस बुलाई और तारेक फतह को वहां से ले जाने के लिए कहा। तारेक भी अपनी बात पर अड़ गए। वह पुलिस और आयोजकों को समझाते रहे, पर कोई सुनवाई नहीं हुई। आखिरकार पुलिस ने जबरदस्ती उन्हें कार्यक्रम स्थल से बाहर कर दिया। इस क्रम में उनके साथ हाथापाई भी हुई। हालांकि बाद में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने आकर दुर्व्यवहार के लिए तारेक से माफी मांगी। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि कार्यक्रम के आयोजकों ने इस लेख के लिखे जाने तक न तो तारेक फतह से माफी मांगी और न ही हुड़दंगियों के के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
पूरे घटनाक्रम से एक बात साबित होती है कि अगर आयोजन के पहले ही दिन बहस हो जाती तो आखिरी दिन जो हुआ, संभवत: उसकी नौबत ही नहीं आती। आयोजन के उद्घाटन सत्र में गीतकार गुलजार ने कहा कि उर्दू एक दमदार भाषा है। यह इसी की ताकत है कि इसने एक नया मुल्क पाकिस्तान बना दिया। यह बयान आपत्तिजनक था और इस पर आपत्ति की जानी चाहिए थी। लेकिन न तो आयोजकों ने इस पर कुछ कहा और न ही इस आयोजन की खबर चलाने वाले किसी मीडिया समूह ने कोई चर्चा की। गुलजार की बात से क्या यह नहीं लगता कि उर्दू इस्लामी कट्टरपंथियों, जिहादियों और देश विरोध ताकतों की भाषा बन कर रह गई है? क्या गुलजार यह कहना चाहते थे कि उर्दू देश विभाजक भाषा है? आयोजक भी मूक सहमति के साथ इसे स्वीकार कर रहे थे? यदि ऐसा है तो इस देश में उर्दू को क्यों रहना चाहिए? इस देश में रेख्ता फाउंडेशन को क्यों होना चाहिए? जश्न-ए-रेख्ता का आयोजन क्यों किया जाना चाहिए? उस देश में जाएं जिसे उर्दू ने बनाया है।
इस तरह के विभाजनकारी बयान को सुनना और देखना भी दुखद था, लेकिन किसी ने गुलजार को कठघरे में खड़ा नहीं किया। आयोजकों ने अगर पहले दिन ही इस पर सवाल उठाया होता और बुद्घिजीवियों ने इस मुद्दे पर उन्हें घेरा होता तो उर्दू के नाम पर कट्टरपंथियों का इस आयोजन में जुटना संभव नहीं होता। तब तारेक फतह जैसे बुजुर्ग से बदसलूकी नहीं होती और उर्दू के किसी चाहने वाले को भी शर्मिंदा नहीं होना पड़ता कि वह एक कट्टरपंथी और देश को तोड़ने वाली भाषा का प्रशंसक है। प्रश्न तो और भी बहुत हैं, जिन्हें इस आयोजन में उठाने की जरूरत थी। गुलजार साहब ने एक बात और कही कि उर्दू लिपि को बचाना जरूरी है। सवाल यह कि क्या उर्दू लिपि है? वह तो अरबी लिपि है। इतने बड़े और प्रतिष्ठित कार्यक्रम में क्या इस बात पर विचार नहीं होना चाहिए था? यह लिपि ही इस भाषा को देश विरोधी बना रही है।
क्या इस भाषा के एक समुदाय विशेष तक सीमित रहने पर भी सवाल नहीं उठना चाहिए था? प्रश्न तो और भी उठाए जा सकते थे। क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए था कि जब हिंदी और उर्दू बहनें हैं तो यह एकतरफा प्रेम क्यों? क्या उर्दू पर हिंदी का कोई कर्ज है जिसे उसे चुकाना चाहिए? प्रश्न तो बहुत हैं और बहुत से प्रश्न इस आयोजन ने खड़े कर दिए हैं। परंतु उन पर विचार करेगा कौन? उर्दू वाले तो करने से रहे, क्या हिंदी वाले करेंगे?    -रवि शंकर

गुलजार उसी 'ताकत' के शिकार
दिल्ली में आयोजित जश्न-ए-रेख्ता में पधारे गुलजार ने कहा कि उर्दू में इतनी ताकत है कि उसने एक देश बना दिया। गुलजार साहब की इस बात पर गौर करने की जरूरत है। यह बात कहने वाले गुलजार साहब खुद उस ताकत के शिकार हैं जिसने देश बनाया था। गुलजार साहब का जन्म अब के पाकिस्तान में ही हुआ था। सीमार पर वाले झेलम जिले के दीना गांव में पैदा होने वाले संपूर्ण सिंह कालरा ही आज के गुलजार हैं। बेहतरीन शायर, गीतकार, कहानीकार, फिल्मकार गुलजार साहब यह बात बोल रहे हैं तो बहुत सारे संदर्भों के साथ इसे सुनने की जरूरत है। लेकिन गुलजार साहब को सभी सम्मान के साथ आज मातृभाषा दिवस पर कह दीजिए, यह एक भाषा की ताकत थी जिसने पाकिस्तान बनाया और यह पंजाबी, सिन्धी, बलूची, सराइकी और पश्तो की ताकत होगी जो पाकिस्तान को बिगाड़ देगी। उर्दू और इस्लाम पाकिस्तान की मजबूती नहीं, कमजोरी है। जिस दिन पाकिस्तान टूटेगा, यही दो कारण उसके लिए जिम्मेदार होंगे।
    – संजय तिवारी की फेसबुक वॉल से

भाषा अड़ गई, तो समझो सड़ गई: प्रसून जोशी
हर भारतीय भाषा में ऐसे समारोह होने चाहिए। इनमें कई भारतीय भाषाओं के वजूद की बात होती है, जो काफी अच्छी बात है। लोग इनके भविष्य पर चिंता करते हैं और चिंता होना स्वाभाविक है। वैसे मुझे कभी इस बात का अहसास ही नहीं हुआ कि मैं कौन-सी भाषा बोल रहा हूं। वह उर्दू है, हिंदी या फिर अंग्रेजी। भाषा हमारे अवचेतन में प्रवेश कर जाती है। हम बस उसके साथ बहते जाते हैं। हम बोलने से पहले यह नहीं सोचते कि अरे यह तो फारसी का शब्द है! जो भाषाओं को आत्मसात कर चुका है, उसे इनकी कोई सीमा नजर नहीं आती। हिंदी और उर्दू में मेरे हिसाब से कोई विवाद ही नहीं है। ये दोनों साथ-साथ चलती हैं और एक-दूसरे में कब घुल-मिल जाती हैं, हम जान ही नहीं पाते। भाषा कभी अड़ती नहीं है। जो भाषा अड़ गई, तो समझो सड़ गई। कई भाषाओं के शब्दों से मिलकर ही हमारी बोलियां समृद्ध हुई हैं। भाषा के साथ हठधर्मिता का कोई फायदा नहीं है।

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