क्रांति-गाथा-31 - विप्लवी संघर्ष की एक सुखद स्मृति
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क्रांति-गाथा-31 – विप्लवी संघर्ष की एक सुखद स्मृति

Written byArchiveArchive
Feb 27, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 27 Feb 2017 13:19:50

गुरधनिया तथा पेशाब के चिराग की बात मेरे कान में गूंज ही रही थी। उसका परिणाम भी जानता था। मन ने कई बार छोटा होने की चेष्टा की, परंतु विप्लवी साहस ने सदैव मेरा साथ दिया और उस वातावरण में भी झुकना मुझे गवारा न हुआ।
''यह काम मेरा नहीं है।'' कह कर मैं बेडि़यां खड़खड़ाता हुआ सीना तान कर आगे बढ़ा। पीछे-पीछे बाबूसिंह की टोली दांत पीसती हुई आ रही थी और बड़े जमादार की तीखी वाणी मोटी-मोटी गालियों के साथ हमसे दूर होती जा रही थी—''अभी छठी का दूध याद आ जाएगा। एक क्या दस फट्टे कहूंगा तो उठा कर चलोगे। भंगी बना कर न छोड़ दूं तो मेरा नाम नहीं— दुबाड़ा साले, रावण की औलाद…।''
नेहरू जी भी नैनी जेल में थे
तिरमोहानी से कोई पचास कदम आगे बढ़ा था कि बगल से लपक कर बाबू सिंह मेरे आगे आकर खड़े हो गए। मुझे भी रुकना पड़ा। एकाएक बाबूसिंह के दल को विनम्र देख क्षणभर तो समझ में कुछ न आया। परंतु दूसरे ही क्षण बात समझते देर न लगी। सामने से पंडित जवाहर लाल नेहरू प्रात:काल की चहल- कदमी करके लौट रहे थे। उनके पीछे कुछ दूरी पर जेल के दो सिपाही आ रहे थे। उन दिनों नेहरू जी भी नैनी जेल में कैद थे।
पास से गुजरते हुए उन्होंने दु:खी भाव से मुझे एक बार ऊपर से नीचे तक देखा। उनका चेहरा गमगीन हो उठा। संभवत: मेरी दशा देखकर सोचा होगा, ''देश के नौजवान कहां जा रहे हैं-चोर, डकैत, खूनी। काश यही शक्ति मुल्क की आजादी के संग्राम में काम आती?
शायद भ्रम दूर हो गया
मैं गुरधनिया के चक्कर में उस समय कुछ ऐसा खो गया कि पंडित जी को अभिवादन करने का भी ध्यान न रहा। जब वह चलते-चलते मुझे ऊपर से नीचे तक गौर से देख रहे थे, तो न जाने किस जोश की उमंग में मेरी नजरें उनकी नजरों से टकराईं। परिणामस्वरूप वह एक क्षण ठिठके और चिपरपरिचित मधुर मुस्कान के साथ आगे बढ़ गए। मानो उन्हें आभास हो गया हो कि मैं वह नहीं हूं, जो वह सोच रहे थे। दुबाड़ा कैदियों के कपड़े क्रांतिकारी कंचन काया की आभा को छिपा नहीं पाए। बाबूसिंह की टोली मुझे लेकर 'गुरधनिया' वाले स्थान की ओर बढ़ी। उस समय लग रहा था मानो मैं फांसी चढ़ने की साध पूरी करने जा रहा हूं। अब सोचता हूं, क्या वह साहस, पंडित नेहरू के मधुर मुस्कान की देन थी या क्रांतिकारी भावना का प्रतीक? भाई लोग मुझे लेकर जेल के एक सुनसान कोने के प्रांगण में पहुंचे। सामने पानी का हौज था और पास ही सूखी घास का ढेर बिखरा पड़ा था। माहौल बलिवेदी के विपरीत था। फिर भी हृदय अगले क्षण की संभावना की याद में लहराने लगा था। बाबूसिंह की टोली आपस में आंखों-आंखों में कुछ इशारेबाजी कर रही थी। पिछले अनुभवों के आधार पर मैं भी परिस्थिति का सामना करने के लिए खुद को संभालने में लगा था। शरीर का अंग-प्रत्यंग ढीला छोड़ दिया था। लंबी सांस खींचकर अपने को उस वातावरण से अलग कर लेना चाहता था। मेरी आंखें बंद थीं। दो पहरेदारों ने मुझे घास के ढेर पर गिरा दिया था और झपट कर मेरे दोनों बेड़ीमुक्त पैरों के तलुए प्रहार सहने के लिए ऊपर उठा दिए थे। संभवत: डंडे भी तन गए होंगे। सहसा दूर से अंग्रेज की बोली में हिन्दुस्तानी भाषा के शब्द सुनाई दिए— बाबूसिंह!
गुरधनिया से बचा
मेरी आंखें खुल गईं। देखा सामने साइकिल पर सवार अंग्रेज जेलर मेरी ओर आ रहा है। उसके पीछे दो जेल-वार्डर दौड़ते आ रहे हैं और बाद में बड़े जमादार भी हांफते भागते आते दिखे। बाबूसिंह का दल मेरे पांव छोड़ आश्चर्यचकित खड़ा हो गया था। जेलर के पास आने तक मैं भी खड़ा होकर बेडि़यों की उलझन ठीक करने लगा था। हृदय की तरंगें धड़कन बनकर मुझ पर छा गई थीं। परंतु वह गुरधनिया से बचने का सदमा तो नहीं था।
जब तक मैं कुछ समझता, जेलर हुक्म सुना चुका था—''आपको पांच नंबर साहब के पास ले जाओ।'' इतना कहकर जेलर साइकिल पर सवार हो दूसरी ओर चले गए। उनके वार्डर अरदली भी पीछे दौड़ते हुए जा चुके थे। बड़े जमादार ने भी केंचुल बदल ली थी। मुझे आप—जनाब कहकर संबोधित करने लगे थे। यद्यपि मुझे गुरधनिया का स्वाद तो चखने को नहीं मिला, फिर भी तिरमोहानी पर जलते हुए पेशाब के चिराग के काले प्रकाश को मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं।
बड़ा जेलर घबराया
कोठरी में पहुंचने के बाद मालूम हुआ कि बड़े जेलर ने उस दिन मेरे कागजात देखे थे। तब उन्हें पता चला कि मैं एक राजनैतिक बंदी हूं और साधारण बंदी समझकर मुझे बड़े जमादार के हवाले कर दिया गया है, तो वह घबरा उठे थे। उस समय नैनी जेल में पंडित नेहरू तथा प्रसिद्ध क्रांतिकारी श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल जैसे प्रमुख राजबंदी थे। उस स्थिति में अकारण ही राजनीतिक बंदी पर गुरधनिया का परिणाम जेल अधिकारियों के जीवन-मरण का प्रश्न बन सकता था। सुनने में आया कि उस घटना के बाद जेल से गुरधनिया की प्रथा ही उठा दी गई थी। सिर्फ बदमाश बंदियों की किसी खतरनाक हरकत पर ही उसका साधारण रूप से प्रयोग होता था। उसे अब फालिन (फॉल इन) नाम से पुकारा जाता था।
जहां शचीनदा भी कैद थे
जेल के पांच नंबर सर्किल में बाल अपराधियों को रखने की जगह पर मुझे रखा गया था। उसी सर्किल के एक भाग की कुछ कोठरियों को घेरकर ऊंची श्रेणी के राजनीतिक बंदियों को रखने की व्यवस्था की गई थी। वहां महान क्रांतिकारी नेता श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल, श्री भूपेन्द्रनाथ सान्याल, श्री बलबीर सिंह आदि क्रांतिकारी कैद थे। कांग्रेस आंदोलन के समय उसी अहाते में महामना मदनमोहन मालवीय, श्री कृष्णकांत मालवीय व बाबू पुरुषोत्तमदास जी टंडन आदि को भी रखा गया था।
संभवत: जिस दिन मैं जेल आया था, उसी दिन बंदी कर्मचारी सूत्रों से शचीनदा को मेरे वहां साधारण बंदी के रूप में लाकर रखे जाने की सूचना मिल गई थी। यद्यपि मुझे जेल नियमों के अनुसार पानी के रहट खींचने का काम मिला था, फिर भी शुरुआती दिनों मंे अधिकतर मुझे कोठरी में ही बंद रखा जाता था। हर रात मेरी कोठरी बदल जाती थी। अदालत ने मेरी हिस्ट्री शीट में 'हैवीचुअल डेन्जरस' लिख दिया था। उसी का परिणाम था कि मुझे सूर्य के दर्शन भी दुर्लभ हो गए थे। मेरी इस परिस्थिति से शचीनदा व्याकुल थे और जेल अधिकारियों से कहा-सुनी शुरू कर दी थी। उनकी इच्छा के आगे जेल अधिकारियों को झुकना पड़ा। उन दिनों मुझे विशेष रूप से शचीनदा इत्यादि क्रांतिकारी साथियों के साथ रहने की सुविधा मिल चुकी थी। पहले दिन जब शचीनदा की कोठरी में मेरी भेंट पंडित नेहरू से हुई, तो तिरमोहानी के पास की घटना पुनर्जीवित हो उठी थी। मैं उस समय भी दुबाड़ा कैदी के भेष में था। नेहरू जी को ज्यों ही नमस्कार करना चाहा, उन्होंने विचित्र भाव से मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और फिर क्षण भर की गंभीरता के बाद शांत हो गए। मेरे नमस्कार के उत्तर में बोले कुछ नहीं। मेरी दशा उस समय देखने योग्य थी। जाड़े के दिनों में भी ललाट का पसीना पोंछना पड़ा था। शचीनदा ने पंडित जी को मेरा परिचय देना चाहा, परंतु बीच में ही टोकते हुए उन्होंने कहा- ''जानता हूं''और उनकी मुखाकृति चिरपरिचित मुस्कान से चमक उठी। वह कह रहे थे, ''उस दिन मिस्टर लेडली इनका इतिहास मुझे सुना गए थे। आओ बैठो।''पंडित जी के समीप बैठते ही मेरी तमाम झिझक जाती रही। उस दिन शचीनदा और नेहरूजी के बीच देर तक इस विषय पर बहस होती रही कि देश के क्रांतिकारी आंदोलन में विद्यार्थियों को खींचना उचित नहीं है।
नेहरू जी व शचीनदा में बहस हो जाती थी
आमतौर से उन दिनों राउंड टेबुल कांफ्रेंस को लेकर पंडित नेहरू तथा शचीनदा में गरमागरम मुबाहिसा हो जाया करता था। शचीनदा की आवाज में और पंडित नेहरू की दलीलों में बराबर का सा बल होता था। अंत में कौन जीता, कौन हारा, इसका अंदाजा पाना भी मुश्किल हो जाता था। शचीनदा जोश में कभी-कभी इतनी जोर से बोलते थे कि उनकी आवाज ि तमोहानी पार कर जाती थी, जिसे सुनकर बड़ा जमादार बौखलाया-सा पांच नंबर सर्किल के फाटक पर आकर कहता था- ''अरे, यह सांडि़यल आज बहुत डींक रहा है, उससे कहो बड़े साहब आने वाले हें। जरा धीरे-धीरे बातें करें।'' अधिकतर शचीनदा के लिए सांडि़यल शब्द का प्रयोग बड़ा जमादार इतने मसखरे क्रोध के साथ करता था, जिसे सुनकर पंडित नेहरू ठहाका मार कर हंस दिया करते थे।
पंडित जी ने भेजा है
शचीनदा की देखरेख में हम सबका खाना पकता था। एक दिन जब सबको खाना परोस दिया गया तो शचीनदा ने एक अखबार के नीचे से जर्मन सिल्वर की कटोरी निकालते हुए आवाज लगाई 'लोविखकान्तो' और कटोरी मेरी ओर बढ़ाते हुए बोले, पंडित जी ने केवल तुम्हारे लिए भेजा है। मन कृतज्ञता से खिल उठा। इसलिए नहीं कि जेल में जर्मन सिल्वर की कटोरी में बढि़या आलू कोफ्ता खाने को मिला है, बल्कि नेहरू जी का अपने प्रति स्नेह पाकर, क्योंकि उन दिनों वहां पर राजनीतिक बंदियों में मैं सबसे छोटा था। सभी साथियों में मेरे प्रति स्नेह की स्पर्धा सी लगी रहती थी, जो मेरे लिए जीवन पर्यंत भी भूल सकना संभव नहीं है।
पंडित नेहरू का यह क्रम, जब तक वह नैनी जेल में रहे, चलता रहा। एल्युमिनियम के बर्तनों के बीच कभी मीठा, कभी हलवा और कभी सब्जी जर्मन सिल्वर की कटोरी में दिख जाती थी। उसे चुपके से मेरी ओर खिसकाते हुए शचीनदा भी बड़े मजे के साथ आवाज लगाया करते थे-'लोक्खिकान्तो केवल तुम्हारे लिए।' इस पर कुछ साथी कहते थे, क्या रे अब्दुल्ला तेरे ये ठाठ! ठाठ की बात से मैं चिढ़ जाता और शचीनदा की दुहाई देकर कहता, दादा इनको समझा दीजिए। इस पर एक जोरदार ठहाका लगता।
दूसरी कटोरी आने लगी
नेहरू जी के जेल से जाने के बाद भोजन के समय मेरे एल्युमिनियम के बर्तनों के बीच जर्मन सिल्वर की कटोरी दिखनी बंद हो गई तब भी साथियों ने छेड़ना नहीं छोड़ा। उसका सिर्फ अंदाज बदल गया था। क्या रे, अब्दुल्ला! इसके आगे न वह कुछ बोल पाते थे और न मैं चिढ़कर दादा से कोई शिकायत करता।  शचीनदा को यह अच्छा नहीं लगा। दूसरे दिन से ही मेरे बर्तनों के बीच एक अधिक कटोरी दिखने लगी, परंतु वह जर्मन सिल्वर की नहीं थी।
  साथियों ने भी क्या रे अब्दुल्ला के बजाय वाह रे अब्दुल्ला कहना शुरू कर दिया था। नेहरूजी के जाने के बाद मुझे भी काले पानी भेज दिया गया। विप्लवी संघर्ष की यह सुखद घडि़यां ही हमारी सबसे बड़ी विरासत है।    

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