मुआवजा नहीं, न्याय चाहिए
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मुआवजा नहीं, न्याय चाहिए

Written byArchiveArchive
Feb 13, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 13 Feb 2017 17:09:59

दंगे को दो महीने बीत चुके हैं लेकिन हालत अब भी वैसी ही है। लोग डरे-सहमे और मूलभूत जरूरतों के लिए तरस रहे हैं। जिन पीडि़त हिन्दू परिवारों का सब कुछ तहस-नहस हो गया, सरकार उन पीडि़तों के घावों पर मरहम की जगह 35 हजार रुपये देकर  जख्मों पर नमक छिड़कने काम कर रही है

अश्वनी मिश्र

कैस्टो मलिक कहते हैं,'' मेरा घर जला है। बिन खून-खता मुझ पर अत्याचार किया। घर गृहस्थी तहस-नहस कर दी गई। मुख्यमंत्री मुझे इस दंगे के एवज में 35 हजार रुपये न देें। मुझे पैसा नहीं दोषियों को सलाखों के पीछे देखना है।'' एक और पीडि़ता सुनीता मंडल (परिवर्तित नाम) सवाल के लहजे में कहती हैं,''अभी कुछ दिन पहले तक तो राज्य सरकार यह कह रही थी कि यहां कुछ हुआ ही नहीं। जब कुछ हुआ ही नहीं तो फिर मुआवजा क्यों? पैसे से क्या हमारे ऊपर हुए अत्याचारों की भरपाई हो जाएगी। मुझे पैसा नहीं न्याय चाहिए।''
कैस्टो मलिक और सुनीता मंडल धूलागढ़ दंगे में पीडि़त परिवारों से हैं। इन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा दिए जा रहे 35 हजार रुपये लेने से यह कहते हुए मनाकर दिया कि उन्हें पैसा नहीं, दोषियों को सजा होते देखना है। पांच सदस्यों का पेट पालने वाले कैस्टो पेशे से व्यवसायी हैं। उनकी एक फर्नीचर की दुकान थी जो दंगे के दिन मुसलमानों ने लूट ली, जिसके बाद एक हजार से ज्यादा हिंसक भीड़ ने उनके घर को भी जलाकर राख कर दिया था।
राज्य सरकार की ओर से पैसा लेने से इंकार करने वालों में कैस्टो और सुनीता ही नहीं बल्कि दर्जनों की तादाद में ऐसे हिन्दू परिवार हैं जिन्होंने गरीबी सहन करना ठीक समझा, लेकिन सरकार की ओर से दिए जा रहे मुआवजे को लेने से स्पष्ट तौर पर मना किया है। हालांकि बहुत से परिवार ऐसे भी हैं जिन्होंने शासन-प्रशासन के दवाब या फिर अपनी दशा को देखते हुए इस मुआवजे को स्वीकार किया है।
पश्चिम बंगाल के धूलागढ़ में दंगा हुए दो महीने बीत चुके हैं लेकिन भय और आतंक का माहौल अभी भी बना हुआ है। जिनके घर जलाये गए उसमें बहुत से परिवार ऐसे हैं जो अभी भी यहां लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे, तो कुछ ने अपने रिश्तेदारों के यहां शरण ले रखी है। सरकार यहां के हिन्दुओं को सुरक्षा तो नहीं दे पा रही लेकिन बाहर से आने वाला कोई व्यक्ति दंगे के बारे में न जानने पाए और कोई साक्ष्य न मिले इसलिए पीडि़तों के जले घरों की दीवारों पर सफेदी जरूर कराई जा रही है।
महिला आयोग ने जानी हकीकत
धूलागढ़ की चीख कोलकाता में बैठीं ममता के कानों तक भले ही न पहुंची हो लेकिन राष्ट्रीय महिला आयोग ने यहां की सुध जरूर ली है। यहां की दयनीय और दुखभरी स्थिति को देखकर दो सदस्यी प्रतिनिधिमंडल ने न केवल राज्य सरकार की संवेदनहीनता पर दुख जताया बल्कि पुलिस-प्रशासन की कार्य प्रणाली पर सवाल उठाए हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य सुषमा साहु पीडि़तों की स्थिति देखकर कहती हैं,''यहां बहुत ज्यादा जुल्म हुआ है। लोग अभी भी भय और आतंक के साये में जी रहे हैं। अधिकांश घरों को जलाया गया है। स्थिति ये है कि कई परिवारों की महिलाओं के पास पहनने तक के कपड़े नहीं हैं, जीवन की अन्य मूलभूत जरूरतें तो दूर की बात। इतनी बुरी स्थिति है कि सोचने से ही सिहरन होने लगती है। इस माहौल में कैसे यहां लोग रह रहे हैं, कल्पना करना भी मुश्किल है।'' वे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर खेद जताते हुए कहती हैं,''आरोपियों को लग गया है कि यह मामला बढ़ता ही जा रहा है तो उन्होंने पुलिस में एक काउंटर केस किया है। लेकिन इस केस में उन्होंने ऐसे लोगों को नामजद कराया है जो मर चुके हैं। मेरा पुलिस से सवाल है कि उसने बिना जांच किए कैसे रिपोर्ट दर्ज की? दूसरा, कुछ ऐसे लोग भी हैं जो उन दिनों अस्पताल में भर्ती होकर इलाज करा रहे थे, उनके नाम कैसे रिपोर्ट में हैं? आखिर यह सब दर्शाता है कि एक पक्ष के सामने दूसरे पक्ष को खड़ा करने और उसे फंसाने के लिए प्रशासन द्वारा ऐसा किया गया। राज्य सरकार पूरी तरह से पंगु बन चुकी है। महिला मुख्यमंत्री तो यहां जरूर हैं लेकिन महिला मुख्यमंत्री के नाम पर अपने आप में एक कलंक हैं।''

दंगे को दो महीने बीत चुके हैं लेकिन हालत अब भी वैसी ही है। लोग डरे-सहमे और मूलभूत जरूरतों के लिए तरस रहे हैं। जिन पीडि़त हिन्दू परिवारों का सब कुछ तहस-नहस हो गया, सरकार उन पीडि़तों के घावों पर मरहम की जगह 35 हजार रुपये देकर  जख्मों पर नमक छिड़कने काम कर रही है

राज्य सरकार हिन्दुओं को भीख के रूप में 35 हजार रुपए का मुआवजा दे रही है। क्या ममता बनर्जी  बता सकती हैं कि  इतना कम पैसा कहां से उनके दुखों को दूर करेगा? अच्छा होता कि यदि पीडि़तों को त्वरित न्याय मिलता और हिंसा में शामिल प्रत्येक व्यक्ति को सजा।
                                       — नयन चौधरी, कोलकाता
 
धूलागढ़ दंगे ने ममता की तुष्टीकरण  नीति सामने ला दी है। बस बंगाल की जनता को इसे समझने की जरूरत है। धूलागढ़ में सरकार का रवैया शर्मसार करने वाला रहा है।
— संजय सोम, सामाजिक कार्यकर्ता

ममता बनर्जी मुआवजा देने के बजाए खुद जाकर पीडि़तों से मिलतीं और बलात्कारियों को सख्त सजा दिलातीं तो शायद उनका दुख कम होता। लेकिन राज्य सरकार तो दंगे के बाद जख्म पर मिर्च लगा रही है। तभी तो मुआवजे में 35 हजार दे रही है। पीडि़तों को मुआवजे के साथ न्याय चाहिए।
— कर्नल दीप्तांशु
स्वाधिकार बंगला फाउंडेशन के अध्यक्ष

ममता  को बंगाल की जनता ने चुना है, किसी एक व्यक्ति ने नहीं। फिर वे सिर्फ मुसलमानों की ही बात क्यों करती हैं? क्या हमारे कोई अधिकार नहीं हैं? — रामपद मन्ना, धूलागढ़

 

उन्होंने ममता सरकार पर तंज भरे लहजे में कहा,''सरकार ने कुछ लोगों को भीख के तौर पर पैसा दिया और चूंकि महिला आयोग का प्रतिनिधिमंडल आ रहा था, इस अफरा-तफरी में कुछ मकानों के ढाचे खड़े कर दिए, उनकी दीवारों पर सफेदी भी करा दी। लेकिन इससे सत्यता नहीं छिपती। सभी पीडि़त न्याय की आस में हैं। साथ ही सरकार जो 35 हजार  मुआवजे के रूप में रुपए दे रही है उससे घर नहीं बन सकता। जिसका पति मर गया हो, बेटा विकलांग हो, सास-ससुर बीमार हों, किराने की जो दुकान थी उसे जला दिया गया हो, ऐसे में कोई बताए कि वह महिला कहां जाएगी?''
अभी भी हो रहे हमले
धूलागढ़ दंगे की आग अभी भी सुलग रही है। उन्मादी फिराक में हैं। कब किसी बड़ी घटना को अंजाम दे दिया जाएगा, कहा नहीं जा सकता।  दरअसल दंगे के बाद से अब तक पुलिस ने कई बार यहां से जिंदा बम और अन्य अवैध सामग्री बरामद की है। महिला आयोग के प्रतिनिधिमंडल के आने से दो दिन पहले ही पुलिस ने दो जिंदा बम बरामद किए जिसमें एक फटा पर कोई हताहत नहीं हुआ। इन घटनाओं से हिन्दू परिवारों में दहशत का माहौल है। स्थानीय निवासी मनसुख दास बताते हैं,''रात होते ही कौन सी आफत आ जाए पता नहीं, क्योंकि दंगे के बाद से हर दिन कुछ न कुछ ऐसा होता है जो दिल को झकझोर देता है। मुसलमान भीड़ में आकर रात को कुछ भी कर सकते हैं।'' वहीं डरी-सहमी सीमा कहती हैं,''हम तो अपने ही घर में डरकर रहते हैं। यहां का जो माहौल है, ऐसे में मन करता है कि कहीं दूर चली जाऊं जहां शांति मिले और डर दूर-दूर तक न हो। क्योंकि कौन यहां आकर कब आपके घर को आग लगा जाए, बम फेंक जाए कुछ पता नहीं। हमारी कोई सुुनने वाला नहीं।''
सीमा की आंखों से झरते आंसू उनके दुख, दर्द, भय, आक्रोश को बताने के लिए काफी हैं। लेकिन इस सबके बाद भी न सेकुलर मीडिया और न ही सेकुलर नेताओं को इन हिन्दुओं का दुख-दर्द दिखाई देता है।
खुलेआम घूम रहे आरोपी
धूलागढ़ हिंसा में 128 से ज्यादा घर और दुकानों को मुसलमानों ने पूरी तरह से जलाकर राख कर दिया था। लेकिन इसके बाद भी पुलिस ने पीडि़तों की ओर से एक रिपोर्ट दर्ज करने की जहमत नहीं उठाई। अगर कोई पीडि़त उनके पास गया तो उसे डरा-धमकाकर भगा दिया गया। नाम न छापने की शर्त पर पीडि़त बताते हैं कि वह संकरेल थाना एवं पांचला थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने गए थे लेकिन पुलिस ने वहां से भगा दिया। अब मामला न्यायालय में है। पीडि़तों की ओर मुकदमा लड़ रहे कोलकाता उच्च न्यायालय के अधिवक्ता गौरव कुमार बसु बताते हैं,''बड़ा आश्चर्यचकित करता है यहां के प्रशासन का यह रवैया। पीडि़त पक्ष की रिपोर्ट तक नहीं लिखी जाती। बल्कि उल्टे उसे पुलिस द्वारा धमकी दी जाती है। आखिर यह सब क्या दर्शाता है? ''
वह बताते हैं,''इस क्षेत्र में पूरी तरह से मुसलमानों द्वारा साजिश रची जा रही है। हर दिन बम भी मिल रहे हैं। यह डर इसलिए पैदा किया जा रहा है ताकि यहां से हिन्दू भाग जाएं। इसीलिए तो आए दिन ऐसी घटनाएं होती हैं। पुलिस प्रशासन की हालत पर कुछ कहना ही बेकार है।''
राज्य की ममता सरकार पीडि़त हिन्दू परिवारों को 35 हजार रुपए देकर खानापूर्ति तो कर रही है लेकिन पीडि़त सरकार के इस रवैये पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि कोई मुख्यमंत्री अपनी जनता के आंसू ऐसे पोंछता है जिस तरह वे पोंछ रही हैं? अगर ऐसी ही किसी घटना में पीडि़त पक्ष मुसलमान होते तो भी उनका यही रवैया होता?    

 

''मुआवजा ऐसा हो जो सरकार को महसूस हो''



'हज गए किसी व्यक्ति के साथ जब अनहोनी होती है तो बंगाल की यही मुख्यमंत्री मुआवजे के रूप में उसके परिवार को खुलकर मुआवजा देती हैं लेकिन धूलागढ़ पीडि़तों की मदद के लिए वे सिर्फ खानापूर्ति कर रही हैं। यह उनके चाल-चरित्र और चेहरे को बताने के लिए काफी है।' यह कहना है पश्चिम बंगाल से भाजपा की राज्यसभा सांसद और अभिनेत्री रूपा गांगुली का। पाञ्चजन्य  संवाददाता अश्वनी मिश्र ने उनसे इसी विषय पर बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-

राज्य सरकार ने धूलागढ़ पीडि़तों को मुआवजा देने की घोषणा की है। लेकिन यह राशि इतनी कम है कि उससे कुछ नहीं होने वाला। सरकार उनकी मदद कर रही है या जख्मों पर मिर्च लगा रही है?
देखिए,बंगाल में जो मुआवजा दिया जाता है वह अलग-अलग तरीके से सरकार ने निर्धारित कर रखा है। मान लीजिए,अगर कोई हज करने जाता है और वहां उसके साथ कोई अनहोनी हो जाती है तो सरकार द्वारा खुलकर पैसा दिया जाता है। लेकिन जब ऐसी ही कोई घटना हिन्दुओं के साथ  होती है तो धूलागढ़ हिंसा की तरह नाम के लिए कुछ दे दिया जाता है। यह बड़े दुख की बात है। सरकार को तो निष्पक्ष होना चाहिए और उसे सभी को समान रूप में देखना चाहिए लेकिन यहां ऐसा कुछ है नहीं। जब भी किसी महिला के साथ बलात्कार हो जाता है तो सरकार उसके लिए अलग-अलग तरह  से पैसा निर्धारित करती है, जैसे- विवाहिता के लिए अलग, अविवाहिता के लिए अलग। तो क्यों न सरकार एक सूची बना दे कि मान लो कल को हममें से किसी के साथ ऐसा होता है तो सरकार हमें कितना पैसा देगी। ममता अपने वोट बैंक को मजबूत करने लिए राज्य की जनता के साथ अन्याय कैसे कर सकती हैं? वे कैसे किसी को मुआवजे में ज्यादा पैसा और कैसे किसी को कम पैसा दे सकती हैं?

धूलागढ़ दंगे को दो महीने बीत चुके हैं। अब स्थिति क्या है? पार्टी की ओर से पीडि़तों को न्याय दिलाने के लिए क्या कुछ कदम उठाए जा रहे हैं?
भारतीय जनता पार्टी की ओर से पीडि़तों को हर संभव मदद दी जा रही है। लेकिन जो घर जले हैं तो कोई एक व्यक्ति या दल अपने फंड से कितनी मदद कर सकता है। हां, जो मूलभूत जरूरतें हैं, जैसे बर्तन, कंबल, भोजन, अन्य रहने के लिए सामग्री रा.स्व.संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार दी जा रही हैं। लेकिन यह सहायता पर्याप्त नहीं है। दंगाइयों द्वारा पेट्रोल बम और गैस जलाकर घर को फूंक दिया गया था, ऐसे में पूरा घर तहस-नहस हो चुका होगा। अब उस इंसान को फिर से पूरा घर बसाना होगा। तो ऐसा मुआवजा होना चाहिए जो सरकार को महसूस हो। तब ही तो वह समझेगी कि ऐसी घटना फिर से नहीं होनी चाहिए। लेकिन धूलागढ़ पीडि़तों को तो सरकार खानापूर्ति करते हुए 25 या 35 हजार रुपये दे रही है, उससे क्या होने वाला है? उससे कई गुना ज्यादा तो हम लोगों द्वारा मदद की जा चुकी है।

राष्ट्रीय महिला आयोग ने धूलागढ़ आकर पीडि़तों का हाल जाना और महिलाओं की चिंताजनक हालत पर दुख जताया। एक महिला होने के नाते राज्य की मुख्यमंत्री से आप क्या अपेक्षा रखती हैं?
एक महिला होने के नाते हम धूलागढ़ पीडि़तों की बराबर चिंता कर रहे हैं और जो संभव मदद होगी, करेंगे। लेकिन यह सच है कि फंडिग सरकार से ही होती है। जैसे अगर हमें सांसद कोटे से कोई सहायता-मदद देनी होगी तो संघीय तरीके से सरकार के माध्यम से ही कार्य करना होगा। हम भी सांसद कोटे से कोई पैसा देने की कोशिश करते भी हैं लेकिन हाथ में उनके ही है। तो उनके जरिए ही वह पैसा पाएगा। लेकिन हम फिर भी मदद करेंगे।

दंगे के बाद तक राज्य सरकार ये कहती रही कि धूलागढ़ में साम्प्रदायिक घटना नहीं हुई, सिर्फ छिटपुट हिंसा हुई है। अगर कुछ हुआ ही नहीं तो फिर सरकार द्वारा पीडि़तों को मुआवजा क्यों?
देखिए, बंगाल की दीदी के लिए हर चीज को नकारना आसान हो गया है। मुझे ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनने के बाद तृणमूल की नेत्री बनकर रह गईं। सरकार और जनता की नेत्री नहीं बन पाईं। जनता की अगर नेत्री बन पातीं तो वह इस तरीके से किसी भी घटना को नकारती नहीं। अगर वह खुद मुख्यमंत्री बनकर नकार देंगी तो प्रशासन के पास क्या संदेश पहुंचेगा? यही न कि इस घटना को दबाओ। और घुमा फिराकर यह संदेश भी प्रशासन तक पहंुचा ही दिया जाता है। यानी एक समुदाय की बात करते-करते वे सही और गलत क्या होता है, भूल गई हैं। हर चीज दीदी के लिए राजनीति है। हां, ये मानना पड़ेगा कि वे अच्छी राजनीतिज्ञ हैं लेकिन ऐसी राजनीतिज्ञ हैं जो देश और समाज के लिए राजनीति न करके अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए   सब कुछ करती हैं।            

 

 

…जारी है दमन
जैसे-जैसे दिन गुजर  रहे हैं वैसे-वैसे दंगे की परतें उघड़नी शुरू हो गई हैं। प्रशासन अब तक बलात्कार की किसी भी घटना से इंकार करता आया था लेकिन दंगाइयों द्वारा कुकृत्य की घटना सामने आने के बाद वह मूक बना हुआ है। उस पर सवाल उठे हैं कि जब 13 दिसंबर को धूलागढ़ में धारा 144  लागू कर दी गई थी, भारी संख्या में पुलिसबल मौजूद था तो फिर 14 दिसंबर को 10 मुसलमानों द्वारा यह सब करने की जुर्रत कैसे की गई। उन्मादियों द्वारा कुकृत्य का शिकार हुई सुमन (40)(परिवर्तित नाम ) फफक कर रोती हैं। बोलना चाहती हैं पर उनके मुख से बोल नहीं फूटते। घटना के बाद से आंखें पथरा गई हैं। फिर भी उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है। सुमन बोलती हैं और खुलकर बोलती हैं। वे अपने साथ हुई घटना के बारे में बताती हैं,''14 दिसंबर को सैकड़ों मुसलमानों की भीड़ ने जब हिन्दुओं के घरों पर हमला बोला तो वे घर में काम कर रही थीं। अचानक बाहर से 'पाकिस्तान जिंदाबाद, हिन्दुस्थान मुर्दाबाद' की आवाजें जोर-जोर से आने लगीं। वे हिन्दुओं के घरों में लूटपाट तो कर ही रहे थे, आग भी लगा रहे थे। इसी भीड़ में से कुछ लोगों ने हमारे घर भी हमला कर दिया। पेट्रोल बम डालने से घर जल रहा था। इसी बीच करीब 10 लोग  घर में घुसे और मुझे जबरदस्ती उठाकर एक निर्जन जगह ले गए। मैं सहायता के लिए चिल्ला रही थी लेकिन वहां कोई मदद करने वाला नहीं था। उन लोगों ने सामूहिक रूप से मेरे साथ बलात्कार किया। वे पास के ही रहने वाले सबूल शेख, मुख्तार, इकबाल मिद,सद्दाम,मिन्टू शेख, मैदुल शेख, खुखुन शेख थे।''  वे रोते हुए कहती हैं कि पुलिस इन्हें पकड़ने के बजाए उल्टे मुझे धमकाती है और इन्हें संरक्षण देती है। मुझे न्याय चाहिए और इनको कड़ी से कड़ी सजा। तब ही मेरे ह्दय को शांति मिलेगी।''

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