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अलगाववाद की आवाज हो बंद!

Written byArchiveArchive
Feb 6, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 06 Feb 2017 14:40:24

8 जनवरी, 2017
आवरण कथा 'पहचान और पीड़ा' को पढ़कर हृदय सिहर उठा है। कश्मीर का यह पुराना रोग जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला की सांठगांठ का ही नतीजा है। भारत विभाजन के समय पाकिस्तान से आए हिंदुओं को अभी तक कश्मीर की नागरिकता नहीं मिलना वहां के शासकों की मुस्लिम मानसिकता का परिचायक है। केंद्र में अधिकांश समय कांग्रेस का शासन रहा और कश्मीर में शेख अब्दुल्ला और उसके परिवार का। दोनों ही मुस्लिम प्रेमी थे। इन्हें हिंदुओं की दु:ख-पीड़ा से कभी कोई मतलब नहीं रहा बल्कि  इनके द्वारा हिंदुओं को समय-समय पर दबाने का काम किया गया। यह प्रवृत्ति आज भी चली आ रही है लेकिन अब हिंदू इसे सहन नहीं करेगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह हिंदुओं के सभी अधिकार दिलाए और मुख्य धारा से जोड़े।
—चन्द्रमोहन चौहान, कोटा (राज.)
 
  मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करो और हिंदुओं को दबाओ, यही कश्मीर की नीति रही है। इसीलिए आज कश्मीर आतंक से त्रस्त है और अलगाववाद की आवाजें उठ रही हैं। यदि सरकार चाहती है कि कश्मीर में हालात सामान्य हों, सभी को अधिकार मिले तो कश्मीर से संबंधित कुछ विश्ेाष प्रावधानों को किसी भी कीमत पर समाप्त करना होगा। निर्वासित हिन्दुओं को तत्काल घाटी में बसाना होगा। इस सबसे ही संतुलन बैठ सकेंगे है।
—अनुराधा शुक्ल, इंदौर (म.प्र.)

 कश्मीर में सदैव से ही हिंदुओं पर अन्याय व भेदभाव होता चला आ रहा है। हिंदू बहुल देश में ही हिंदुओं के प्रति दोहरा कानून अब तक की सत्तासीन सरकारों की तुष्टीकरण नीति का परिणाम है। अब जब केंद्र सरकार के दबाव और प्रयास से राज्य की पीडीपी सरकार ने 1947 में पाकिस्तान से आए हिन्दुओं को पहचान पत्र जारी किया तो यह अलगाववादियों को कैसे सहन हो सकता था। जो लोग राज्य में धारा 370 की आड़ की दुहाई देकर किसी बाहरी व्यक्ति या हिंदुओं के बसने पर हुड़दंग करते हैं, वही लोग पाकिस्तान, बंगलादेश व म्यांमार से आए रोहिंग्या मुसलमानों का जम्मू-कश्मीर में दिल खोलकर किस आधार पर स्वागत कर रहे हैं? अलगाववादियों के साथ-साथ वहां की अब तक रही सरकारों की मंशा पर सवाल उठने जायज हैं।
—रमेश कुमार मिश्र, अंबेडकर नगर (उ.प्र.)

 यह राजग सरकार के दखल का ही परिणाम है कि पाकिस्तान से आए हिंदुओं को पहचान पत्र जारी हुए हैं। इससे कश्मीर के मुल्ला-मौलवी काफी परेशान हैं और मोदी जी से चिढ़े हुए हैं। सरकार को धीरे-धीरे घाटी से विस्थापित हिंदुओं को बसाना होगा। क्योंकि उन्हें इस सरकार से ही आशा है।
—अनिरुद्ध कौशल, मुंगेर (बिहार)

संगठित होना होगा हिंदुओं को
रपट 'मजहबी उन्माद की (1जनवरी, 2016)' आक्रोश से भर देती है। सवाल उठता है कि आखिर हिंदुओं पर ही ऐसा जुल्म क्यों होता है? वे तो सहिष्णुता की बात करते हैं, फिर ऐसे हमले क्यों? पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं के साथ जो अत्याचार किए गए, वे किसी भी हिंदू को गुस्से से भर देने के लिए काफी हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को वोट सिर्फ मुसलमानों ने ही दिया है जो वे इस तरह की घटनाओं पर न तो कोई त्वरित प्रतिक्रिया देती हैं और न ही कड़ी कार्रवाई करती हैं। यहां तक कि उनके द्वारा मीडिया पर भी प्रतिबंध लगाने की बात सामने आई। आज भी बंगाल की बड़ी-बड़ी खबरें क्षेत्रीय मीडिया की बात छोडि़ए राष्ट्रीय मीडिया तक में नहीं आतीं।
—बी.एल.सचदेवा, आईएनए बाजार (नई दिल्ली)

  देश कब तक हिंदुओं की पीड़ा और दर्द का दृश्य देखता रहेगा। दूर बैठे लोग शायद धुलागढ़ के हिंदुओं की पीड़ा को कम आंक रहे होंगे। लेकिन जो समाचार और चित्र आए हैं, वे डराने वाले हैं।  हिंसा या सांप्रदायिक उन्माद किसी एक समाज के लिए ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए कलंक से कम नहीं है। ऐसे में सरकार द्वारा दंगाइयों का हौसला बढ़ाना, उन्हें उन्माद के लिए दबे पांव भड़काना कहां उचित है। देश के विभिन्न हिस्सों में आए दिन हिन्दुओं पर होता अन्याय हिंदुओं के धैर्य की परीक्षा ले रहा हैं।
—हरिहर सिंह चौहान, मेल से

  हिंदुओं के घरों को जलाया जाता रहा और कुछ दूर पर स्थिति मुख्यमंत्री आवास में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को खबर तक नहीं हुई। क्या ऐसी बात कोई मान सकता है। राज्य में इतना बड़ा दंगा हो जाए और पुलिस-प्रशासन राज्य के मुख्यमंत्री को खबर न दे। ममता बनर्जी मुस्लिमों को खुश करने के लिए हिंदुओं के दबा रही हैं। बंगाल में आए दिन हिंदुओं पर जुल्म ढहाया जाता है और कोई कुछ नहीं बोलता।
—देवाशीष वर्मा, यमुनानगर (हरियाणा)

संघ से परिचित कराता अंक
'राष्ट्र सेवा के 90 वर्ष' संग्रहणीय विशेषांक ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सभी आयामों से परिचित कराया है। कम से कम इस विशेषांक के जरिए वे जरूर लाभान्वित हुए होंगे जो इसकी आलोचना करते नहीं थकते। लेकिन अवसाद और कुंठाग्रस्त लोगों के लिए भी यह विशेषांक एक ऊर्जा से कम नहीं है।
 —आचार्य त्रिनाथ शास्त्री, मेरठ (उ.प्र.)

संग्रहणीय विशेषांक के लिए संपादकीय विभाग को बधाई। इस विशेषांक के जरिए बहुत से विषय संघ की दृष्टि से मन में किंतु, परन्तु के रूप में चलते रहते थे, वह समाप्त हो गए। अत्यधिक रोचक सामग्री पढ़ने का अवसर मिला है।
—मनोहर भंडारी, इंदौर (म.प्र.)

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