सहजता का सम्मान
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सहजता का सम्मान

Written byArchiveArchive
Feb 6, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 06 Feb 2017 16:34:49

 

पद्मश्री सम्मान का नाम सुनते ही आम आदमी के मन में प्रमुख या चर्चित चेहरे उभरने लगते हैं-कोई खिलाड़ी, कलाकार, नेता या अभिनेता। लेकिन 2017 दशकों पुरानी इस परम्परा में नयी ताजगी लेकर आया। इस बार जब इन सम्मानों की घोषणा हुई तो दर्जन से ज्यादा चेहरे मीडिया तक के लिए अनजान थे। गूगल पर घोषित नामों की खोजबीन शुरू हो गई कि भई, ये कौन हैं, कहां के हैं, पता किया जाए। खोज तो हुई, लेकिन फिर भी इनके बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं मिली। क्योंकि सामाजिक जीवन के इन कर्मवीरों तक मीडिया प्राय: पहुंचा ही नहीं था, और उन्हें अपनी कोई वेबसाइट, प्रचार सामग्री छपाने-बांटने की फुर्सत भी नहीं मिली। कोई सुदूर क्षेत्र में अपनी मोटरसाइकिल को एंबुलेंस बनाकर स्वास्थ्य सेवाएं दे रहा है, तो कोई आग की लपटों के बीच से जिंदगी बचा रहा है, कोई अपनी मेहनत और लगन के चलते एक करोड़ से ज्यादा पेड़ लगा चुका है। इस विशेष आयोजन में कोशिश यही है कि इस बार पद्म पुरस्कारों से सम्मानित असामान्य कामों में जुटे सामान्य लोगों की कहानी पाठकों तक पहंुचे, जिन्होंने अपनी सेवा के बूते न केवल समाज को प्रेरणा देने का काम किया है बल्कि अपने संघर्ष से साबित किया कि संकल्प अगर ठान लें तो कुछ भी असंभव नहीं है

प्रस्तुति: अश्वनी मिश्र

 

 

'जब तक सांस है तब तक खुशियां बांटती रहूंगी'

डॉ. भक्ति यादव (91)

कार्य : स्त्री रोग विशेषज्ञ, इंदौर (मध्य प्रदेश)

अहम योगदान : 68 वर्ष से हजारों गरीब व असहाय महिलाओं का नि:शुल्क प्रसव कराया

 

मां की ममता बिन मोल मिलती है। डॉ़ भक्ति यादव इस श्रद्धा को प्रगाढ़ करती हैं। मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली ये गाइनोकोलाजिस्ट 91 बरस की हो चुकी हैं लेकिन उनकी ऊ र्जा और कार्य के प्रति समर्पण देखते ही बनता है। हाथ कांपते हैं, बैठने और चलने में दिक्कत है लेकिन सेवा का जज्बा जस का तस है। अभी भी वे प्रतिदिन 3-4 मरीजों को देखती हैं और उन माओं का प्रसव कराती हैं जो आर्थिक रूप से अक्षम हैं। उनसे फीस नहीं लेतीं। यह सिलसिला 1948 से चला रहा है। इन्हें इंदौर व आसपास के लोग डॉ़ दादी के नाम से जानते हैं। वे इंदौर की पहली महिला एमबीबीएस डाक्टर हैं। 68 साल के अपने चिकित्सा करियर के दौरान हजारों महिलाओं का वे प्रसव करा चुकी हैं। वे कहती हैं,''चिकित्सा एक सेवा कार्य है और मैंने सदैव से इसे सेवा रूप में लिया। इसलिए जब तक सांस है, तब तक ऐसे ही कार्य करती रहूंगी।'' इस सेवा यज्ञ की शुरुआत के बारे में वे बताती हैं,''मैंने 1952 में एमबीबीएस किया और 1957 में डॉ़ चन्द्रसिंह यादव से मेरा विवाह हुआ। उस दौरान डॉ. चन्द्रसिंह जी को सरकारी अस्पतालों की ओर से कई बार बुलावा आया लेकिन वे इंदौर के एक अस्पताल में अपना कार्य करते रहे। वे शुुरुआत से ही सेवाभावी थे। लोग उन्हें मजदूरों के डॉ बुलाते थे। मुझे उनकी यह बात बहुत अच्छी लगी और मैं भी उन्हीं के रास्ते पर चल पड़ी। मेरी इंदौर के सरकारी अस्पताल में नौकरी लगी लेकिन उसे मैंने ठुकराकर नंदलाल भंडारी प्रसूतिगृह नाम से एक अस्पताल खोला लेकिन वह बंद हो गया। इसके बाद मैंने अपने घर पर वात्सल्य नाम से नसिंर्ग होम की शुरुआत की जहां मैं आज भी असहाय एवं गरीबों की सेवा करती हूं।''

 

 

हौसला, जो हैरान कर दे

शेखर नाइक (30)

कार्य : क्रिकेट के खिलाड़ी

शिमोगा (कर्नाटक)

अहम योगदान: 2012 में भारत की ओर से नेत्रहीनों की क्रिकेट टीम के कप्तान रहे एवं टी-20 और एक दिवसीय प्रतियोगिता में विश्वकप जिताया।

 

राष्ट्रपति जब पद्मश्री सम्मान से एक तरफ भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली को अलंकृत करेंगे तो दूसरी ओर इसी सम्मान से दृष्टिहीन क्रिकेट खिलाड़ी शेखर नाइक भी सम्मानित होंगे। विराट से इतर नाइक के जीवन की कहानी अनूठी तो है ही, संघर्ष से जूझते लोगों के लिए एक मिसाल भी है। नाइक ने अपने परिश्रम, हौसले और लगन से अपनी शारीरिक अक्षमता को मात दी।

शिमोगा,कर्नाटक के रहने वाले शेखर नाइक बचपन से ही आंखों की रोशनी से वंचित हैं। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने एक सफल क्रिकेटर का मुकाम हासिल किया है। छोटे से स्तर से खेलते हुए वे न केवल राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचे बल्कि 2012 के टी-20 मैचों में भारत की 'ब्लाइंड टीम' के कप्तान भी रहे हैं। वे अपने बारे में बताते हैं,''मुझे आनुवंशिक बीमारी रही। एक दिन की बात है कि मैं एक नदी में गिर गया। आंखों में समस्या हुई और संयोग ऐसा रहा कि गांव में उसी समय आई कैंप लगा हुआ था। मैं जब उस शिविर में पहुंचा तो डाक्टरों ने आंखों की जांच की और बताया कि तुम्हारी आंखों की रोशनी वापस आ सकती है। मुझे बेंगलुरू लाया गया और एक ऑपरेशन के बाद मेरी दाईं आंख की रोशनी 60 प्रतिशत तक लौट आई। लेकिन इसी तीन महीने के भीतर ही मेरे पिता का देहांत हो गया। मेरी मां ने मुझे एक ब्लाइंड स्कूल में दाखिला दिलाया। इस समय मेरी उम्र यही कोई 11 वर्ष की रही होगी। बस मैंने यहीं से क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया। ­वे आगे बताते हैं,''मैं जब क्रिकेट खेलता था तो मेरे साथी मेरी दृष्टिहीनता का मजाक बनाते थे। मुश्किल समय में मेरी मां मेरा उत्साहवर्धन करती थीं। नाइक की इसी मेहनत का परिणाम है कि उन्होंने 2012 में टी-20 का विश्व कप एवं 2014 का विश्व कप जीतकर सभी को चौंका दिया।

 

 

सेतु से जोड़ा संसार

गिरीश भारद्वाज (51)

कार्य: अभियांत्रिकी

शुल्या (कर्नाटक)

अहम योगदान : पारंपरिक पुलों की तुलना में बेहद कम लागत पर करीब 120 से ज्यादा झूलते पुलों का किया निर्माण

 

शुल्या कर्नाटक के 66 वर्षीय मैकेनिकल इंजीनियर गिरीश भारद्वाज ने भारत के उन पिछड़े इलाकों में 100 से ज्यादा झूलते पुल बनाए हैं जहां सरकारी उदासीनता या अन्य किसी कारण से पुल नहीं बन सके थे। इस वजह से इन इलाकों के लोगों के जीवन स्तर पर खासा प्रभाव पड़ रहा था, जिसे गिरीश ने करीब से महसूस किया। उन्होंने ऐसे लोगों की समस्या और पीड़ा को समझकर अपने ज्ञान का सदुपयोग किया और ऐसे क्षेत्रों में सैकड़ों पुलों का निर्माण कर डाला। इसी वजह से आज उन्हें 'पुल बंधु' के रूप में भी जाना जाता है। वे जिस क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते थे, उसमें नहीं जा सके और उन्होंने करोबार करने का निश्चय किया। इसी बीच गिरीश के एक सरकारी अधिकारी मित्र, जो उनकी प्रतिभा से परिचित थे, ने उनसे एक गांव को जोड़ने के लिए पुल बनाने में मदद मांगी। गिरीश ने इसे स्वीकार किया और कुछ दिन में रस्सी एवं लकड़ी को जोड़कर एक पैदल यात्री पुल का निर्माण कर डाला। इसे सहारा देने के लिए उन्होंने स्टील और लोहे की राडों का प्रयोग किया जिसके सहारे लकड़ी टिकी रही। इसके बाद से तो गिरीश का यही ध्येय हो गया। वे धीरे-धीरे उन गांवों को मुख्य धारा से जोड़ने लगे जहां पुल नहीं होने की वजह से स्थानीय लोगों के जीवन स्तर पर खासा प्रभाव पड़ रहा था। खास बात यह है कि गिरीश की तकनीकी से पारंपरिक पुलों की तुलना में सिर्फ 10 फीसद की लागत में ही पुल का निर्माण बड़े ही कम समय में हो जाता है। प्रतीक के तौर पर अत्यधिक दुर्गम पश्चिमी घाट में उनके बनाए पुल लोगों के लिए काफी मददगार साबित हुए हैं। वे बताते हैं,''मैं एक गांव से जुड़े सेमिनार में गया था जहां सुदूर क्षेत्रों से करीब 80 से ज्यादा लोग आए थे। लेकिन जब इन्होंने अपने आवागमन संबंधी कठोर अनुभव बताने शुरू किए तो मन सिहर गया। विचार आया कि क्यों न ऐसे लोगों के लिए कुछ किया जाए। अपने इंजीनियर मित्रों की मदद से मैंने कुछ पुलों के नक्शे बनाकर सरकारी एजेंसियों से संपर्क किया और उन्हें अपने विचार और कार्य से अवगत कराया। सरकारी मशीनरी ने भी पूरी मदद की और स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से मैं आज तक यह काम करता आ रहा हूं।''

 

 

लपटों से जीवन बचाते

विपिन गनत्रा (59)

कार्य: अग्निशमन व्यक्तिगत रुचि

कोलकाता (पश्चिम बंगाल)

अहम योगदान : 40 वषोंर् में इस सेवाभावी इंसान ने बचाईं सैकड़ों जानें।      

 

वे पेशे से अग्निशमनकर्मी नहीं हैं लेकिन कोलकाता या उसके आसपास कहीं आग लगी हुई हो और विपिन गनत्रा वहां न हों, ऐसा हो ही नहीं सकता। कई बार वे खुद अग्निशमन दल के मुख्यालय को फोन करके आग लगने की जानकारी देते हैं और फिर वहां पहुंच जाते हैं। वे पूरी तरह से फायर बिग्रेडकर्मी की वेशभूषा में होते हैं। ऐसे में कोई उन्हें देखकर यह नहीं कह सकता कि वे अग्निशमन दल के कर्मचारी नहीं हैं। जब लोगों के हाथ-पांव फूल रहे होते है तब वे बिना बुलाए पहुंच जाते हैं और दमकल कर्मियों के साथ आग को काबू करने में जुट जाते हैं। पद्म सम्मान मिलने पर वे कहते हैं,''सम्मान मिला इसके लिए खुशी है लेकिन समाज के लोगों का आशीर्वाद मुझे ऐसे ही मिलता रहे ताकि मेरे अंदर सेवा करने की शक्ति आए और मैं कार्य करता रहं।''

वे इस क्षेत्र में आने के बारे में बताते हैं,''मैं जब भी कहीं आग लगी हुई देखता था तो मुझे पता नहीं कैसा लगता था। दरअसल इसके पीछे की वजह यह है कि जब मेरी 12 साल की उम्र रही होगी तब आग से एक हादसा हुआ और मेरे भाई की उसमें जान चली गई। उस घटना के बाद होता यह था कि मैं जब भी कहीं दमकल का सायरन सुनता तो उसके पीछे भाग पड़ता था और अग्निशमन दल के सदस्यों के साथ आग बुझाने में जुट जाता था। धीरे-धीरे यह मेरी आदत और कार्य का हिस्सा हो गया।'' विपिन के अनुसार इस काम से उन्हें सुकून मिलता है और इसी सुकून के चलते आज भी वे इस काम में लगे हुए हैं।

 

 

वसुधा ने ओढ़ी धानी चूनर

दारिपल्ली रमैया (68)

कार्य: वृक्ष रोपण

तेलंगाना

अहम योगदान : 1 करोड़ से ज्यादा पेड़ लगाने का कीर्तिमान

 

''पेड़ हैं तो सब कुछ है। मानव जीवन में इनका जो महत्व है उसे शब्दों का रूप दे पाना संभव नहीं है। मैं भारत को हरा-भरा देखना चाहता हूं। इसलिए मैं बोलने में नहीं, कर्म करने में विश्वास रखता हूं।'' ऐसा कहना है तेलंगाना के 68 वर्षीय दारिपल्ली रमैया का। आज भी वे उत्साह से भरे हुए हैं। आस-पास कैसे हरियाली आए और पेड़ लहलहाएं, इसके लिए रमैया दशकों से वृक्षारोपण के अपने अनूठे काम में लगे हुए हैं। उन्हें पेड़ों का विस्तार करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने विशेष रूप से जैव डीजल एवं छायादार नीम के पौधे लगाए हैं। इस नेक काम में उनकी पत्नी ज्ञानम्मा उन्हें पूरा समर्थन देती हैं और कंधे से कंधा मिलाकर इस मिशन में सहभागी होती हंै। उन्होंने अपने घर के पास पौधशाला तैयार की है जहां से तैयार पौधों को वे दूसरे स्थानों पर लगाते हैं। रमैया अपने काम के बारे में बताते हैं,''मैंने अभी तक कितने पेड़ लगाए, यह तो मुझे याद नहीं है। लेकिन मैं जब भी कहीं भी जाता हूं मेरी थैली में विभिन्न तरह के पौधों के बीज होते हैं। मैं उन्हें जगह-जगह डालते हुए चलता हूं। इसके पीछे मेरा मानना है कि मैं जितने भी बीज डालता हूं, उसमें कुछ तो पेड़ तैयार होते ही होंगे।''

रमैया ने अपने जिले एवं आसपास के क्षेत्र में अनेक तरह के पेड़-पौधों को लगाया है। खासकर डीजल पौधे जिनसे न केवल पर्यावरण की रक्षा होती है बल्कि जो आर्थिक रूप से उत्पादक साबित होते हैं। इसी के चलते उन्हें 'वृक्ष पुरुष' के रूप में जाना जाता है।  

 

 

मोटरसाइकिल एंबुलेंस से बचाई 3 हजार जानें

करीमुल हक(52)

कार्यक्षेत्र: चाय बागान में श्रमिक

जलपाईगुड़ी(पश्चिम बंगाल)

अहम योगदान : उनकी मोटरसाइकिल एंबुलेंस बनी मानवता की प्रतीक

 

'रात का पहर था। अचानक मेरी मां की काफी तबियत खराब हो गई। पहले तो गांव के डॉक्टर को दिखाया लेकिन उनको कोई राहत नहीं मिली। उनकी तबियत लगातार खराब होती जा रही थी। मैं उन्हें पास के गांव में ले जाना चाहता था जहां एक छोटा अस्पताल था लेकिन वहां तक ले जाना संभव नहीं था क्योंकि गांव के बीच एक नदी थी। नदी पर कोई पुल नहीं था जो कोई एंबुलेंस उधर से इधर आ जाती और न ही कोई मोटरसिाइकल थी जिससे उन्हें किसी तरह पास के अन्य गांव में दिखाया जा सकता। मैं अपनी आंखों के सामने मां की झटपटाहट देख रहा था। मां दर्द से चिल्ला रही थीं लेकिन मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा था। अचानक मां ने अपने प्राण छोड़ दिए और वे एंबुलेंस और चिकित्सा अभाव में मर गईं। मैं रह रह कर सोच रहा था कि मेरी मां को समय रहते अगर एंबुलेंस मिल जाती और वे अस्पताल पहुंच जाती तो शायद वह जीवित होतीं। इसके बाद मैंने निश्चय किया कि मैं इस बारे में कुछ करूंगा। लेकिन इसी बीच मेरे जीवन में एक और हादसा हुआ। मैं एक दिन चाय बागान में काम कर रहा था तभी मेरा साथी कर्मचारी बेहोश होकर गिर पड़ा। आसपास कुछ साधन न देख मैंने तत्काल निर्णय लिया और उसे पीठ पर बांधकर मोटरसाइकिल से ही प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र ले गया। लेकिन वहां पर उचित स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं थी। डॉक्टर ने सलाह दी कि 45 किमी़ दूर अस्पताल जाना होगा जहां इनकी तत्काल सर्जरी हो तो यह ठीक हो जाएंगे। मैंने तत्काल जाने का निर्णय लिया और बाइक से ही उसे लेकर अस्पताल चल दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि समय से पहुंचने के कारण उसकी जान बच गई। बस यहीं से मोटरसाइकिल एंबुलेंस सुविधा शुरू करने का विचार आया। आज मुझे जैसे ही सूचना मिलती है, मैं अपनी मोटरसाइकिल से मरीज को अस्पताल पहुंचाने का काम करता हूं।'' पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के माल ब्लॉक के चाय श्रमिक करीमुल हक मानते हैं कि ऐसा करने से जन्नतनशीं उनकी मां को खुशी मिलती होगी।                          

 

 

मसीहा ही तो हैं सुब्रतो दास

डॉ. सुब्रतो दास

कार्य: चिकित्सक

वडोदरा (गुजरात)

अहम योगदान : दुर्घटना में घायल हुए लोगों को तत्काल पहंुचाते हैं मदद

 

सुब्रतो दास बताते हैं,''यह बात वर्ष 1999 की है। रात का यही कोई 1 बजे का समय रहा होगा। मैं कार से वडोदरा राजमार्ग से गुजर आ रहा था लेकिन रास्ते में मेरी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई। कार में मेरे साथ मेरी पत्नी और मेरे मित्र थे जो दुर्घटना के चलते कार में बुरी तरह से फंस गए थे। मैं लोगों से मदद की अपील कर रहा था लेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। इस दौरान मैं लगभग 7 घंटे तक इसी तरह फंसा रहा। इसके बाद सुबह एक बैलगाड़ी वाले दूधियों ने हमें कार से निकाला और अस्पताल में भर्ती कराया। बस इसी घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया। मुझे लगा कि इस दिशा में कोई ठोस कार्य करना चाहिए और मैंने 'लाइफ लाइन फाउंडेशन' की स्थापना की। मैंने कुछ प्रशिक्षण कर्मियों के साथ इस क्षेत्र में काम करना शुरू किया और एक 'हेल्प लाइन नंबर' जारी किया जिस पर सूचना मिलते ही फाउंडेशन से जुड़े प्रशिक्षित सदस्य घायल का प्राथमिक उपचार करते हैं और फिर उसे 1 घंटे के अंदर अस्पताल में भर्ती कराते हैं।''वे कहते हैं,''एड्स से मरने वालों की तुलना में सड़क दुर्घटना में मरने वालों की संख्या काफी ज्यादा है, क्योंकि हर साल करीब 1 लाख लोग (भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार) सड़क दुर्घटना में मर जाते हैं।'' फाउंडेशन आज के इस अनूठे कार्य का विस्तार गुजरात के अलावा महाराष्ट्र,पश्चिम बंगाल एवं अन्य राज्यों तक फैल चुका है। फाउंडेशन एंबुलेंस के संजाल का प्रयोग करता है जिसके सहारे वह दुर्घटना में घायल लोगों को समय रहते अस्पताल पहुंचाता है।

 

 

मां की पीड़ा सहन न हुई तो बना दी मशीन

चिंताकिंदी मल्लेशम (48)

कार्य: बुनकर

सरजीपेट (आंध्र प्रदेश)

अहम योगदान : बुनकरों के लिए कम समय, कम परिश्रम वाली मशीन बनाई।

 

पारंपरिक पोचमपल्ली रेशम की साडि़यां बनाने वाले बुनकरों को साड़ी की बुनाई के दौरान दिनभर में हजारों बार साड़ी पर हाथ फेरने की कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। लेकिन अब उन्हें ऐसा करने की जरूरत नहीं पड़ती। क्योंकि अब यह कठिन काम मशीन द्वारा होता है। इसका पूरा श्रेय मल्लेशम को जाता है जिन्होंने यह मशीन बनाई है। इस मशीन की मदद से आंध्र प्रदेश के सैकड़ों बुनकर आज न केवल अत्यधिक श्रम से बच पा रहे हैं बल्कि बहुत कम समय में ही ढेरों डिजायन भी तैयार कर लेते हैं। मल्लेशम ने 12 साल की छोटी उम्र में ही बुनकर के काम की शुरुआत कर दी थी। घर की परिस्थिति और काम के दबाव के चलते सातवीं तक की पढ़ाई के बाद उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा। हालांकि रात में पढ़ाई कर उन्होंने दसवीं पास की। मल्लेशम बताते हैं,'' अपनी मां को साड़ी की बुनाई के लिए कठिन परिश्रम करते देखकर मुझे कष्ट होता था। कंधे और जोड़ों में भयंकर दर्द होने के बाद भी परिवार के भरण पोषण के लिए वे घंटों साड़ी की बुनाई करती थीं। एक साड़ी पर यह प्रक्रिया पूरा करने के लिए कम से कम नौ हजार बार हाथ को ऊपर से नीचे फेरना पड़ता था जिसमें कम से कम पांच से छह घंटे का वक्त लगता था। ऐसे में मां 16 से 17 घंटे काम करती थीं और दो साडि़यां तैयार कर पाती थीं। इस सबके चलते वे बीमार रहती थीं। मां के अलावा भी ऐसी सैकड़ों महिलाएं थीं जो इस कठिन काम के चलते बीमार रहती थीं। यह सब देखकर मेरे मन में विचार आता था क्यों न कुछ ऐसा किया जाए जिससे इन सभी महिलाओं का जीवन आसान हो सके।'' मल्लेशम ने 1992 में एक मशीन की योजना पर काम करना शुरू किया और लंबे समय के बाद 'लक्ष्मी अशू'(अशू-साडि़यों पर तेजी से हाथ फेरने की प्रक्रिया) का पहला प्रोटोटाइप बनानया और बाद में मशीन बनाने में सफलता मिली। सदियों से जो काम हाथ से होता था, अब वह मशीन से होता है-

 

 

स्वच्छता के संकल्प का सम्मान

डॉ. मापुस्कर (88)

कार्य: चिकित्सक

पुणे (महाराष्ट्र)

अहम योगदान : गांव को खुले में शौच के दु:स्वप्न से किया मुक्त

 

पुणे के रहने वाले डॉ. मापुस्कर स्वच्छता दूत के नाम से जाने जाते हैं। देश में केंद्र में राजग सरकार आने के बाद से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देशभर में स्वच्छता अभियान की शुरुआत की गई थी लेकिन डॉ़ मापुस्कर 5 दशक पहले से इस अभियान को छेड़े हुए थे। इसी अनूठे योगदान के चलते उन्हें सरकार की ओर से मरणोपरांत पद्म सम्मान देने की घोषणा की गई है। पुणे के रहने वाले डॉ़ मापुस्कर की 1960 में देहु के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर नियुक्त हुई। इस दौरान उन्होंने देखा कि अधिकांश रोगी स्वच्छता के अभाव में बीमार होकर आते थे। उन्होंने ऐसी स्थिति को देखकर स्वच्छता पर काम करने का मन में संकल्प लिया और गांव में स्वच्छता मुहिम छेड़ दी। गांव के घर-घर में शौचालय हो, इसके लिए उन्होंने लोगों को जागरूक करना शुरू कर दिया। इसके लिए प्रत्येक घर पर साधारण शौचालय बनवाना शुरू किया और गांव को खुले में शौच मुक्त भी कराया। लोगों का समर्थन मिलता देख उन्होंने गांव में स्वच्छता के लिए एक अभियान भी छेड़ा और देहु में ही एक प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की। सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका यह काम जारी रहा। आज उनकी इस विरासत को उनकी बेटी डॉ़ शिल्पा नारायण आगे बढ़ा रही हैं और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य कर रही हैं।

 

 

प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती

मरियप्पन थंगवेलु (22)

कार्य: खिलाड़ी

सालेम (तमिलनाडु)

अहम योगदान : रियो पैरालंपिक (2016) में स्वर्ण पदक

 

 

मरियप्पन की उम्र लगभग 22 वर्ष है। पिछले वर्ष जिस समय उन्होंने रियो के पैरालंपिक में पुरुषों की लंबीकूद में छलांग लगाई तो पूरी दुनिया भारत के इस सितारे की तरफ देखती ही रह गई। अपने अदम्य साहस और जुनून के चलते उन्होंने भारत की झोली में तीसरा पैरालंपिक स्वर्ण पदक डालकर इतिहास रच दिया। लेकिन स्वर्ण पदक जीतकर भारत का मान बढ़ाने वाले मरियप्पन थंगवेलु के स्वयं के जीवन की कहानी बड़ी संघर्षपूर्ण है। वे अपने संघर्षपूर्ण जीवन के बारे में बताते हैं,''उस समय मैं महज पांच साल का था। घर के पास सड़क थी और वहीं पर खेल रहा था। अचानक आई एक बस जिसका चालक नशे में धुत था, उसने मेरे पैर में टक्कर मार दी। टक्कर की वजह से मेरे घुटने से नीचे टांग पूरी तरह कुचली चुकी थी और पैर पूरी तरह बेकार हो चुका था। धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ तो इसकी वजह से मुझे बहुत समस्या भी हुई लेकिन इस अक्षमता को मैंने कभी अपने करियर के आड़ेआने नहीं दिया। आज उसी लगन और मेहनत का परिणाम सभी के सामने है।'' तमिलनाडु के सेलम जिले के पेरियावादागामपट्टी के रहने मरियप्पन की मां सरोजा सब्जियां बेचती हैं और मजदूरी करती हैं। राष्ट्रीय चैंपियनशिप में कोच सत्यनारायण ने पहली बार नेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उनका प्रदर्शन देखा था और तभी भांप लिया था कि वह कुछ बड़ा करेंगे। यह देखकर सत्यनारायण ने मरिय्यपन के मन में जीत का जज्बा जगाया। साल 2015 में बेंगलुरु में जब प्रशिक्षण हुआ उस समय मरिययपन वरिष्ठता क्रम की प्रतियोगिता में सबसे अधिक अंक हाासिल करने वालों में से एक रहे, जिसके बाद उनके रास्ते खुलते चले गए और उन्होंने ट्यूनीशिया ग्रांड प्रिक्स में 1.78 मीटर की छलांग लगाकर पैरा ओलंपिक में जगह बनाई और अंत में भारत की झोली में स्वर्ण पदक डालकर साबित कर दिया कि जज्बा और लगन मन में है तो कुछ भी असंभव नहीं है।

 

 

योद्धा दादी मीनाक्षी अम्मा

मीनाक्षी अम्मा (77)

कार्य: मार्शल आर्ट प्रशिक्षक केरल

अहम योगदान : प्राचीन भारतीय युद्घ कला कलारीपयट्टू को रखा है जीवंत

 

77 वर्ष की मीनाक्षी अम्मा अपने से आधे उम्र के व्यक्ति के सामने कलारी (मैदान) में उतरती हैं। आंखों में बिजली जैसी चमक, हाथ में लहराती हुई तलवार, अपने प्रतिद्वंद्वी को परास्त करने का मौका ढूंढती नजरें देखने वाले को बांध लेती हैं। अनुभव का कमाल दिखता है जब पलक झपकते ही वे अपने प्रतिद्वंद्वी पर हावी हो जाती हैं। उनके पैंतरे और सधापन देखने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ता है। अम्मा प्राचीन भारतीय मार्शल आर्ट कलारीपयट्टू की प्रशिक्षक हैं। हाल ही में उनसे जुड़ा एक वीडियो फेसबुक पर वायरल हुआ था जिसे करीब12 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा था। अम्मा को भारत की सबसे उम्रदराज महिला तलवारबाज होने के लिए जाना जाता है। उन्होंने 7 वर्ष की अवस्था से ही यह कला सीखनी शुरू कर दी थी और 68 वर्ष से ज्यादा समय से वे इसका प्रशिक्षण दे रही हैं। उनके विद्यालय कलारी संगम में 150 से ज्यादा बच्चे हैं। जून से सितम्बर तक हर साल यहां दिन में तीन बार कक्षाएं लगती हैं और खास बात यह है कि इसमें बेटियां सबसे ज्यादा होती हैं। दरअसल कलारीपयट्टू को मार्शल आर्ट प्रणाली की सबसे पुरानी कला के तौर पर भी जाना जाता है। कहते हैं,चीन का मार्शल आर्ट कुंगफू इससे ही विकसित हुआ है।

 

'बेटियों के लिए कुछ भी करूंगी'

अनुराधा कोइराला (68)

कार्य: सामाजिक कार्यकर्ता

रुमजातार (नेपाल)

अहम योगदान : 12 हजार महिलाओं को देह व्यापार से तो 45 हजार से अधिक को मानव तस्करी से कराया मुक्त

 

उनका काम बेहद चुनौतीपूर्ण है लेकिन अनुराधा के चेहरे पर हरदम मुस्कान रहती है। वे गैर सरकारी संस्था माइती नेपाल की संस्थापक अध्यक्ष हैं। वे सालों से उन महिलाओं के लिए संघर्ष कर रही हैं जो तस्करों द्वारा वेश्यावृत्ति के लिए अपहर्त की जाती हैं। अब तक उन्होंने 12 हजार को देह व्यापार से मुक्त कराया है जबकि 45 हजार से अधिक को मानव तस्करी का चारा बनने से रोका है। ये दुनिया के सबसे खतरनाक अपराधियों से टकराने का काम है। ये दुनिया के सबसे ज्यादा उपेक्षित पीडि़तों के आंसू पोंछने का भी काम है। इसके लिए साहस और संवेदनशीलता, दोनों की आवश्यकता है। अनुराधा डटी हुई हैं। नेपाल-भारत सीमा मानव तस्करों के लिए बड़ा ही सुलभ रास्ता है। आंकड़ों की मानें तो यह रास्ता दुनिया के सबसे व्यस्त मागोंर् में से एक है। और इन रास्तों से सालाना करीब 10 हजार महिलाओं की तस्करी की जाती है। वे कहती हैं,''यह बड़ा ही दुखद है। मैं जल्द ही इस विषय में हस्तक्षेप करूंगी।''  

 

 

मन को मोहती कला

एक छोटी सी बच्ची एक दिन एक मधुबनी कलाकृति बना रही थी। यह कोई अजूबा नहीं था लेकिन फिर भी कई लोग जो बना रहे थे उसमें से यह अलग थी। एक जानकार ने उस कलाकृति देखकर कहा था कि वह मिथिला की कलाकृति और गांव का नाम एक दिन जरूर रोशन करेगी। गणतंत्र दिवस पर जब बिहार की बउवा देवी को पद्म सम्मान देने की घोषणा हुई तो लोगों को लगा कि उस व्यक्ति ने ठीक ही कहा था। 76 वर्षीय बउवा देवी की बनाई गईं अनेक कलाकृतियों ने लोकप्रियता हासिल की। बउवा देवी 11 बार जापान, 2 बार फ्रांस, स्पेन, जर्मनी समेत कई देशों की यात्रा कर चुकी हैं। इनकी कलाकृतियों को प्रधानमंत्री ने अतिथियों को भेंट किया है।

 

योद्धा दादी मीनाक्षी अम्मा

मीनाक्षी अम्मा (77)

कार्य: मार्शल आर्ट प्रशिक्षक, केरल

77 वर्ष की मीनाक्षी अम्मा अपने से आधे उम्र के व्यक्ति के सामने कलारी (मैदान) में उतरती हैं। आंखों में बिजली जैसी चमक, हाथ में लहराती हुई तलवार, अपने प्रतिद्वंद्वी को परास्त करने का मौका ढूंढती नजरें देखने वाले को बांध लेती हैं। अनुभव का कमाल दिखता है जब पलक झपकते ही वे अपने प्रतिद्वंद्वी पर हावी हो जाती हैं। उनके पैंतरे और सधापन देखने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ता है। अम्मा प्राचीन भारतीय मार्शल आर्ट कलारीपयट्टू की प्रशिक्षक हैं। हाल ही में उनसे जुड़ा एक वीडियो फेसबुक पर वायरल हुआ था जिसे करीब12 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा था। अम्मा को भारत की सबसे उम्रदराज महिला तलवारबाज होने के लिए जाना जाता है। उन्होंने 7 वर्ष की अवस्था से ही यह कला सीखनी शुरू कर दी थी और 68 वर्ष से ज्यादा समय से वे इसका प्रशिक्षण दे रही हैं। उनके विद्यालय कलारी संगम में 150 से ज्यादा बच्चे हैं। जून से सितम्बर तक हर साल यहां दिन में तीन बार कक्षाएं लगती हैं और खास बात यह है कि इसमें बेटियां सबसे ज्यादा होती हैं। दरअसल कलारीपयट्टू को मार्शल आर्ट प्रणाली की सबसे पुरानी कला के तौर पर भी जाना जाता है। कहते हैं,चीन का मार्शल आर्ट कुंगफू इससे ही विकसित हुआ है।

 

'बेटियों के लिए कुछ भी करूंगी'

अनुराधा कोइराला (68)

कार्य: सामाजिक कार्यकर्ता

रुमजातार (नेपाल)

अहम योगदान : 12 हजार महिलाओं को देह व्यापार से तो 45 हजार से अधिक को मानव तस्करी से कराया मुक्त

 

उनका काम बेहद चुनौतीपूर्ण है लेकिन अनुराधा के चेहरे पर हरदम मुस्कान रहती है। वे गैर सरकारी संस्था माइती नेपाल की संस्थापक अध्यक्ष हैं। वे सालों से उन महिलाओं के लिए संघर्ष कर रही हैं जो तस्करों द्वारा वेश्यावृत्ति के लिए अपहर्त की जाती हैं। अब तक उन्होंने 12 हजार को देह व्यापार से मुक्त कराया है जबकि 45 हजार से अधिक को मानव तस्करी का चारा बनने से रोका है। ये दुनिया के सबसे खतरनाक अपराधियों से टकराने का काम है। ये दुनिया के सबसे ज्यादा उपेक्षित पीडि़तों के आंसू पोंछने का भी काम है। इसके लिए साहस और संवेदनशीलता, दोनों की आवश्यकता है। अनुराधा डटी हुई हैं। नेपाल-भारत सीमा मानव तस्करों के लिए बड़ा ही सुलभ रास्ता है। आंकड़ों की मानें तो यह रास्ता दुनिया के सबसे व्यस्त मागोंर् में से एक है। और इन रास्तों से सालाना करीब 10 हजार महिलाओं की तस्करी की जाती है। वे कहती हैं,''यह बड़ा ही दुखद है। मैं जल्द ही इस विषय में हस्तक्षेप करूंगी।''  

 

मन को मोहती कला

एक छोटी सी बच्ची एक दिन एक मधुबनी कलाकृति बना रही थी। यह कोई अजूबा नहीं था लेकिन फिर भी कई लोग जो बना रहे थे उसमें से यह अलग थी। एक जानकार ने उस कलाकृति देखकर कहा था कि वह मिथिला की कलाकृति और गांव का नाम एक दिन जरूर रोशन करेगी। गणतंत्र दिवस पर जब बिहार की बउवा देवी को पद्म सम्मान देने की घोषणा हुई तो लोगों को लगा कि उस व्यक्ति ने ठीक ही कहा था। 76 वर्षीय बउवा देवी की बनाई गईं अनेक कलाकृतियों ने लोकप्रियता हासिल की। बउवा देवी 11 बार जापान, 2 बार फ्रांस, स्पेन, जर्मनी समेत कई देशों की यात्रा कर चुकी हैं। इनकी कलाकृतियों को प्रधानमंत्री ने अतिथियों को भेंटनदी को दी नई जिन्दगी

 

बलबीर सिंह सीचेवाल (51)

कार्य: सामाजिक कार्यकर्ता-संत

होशियारपुर (पंजाब)

अहम योगदान : 160 किमी. लंबी ऐतिहासिक नदी को किया निर्मल

 

जिस नदी के तट पर गुरुनानक जी को ज्ञान प्राप्त हुआ उसे शहरी बसाहट से बहकर आ रही गंद्गी ने नाले में तब्दील कर दिया था। लोग बेखबर थे, जिन्हें अखरता वे शोक प्रकट कर किनारे हो जाते। एक शख्स ने इसे साफ करने की ठानी और 160 किमी़ लंबी काली बेईं नदी साफ करके दिखा दी। यह चमत्कार कर दिखाया है पंजाब-होशियापुर के पर्यावरण कार्यकर्ता और संत श्री बलबीर सिंह सीचेवाल ने। सालों परिश्रम के बाद सीचेवाल ने वर्ष 2000 में यह काम पूरा किया जिसके लिए उन्हें टाइम पत्रिका ने दुनिया के 30 'हीरोज ऑफ एन्वायरन्मेंट' में शामिल किया था। आज भी वह पर्यावरण, स्वच्छता के लिए तरह-तरह के अभियान चलाते रहते हैं। वे बताते हैं,''मैंने अपने साथी और सहयोगी स्वयंसेवकों के साथ मिलकर सबसे पहले बीन नदी के तटों का निर्माण किया और नदी के किनारे-किनारे सड़कें बनाईं। लोगों को इसकी स्चव्छता के लिए जागरूक किया और स्वच्छता अभियान भी चलाया। अपने स्वयंसेवकों के साथ नदी में उतरा और हर उस गंदे नाले का रुख मोड़ा जो सीधे नदी में मिलता था। आज इस नदी की दशा बदल गई है। जिस नदी के किनारे लोग खड़े होना पसंद नहीं करते थे आज वहां लोग अपना समय बिताने आते हैं।''

 

 

असंभव तो कुछ होता ही नहीं

सुनीति सोलोमन (76)

कार्य: चिकित्सक

चेन्नै (तमिलनाडु)

अहम योगदान : एड्स की दिशा में शोध के अलावा मरीजों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए समर्पित किया जीवन

 

'मेरी कार्यपद्धति में संभव शब्द है, असंभव तो कुछ होता ही नहीं। मैं किसी भी बात के लिए किसी से शिकायत नहीं रखती हूं। और जो भी काम करती हूं पूरे मन से करती हूं, जिसका मुझे परिणाम भी मिलता है।' ये शब्द जुलाई,2010 में सुनीति सोलोमोन ने विदेशी मीडिया को दिए साक्षात्कार के दौरान संवाददाता के एक सवाल के जवाब में कहे थे। आज वह इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन 'असम्भव' को संभव बनाने की प्रेरणा दे रही हैं। सुनीति ने 1985 में भारत में एड्स के पहले मामले का पता लगाया था। और तब से आजीवन इस क्षेत्र में शोध करतीं रहीं। इसके लिए उन्होंने वाई.आर गायतोंडे केंद्र की स्थापना की जिसने भारत में एड्स पर अनुसंधान एवं इसके रोकथाम के लिए प्रभावी काम किया। वे एड्स पीडि़तों को इलाज उपलब्ध करवाने और सामाजिक जागरूकता लाने के लिए आजीवन कार्य करती रहीं। 76 वर्ष की अवस्था में उनका देहांत हुआ।

 

साहित्य के सिंधु

प्रख्यात साहित्यकार नरेन्द्र कोहली की आज के दौर में आधुनिक हिन्दी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों में होती है। कहानी, उपन्यास, नाटक और व्यंग्य सहित अन्य विधाओं में उनकी लगभग 100 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। हिन्दी साहित्य में महाकाव्यात्मक उपन्यास की विधा की शुरुआत का श्रेय उन्हीं को जाता है।

पुराणों, इतिहास और कहानियों को आधुनिक संदर्भों में देखकर उन्होंने बेहतरीन रचनाएं लिखीं। इसलिए उन्हें सांस्कृतिक राष्ट्रवादी साहित्यकार कहा जाता है। उनका उपन्यास 'महासमर' चर्चित उपन्यासों में से एक है।

 

संत से बढ़ा 'सम्मान' का मान

आचार्य विजयरत्न

सुंदर सूरी (70)

कार्य/ सेवा: जैनसंत गुजरात

अहम योगदान : भारत के गांव-गांव, शहर-शहर कन्या भ्रूण हत्या, गोवंश संरक्षण और मादक पदार्थों के विरुद्ध समाज को किया जागरूक

 

आचार्य विजयरत्न सुंदर सूरी जी का नाम जैन संत परंपरा में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। आचार्यश्री पिछले लंबे समय से भारत के गांव-गांव, शहर-शहर में कन्या भ्रूण हत्या, गोवंश रक्षण और मादक पदार्थों के सेवन के विरुद्ध समाज को जाग्रत करते आ रहे हैं। अत्यंत विनम्र स्वभाव के आचार्यश्री की प्रभावी भाषा शैली की वजह से लोग उनकी बातों को सहजता से आत्मसात ही नहीं करते, बल्कि उनके दिखाए मार्ग पर चलने का प्रयास भी करते हैं। जैन संत होने के कारण देशभर में उनका प्रवास पैदल चलकर होता है। महाराजश्री की एक और अनूठी प्रतिभा है कि वे गुजराती, हिन्दी और अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं में बड़ी ही सहजता से अपनी बात रखते हैं।

एक अन्य कीर्तिमान जो महाराजश्री के नाम है, वह है किसी भी संत के प्रवचन का सबसे अधिक पुस्तक रूप में संकलन होना। यह अपने आप में रिकॉर्ड ही है। अब तक अनेक भाषाओं में उनकी 350 से अधिक पुस्तकें अनुदित होकर प्रकाशित हो चुकी हैं। बातचीत की शैली में लिखी गईं ये पुस्तकें समाज जीवन के विभिन्न पहलुओं को बड़े सहज, सरल अंदाज में छूती हैं।

पद्मश्री से सम्मानित होने पर आचार्यश्री ने कहा,''इस पुरस्कार से शील, सदाचार और संस्कार की रक्षा करने का जो मेरे द्वारा प्रयास हो रहा है वह और आसान हो जाएगा।'

 

सेवामय जीवन का लिया व्रत

निवेदिता भिड़े (59)

पेशा : सामाजिक कार्यकर्ता

वर्धा (महाराष्ट्र)'

अहम योगदान:   देश के सुदूर क्षेत्रों में बच्चों को शिक्षा से किया आलोकित

 

'यह विवेकानंद केन्द्र के सभी कार्यकर्ताओं की मेहनत का प्रतिसाद है।' सामाजिक कार्य के लिए पद्म सम्मान मिलने के बाद सुश्री निवेदिता भिड़े की यह पहली प्रतिक्रिया थी। वह शिक्षा एवं सामाजिक क्षेत्र से एक लंबे से जुड़ी हुई हैं और लोग उन्हें प्रेम से दीदी बुलाते हैं। महाराष्ट्र के वर्द्धा में जन्मीं निवेदिता ने 1977 में कन्याकुमारी के विवेकानंद केंद्र में अखिल भारतीय प्रसार सचिव के रूप में कार्य संभाला। वर्तमान में वे इसी केंद्र की उपाध्यक्ष हैं। 1978 से 1985 तक उनके निर्देशन में तमिलनाडु के दक्षिण जिलों के सुदूर गांवों में विकास कार्य संपन्न हुआ। इसके बाद वह विवेकानंद केन्द्र विद्यालय की प्रधानाचार्य बनीं जहां उन्होंने कन्याकुमारी के ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था की एवं 1993 से 2000 के बीच वनवासी क्षेत्रों-असम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में 47 से ज्यादा स्कूलों को खोला। इस समय इनकी विद्यालयों की संख्या बढ़कर 65 हो गई है। अनेक भाषाओं-संस्कृत, हिन्दी, मराठी, अंग्रेजी और तमिल की गहन जानकार सुश्री भिड़े ने अनेक पुस्तकों को लिखा है जिसमें 'स्वामी विवेकानंद इन अमेरिका', 'लाइफ एंड मैसेज ऑफ स्वामी विवेकानंद','गीता फॉर डेली लाइफ' प्रमुख हैं। वे बातचीत में कहती हैं,''स्वामी विवेकानंद केन्द्र जैसी जीवनव्रती कार्यकर्ता होने के नाते कोई कार्य व्यक्तिगत नहीं होता। यहां जो भी होता है वह सब सामूहिक होता है। इसलिए कोई भी उपलब्धि और सम्मान यहां एक व्यक्ति का नहीं है। इसलिए यह सम्मान भी विवेकानंद केंद्र के सभी कार्यकर्ताओं का है जो देश के विभिन्न क्षेत्रों में कठिन से कठिन स्थिति में कार्य करते हैं।'' 

 

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