| दिंनाक: 06 Feb 2017 15:15:48 |
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पीढ़ी दर पीढ़ी से लोग यह कामना करते हैं कि हे प्रभु! कोई ऐसा समय, ऐसा अवसर, ऐसा संयोग प्रदान करो कि हम जीते जी, जब तक शरीर सक्षम है, कैलास-मानसरोवर के दर्शन कर आएं। यह यात्रा बिना प्रभु की साक्षात् कृपा के संभव नहीं। प्राचीन काल में तो यह यात्रा इतनी कठिन और असंभव से भी परे मानी जाती थी कि यात्रा पर जाने से पूर्व लोग अपना श्राद्ध-तर्पण भी कर देते थे। महाराष्ट्र में तो इस यात्रा की कठिनता का इतना आभास रहा कि स्वर्गीय प्रियजन के लिए वहां कैलासवासी ही लिखा जाता है- स्वर्गीय नहीं। एक समय था जब भारत से लगभग 20 मार्ग कैलास-मानसरोवर की ओर जाते थे। केवल उत्तराखंड से ही तीन बड़े मार्ग थे— श्री बदरीनाथ होते हुए माना गांव पार करके— दूसरा धारचुला तथा गुंजी गांव होते हुए और तीसरा मुनस्यारी से मिलम दर्रा पार करके। 1948 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. संपूर्णानंद ने गांधीजी की अस्थियां मानसरोवर में प्रवाहित करने के लिए मिलम दर्रे वाले रास्ते से ही भिजवायी थीं। उन्हीं के समय प्रख्यात वैज्ञानिक एवं अनंतर संन्यासी बने स्वामी प्रणवानंद जी ने मानसरोवर की गहराई मापने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की सहायता प्राप्त की थी। स्वामी जी 21 बार कैलास-मानसरोवर गये और अनेक महीने वहां प्रवास भी किया। योग विद्या के ध्यान विद्वान डॉ. संपूर्णानंद ने उन्हें विशेष अल्यूमीनियम की नाव बनवा कर दी थी ताकि वे मानसरोवर की गहराई का अध्ययन कर सकें। समय बदला और '62 के युद्ध के बाद चीन ने कैलास-मानसरोवर यात्रा का मार्ग बंद कर दिया।
1977 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी के विदेश मंत्री रहते हुए उनकी चीन यात्रा के दौरान हुई चर्चा में यात्रा पुन: प्रारंभ करने का भी समझौता हुआ। इससे पूर्व प्रसिद्ध चीन विशेषज्ञ एवं वर्तमान सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी प्रारंभिक तैयारियों के लिए चीन का मन बना आये थे। 1981 में यह यात्रा पुन: शुरू हुई और उसका स्वरूप लगातार बढ़ता गया। दो वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ऐतिहासिक पहल करते हुए सिक्किम के नाथूला क्षेत्र से कैलास-मानसरोवर यात्रा का दूसरा मार्ग प्रारंभ करवाया। इसके लिए देश के हिंदू तीर्थ यात्री उनके सदैव आभारी रहेंगे। क्योंकि यह मार्ग बहुत सरल, सहज तथा वयाधिक्यों के लिए यात्रा करने योग्य हो गया है। दूसरा और प्रारंभिक मार्ग उत्तराखंड के धारचुला, गुंजी, नवीढांग तथा लिपुलेख दर्रे से गुजरता है। यद्यपि इस मार्ग में प्राकृतिक सौंदर्य के दिव्य दर्शन होते हैं और चमत्कारिक ओइम पर्वत भी इसी यात्रा मार्ग से दिख्ता है, किसी अन्य मार्ग से नहीं। लेकिन यह कठिन अधिक है और इसमें 24 दिन लगते हैं। जबकि नाथूला क्षेत्र से 21 दिन लगते हैं। जो भी हो, मान्यता है कि संपूर्ण पृथ्वी पर कैलास मानसरोवर ही भगवान शिव का साक्षात् निवास स्थान है जहां उनका परिवार सानंद रहता है और युगों-युगों से भक्तों को मोक्ष प्रदान करता आ रहा है। इस यात्रा पर जाए बिना किसी भी हिंदू का जीवन पूरा नहीं माना जाता। यहां प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देव जी का भी निर्वाण स्थल है और बौद्ध इस स्थान के प्रति हिंदुओं से ज्यादा नहीं तो कम श्रद्धा नहीं रखते।
इस वर्ष लिपुलेख (उत्तराखंड) के मार्ग से 18 यात्री दल जून से सितंबर के मध्य जाएंगे। प्रत्येक दल में 60 यात्री रहते हैं। प्रति यात्री खर्च लगभग 1.60 लाख रु. होता है। नाथूला से 8 यात्री दल जाते हैं जिनमें से प्रत्येक दल में 50 तीर्थयात्री रहते हैं और उस मार्ग से प्रति व्यक्ति व्यय लगभग 2 लाख रुपए होता है। इस यात्रा का आयोजन विदेश मंत्रालय करता है और इसके लिए यात्रियों को फरवरी में फार्म भर कर पंजीकरण करवाना होता है (वेबसाइट—ँ३३स्र://'े८.ॅङ्म५.्रल्ल)। अनेक प्रांत सरकारें यात्रियों को अनुदान भी देती हैं। अटल जी की 13 दिन की सरकार के समय भारत के इतिहास में पहली बार केन्द्र सरकार की ओर से कैलास यात्रियों के लिए अनुदान स्वीकार हुआ। बाद में अनेक प्रांत सरकारों ने भी प्रयास किये।
यह यात्रा प्रभु की कृपा से तो होती ही है लेकिन इसके लिए प्रार्थना के साथ-साथ इच्छाशक्ति भी चाहिए। महाभारत तक में मानसरोवर, कैलास, मान्धाता पर्वत का जिक्र है। यह पृथ्वी का मेरू पर्वत है और संसार के दुर्लभतम खनिजों का भंडार है। विश्व में इस महान और पवित्र पर्वत की तुलना में कोई भी पर्वत नहीं है। आज तक हजारों वर्षों से किसी भी शासन और सरकार ने कैलास पर्वत पर पर्वतारोहण की अनुमति नहीं दी है। चीन में तो कम्युनिस्ट सरकार है पर वह भी कैलास-मानसरोवर का अन्यतम गंभीरता से रक्षण ओर वहां की यात्रा के लिए प्रोत्साहन देती है। वहां की तिब्बती जनता भारत से आये हिंदू तीर्थ यात्रियों को देखकर विशेष अनुराग और आनंद से उनका स्वागत करती है। इस यात्रा की तैयारी में दो महीने लग जाते हैं। इस बार नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने चार-चार यात्रियों के पारिवारिक जत्थों को एक साथ भेजने का भी फैसला किया है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी अस्वस्थ रहते हुए भी इस यात्रा की तैयारी को और अधिक बेहतर बनाने के लिए वस्तुत: एक भाविक यात्री के नाते ही जुटी रही हैं। तो फिर देर किस बात की। संभव है कि शिव इस बार ही आपको यात्रा का अवसर दे दें। -तरुण विजय