'नर्मदा म.प्र. की जीवन रेखा है'
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होम Archive

'नर्मदा म.प्र. की जीवन रेखा है'

Written byArchiveArchive
Jan 2, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 02 Jan 2017 16:52:50

 

नर्मदा सेवा यात्रा का संपूर्ण मध्य प्रदेश में जोश दिखता है। खुद मुख्यमंत्री की सक्रिय सहभागिता नर्मदा को फिर से उसी तरह निर्मल, अविरल बनाने में प्रशासन को मुस्तैद रखे है। इस यात्रा के अतिरिक्त प्रदेश में खेती-किसानी, नकदी रहित अर्थतंत्र और जन-जीवन में सुधार के संदर्भ में पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से बातचीत की। प्रस्तुत हैं अंश —

 'नर्मदा म.प्र. की जीवन रेखा है'

इस यात्रा का विचार कैसे आया?

मैं ये कहूं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि नर्मदा जी मध्य प्रदेश की समृद्धि का आधार हैं। और मैं जगह-जगह नर्मदा का पानी भेजने पर विचार कर रहा हूं। लेकिन जब मैं पिछले वर्ष गर्मियों में नर्मदा जी पर पुल का लोकार्पण करने डिंडोरी जिले में गया तो वहां पर नर्मदा जी में पानी नहीं था। गर्मी के दिन थे और उस समय बहुत ही कम मात्रा में इसमें पानी था। लोगों ने कहा कि एक समय था कि नर्मदा यहां भरी रहती थीं लेकिन अब पानी घट रहा है। मैंने उनसे पूछा कि ये कम क्यों होता जा रहा है? कुछ ने कहा पता नहीं तो कुछ ने कहा कि जंगल थे वे कम हो गए। लेकिन वह बात मेरे दिमाग में बैठ गई। मुझे लगा कि नर्मदा जी के पानी को दुनिया में ले जाओ लेकिन नर्मदा जी में ही पानी न रहे, तो फिर होगा क्या? नर्मदा के बिना मध्य प्रदेश की कल्पना ही नहीं कर सकते वही हाल गुजरात का भी है। क्योंकि नर्मदा जी के कारण ही दोनों प्रदेश समृद्धि के पथ पर बढ़े हैं। उस दृश्य को देखकर मेरे मन में बेचैनी हुई कि अगर यही हालत रही तो क्या होगा। फिर मैंने विशेषज्ञों से चर्चा कि तो उन्होंने कहा कि नर्मदा में पानी ग्लेशियर से नहीं आता। इसमें पानी सतपुड़ा और विंध्याचल जो दोनों ओर जंगल-पहाड़ हैं, उनमें जो घने जंगल हैं, जिनमें साल के ऊंचे-ऊंचे पेड़ थे वह सभी वर्षा जल अवशोषित करते हैं और वर्षा में जल सोखने के बाद वह वर्षा के बाद बूंद-बूंद जल छोड़ते हैं। वह जल जगह-जगह से बहता-बहता नर्मदा जी में मिलता है और नर्मदा जी में धार बनकर वह आगे बढ़ता है। तो अगर नर्मदा जी को बचाना है तो पेड़ चाहिए क्योंकि बिना पेड़ के नर्मदा नहीं बच सकती। हाल ही में विचार कुं भ में भी पर्यावरण एक विषय रखा गया था। तो पर्यावरण में नदी संरक्षण विषय था। वहां से यह विचार शुरू हुआ कि फिर से नर्मदा जी को ऐसी स्थिति बनानी चाहिए कि मां नर्मदा जीवित रहें। फिर मैं अपनी टीम और विशेषज्ञों के साथ बैठा और विचार किया कि कैसे हम नर्मदा को विश्व की प्रदूषण रहित और स्वच्छ नदी बना सकते हैं। मैं नर्मदा को मां मानता हूं, नदी नहीं।

 

पर्यावरण और संस्कृति थामने की बात भावनात्मक ज्यादा है। इसे शासन और व्यवस्था से तर्कपूर्ण रूप से कैसे जोड़ा?

यह सबसे महत्वपूर्ण था और चुनौतीपूर्ण भी। मैंने विचार किया कि क्या-क्या करना है-पहला, मैंने प्रशासन को बैठाया कि दोनों किनारों पर पेड़ लगाने हैं। शासकीय जमीनों पर तो आप पेड़ लगा देंगे लेकिन जहां निजी जमीन हैं किसानों की, वहां कैसे आप पेड़ लगाएंगे। तो विचार आया कि किसानों को फलदार पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। उस प्रजाति के पेड़ जो यहां हो सकें, पानी को रोक सकें साथ ही धीरे-धीरे प्रवाहित कर सकें। हमने इस प्रजाति के पेड़ चिन्हित किए। फल आएंगे 4 साल बाद। तो तब तक किसान क्या करेगा, हमने तय किया हम 3 साल तक 20 हजार रु. प्रति हेक्टेयर की दर से मुआवजा देंगे। पेड़ लगाने में 40 प्रतिशत भी सब्सिडी देंगे। जो मजदूरी लगेगी वह मजदूरी भी हम मनेरगा से जोड़कर देंगे। इससे किसान पर बोझ बिल्कुल नहीं आएगा। बीच-बीच में वह अपनी फसल कर लेगा और 4 साल के बाद अच्छे फल मिलेंगे। नर्मदा जी को पानी मिलेगा। किसान को फल मिलेंगे जिससे आमदनी बढ़ेगी। प्रोजेक्ट मैंने हाथ में लिया तो प्रशासन के इंकार का प्रश्न ही नहीं।

लेकिन इसके साथ हमने कुछ चीजें और जोड़ीं। अभी नर्मदा जी का जल तुलनात्मक दृष्टि से ठीक है। यह और ठीक हो इसके लिए तय किया कि जो सीवेज का पानी है वह पानी नर्मदा जी में बिल्कुल नहीं जाएगा। हमने प्रशासनिक अफसरों के साथ बैठने के बाद तय किया कि जितने भी शहर जो नर्मदा के किनारे हैं वहां नया सीवेज प्लांट बनाएंगे। प्लांट में शोधित जल किसानों को देंगे। नर्मदा के किनारे बहुत से ऐसे गांव हैं जहां शौचालय नहीं है। लोग नर्मदा के किनारे शौच जाते हैं, वह मल नर्मदा जी में जाता है। यहां शौचालय प्राथमिकता के साथ और जल्दी से जल्दी बनें यह तय किया। इस पर काम चल रहा है। नर्मदा जी में पूजन के नाम पर प्लास्टिक और रासायनिक सामग्री डालने से रोकने के लिए हमने तय किया कि हम पूजन कुंड बनाएंगे। पूजा करने वाले लोग पूजन सामग्री इस कुंड में डालेंगे नर्मदा जी में नहीं। जो सामग्री आएगी उससे जैविक खाद बनाएंगे। जो लोग मूर्ति विसर्जन करते हैं, उसके लिए भी मूर्ति विसर्जन कुंड बनाएंगे। उसमें नर्मदा जल भरेंगे, उसमें प्रवाहित करंेगे। नर्मदा जी के तट पर अंतिम संस्कार के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। कुछ लोग अधचली चिता को गंगा में प्रवाहित कर देते हैं। कई बार जल समाधि देकर ही नर्मदा जी में छोड़ देते हैं। इसको बंद कर हम विश्राम घाट बनाएंगे। और उपयुक्त स्थान पर अंतिम संस्कार करेंगे ताकि सम्मान से अंतिम संस्कार भी हो जाए और नर्मदा जी भी प्रदूषित न हों। एक चीज और अमावस पूर्णिमा परबड़े पैमाने पर लाखों लोग स्नान करते हैं। माता-बहनों के लिए कपड़े बदलने का स्थान नहीं होता है तो मर्यादा के साथ वह कपड़े बदलने का स्थान बनाएंगे। और अंतिम नर्मदा के छोर पर बसे सभी गांवों को नशा मुक्त गांव बनाने पर काम करंगे और नशा और शराब छोड़ने का संकल्प दिला रहे हैं। ये यात्रा एक सामाजिक आन्दोलन है। पर्यावरण के लिए, नदी के संरक्षण के लिए, पेड़ लगाने के लिए, पेड़ बचाने केलिए और कुल मिलाकर मध्य प्रदेश बचाने के लिए। क्योंकि नर्मदा बचेगी तो मध्य प्रदेश बचेगा। इस यात्रा के उद्देश्य हैं पर्यावरण, आधुनिक विज्ञान और आस्थाओं का ध्यान और सम्मान।

 

आपने जो योजना बनाई उसकी संपूर्णता और गति को देखते हुए आपको लगता है कि गंगा या यमुना की जो चिंता हो रही है, उसके लिए नर्मदा का काम मील का पत्थर या कसौटी बनेगा?

मैं मानता हूं जिस तरह से जनान्दोलन चल रहा है, उसमें मैंने सरकार को पीछे रखकर समाज को आगे किया है। यात्रा में नाचते, गाते, उत्साह से लोग चलते हैं। यात्रा में जो संत है वह पर्यावरण की बात करता है। ये भी अपने आप में अदभुत है कि पर्यावरण-नदी को बचाना है। और बच्चे महिलाएं, वृद्ध, जवान, गरीब, अमीर, किसान, वनवासी, गैरआदिवासी, सवर्ण समाज का हर वर्ग उत्साह से शामिल हो रहा है। और यात्रा की सभी व्यवस्था-भोजन आदि जनता कर रही है। पर्यावरण को बचाने का यह अदभुत जनान्दोलन बन गया है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह उदाहरण बनेगा। जनता को साथ खड़े करके ही किसी नदी या पर्यावरण को बचाया जा सकता है।

 

मध्य प्रदेश लगातार बड़े काम कर भी रहा है। यहां पर गेंहू की फसल के उत्पादन में रिकार्ड तोड़े हैं। लेकिन साथ ही लोगों की आकांक्षाएं और बढ़ी हैं। इन आकांक्षाओं को कैसे पूरा करेंगे?

हमने दो काम किए हैं। एक तो उत्पादन बढ़ाया। आज पंजाब, हरियाणा से हम आगे हैं। 20 फीसद कृषि विकास दर लगभग अद्भुत आंकड़ा है। यह सब चार साल में किया है। खेती को लाभ का धंधा बनाना ये प्रधानमंत्री जी भी कह रहे हैं। उसको भी हमने मंत्र रूप में लिया। इसके लिए भी हम कई तरह के प्रयास कर रहे हैं। जैसे 18 प्रतिशत ब्याज पर कर्ज मिलता था, उसको घटाकर हमने शून्य कर दिया। उसमें भी मूल पर10 फीसद छूट दे रहे हैं। जैसे 1 लाख लो 90 हजार दो। उसके साथ-साथ प्राकृतिक आपदा आए तो किसानों को बेहतर राशि देना। फिर ऐसी विविध योजनाएं लाना जिससे किसानों को लाभ ज्यादा हो। केवल गेंहू ही नहीं हम कुछ ऐसे मॉडल फार्म बना रहे हैं जिसमें एक हिस्से में गेंहू-चावल होगा। दूसरे हिस्से में बागवानी होगी और भी चीजें करके कैसे मुनाफा कमा सकते हैं हम उस ओर ले जा रहे हैं। किसान को सही दाम मिले इसलिए हमारे यहां खरीद की व्यवस्था अच्छी है। कोई बिचौलिया किसानों को लूट नहीं सकता। फिर हमने जहां-जहां राष्ट्रीय मंडियां हैं, उनमें जहां अच्छे दाम हैं वहां हमने ई-प्लेटफार्म बनाया ताकि किसान दूसरी मंडियों के भाव के बारे में जान सके। जनता की आकांक्षाएं हैं, उनको पूरा करने और खेती को फायदे का धंधा बनाने के लिए बहुत ही गंभीर प्रयास कर रहे हैं।

 

अब भी मध्यप्रदेश में अल्प शिक्षित लोगों की बड़ी संख्या है। कौशल विकास की चुनौती भी है। इसके लिए कुछ कर रहे हैं ?

शिक्षा का स्तर इसलिए गिरा था कि हमारे पहले की सरकारों में मुख्यमंत्री यानी दिग्विजय सिंह जैसे लोगों ने शिक्षा की पूरी व्यवस्था को ऐसा कर दिया कि पांच सौ रुपये में गुरुजी पढ़ाएंगे। शिक्षाकर्मी को 1200 सौ रुपये वेतन देंगे। तो अच्छे लोग आए ही नहीं पढ़ाने। जो आए उनके भविष्य का ठिकाना नहीं था। तो वे लगातार आन्दोलन ही करते रहे। पूरी शिक्षा व्यवस्था को चौपट करने का अपराध अगर किसी ने किया है तो वह पिछली सरकार ने किया। अब हम उसको पटरी पर ला रहे हैं। नए शिक्षकों की भर्ती की है। पुरानों को प्रशिक्षित किया। आज हमारे यहां संविदा शिक्षा कर्मी या जो अध्यापक बने हैं वह लगभग 20 से लेकर 30 हजार का वेतन पा रहे हैं। कभी उनका वेतन 1200 रुपये हुआ करता था। हम अनेक तरीकों से शिक्षा के स्तर को बेहतर करने में लगे हुए हैं। इसका उदाहरण केवल मैं ये दूंगा कि जिन बच्चों के 85 फीसद से ज्यादा अंक आते हैं उनको लैपटाप देते हैं। निजी स्कूलों से ज्यादा सरकारी स्कूलों के बच्चे 85 फीसदी से ज्यादा अंक ला रहे हैं। 'स्किल्ड मैन पॉवर' तैयार करना हमारा अभियान है। इसके लिए हमने आईटीआई खोली हैं। पुरानों को उन्नत किया है। मैं सिंगापुर गया था तो वहां के आईटीआई से हमने सीखने की कोशिश की है। हम इंजीनियरिंग कॉलेज और पॉलीटेक्निक में भी संख्या बढ़ाने के लिए आईटीआई कक्षाएं शुरू कर रहे हैं। कौशल विकास केंद्र खोल रहे हैं, जिसमें सालभर में 60, 90 और 120 दिन के कोर्स चलाकर स्थानीय स्तर पर कुशल लोग तैयार कर सकें।

 

मध्यप्रदेश में कांग्रेस की स्थिति पहले ही खस्ता हो चुकी थी। अब केंद्र में वही स्थिति है। ऐसे में कांग्रेस की अगुआई में संसद ठप किए जाने को कैसे देखते हैं?

संसद चर्चा और बहस के लिए होती है। लेकिन दुर्भाग्य देश का, सरकार चर्चा चाहती थी लेकिन विपक्ष के पास कुछ नहीं है, इसलिए वह हंगामा और हल्ला कर रहा है। कांग्रेस के लोग बाहर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं जैसे- मैं बोल दूंगा तो भूकंप आ जाएगा। ऐसी बुद्धिहीनता मैंने कहीं देखी नहीं। तुम्हें रोका किसने है? अगर संसद में नहीं बोलना तो बाहर बोलो। आज कांग्रेस की हास्यास्पद स्थिति बन गई है। लोकतंत्र के लिए मैं ये शुभ नहीं मानता। चर्चा होनी चाहिए, बहस होनी चाहिए। विपक्ष को परिपक्व होना चाहिए।

 

नोटबंदी एक बड़ा फैसला था। इस पूरे मुदद् को आप कैसे देखते हैं?

मैं एक बात बड़ी दृढ़ता और स्पष्टता के साथ कहता हूं कि नोटबंदी जैसा फैसला कोई साधारण प्रधानमंत्री नहीं कर सकता। देशभक्ति जिसके ह्दय में हो और जो हर खतरा लेने के लिए तैयार हो, ऐसा कर्मयोगी युगपुरुष ही ऐसे फैसले कर सकता है। वह जानते थे कि अचानक 86 फीसद मुद्रा अगर बाहर हो जाएगी तो उसके कारण समस्याएं होंगी, आलोचनाएं भी होंगी। लेकिन राष्ट्रहित में तीन कारणों से ये फैसला बहुत जरूरी था। पहला, जाली मुद्रा के चलन के कारण हमारी अर्थव्यवस्था को चौपट करने का षड्यंत्र हमारे दुश्मन देशों ने किया था। दूसरा, आतंकवाद को पोषण देने वाली यह जाली मुद्रा ही थी। पड़ोसी देश से आतंकवादी इसी के सहारे आते थे और विस्फोटक सामग्री और हथियार खरीदते और फिर यहीं पर आतंकवादी घटनाएं करते थे। उस आतंकवाद की रीढ़ पर प्रहार करना जरूरी था। तीसरी बात, प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि न खाऊंगा और न खाने दूंगा। काले धन के खिलाफ एक अभियान की बात प्रधानमंत्री जी ने कही थी। भ्रष्टाचार को पूरी तरह से समाप्त करूंगा। इसलिए उन्होंने पूरी तरह से इसे समाप्त करने के लिए नोटबंदी करने का फैसला किया। इसे चर्चा करके नहीं किया जा सकता था क्योंकि गोपनीयता भंग हो जाती। लेकिन राष्ट्रहित में जो फैसला उन्होंने किया है इसके लिए मैं उन्हें प्रणाम और अभिनंदन करता हूं। देश उनके साथ खड़ा है।

नोटबंदी का पहला चरण पूरा हो गया। इसका अगला सोपान है 'कैशलेस'। आप मध्य प्रदेश को नकदी रहित व्यवस्था की तरफ कैसे ले जाएंगे?

हमारे यहां सभी मंडिया कैशलेस हो गई हैं। 95 फीसद लेनदेन कैशलेस ही होता है। फिर आप देखें चाहे छात्रवृत्ति देना, फीस भरना, किसानों को सीधे उनके खाते में पैसे देना, समर्थन मूल्य द्वारा खरीदी सीधे खाते में जाता है। यानी सरकार की ओर से जितनी लेनदेन है वह सब हमने कैशलेस कर दिया है। हम अब लक्ष्य तय कर रहे हैं। पहले कौन से बड़े शहर कैशलेस किए जा सकते हैं। हमने व्यापारियों से कहा है कि वह स्वाइप मशीन खरीदें। उन पर वैट कर, निजी कर कुछ नहीं लेंगे। हम बैंकों के साथ मिलकर लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान चला रहे हैं। हमारे यहां से बहुत से उच्च संस्थानों के विद्यार्थी लोगों को प्रशिक्षण देने का काम कर रहे हैं। साथ ही सभी शासन-प्रशासन के लोग इसमें भागीदारी दिखाएं। इससे जनता का इस ओर ध्यान जाएगा।

 

मैं खुद बचपन से नर्मदा मैया की गोद में खेला हूं। नर्मदा मध्य प्रदेश की जीवन रेखा है। मध्य प्रदेश में नर्मदा जी के कारण बहुत अच्छी फसलें पैदा हो रही हैं। हम नर्मदा जी के पानी को जगह-जगह रोककर किसानों के खेत में ले गए। आज मध्य प्रदेश में कृषि विकास दर चार साल से शीर्ष पर जो दुनिया में एक रिकॉर्ड है। इसका अगर श्रेय किसी को है तो वह सिर्फ नर्मदा जी को। क्योंकि हमने नर्मदा जी पर जगह-जगह बांध बनाए और उस पानी को हम किसानों के खेतों तक ले गए। साढ़े सात हेक्टेयर से सिंचाई की क्षमता बढ़ाकर हमने 40 लाख हेक्टेयर कर ली है। दूसरी बात, इंदौर, भोपाल, जबलपुर एवं सैकड़ों गांव और पूरे मालवा में पीने का पानी हम नर्मदा जी से ले जा रहे हैं। नर्मदा जी को उठाकर हम क्षिप्रा जी में ले गए। पीने का जल, सिंचाई का प्रबंध और विपुल मात्रा में बिजली हम नर्मदा जी से बना रहे हैं।

 

हमें व्यवस्थाएं खड़ी करनी पड़ेंगी कि स्वाइप जैसी मशीन और मोबाइल को बटुआ बनाएं। दूर-दराज के क्षेत्रों में इंटरनेट की समस्या है, उसे दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। एक बार लोगों का ध्यान इस ओर गया और व्यवस्थाएं खड़ी हो गईं,तब कैशलेस होना आसान होगा।

 

 

जो वैचारिक ऊर्जा भाजपा को चलाती है, यह उन पं. दीनदयाल जी का जन्मशताब्दी वर्ष है। प्रधानमंत्री जी ने इसे गरीब कल्याण वर्ष के रूप में चिह्नित किया। क्या आपने मध्य प्रदेश के लिए कुछ कसौटियां तय की हैं कि इस वर्ष में क्या करेंगे?

दीनदयाल जी के दर्शन और एकात्म मानव दर्शन के आधार पर भाजपा शासित राज्यों में पहले भी सरकारें चलीं। कई काम हमने उसी आधार पर किए। जैसे मध्य प्रदेश में रोटी, कपड़ा, मकान, दवाई ये सब के लिए करना है। इसको मंत्र मानके सबके लिए सस्ता राशन गेंहू-चावल, मकान दिए। मुफ्त में इलाज व शिक्षा की व्यवस्था मध्य प्रदेश सरकार ने की है। एक और बड़ा फैसला जो हम कर रहे हैं वह यह कि कोई भी बच्चा चाहे वह किसी भी जाति का हो प्रतिस्पर्द्धी परीक्षा से चयनित होता है तो वह फीस भरने का मोहताज नहीं रहेगा, यह सरकार कराएगी। रोजगार के लिए मुख्यमंत्री स्व रोजगार योजना, स्टार्टअप इंडिया, मुद्रा बैंक योजना का उपयोग करते हुए रोजगार दिलाने का काम। दीनदयाल जी ने कहा था कि हर हाथ को काम, हर खेत को पानी । माता, बहनों के सम्मान के लिए रानी लक्ष्मी बाई जैसी योजना, सुशासन की बात आती है तो पब्लिक सर्विस गारंटी एक्ट हमने बनाया। गरीब कल्याण के लिए हम और भी बहुत कुछ करेंगे।

 

दीनदयाल जी द्वारा पचास वर्ष पूर्व बताए गए एकात्ममानव दर्शन का जो अखंड मंडलाकार चक्र है उसमें व्यक्ति, समाज, परिवार, सृष्टि…सब तार जुड़ते हैं। क्या नर्मदा सेवा यात्रा को भी उस चिंतन से जुड़ा माना जाए?

संपूर्ण हमारी राजनीतिक व्यवस्था को हमने दीनदयाल जी के चिंतन से जोड़ा है। मनुष्य केवल मन नहीं, मन, बुद्धि और आत्मा भी उससे जुड़े हैं। यहां मनुष्य ही नहीं समाज है। समाज भी नहीं पेड़-पौधे, जीव-जंतु, पशु-पक्षी, नदियां, समुद्र, ग्रह-नक्षत्र, सूर्य-चंद्रमा…नदी बचेगी तो जीवन बचेगा, पर्यावरण बचेगा तो मनुष्य बचेगा। दीनदयाल जी ने कहा कि प्रकृति का शोषण न करो दोहन करो। इसलिए ये यात्रा जरूरी है। दीनदयाल जी के विचार को लेकर। पर्यावरण को बचाने के लिए, धरती को बचाने के लिए और अगर दूसरे शब्दों में कहें तो मनुष्य का अस्तित्व बचाने के लिए।

 

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