वैचारिक अधिष्ठान से समझौता न करते हुए संघ अविरत रहा है
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वैचारिक अधिष्ठान से समझौता न करते हुए संघ अविरत रहा है

Written byArchiveArchive
Dec 5, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 05 Dec 2016 10:33:39

विशेष साक्षात्कार, श्री सुरेश जोशी

संकुचित शक्तियां भी प्रभावी हैं जो विषमता बनाए रखने का काम करती हैं। यह चुनौती है। परंतु इतने वर्षों में कि, जहां-जहां संघ का कार्य प्रभावी रूप से खड़ा हुआ वहां ऐसी विषमताएं खत्म होती गईं। हम किसी भी जाति-बिरादरी के हों, हमारा मूल हिंदू है। हमारा नाम, भाषा, हमारे भगवान्, धर्म ग्रंथ, तीर्थ क्षेत्र, महापुरुष कौन-सी जाति-बिरादरी के हैं? वे कहां से आए? वे जहां से आए उसका नाम है हिंदू।

 

संघ कार्य की शक्ति तो अनौपचारिक पद्धतियों में है। कोई अलग पहचान है तो यही है। इसलिए प्रतिबंध लगे तो शाखाएं बंद हो गईं। पर मिलना-जुलना बंद नहीं हुआ।  …उतार-चढ़ावों में भी संघ आगे बढ़ा समर्पित कार्यकर्तरओं के कारण।

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह 69 वर्षीय श्री सुरेश जोशी, जो सार्वजनिक जीवन में भैयाजी जोशी के नाम से जाने जाते हैं, से संघ की 90 वर्षों की अद्भुत यात्रा के बारे में बातचीत के लिए समय मिलना कठिन था, विशेषकर देश भर में उनके अति-व्यस्त प्रवास कार्यक्रम को देखते हुए, जो वर्ष के शुरू में ही तय हो जाता है। इसी में देश भर में समय-समय पर होने वाले सार्वजनिक कार्यक्रम भी होते हैं।. फिर भी संघ की नौ दशक की यात्रा पर 'पाञ्चजन्य' और 'ऑर्गनाइज़र' के संग्रहणीय विशेषांकों की योजना को देखते हुए वे बातचीत के लिए राजी हुए। वे 9 अक्तूबर के दीनदयाल संपूर्ण वांड्मय के लोकार्पण कार्यक्रम के लिए 8 अक्तूबर को दिल्ली आए थे। शाम को नई दिल्ली के झंडेवालान क्षेत्र स्थित दीनदयाल शोध संस्थान की छठी मंजिल पर छोटे-से, सामान्य सुविधाओं वाले कक्ष में, जहां वे ठहरे थे, 'पाञ्चजन्य' के संपादक हितेश शंकर और 'ऑर्गनाइज़र' के संपादक प्रफुल्ल केतकर तथा समूह संपादक जगदीश उपासने ने उनसे बात की। भैयाजी ने संघ की स्थापना के बाद संगठन खड़ा करने के आरंभिक प्रयत्नों से लेकर समाज में संघ को मिली व्यापक तथा चिरस्थायी स्वीकृति की तो चर्चा की ही, आरोपों और लांछनों पर भी वे सहजता से बोले। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

'    आप संघ की नौ दशकों की इस यात्रा को किस तरह देखते हैं और राष्ट्र जीवन में संघ का सबसे बड़ा योगदान कौन-सा मानते हैं?

ल्ल जब यह कार्य प्रारंभ हुआ तो विचार यही था कि जो भी काम करना है वह हिंदू समाज के लिए करना है, हिंदू समाज के बीच करना है और हिंदू समाज के बल पर करना है। सामान्य व्यक्ति भी इसे कर सकता है, ऐसी कार्यपद्धति प्रारंभ हुई। मैदान पर आएंगे, खेलेंगे-कूदंेगे, गपशप करेंगे, गीत गाएंगे। कोई बौद्धिक चर्चाएं, चिंतन के विषय ज्यादा नहीं, सामान्य व्यक्ति कर सके, ऐसे कार्यक्रम।

संघ के योगदान के बारे में मैं तीन बातें कहना चाहूंगा। एक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक सामान्य व्यक्ति में, यह हमारा राष्ट्र है, इस भाव को जगाने में सफलता मिली है। दूसरे, सामान्य व्यक्ति भी अपनी पहल से समाज के लिए कुछ कर सकता है, ऐसा विश्वास निर्माण हुआ है। तीसरे, राष्ट्र के पुनर्निर्माण के संबंध में संघ ने प्रारंभ से कहा है कि हम (समाज के सम्मुख उपस्थित) समस्याओं से परिचित हैं, इसलिए समस्याएं खड़ी करने वाले लोग नहीं चाहिए। इस तरह संघ की सारी रचना से ऐसे व्यक्ति तैयार होते गए जिन्होंने समस्याओं के समाधान की दिशा मेंे पहल की है।

'    दैनंदिन शाखा पद्धति का विचार संघ का है या फिर कहीं कोई ऐसा प्रयोग विश्व में हुआ था, जिसका अनुसरण किया गया?

ल्ल नहीं, विश्व में कहीं ऐसा नहीं हुआ। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि समाज जागरण के छोटे-छोटे केंद्र बनने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि कि मैं देख रहा हूं कि देश के मध्य भाग से इसका प्रारंभ होगा। तो उनके विचारों का कुछ प्रभाव रहा है। संघ जो कार्य करना चाहता है, वह इस देश में किसी न किसी रूप में चलता आया है। इसीलिए डॉ. हेडगेवार ने कहा कि ''मैं कुछ नया करने नहीं जा रहा हंू।'' यह कहते हुए उन्होंने संघ कार्य को हजारों वर्षों से चल रहे प्रयासों की शृंखला में जोड़ दिया। जहां हिंदू हैं वहां जाना है और इसके लिए नागपुर से बाहर निकला संघ।

'    90 वर्ष की इस यात्रा में बहुत से विघ्न आए, फिर भी संघ कार्य निरंतर बढ़ता गया। यह कैसेे संभव हुआ?

ल्ल इस यात्रा के कुछ चरण हैं। पहला है 1925 से लेकर1940 तक। इस कालखंड में हिंदू समाज का संगठन हो सकता है, यह बात साबित हुई। 1948 तक संघ एक शक्ति के रूप में समाज जीवन में उभर रहा था। देश में स्वतंत्रता पूर्व का जैसा वातावरण था, उसमेंे हिंदुओं में विश्वास निर्माण करने वाला अगर कोई रहा होगा तो वह संघ था। बाकी राजनीतिक नेता अपनी चिंता कर रहे थे। मैं तीसरा चरण 1948 से 1975 तक मानता हूं। यह कालखंड तीन बातों से महत्वपूर्ण है। एक, देश में कार्य का विस्तार लगभग सभी प्रांतों में, सभी जिलों में पहंुच गया। दूसरे, संगठन की कार्यपद्धति परिष्कृत होकर निश्चित हो गया कि ऐसी पद्धति रहेगी। तीसरी बात यह कि संघ कार्य को एक वैचारिक अधिष्ठान प्राप्त हुआ कि आखिर संघ क्यों है। पूज्य गुरुजी 1973 तक रहे, उनका योगदान इसमें सबसे अधिक है। 1975 के बाद समाज परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारंभ करने का कालखंड है। फिर वह राम जन्मभूमि आंदोलन हो, जिसमें समाज की शक्ति खड़ी हुई, या उससे पहले 1969 में उडुपि में हुआ संत सम्मेलन, जिसमें सामाजिक समरसता का विषय प्रमुख था कि समाज की समस्याओं का कारण भेदभाव है, उसे समाप्त करना चाहिए। इसे सभी मतों, संप्रदायों, पंथों के संतों ने एक स्वर से घोषित किया। और 1975 के आपातकाल के बाद इसकी व्यावहारिक प्रक्रिया शुरू हुई। 1977 के बाद कार्य का विस्तार दोगुना हुआ, और कई तरह के सामाजिक प्रश्नों के उत्तर ढूंढने की प्रक्रिया आरंभ हुई। 1990 में डॉ. हेडगेवार की जन्मशताब्दी अगला महत्वपूर्ण कदम थी। संघ के स्वयंसेवकों की समाज के प्रति जो भावनाएं हैं उनका प्रकटीकरण होना चाहिए, और सेवा के रूप में होना चाहिए। उसके बाद हमने और भी कार्य क्षेत्रों में जाना शुरू किया। '90 से इसमें अधिक तेजी आई तो सेवा विभाग, प्रचार विभाग, संपर्क विभाग, धर्म जागरण जैसे विविध कार्य प्रारंभ हुए। अगला पड़ाव 2006-07 में आया। यह पूजनीय गुरुजी की जन्मशताब्दी का वर्ष था, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों में संघ गया। जाति भेद को हम कठिनाई मानते हैं। इस समूह का नेतृत्व करने वाले जो लोग हैं, उनको सारे परिवर्तन की प्रक्रिया से जोड़ना है तो हमें कुछ और कदम उठाने पड़ेंगे। इसलिए यह प्रक्रिया 2006 के बाद और अधिक गतिमान हुई। साामाजिक सद्भावना बैठकें चलीं। यह 1925 से लेकर 2016 तक की यात्रा है।

 

 

संघ पर दो बार प्रतिबंध लगा। हजारों कार्यकर्ता जेलों में डाल दिए गए, फिर भी संघ चलता रहा। इसका राज क्या है?

 

एक है संघ की अनौपचारिक कार्यपद्धति। हमारे तंत्र (कार्य के ढांचे) का विशेष महत्व है, पर संघ कार्य केवल तंत्र पर ही निर्भर नहीं। इसमें अनौपचारिकता है, सहजता से मिलना-जुलना है, समाज के साथ संपर्क-संवाद की प्रक्रिया है। तंत्र को समाप्त करने की कोशिश की गई, पर संघ कार्य की शक्ति तो अनौपचारिक पद्धतियों में है। संघ की कोई अलग पहचान है तो यही है। इसलिए प्रतिबंध लगे तो शाखाएं बंद हो गईं। पर मिलना-जुलना बंद नहीं हुआ। उसका ही परिणाम है कि जैसे ही आपातकाल हटा, संघ की शाखाएं आरंभ हो गईं। दूसरा है, समर्पित कार्यकर्ता जो व्यक्तिगत हित-अहित का विचार न करते हुए कार्य करता है। उतार-चढ़ावों में भी संघ आगे बढ़ा ऐसे समर्पित कार्यकर्तरओं के कारण। तीसरी बात यह कि हम सारे झंझावातों में वैचारिक अधिष्ठान के साथ समझौता न करते हुए टिके रहे। इसलिए संघ अविरत चल रहा है।

1925 में स्थापना के समय स्वतंत्रता प्राप्ति ही संघ का परम उद्देश्य था। स्वतंत्रता के बाद इस उद्देश्य की पुनर्व्याख्या कैसे की गई?

स्वतंत्रता आंदोलन के समय ही डॉक्टर(हेडगेवार) जी के मन में ऐसा कार्य (संघ कार्य) आरंभ करने का विचार था। इसके मूल में उनका यह चिंतन था कि वर्तमान सारी समस्याओं की जड़ हिंदू समाज की मानसिकता में है और वह जड़ केवल गुलामी नहीं रही। गुलामी केवल प्रकट रूप है। लेकिन अंतर्मन से समाज कई समस्याओं से जूझ रहा है। इसलिए जब तक मूल रोग को स्पर्श नहीं करेंगे तब तक देश की समस्याएं हल नहीं होंगी। अंग्रेज चले जाएंगे, कल कोई और आक्रमण करेगा। पर यदि समाज की शक्ति खड़ी होगी तो हम आक्रांताओं का भी सामना कर सकते हैं। डॉक्टर जी ने एक वाक्य कहा था कि ''हमारा उद्देश्य क्या है? वह है, हिंदू समाज की ओर कोई भी टेढ़ी नजर से नहीं देखे।'' इतनी शक्ति निर्माण करना, यह मूल बात थी। इसके लिए स्वतंत्रता प्राप्ति आवश्यक थी। जिस दिन लगेगा कि ऐसी स्थिति आ गई है तो पक्की बात है कि संघ समाप्त हो जाएगा, उसकी आवश्यकता नहीं रहेगी। हम देखते हैं कि देश स्वतंत्र होने के बाद समस्याएं हल नहीं हुईं क्योंकि समस्याओं से जूझने वाला जो समाज खड़ा होना चाहिए था, वह तैयार नहीं था। परंतु आज कह सकते हैं कि समाज समस्याओं से बाहर आ सकता है।

 

क्या संघ को सही अर्थों में भारतीय समाज को एक करने वाला अभियान कहा जा सकता है?

हमने हमेशा हिंदू संगठन की बात की है। अपेक्षा यह है कि भारत का सारा समाज खड़ा हो। लेकिन प्रथम चरण यह है कि जो अपने आप को हिंदू मानता है वह शक्तिशाली हो जाए। संघ ने हिंदू की भी व्याख्या नहीं की है। बालासाहब (देवरस) ने 'हिंदू' की परिभाषा इस तरह बताई: 'जो भी स्वयं को हिंदू कहे, वही हिंदू!' और कोई परिभाषा नहीं है। और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, यह नाम इसलिए कि हिंदू और यह राष्ट्र एक ही हैं। हिंदू समाज का जो जीवन है वह राष्ट्र का जीवन है। इसलिए हमने कहा कि हिंदू का काम करना यानी राष्ट्र का ही काम करना है। डॉक्टर साहब ने इसी बात को बहुत सुंदर शब्दों में कहा कि ''विश्व में जब तक एक हिंदू शेष रहेगा, तब तक यह हिंदू राष्ट्र रहेगा।'' हिंदू राष्ट्र संख्या पर निर्भर नहीं है। उसे सही दिशा में जाने के लिए सही दृष्टिकोण देना है। हम शब्दों को लेकर किसी भी तरह की भ्रम की स्थिति की निर्माण नहीं करना चाहते। हम इतना ही कह रहे हैं कि जो हिंदू हैं, पहले उनके बीच काम करेंगे। यह सारे समाज का संगठन करने का अभियान है, जो सही है और सही दिशा में चल रहा है।

गांधी जी के विचारों के मूल में भारत के सनातन विचार और जीवन पद्धति है। स्वधर्म, स्वराज, स्वदेशी और ग्राम स्वराज, गोरक्षा, आध्यात्मिकता, शुचिता, चरित्र निर्माण। संघ भी इन विषयों पर काम करता रहा है। फिर भी संघ को गांधी के विचारों का विरोधी क्यों बताया जाता है? यहां तक कि संघ को गांधी जी की हत्या के लिए जिम्मेदार बताने जैसे आरोप भी लगाए जाते हैं?

 

स्वतंत्रता आंदोलन के साथ किसी एक व्यक्ति का नाम बहुत गहरे जुड़ा है तो वह महात्मा गांधी जी का है। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त हुई तब तक गांधी जी का नेतृत्व था। अपने आप को गांधी जी का अनुयायी मानने वाले लोगों ने कहा कि गांधी जी हमारे हैं। हम कहते हैं, गांधी जी सारे देश के हैं। गांधी जी ने भी कहा था कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए जो मंच (कांग्रेस) खड़ा हुआ था, अब उसकी आवश्यकता नहीं है। लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण रखने वाले जो लोग थे, वे मानते थे कि उनका भविष्य इसी नाम से तय होने वाला है। उन्होंने गांधी जी की बात नहीं मानी और इसके बाद दुर्भाग्य से गांधी जी की हत्या हो गई।

गांधी जी के कुछ राजनीतिक विचारों को लेकर कुछ मतभेद हो सकते हैं। लेकिन उन्होंने देश, समाज, भारतीय चिंतन पर जो विचार रखे, उनसे संघ कभी भी असहमत नहीं रहा। लेकिन जिन लोगों को इस उभरती शक्ति (संघ) को दुर्बल करना था, उन्हें लगा कि यह भविष्य में हमारे लिए राजनीतिक संकट बनेगा। इसलिए किसी न किसी प्रकार से इसे समाप्त करना चाहिए। उन लोगों को मौका मिला और महात्मा गांधी जी की हत्या का आरोप उन्होंने संघ पर लगा दिया। भारत का जनसामान्य गांधी जी के शुद्ध जीवन से प्रभावित था। इसलिए मुद्दे को बार-बार उठाया गया। लेकिन ऐसे जितने प्रयास हुए, उन पर प्रतिक्रिया का परिणाम यह रहा कि उन लोगों को पीछे हटना पड़ा। हम पूरे विश्वास से कह सकते हैं कि (इस बारे में) कोई भी किसी भी तरह की कानूनी लड़ाई में जीत नहीं सकता। हम प्रामाणिकता से समाज के सामने आए। किसी भी परिस्थिति में हम गांधी जी के विरोधी या हत्यारे हैं, यह सरासर मिथ्या बात सिद्ध होना संभव नहीं।

 

संघ पर दो बार प्रतिबंध लगा। हजारों कार्यकर्ता जेलों में डाल दिए गए, फिर भी संघ चलता रहा। इसका राज क्या है?

ल्ल एक है संघ की अनौपचारिक कार्यपद्धति। हमारे तंत्र (कार्य के ढांचे) का विशेष महत्व है, पर संघ कार्य केवल तंत्र पर ही निर्भर नहीं। इसमें अनौपचारिकता है, सहजता से मिलना-जुलना है, समाज के साथ संपर्क-संवाद की प्रक्रिया है। तंत्र को समाप्त करने की कोशिश की गई, पर संघ कार्य की शक्ति तो अनौपचारिक पद्धतियों में है। संघ की कोई अलग पहचान है तो यही है। इसलिए प्रतिबंध लगे तो शाखाएं बंद हो गईं। पर मिलना-जुलना बंद नहीं हुआ। उसका ही परिणाम है कि जैसे ही आपातकाल हटा, संघ की शाखाएं आरंभ हो गईं। दूसरा है, समर्पित कार्यकर्ता जो व्यक्तिगत हित-अहित का विचार न करते हुए कार्य करता है। उतार-चढ़ावों में भी संघ आगे बढ़ा ऐसे समर्पित कार्यकर्तरओं के कारण। तीसरी बात यह कि हम सारे झंझावातों में वैचारिक अधिष्ठान के साथ समझौता न करते हुए टिके रहे। इसलिए संघ अविरत चल रहा है।

 

1925 में स्थापना के समय स्वतंत्रता प्राप्ति ही संघ का परम उद्देश्य था। स्वतंत्रता के बाद इस उद्देश्य की पुनर्व्याख्या कैसे की गई?

ल्ल स्वतंत्रता आंदोलन के समय ही डॉक्टर(हेडगेवार) जी के मन में ऐसा कार्य (संघ कार्य) आरंभ करने का विचार था। इसके मूल में उनका यह चिंतन था कि वर्तमान सारी समस्याओं की जड़ हिंदू समाज की मानसिकता में है और वह जड़ केवल गुलामी नहीं रही। गुलामी केवल प्रकट रूप है। लेकिन अंतर्मन से समाज कई समस्याओं से जूझ रहा है। इसलिए जब तक मूल रोग को स्पर्श नहीं करेंगे तब तक देश की समस्याएं हल नहीं होंगी। अंग्रेज चले जाएंगे, कल कोई और आक्रमण करेगा। पर यदि समाज की शक्ति खड़ी होगी तो हम आक्रांताओं का भी सामना कर सकते हैं। डॉक्टर जी ने एक वाक्य कहा था कि ''हमारा उद्देश्य क्या है? वह है, हिंदू समाज की ओर कोई भी टेढ़ी नजर से नहीं देखे।'' इतनी शक्ति निर्माण करना, यह मूल बात थी। इसके लिए स्वतंत्रता प्राप्ति आवश्यक थी। जिस दिन लगेगा कि ऐसी स्थिति आ गई है तो पक्की बात है कि संघ समाप्त हो जाएगा, उसकी आवश्यकता नहीं रहेगी। हम देखते हैं कि देश स्वतंत्र होने के बाद समस्याएं हल नहीं हुईं क्योंकि समस्याओं से जूझने वाला जो समाज खड़ा होना चाहिए था, वह तैयार नहीं था। परंतु आज कह सकते हैं कि समाज समस्याओं से बाहर आ सकता है।

क्या संघ को सही अर्थों में भारतीय समाज को एक करने वाला अभियान कहा जा सकता है?

ल्ल हमने हमेशा हिंदू संगठन की बात की है। अपेक्षा यह है कि भारत का सारा समाज खड़ा हो। लेकिन प्रथम चरण यह है कि जो अपने आप को हिंदू मानता है वह शक्तिशाली हो जाए। संघ ने हिंदू की भी व्याख्या नहीं की है। बालासाहब (देवरस) ने 'हिंदू' की परिभाषा इस तरह बताई: 'जो भी स्वयं को हिंदू कहे, वही हिंदू!' और कोई परिभाषा नहीं है। और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, यह नाम इसलिए कि हिंदू और यह राष्ट्र एक ही हैं। हिंदू समाज का जो जीवन है वह राष्ट्र का जीवन है। इसलिए हमने कहा कि हिंदू का काम करना यानी राष्ट्र का ही काम करना है। डॉक्टर साहब ने इसी बात को बहुत सुंदर शब्दों में कहा कि ''विश्व में जब तक एक हिंदू शेष रहेगा, तब तक यह हिंदू राष्ट्र रहेगा।'' हिंदू राष्ट्र संख्या पर निर्भर नहीं है। उसे सही दिशा में जाने के लिए सही दृष्टिकोण देना है। हम शब्दों को लेकर किसी भी तरह की भ्रम की स्थिति की निर्माण नहीं करना चाहते। हम इतना ही कह रहे हैं कि जो हिंदू हैं, पहले उनके बीच काम करेंगे। यह सारे समाज का संगठन करने का अभियान है, जो सही है और सही दिशा में चल रहा है।

 

गांधी जी के विचारों के मूल में भारत के सनातन विचार और जीवन पद्धति है। स्वधर्म, स्वराज, स्वदेशी और ग्राम स्वराज, गोरक्षा, आध्यात्मिकता, शुचिता, चरित्र निर्माण। संघ भी इन विषयों पर काम करता रहा है। फिर भी संघ को गांधी के विचारों का विरोधी क्यों बताया जाता है? यहां तक कि संघ को गांधी जी की हत्या के लिए जिम्मेदार बताने जैसे आरोप भी लगाए जाते हैं?

ल्ल स्वतंत्रता आंदोलन के साथ किसी एक व्यक्ति का नाम बहुत गहरे जुड़ा है तो वह महात्मा गांधी जी का है। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त हुई तब तक गांधी जी का नेतृत्व था। अपने आप को गांधी जी का अनुयायी मानने वाले लोगों ने कहा कि गांधी जी हमारे हैं। हम कहते हैं, गांधी जी सारे देश के हैं। गांधी जी ने भी कहा था कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए जो मंच (कांग्रेस) खड़ा हुआ था, अब उसकी आवश्यकता नहीं है। लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण रखने वाले जो लोग थे, वे मानते थे कि उनका भविष्य इसी नाम से तय होने वाला है। उन्होंने गांधी जी की बात नहीं मानी और इसके बाद दुर्भाग्य से गांधी जी की हत्या हो गई।

गांधी जी के कुछ राजनीतिक विचारों को लेकर कुछ मतभेद हो सकते हैं। लेकिन उन्होंने देश, समाज, भारतीय चिंतन पर जो विचार रखे, उनसे संघ कभी भी असहमत नहीं रहा। लेकिन जिन लोगों को इस उभरती शक्ति (संघ) को दुर्बल करना था, उन्हें लगा कि यह भविष्य में हमारे लिए राजनीतिक संकट बनेगा। इसलिए किसी न किसी प्रकार से इसे समाप्त करना चाहिए। उन लोगों को मौका मिला और महात्मा गांधी जी की हत्या का आरोप उन्होंने संघ पर लगा दिया। भारत का जनसामान्य गांधी जी के शुद्ध जीवन से प्रभावित था। इसलिए मुद्दे को बार-बार उठाया गया। लेकिन ऐसे जितने प्रयास हुए, उन पर प्रतिक्रिया का परिणाम यह रहा कि उन लोगों को पीछे हटना पड़ा। हम पूरे विश्वास से कह सकते हैं कि (इस बारे में) कोई भी किसी भी तरह की कानूनी लड़ाई में जीत नहीं सकता। हम प्रामाणिकता से समाज के सामने आए। किसी भी परिस्थिति में हम गांधी जी के विरोधी या हत्यारे हैं, यह सरासर मिथ्या बात सिद्ध होना संभव नहीं।

'    क्या आपको लगता है कि संघ के बारे में समाज में आज भी कुछ भ्रांतियां हैं, जिनसे अभी धुंध साफ होनी बाकी है?

ल्ल निश्चित ही हैं। इनमें से कुछ हमारे विरोधियों ने निर्माण की हैं और कुछ हमारे कार्य के स्वरूप के कारण हैं। मैं समझता हूं कि जैसे-जैसे हमारा कार्य बढ़ रहा है—हम ग्रामीण क्षेत्र में जा रहे हैं, झुग्गी-झोंपडि़यों, समाज की विभिन्न जातियों, अनुसूचित जाति-जनजातियों में जा रहे हैं; हमारे भिन्न-भिन्न प्रकार के सेवा के जो उपक्रम हैं उनके द्वारा हम पहुंच रहे हैं, इससे धीरे-धीरे ये सारी भ्रांतियां दूर हो सकती हैं, और हो जाएंगी।

'    आपातकाल के बाद संघ की कथित राजनीतिक भूमिका के बारे में अधिक लिखा जाने लगा। 2014 के चुनाव में संघ की भूमिका की भी बात चली। क्या संघ की कोई राजनीतिक सत्ता है या वह अपनी एक भूमिका नैतिक पहरेदारी की देखता है?

ल्ल संघ की राजनीतिक छवि निर्माण करने का प्रयास1948 में हुआ। 1975-77 के कालखंड में देश के लोकतंत्रात्मक जीवन पर आघात हुआ था। लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व हम सबका था। इसलिए संघ ने उस समय लोक संघर्ष समिति के माध्यम से लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी सारी ताकत लगाई। परिणाम यह हुआ कि लोकतंत्र की पुनर्स्थापना हुई। अगर संघ की इच्छा सत्ता को ही प्रभावित करने की होती तो संघ की ताकत तब निश्चित रूप से ऐसी थी कि संघ जो कहता वह राजनीति में होता। पर जैसे ही चुनाव (1977 में) परिणाम आए, संघ ने कहा, अब हमारी भूमिका समाप्त हुई, जिन्हें देश में राजनीतिक सत्ता संचालित करनी है वे सभी मिल-बैठकर इसका निर्णय करें।

उस समय दो व्यक्तित्वों के नेतृत्व की कसौटी थी। एक जयप्रकाश नारायण, जिन्होंने चुनाव में विजय के बाद अपने आपको सारे आंदोलन और जनता पार्टी से अलग कर लिया था। और दूसरे बालासाहब देवरस, जिन्होंने चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद संघ कार्यकर्ताओं को पुन: कार्य में लगने को प्रेरित किया। जहां सारा समाज चलेगा, संघ उससे दूर कैसे रह सकता है? भविष्य में भी समाज जागरण और समाज हित में जो भी आंदोलन चलेंगे, उनसे संघ के स्वयंसेवकों का स्वयं को दूर रखना असंभव है। वी आर द पार्ट एंड पार्सल ऑफ दिस टाइप ऑफ मूमेंट्स।

'    2005 के बाद शाखा केंद्रित काम और समाज के विभिन्न घटकों तक पहुचंने के बड़े प्रयास हुए हैं। क्या शाखाओं की संख्या कम होने के पीछे यही कारण है?

ल्ल नहीं। संघ का कार्य विकासशील कार्य है और ऐसे कार्य में हमेशा बहुत लंबी योजनाएं नहीं बनतीं। संघ ने कोई ब्लू प्रिंट नहीं बनाया था। समय के अनुसार जो कुछ आवश्यक है, वह करेंगे। समाज जीवन में सबको साथ लेकर चलना है तो सामाजिक, धार्मिक नेतृत्व भी इसमें है। कोई भी जाति-बिरादरी, यहां के मठ, पंथ, संप्रदाय सबका संबंध हिंदू समाज से है। इसलिए इस क्षेत्र को प्रभावित करने वाली जो भी शक्ति है, उन शक्ति केंद्रों को हमने साथ जोड़ने का प्रयास किया है। संघ की शाखा कार्यकर्ता निर्माण का कार्य है। सारा समाज संगठन की उस प्रक्रिया में जुड़ेगा, ऐसा नहीं है। मैं यह प्रक्रिया शब्द जान-बूझकर इस्तेमाल कर रहा हूं।

'    प्रचारक व्यवस्था संघ की एक अनोखी पहल है, धुरी भी रही है। बदली हुई स्थिति में क्या आपको लगता है कि भविष्य में भी प्रचारक व्यवस्था ही इसकी धुरी बनी रहेगी?

ल्ल संघ के प्राथमिक चरण से गुजरा हूं मैं। प्रारंभ के 20-25 वर्षों में कार्य का विस्तार प्रमुख था। घर-बार छोड़कर गए प्रचारक ही कार्य की धुरी थे। लेकिन संघ ने प्रचारक को कभी कार्य की धुरी नहीं माना। हम कोशिश करते रहे कि गृहस्थ कार्यकर्ता ही कार्य की धुरी बनें। आज देशभर में हजारों की संख्या में गृहस्थ कार्यकर्ता हैं जो इस कार्य को संचालित कर रहे हैं। प्रचारक की भूमिका संपर्क-संवाद बनाए रखने की है, कार्यकर्ताओं की संख्या के अनुपात में प्रचारक बहुत कम हैं। प्रचारक केवल नए लोगों को लाने वाला व्यक्ति नहीं है, सबको कार्य की प्रेरणा देते हुए वह सबके साथ मिलकर चलेगा। यह भूमिका कभी समाप्त होने वाली नहीं है। यह एक अद्भुत व्यवस्था है। हम कहते हैं कि प्रचारक होना चाहिए, दिखना नहीं चाहिए। जैसे बिजली का करंट चलता रहता है दिखता नहीं है, ऐसी एक अंतर्निहित शक्ति है प्रचारक।

'    पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के बारे में गत 90 वर्षों में संघ की क्या सोच रही? क्या उसमें समय-समय पर कुछ परिवर्तन

भी आया?

ल्ल देखिए, दोनों शब्दों से हमारी असहमति है। हम समाज को पिछड़ा वर्ग नहीं मानते। दुर्बल वर्ग है। ऐसे दुर्बल वर्गों को सबल बनाना चाहिए। जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति होनी चाहिए। जीवन सम्मानजनक बनना चाहिए। इस विचार को लेकर संघ ने शुरू से, जिनको आज कथित पिछड़ा माना जाता है, उनको अपना मानकर और उनमें जो श्रेष्ठ गुण हैं, उनको सामने लाते हुए उनका जीवन उन्नत करने का प्रयास किया। हम 'अल्पसंख्यक' शब्द स्वीकार नहीं करते। अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक शब्द प्रयोग राजनैतिक लोगों ने चलाया है, समाज में विभाजन करने के षड्यंत्र के रूप में इसे देखना चाहिए। हमारा संविधान कहता है कि वी, द पीपल ऑफ इंडिया। तो ये अल्पसंख्यक कहां से आया? जो इस देश का है, व्

 

'    भूमंडलीकरण के दौर में जब नागरिकताएं और सीमाएं घुल-मिल रही हैं, संघ हिंदुत्व के आह्वान को कितना प्रासंगिक मानता है?

ल्ल हिंदुत्व का विचार भौगोलिक है ही नहीं। यह एक सांस्कृतिक शब्द है। किसी भी पूजा पद्धति को मानने वाला स्वयं को हिंदू मान सकता है। हिंदुत्व एक जीवन शैली, जीवन मूल्य है। इनको मानने वाला हिंदू है। भूमंडलीकरण स्थापित करना है तो इसी शब्द को सबको स्वीकार करना चाहिए। हिंदू कभी संकुचित नहीं है। यहां की जीवन शैली मनुष्य के भाव-भावनाओं को केंद्र में रखती है। ऐसी हिंदू जीवन शैली कल अमेरिका-पाकिस्तान के लिए भी हो सकती है क्योंकि यह कर्मकांड से बंधी हुई जीवन शैली नहीं है। नैतिक मूल्य हैं। नैतिक मूल्य कहां अलग हो सकते हैं? हिंदू चिंतन में स्वावलंबन शब्द नहीं है, परस्परावलंबन है। कोई भी समूह अपने बल पर सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करे, यह कठिन है। इसलिए एक दूसरे का सहयोग करते चलना है। अगर भूमंडलीकरण का यही शुद्ध अर्थ है तो यह हमें स्वीकार है। पर इसके नाम पर यदि साम्राज्यवादी कल्पनाएं स्थापित होती हैं, विकेंद्रित व्यवस्था को समाप्त करते हुए एक-केंद्रीय व्यवस्थाएं होंगी, तो इसका हम विरोध करते हैं।

'    संघ विचारों से प्रेरित संगठन भी बढ़ रहे हैं। ऐसे में सुसंवाद, समन्वय से जुड़े विषय संभालने का काम संघ कैसे करता है?

ल्ल इस तरह के जितने भी कार्य खड़े होंगे, उनको जोड़ने की महत्वपूर्ण शक्ति एक विचार है, एक लक्ष्य है। उस लक्ष्य के बारे में कभी प्रश्न नहीं उठते। अलग-अलग पद्धतियों को लेकर कभी कुछ थोड़ा समन्वय करना पड़ता है। समन्वय का मतलब है चारों दिशाओं से चलना, परंतु एक दिशा में चलना। अगर हम चारों दिशाओं से आगे चलेंगे तो टकराएंगे। समाज जीवन की परिधि पर खड़े होकर चलेंगे तो परिधि के केंद्रबिंदु पर पहुंचेंगे। केंद्रबिंदु एक है इसलिए सब एक ही जगह आएंगे। और सबके मिलने का केंद्र हमारा राष्ट्र के परम वैभव का लक्ष्य है। मैं हमेशा कहता हूं कि प्रवेश द्वार अलग-अलग हैं, जिसकी जिसमें रुचि होगी वह उससेे आएगा। जब केंद्र में पहुंचेगा तो पता चलेगा कि मैं यहां पहुंच गया। जैसे जिसकी सामर्थ्य है तो वह प्रथम श्रेणी एसी. में जाएगा, जिसकी क्षमता है सेकेंड एसी की, वह उसमें जाएगा। और अगर वैसी क्षमता नहीं है तो जनरल डिब्बे में बैठेगा। किन्तु गाड़ी तो एक ही दिशा में जाने वाली है। आप किसी भी डिब्बे में चढि़ए. (हंसते हुए) अब लोगों में झगड़ा डिब्बे को

लेकर है….!

'    कहा जाता है कि भाजपा का रिमोट कंट्रोल संघ के पास है। संघ-भाजपा संबंधों को किस तरह परिभाषित करेंगे?

ल्ल वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में मैं लगभग सभी राजनीतिक दलों को तीन भागों में देखता हूं। एक प्रकार उनका है जो क्षेत्रीय हैं, क्षेत्रवाद को बढ़ावा देते हैं। दूसरे वे, जिनका उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्ति है। एक तीसरा समूह है राजनीतिक दलों का, जो विचारों पर खड़ा है। परंतु ये विचार भारतीय जीवन, हिंदू चिंतन से विसंगत हैं। इन सभी ने संघ का विरोध किया है, हिंदू चिंतन का विरोध किया है। स्वयंसेवक कैसे उनके साथ जा सकता है? जो उसके विचारों के निकट है, संघ का स्वयंसेवक स्वाभाविक रूप से वहां जाएगा। आज की स्थिति में भाजपा का चिंतन उन विचारों के साथ सुसंगत है। इस कारण स्वयंसेवक स्वाभाविक रूप से भाजपा के पक्ष में खड़ा है। पर कोई बंधन नहीं कि वे भाजपा के लिए ही कार्य करें। एक जिम्मेदार संगठन के नाते समाज जीवन से जुड़े विविध बिंदुओं, प्रश्नों पर अपना मत व्यक्त करना हम दायित्व मानते हैं। लोग उसे रिमोट कंट्रोल कहें, या कुछ भी कहें, वास्तव में संघ अपनी स्पष्ट भूमिका रखने का काम करता आया है। भविष्य में भी करता रहेगा।

'    सामाजिक भेदभाव और विषमताओं को लेकर तनाव बढ़ रहा है। इससे निबटने की संघ की क्या कोई योजना है?

ल्ल इसी कारण तो संघ का जन्म हुआ है। हमने जो रास्ता ढूंढा है, वह परंपराओं से भिन्न है। हमने भेदभाव, विषमताओं की चर्चा करने की बजाए कहा कि हम सब हिंदू हैं। हिंदू शब्द ही ऐसा है जो ऐसे भेदभाव और विषमता को मिटा सकता है। परंतु संकुचित शक्तियां भी बहुत प्रभावी हैं जो इस भेदभाव, विषमता को बनाए रखने या खाई को बढ़ाने का काम करती हैं। यह हमारे सामने चुनौती है। परन्तु मेरा अनुभव ऐसा है इतने वर्षों में कि जहां-जहां संघ का कार्य प्रभावी रूप से खड़ा होता गया, वहां ऐसी विषमताएं भी खत्म होती गईं। हम किसी भी जाति-बिरादरी के हों, हमारा मूल हिंदू है। हमारा नाम, भाषा, हमारे भगवान्, धर्म ग्रंथ, तीर्थ क्षेत्र, महापुरुष कौन-सी जाति-बिरादरी के हैं? वे कहां से आए? वे जहां से आए उसका नाम है हिंदू। इसका स्मरण हम जितना प्रभावी रूप से करेंगे, उतना ही इन समस्याओं का निवारण होगा।

'    एक ओर संघ के अनुकूल वातावरण है, दूसरी ओर वैचारिक और मीडिया क्षेत्र में संघ के लिए भ्रांतियां फैलाने के प्रयास बढ़ रहे हैं। कैसे निबटेंगे?

ल्ल इसकी हम बहुत चिंता नहीं करते। संघ छोटा था तब से भ्रांतियां फैलाने के प्रयास हो रहे हैं। इसके बावजूद संघ बढ़ा। हां, इन भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास हम अवश्य करते हैं। आज सामान्य व्यक्ति के सामने भी यह एक गंभीर प्रश्न है कि भ्रांतियां फैलाकर प्रसार माध्यम अपनी विश्वसनीयता खो रहे हैं। यह सुसंस्कृत समाज और लोकतंत्र मानने वाले किसी भी देश के लिए बहुत बड़ा संकट है। भ्रांतियां फैलाने वाली शक्तियों को ठीक दिशा में चलाने की कोशिश समाज के माध्यम से ही करनी चाहिए। प्रसार माध्यमों में काम कर रहे संघ के स्वयंसेवकों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होगी कि कैसे इसे पुन: प्रतिष्ठा प्राप्त हो?

'    नौ दशक की यात्रा के इस पड़ाव पर संघ कितना संतुष्ट है और भविष्य में संगठन में कैसी गति और तस्वीर देखता है?

ल्ल संतुष्ट तो नहीं है, परन्तु असंतुष्ट भी नहीं है। समय की, समाज की जो मांग है उसके अनुसार जितना काम होना चाहिए था, उतना नहीं है। परन्तु जैसी प्रतिकूलता में कार्य प्रारंभ हुआ, उसकी तुलना में हमने बहुत कुछ पाया है। इसलिए निराश नहीं हैं। लेकिन बहुत बड़ी मंजिल अभी और पार करनी है। हम हमेशा आगे बढ़ने की बात सोचते हैं। मैं गत 6-7 वर्षों के अनुभव के आधार पर बता सकता हूं कि हमने एक ऊंची दिशा में गति पकड़ी है। केवल संघ कार्य का नहीं, संघ विचारों का प्रभाव भी समाज में जीवन में प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहा है। स्वीकार्यता भारत में और बाहर भी बढ़ी है। हम असंतुष्ट केवल इसलिए हैं कि हमारे संगठन की ताकत और बढ़नी चाहिए। इसके लिए हम प्रयासरत हैं। एक बात और, केवल अनुकूलता है इसलिए काम कभी बढ़ता नहीं है। अनुकूलता के साथ अपनी शक्ति का नियोजन हम जितना कर पाएंगे, उतना ही आज की अनुकूलता को कार्यरूप में परिवर्तित करेंगे।

'    काम बढ़ा है फिर भी कहा यही जाता है कि आदेश नागपुर से आता है….?

ल्ल संघ का केंद्र नागपुर है और जब लोग कहते हैं कि नागपुर ने क्या कहा है, तब इसका मतलब है, संघ ने क्या कहा है। नागपुर और संघ पर्यायवाची बन गए हैं। मैं आदेश के बजाय सुझाव शब्द प्रयोग करूंगा। बालासाहेब जब सरसंघचालक बने तो यहां दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस में एक पत्रकार ने उनसे पूछा, ''हम देखते हैं कि संघ में महाराष्ट्र का डॉमिनेशन है?'' तब बालासाहेब ने कहा,''आपकी जानकारी गलत है। संघ में महाराष्ट्र का नहीं, नागपुर का डॉमिनेशन है (हंसते हुए), क्योंकि हम जितने भी अखिल भारतीय अधिकारी हैं, आधे से ज्यादा नागपुर के ही हैं।'' पत्रकार एकदम हक्का-बक्का रह गया। बाद में बालासाहेब ने कहा,''आप सोचिए, देश का यह इतना बड़ा संगठन है। किसी एक स्थान से चल सकता है क्या? स्थान-स्थान पर कार्यकर्ता हैं, सब मिलकर इसे चलाते हैं।''

'    इतनी लंबी यात्रा में कुछ लोग असंतुष्ट या उपेक्षित भी महसूस करते होंगे। ऐसे में कार्यकर्ता की संभाल कैसे करते हैं?

ल्ल प्रवाह में ऐसा होता है। हरेक के स्वभाव की एक मर्यादा होती है। दूसरे एक जनरेशन गैप भी आता है। गलत कुछ नहीं है। कई बार व्यक्ति स्वयं को थोड़ा अलग कर लेता है। जब कोई प्रवाह से अलग होता है तो स्वाभाविक संपर्क की धारा कम हो जाती है। जैसे मैं कहीं पर पुराने लोगों से मिलने जाता हूं तो वे कहते हैं—देखिए, आज जो जिला प्रचारक हैं, उनके बारे में मुझे मालूम ही नहीं है। मैं कहता हूं कि आप कभी गए कार्यालय में कि जिला प्रचारक कौन है, जरा देख आऊं? मैं जिला प्रचारक था इसीलिए आपसे मेरी पहचान हैं। अब जो नया जिला प्रचारक है उसकी नई पहचान हो गई है। वह आपके यहां नहीं आता होगा लेकिन और पच्चीस जगह जाता है। जहां यह समझ में आ जाता है, वहां खट-पट कम होती है। परन्तु फिर भी मुझे लगता है ऐसा बहुत ज्यादा नहीं है। (हंसते हुए) अगर यह भी नहीं रहेगा तो हम करेंगे क्या?   

 

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