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संघ गीतों की प्रवाहमान धारा

Written byArchiveArchive
Dec 5, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 05 Dec 2016 12:30:46


संघ गीतों की प्रवाहमान धारा

'हम करें राष्ट्र आराधन' के स्वरों से रग रग में दौड़ जाती हैस्फूर्ति

 

संघ गीतों ने स्वयंसेवकों के साथ ही देश के आम नागरिकों में उत्कट राष्ट्रभक्ति जगाने का काम किया है। विभिन्न परिस्थितियों में और उत्सव-आयोजनों के अवसर पर संघ गीतों के स्वर नई ऊर्जा प्रवाहित करते हैं

डॉ. अमिता पत्की

 

साहित्य की अनेक विधाओं में काव्य सर्वोत्तम विधा है। काव्य एक बहती सरिता के समान है। गेय काव्य को गीत कहा जाता है। कोई भी गीत उसमें निहित रस व मनोभावों को दृढ़ करने में अत्यंत सक्षम

होता है।

उपरोक्त वाक्य की यथार्थता को जानकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्थापना काल से ही अपने प्रत्येक कार्यक्रम व दैनंदिन शाखाओं में गीतों को विशेष महत्व दिया है। रा.स्व.संघ के विस्तार में संघ गीतों की प्रवहमान संजीवनी का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। प्रतिभावान कार्यकर्ताओं ने आवश्यकतानुसार संघ के श्रद्धा, निष्ठा, समर्पण एवं राष्ट्रभावना जैसे मूल्यों को ध्यान में रख्तते हुए प्रभावी एवं उपयुक्त गीतों की रचना की है।

अज्ञात व अचर्चित रचनाकार

आचार्य मम्मट ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'काव्यप्रकाश' में जनकाव्य के हेतु की चर्चा में यश की आकांक्षा को एक प्रबल कारण बताया है। उनके अनुसार काव्य सृष्िेट का प्रथम कारण यश की आकांक्षा है। किंतु अधिकांश संघ गीतों के रचयिताओं के नामों का उल्लेख हमें कहीं नहीं मिलता। इसका क्या कारण हो सकता है? उत्तर पाना सरल नहीं है, क्योंकि किसी भी कवि ने इस विषय में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है। ऐसे अनेकानेक भावप्रवण रचनाकार हुए, जिन्होंने राष्ट्रमाता की अर्चना में अपनी कविता को आरती की शिखा बना दिया और प्रकाश के अमिट हस्ताक्षर विश्व को अर्पित कर स्वयं शून्य में समा गये।

संघ गीतों के रूप में हिंदी साहित्य के कुछ श्रेष्ठ कवियों की कविताओं का उपयोग भी किया गया है। किंतु उनके नाम भी गीतों के साथ प्रकाशित नहीं हैं। मैथिलीशरण गुप्त, शिवमंगल सिंह सुमन, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, चंद्रकांत भारद्वाज व श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह उनमें से कुछ हैं। इनके अलावा श्री अटल बिहारी वाजपेयी, वचनेश त्रिपाठी, ला.ज. हर्षे, विष्णुगुप्त विजिगीषु, श्रीकांत भारद्वाज भी इस कड़ी में हैं। तुलसीदासजी के 'रामचरित मानस' में कलियुग में समाज में कौन-कौन-से बदलाव आएंगे से जुड़े वर्णन को यदि देखें तो आज वे शत-प्रतिशत सत्य सिद्ध होते हैं। ठीक उसी प्रकार अनेक संघगीतों के कवि भी युगद्रष्टा थे। उनके गीत आज भी सामाजिक नियति व समस्याओं को स्पष्ट करने व सुलझाने में शत-प्रतिशत सही बैठते हैं।

परिवर्तनशील भाव

परिवर्तन एक जीवंत समाज का मुख्य लक्षण है, इसे मानते हुए संघ ने अपनी सभी प्रकार की कार्यप्रणाली में परिवर्तनशीलता को अत्यंत महत्व दिया है। कालानुरूप योग्य परिवर्तन करते हुए अपने मूलभूत विचार समाज में प्रस्तुत करना व संस्कृति रक्षण करना संघ की विशेषता है। संघ गीत इससे अलग कैसे हो सकते हें? स्वतंत्रता पूर्व से आज तक संघ गीतों ने कालानुरूप भाव जगाने का कार्य किया है।

 

  1. साहस एवं राष्ट्रभक्ति की भावना: स्वाधीनता के पूर्व के इन गीतों को सुन आज भी नवयुवकों की भुजाएं फड़कने लगती हैं व देश, धर्म पर मर मिटने की सिद्धता उत्पन्न होती है। उदाहरण के लिए-

अति विकट निकट संकट का तट सर पर है, परवाह नहीं जब रक्षक जगदीश्वर है।…

चाहे रूठे संसार सकल क्या डर है, परवाह नहीं रक्षक जगदीश्वर है।।

  1. राष्ट्रार्चन : स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात संघ गीतों में एक वैचारिक पुट नजर आता है। इनमें भारत की श्रेष्ठता, राष्ट्र के प्रति असीम सम्मान प्रगट करने का भाव प्रकट हुआ-

हम करें राष्ट्र आराधन…।।

  1. ध्येय चिंतन : हिंदू राष्ट्र की निर्मिति व भारत को विश्वगुरु के स्थान पर ले जाना प्रत्येक स्वयंसेवक का प्रमुख ध्येय होना चाहिए। समाज व देश की बदलती परिस्थितियों में स्वयंसेवक अपने ध्येय से किंचित् भी विचलित न हो, इस भावना को सदैव जागृत रखने का कार्य अनेक संघ गीतों ने किया है। –

ले चले हम राष्ट्र नौका को भंवर से पार कर…

  1. सांस्कृतिक एकता : भारत की सांस्कृतिक एकता, राष्ट्रीय एकता की प्राणवायु बन संचरित हो, इस उद्देश्य से अनेक संघ गीतों में सांस्कृतिक एकता को बल प्रदान करने वाले भावों का समावेश दिखता है-

भुआओंे में दो भीम सा बल, रगों में ऋषि रक्त संचार कर दो।।

  1. ध्वजवंदना : प्राचीन काल से चन्द्रगुप्त, विक्रमादित्य, शिवाजी महाराज, राणा प्रताप, झांसी की रानी ने भगवाध्वज को थाम कर युद्धभूमि में अपना शौर्य और पराक्रम दिखाया। यह ध्वज ही संघ में गुरुस्थान पर है अत: ध्वज वन्दना से जुड़े अनेक संघ गीत प्रचलित हैं-

नमो नमस्ते नमो नमो, भगवाध्वज हे नमो नमो।

  1. महापुरुषों का यशगान : डॉ. हेडगेवार के द्वारा रोपित व श्रीगुरुजी द्वारा पोषित संघ रूपी पवित्र वृक्ष की अनेक शाखाएं आज देश-विदेश में फैल रही हैं। उनके दिये पाथेय पर चलने का संबल सदैव मिलता रहे, इस उद्देश्य से इन महापुरुषों के कार्य को उजागर करने वाले अनेक संघगीत अत्यंत पवित्र भावना से संघ के क्रियाकलापों में सदैव गाये

जाते हैं-

केशवं स्मरामि सदा परमपूजनीयम्।

  1. विश्वमंगल : विश्व का कल्याण हो, यह जयगान करने वाली भारतीय मनीषा में ही नि:स्वार्थ भाव से प्राणियों के प्रति सद्भावना तथा मंगल की कामना की गयी है। इन भावनाओं से युक्त संघगीत रचे गये-

मातृमंदिर का समर्पित दीप मैं।

  1. उद्बोधन : संघ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उसकी शाखा के कार्यक्रम में एक वैयक्तिक गीत का चयन किया। गायक ने जब गीत गाना प्रारंभ किया तो कार्यकर्ताओं की आंखों से अश्रु झरने लगे-

न हो साथ कोई अकेले बढ़ो तुम, सफलता तुम्हारे चरण चूम लेगी।

  1. प्रासंगिक : संघ में उत्सवों का बेहद महत्व है। संघ के छह उत्सव तथा अन्य प्रासंगिक आयोजनों के अवसर पर अनुरूप गीत हैं-

वर्ष प्रतिपदा-पूर्ण करेंगे हम सब केशव, वह साधना तुम्हारी।

हिंदू साम्राज्य दिन-पावन हिंदू साम्राज्य दिवस

गुरुपूर्णिमा-गुरु वंद्य महान, भगवा एक ही जीवन प्राण, अर्पित कोटि-कोटि प्रणाम।

रक्षाबंधन-बंधनकारी पाश नहीं यह, अरे मुक्ति का है बंधन यह।

विजयादशमी-विजय का शुभ पर्व आया, विजय का वरदान बनकर।

 

मकर संक्रांति-आ गया संक्रांति का संदेश पावन।

  1. देश व समाज में उभरी विशेष समस्या के प्रश्नों के हल-

आपातकाल : 1975 जून से 1977 तक देश में आपातकाल घोषित हुआ तथा संघकार्य पर प्रतिबंध लगा। कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाये रखने के लिए इस कालखंड में कुछ श्रेष्ठ रचनाएं रची गईं-

क. बाधाएं आती है आएं। घिरें प्रलय की घोर घटाएं।। आग लगाकर जलना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा।

ख. आंखों में वैभव के सपने, पग में तूफानों की गति हो। राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता, आए जिस जिसकी हिम्मत हो।

राममंदिर अभियान : राममंदिर नवनिर्माण में संघ ने सक्रिय सहभाग किया। इस कालखंड में सभी में उत्साहवर्धन करने वाले अनेक गीतों की रचना हुई-

क. सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे।

आधुनिक : वैश्विीकरण के इस युग में हिंदू संस्कृति पर अन्य संस्कृतियों का आक्रमण, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभाव, बौद्धिक पलायन (स्थानांतरण), विदेशी चकाचौंध के अधीन होकर अपने देश की अवहेलना जैसी अनेक आधुनिक समस्याओं से जूझने का बल भी संघ गीतों ने दिया है-

चिंतन चरित्र में अब, विकृति बढ़ी हुई है। चहुंओर कौरवों की सेना खड़ी हुई है।

संघ की परिवर्तनशीलता का सबसे उत्तम उदाहरण यही है कि इन गीतों में हर मर्ज की दवा उपलब्ध है। देशभक्ति की भावना से हम सभी परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। समर्पण भाव संघ कार्यकर्ता का विशेष परिचय है। यह बात अनेक गीतों के माध्यम से अंकित की गयी है-

तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित। चाहता हंू इस देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं।

पर्यावरण जैसे विषयों पर भी समाज में जागृति हेतु कुछ गीत हैं-

स्वार्थ साधना की आंधी में, वसुधा का कल्याण न भूले।

संघ गीतों का विभाजन

शैली एवं योग्यता की दृष्टि से संघगीतों को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है।

  1. एकल गीत 2. समूह गीत (सांघिक गीत/गणगीत) 3. संचलन गीत (प्रभाव गीत)

एकल गीत— इस प्रकार के गीतों में शास्त्रीय गायन विधान का उपयोग व विविधता होती है। विचारों का प्रभाव इन गीतों से स्पष्ट झलकता है-

उद्धव्य ध्येय की ओर तपस्वी। जीवन अविचल चलता है, जीवनभर अविचल   चलता है।

समूह गीत -ये संगठन के कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार करने वाले गीत होते हैं। राष्ट्रीयता तथा सांस्कृतिक चेतना का ज्वार जगाने में ऐसे गीत समर्थ     होते हैं-

भारत वंदे मातरम्, जय भारत वंदे मातरम्।

संचलन गीत-एक निश्चित ताल अर्थात् चलते समय कदम के साथ ये गीत गाये जाते हैं। इस प्रकार के गीतों की धारा मुख्यत: देशभक्ति होती है। कदम से कदम मिलाकर चलने से मन भी मन से मिलने लगते हैं, यह धारणा होने से ऐसे गीत गाने की पद्धति है। प्रत्येक बायें कदम पर पंक्ति शुरू की जाती है। संघ में संचलन नित्य चलने वाला कार्यक्रम है, इसलिए इस प्रकार के गीतों की रचना विशेष रूप से की गई है-

  1. हिमाद्रि तुंग शृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती। स्वयंप्रभा, समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती।
  2. जननी जनमभूमि, स्वर्ग से महान है। इसके वास्ते ये तन है, मन है और प्राण है।
  3. मातृभूमि गान से गूंजता रहे गगन, स्नेह नीर से सदा फूलते रहे सुमन।
  4. गलत मत कदम उठाओ, सोच कर चलो, विचार कर चलो। राह की मुसीबतों को पार कर चलो।

इस प्रकार रा.स्व.संघ में ये गीत अपनी विविध विशेषताओं व रूपों के साथ संघ की स्थापना से आज तक निरंतर चैतन्य को प्रवाहित कर रहे हैं। राष्ट्रभाषा होने के कारण हिंदी भाषा में गीतों की संख्या बहुत अधिक है। किंतु जैसे-जैसे संघ कार्य का विस्तार देशभर में होने लगा, कुछ प्रांतीय कार्यकर्ता व कवियों ने अपने-अपने प्रांत की भाषा में संघगीतों की रचनाएं कीं। मराठी, तमिल, कन्नड़, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, मलयालम, तेलुगु एवं सुदूर पूर्वोत्तर भारत की भाषाओं में भी प्रभावी गीत रचे गए हैं। प्रांतीय भाषाओं के गीत भी उपरोक्त वर्णित सभी वैशिष्ट्यों से युक्त एवं प्रभावी हैं। ये सभी गीत त्याग, समर्पण, बलिदान एवं राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत हैं।संघ की प्रेरणा से समाजहितैषी काम करने वाले अन्य संगठन एवं संस्थाएं भी अपने-अपने क्षेत्र में सभी कार्यक्रमों में उपयुक्त कार्यकर्ता एवं वातावरण निर्मिति हेतु राष्ट्रभक्तियुक्त गीतों का गायन करते हैं। संघगीतों के उपरोक्त चर्चित अनेक वैशिष्ट्यों में सबसे महत्वपूर्ण वैशिष्ट्य यह है कि हृदय से हृदय अपने आप मिल जाते हैं। पिछले 90 वर्ष से उम्र, भाषा, प्रांत, जाति के परे स्वयंसेवक इन गीतों के द्वारा आपस में जुड़ रहे हैं। आने वाले यांत्रिक युग में भी संघगीत यही कार्य करेंगे व सही अर्थों में समाज व देश में मन से मन को जोड़कर समरसता की निर्माण करेंगे, यही अपेक्षा है।

 

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