ऐसे हड़पा बलूचिस्तानजिन्ना का छल, पाकिस्तान का सैन्यबल
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ऐसे हड़पा बलूचिस्तानजिन्ना का छल, पाकिस्तान का सैन्यबल

Written byArchiveArchive
Aug 22, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 22 Aug 2016 11:51:21

बलूचिस्तान कभी भी पाकिस्तान का अंग नहीं रहा। पाकिस्तान ने 1948 में छल से बलूचिस्तान पर कब्जा किया। तभी से बलूचिस्तान के लोग आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस आजादी की लड़ाई में अब तक हजारों बलूच शहीद हुए हैं। अनेक बलूच नेता विदेशों में रहकर आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं

सुधेन्दु ओझा
बलूचिस्तान के दुर्भाग्य से वह पाकिस्तान के लिए ऐसा छल-प्रपंच का केन्द्र रहा है जिसका जन्म, जिन्ना के मुस्लिम साम्राज्यवाद की दिमागी प्रयोगशाला में कश्मीर की ही तरह 1947 से पहले हो चुका था। अलबत्ता यह अवश्य है कि पाकिस्तान ने एक सैनिक कार्रवाई के बाद एक अप्रैल, 1948 में उसे 'कायम' किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वाधीनता दिवस के भाषण के तत्काल बाद ही अकबर बुगती के पुत्र बरहमदाग बुगती के बयान से साफ है कि प्रधानमंत्री द्वारा बलूचिस्तान का उल्लेख किया जाना महज संयोग नहीं, एक सोची-समझी रणनीति है।
बलूचिस्तान: एक परिचय
बलूचिस्तान पाकिस्तान का पश्चिमी प्रांत है। यह भौगोलिक रूप से बहुत बड़ा है और ईरान  के सिस्तान और अफगानिस्तान से सटे क्षेत्रों में बंटा हुआ है। यहां की राजधानी क्वेटा है। यहां के लोगों की प्रमुख भाषा बलूच या बलूची है। यह प्रदेश पाकिस्तान के सबसे कम आबाद इलाकों में से एक है और पूरे पाकिस्तान का 44 प्रतिशत भूभाग है। पाकिस्तान की कुल छह फीसदी आबादी ही यहां रहती है। यहां पर जनसंख्या घनत्व 22 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। बलूचिस्तान में कुल 27 जिले हैं।
पितृ वंशीय बलूच, विभिन्न कबीलों में बंटे हुए हैं। कबीले के सरदार के प्रति आस्था पर कोई सवालिया चिह्न नहीं लगा सकता। यहां न्याय व्यवस्था भी कबायली है और मुख्य रूप से आपसी विवाद जिरगों के माध्यम से ही सुलझाए जाते हैं।
बलूचिस्तान का मुख्य बलूच कबीला है- बुगती। यह बलूच-भाषी है और इसे बलूचिस्तान का सबसे शक्तिशाली कबीला माना जाता है। परवेज मुशर्रफ के काल में मारे गए अकबर बुगती इसी कबीले के सरदार थे।
बलूच-भाषी मर्री लोग पाकिस्तान के बलूचिस्तान के कोहलू, सिबी, जाफराबाद और नसीराबाद जिलों के निवासी हैं। ये अलगाववादी विचारधारा से खूंखार तरीके से लड़ने के लिए जाने जाते हैं।
ब्राहुई-भाषी मेंगल का कबीला बड़ा कबीला माना जाता है। ये बलूचिस्तान के चगाई,  खुजदार और खारान जिलों में रहते हैं।
बिजेंजो, बलूचिस्तान के अवारान जिले में रहते हैं। लांगो बलूचिस्तान के मध्य में रहते हैं। लांगो कबीले में प्राथमिक रूप से बलूची बोली जाती है, लेकिन बहुत से लोग ब्राहुई भी द्वितीय भाषा के रूप में बोलते हैं। बंगुलजई, एक ब्राहुई-भाषी कबीला है और इसे बलूचिस्तान के बड़े कबीलों में गिना जाता है। बलूचिस्तान को पूर्व में कलात के नाम से भी जाना जाता था। अंग्रेजी साम्राज्य के अंतिम दिनों में कलात भी स्वयं के स्वतंत्र राष्ट्र बनने का स्वप्न देख रहा था।
प्राचीन इतिहास
बलूची लोगों का मानना है कि उनका मूल निवास सीरिया के इलाके में था और उनका मूल सेमेटिक, एफ्रो-एशियाटिक है। आज का दक्षिणी बलूचिस्तान ईरान के कामरान प्रांत का हिस्सा था, जबकि उत्तर-पूर्वी भाग सिस्तान का अंग था। 652 ई. में मुस्लिम खलीफा उमर ने कामरान पर आक्रमण के आदेश दिए और यह इस्लामी खिलाफत का अंग बन गया। बाद में उम्मयदों ने इस पर कब्जा कर लिया। इसके बाद यह मुगल हस्तक्षेप का भी शिकार हुआ। भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान 1839, 1854 और 1876 में कलात ने अंग्रेजों से संधि की किन्तु यह कभी भी अंग्रेजी साम्राज्य का हिस्सा नहीं रहा।
बलूचिस्तान और अंग्रेजी हुकूमत
1876 की संधि, जो कि खान-ए-कलात मीर खोदाद खान और ब्रिटिश सरकार के बीच हुई थी, के तीन प्रमुख बिंदु थे। पहला था, खान-ए-कलात मीर नसीर खान और ब्रिटिश सरकार के मध्य 1854 की संधि का पुष्टिकरण। दूसरा, ब्रिटिश सरकार और खान-ए-कलात मीर खोदाद खान और उनके वारिसों के प्रति परस्पर दोस्ती का भाव बनाए रखने का वायदा और तीसरा, ब्रिटिश सरकार कलात की स्वतंत्रता और संप्रभुता बनाए रखेगी और किसी भी बाहरी आक्रमण में वह कलात की
सुरक्षा करेगी।
1935 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट में पहली बार अंग्रेजों ने कलात को ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा दिखाया। जब खान-ए-कलात को इस बात का पता चला तो उसने 1876 की संधि का हवाला देते हुए अपना विरोध पत्र भेजा। इसके जवाब में उसे एक बार फिर आश्वस्त किया गया कि कलात और ब्रिटिश सरकार के बीच हुई 1876 की संधि अंतिम है और आगे से यह बात नहीं दोहराई जाएगी। अंग्रेज द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी भी तरह से भारतीय उपमहाद्वीप से विदा होना चाहते थे। यही कारण है कि वे ऊपरी तौर पर तो खान-ए-कलात को आश्वस्त करते रहे कि कलात की स्वतंत्रता बनाए रखेंगे, किन्तु दूसरी तरफ जिन्ना को उनका समर्थन था जो हर हालत में कलात को पाकिस्तान का हिस्सा बनाना चाहते थे।
जिन्ना का छल और खान की मूर्खता
तत्कालीन खान-ए-कलात मीर अहमद यार खान और बलूचिस्तान के साथ पाकिस्तानी छल की शुरुआत यहीं से होती है। खान के सलाहकार आई.आई. चुन्द्रीगर, सुल्तान अहमद, बी.के. मेमोन और सर वाल्टर मौनक्तों कलात के स्वतंत्र राष्ट्र बने रहने के पक्षधर थे। किन्तु खान-ए-कलात स्वयं जिन्ना से बहुत प्रभावित था। उसे लगा कि जिन्ना कलात के हित की बात करेंगे सो उसने उन्हें आधिकारिक तौर पर कलात स्टेट का कानूनी सलाहकार
बना दिया।
जैसे सारे पाकिस्तानियों को यकीन था कि पाकिस्तान की हर समस्या का हल जिन्ना के पास है, वैसे ही जिन्ना भी पाकिस्तानी मामलों में खुद को हकीम लुकमान समझने लगे थे। देश के आजाद होते ही उन्होंने अपने लिए सब फायदे की चीजें समेट ली थीं। जिन्ना ने जिद की कि वे ही पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल बनेंगे। खराब स्वास्थ्य के चलते उन्हें अपनी मृत्यु के नजदीक होने का अहसास था, किन्तु वे  पाकिस्तान के लिए हकीम बनने का सपना संजोये बैठे थे। पाकिस्तान का संविधान भी वही लिखना चाहते थे, सो पाकिस्तानी संविधान समिति के सदर भी बन गए। इन सबके ऊपर, वे पाकिस्तान पर शासन करने वाली मुस्लिम लीग के अध्यक्ष भी बने रहे।
ऐसे में जब खान-ए-कलात ने उन्हें स्टेट का कानूनी सलाहकार बना दिया तो वे इस बात से निश्िंचत हो गए कि कलात जैसा बड़ा प्रदेश स्वत: पाकिस्तान की झोली में आ गिरा है।
उन्होंने खान-ए-कलात को यह नहीं जाहिर होने दिया कि पाकिस्तान कलात को निगलना चाहता है। वे खान-ए-कलात को स्वतंत्र राष्ट्र का सपना दिखाते रहे और साथ ही एक बड़े पाकिस्तानी मंसूबे में उसे हड़पने की चाल भी चलते रहे।
अंग्रेजों ने किया था आगाह  
अंग्रेज कलात को सामरिक महत्व का क्षेत्र मानते थे। लार्ड माउन्टबेटन ने तत्कालीन एडजुटेंट गवर्नर जनरल कर्नल सर जैफ्री प्रायोर के मार्फत खान-ए-कलात को एक गोपनीय सन्देश भेजा, जिसमें बताया गया कि अंग्रेज कलात को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बनाए रखने को तैयार हैं। उन्होंने कलात की सुरक्षा के लिए यह भी वायदा किया कि अगले 50 वर्ष तक ब्रिटिश फौज कलात में बनी रहेगी। बस, मीर अहमद यार खान को एक शाही जिरगे की बैठक बुला कर बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के लिए प्रस्ताव पारित करवाना था।
इस सन्देश को खान-ए-कलात ने तुरंत  जिन्ना को बता दिया। लार्ड माउन्टबेटन को जैसे ही इस बात का पता चला, उन्होंने तुरंत एक टेलेक्स सर जैफ्री प्रायोर को किया: ''शाही जिरगा रोक दो, खान-ए-कलात घोर अविश्वसनीय व्यक्ति है।''
4 अगस्त, 1947 को कलात मसले पर दिल्ली में एक गोलमेज कांफ्रेंस हुई। इसमें लार्ड माउन्टबेटन, जिन्ना, लियाकत अली खान, कलात के मुख्यमंत्री और विधिक सलाहकार सुल्तान अहमद ने हिस्सा लिया। इस बैठक में जिन बिन्दुओं पर सहमति हुई, उसके अनुसार 'कलात 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हो जाएगा और उसका दर्जा वही होगा जैसे वह 1838 में था। यदि भविष्य में कलात का किसी सरकार से मन-मुटाव हो जाता है तो वह जनमत का अधिकार रखता है और ऐसे में 1839 और 1841 की संधि के अनुरूप अंग्रेज सरकार उसे मदद प्रदान करेगी।'
इसी बैठक में एक अन्य समझौते पर भी दस्तखत किए गए। इसे 'स्टैंड-स्टिल'  समझौता कहा जाता है। पाकिस्तान और कलात के बीच हुए इस समझौते में दर्ज था कि ''पाकिस्तान सरकार इस बात से सहमत है कि कलात एक स्वतंत्र राज्य है और भारत की अन्य रियासतों से भिन्न है। पाकिस्तानी सरकार कलात और ब्रिटिश सरकार के मध्य हुए करारों के अनुपालन के लिए बाध्य है अथवा नहीं इस पर विधिक विचार प्राप्त करेगी। इन विधिक बिन्दुओं पर राय प्राप्त करने के बाद कलात और पाकिस्तानी प्रतिनिधियों के बीच वार्ता जारी रहेगी। कलात के साथ 1839 से 1947 तक संपन्न ब्रिटिश संधि की जिम्मेदारियों के अनुपालन के लिए पाकिस्तान और कलात के बीच एक 'स्टैंड-स्टिल' करार होगा।'' पाकिस्तान और कलात के बीच रक्षा, विदेश मामलों, और संचार आदि विषयों पर शीघ्र ही कराची में बैठक होगी।'' इस समझौते का प्रसारण आल इंडिया रेडियो से 11 अगस्त, 1947 को किया गया। यही समझौता पाकिस्तान के गले की फांस सिद्ध हो रहा है।
विभिन्न बलूच राष्ट्रवादियों ने इस समझौते को आगे रखकर ही आंदोलन चलाया हुआ है। 

 बुगती ने दिया धन्यवाद
बलूच रिपब्लिकन पार्टी के नेता बरहमदाग बुग्ती ने बलूचिस्तान के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके बयान पर धन्यवाद दिया और आभार भी व्यक्त किया। उन्होंने भारत से अनुरोध किया कि वह बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन और पाकिस्तानी सेना के नरसंहार का मुद्दा उठाए। फेसबुक पेज पर पोस्ट वीडियो संदेश में उन्होंने भारत का समर्थन मांगा है। बुगती ने कहा कि बलूचिस्तान के लोग स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पाकिस्तान हजारों युवाओं पर अत्याचार  कर रहा है।

खुर्शीद की समस्या
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जियाउल हक द्वारा नियुक्त बलूचिस्तानी गवर्नर रहीमुद्दीन की शादी पूर्व भारतीय राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन की भतीजी के साथ हुई थी। जाकिर हुसैन वर्तमान कांग्रेसी सलमान खुर्शीद के नाना थे।
रहीमुद्दीन की बीवी एक रिश्ते से सलमान की मौसी हुईं और रहीमुद्दीन मौसा। इसका उल्लेख केवल वर्तमान समस्या और बयानों के संदर्भ में बेहतर स्पष्टता के लिए किया जा रहा है।

2006 में नवाब अकबर अली खान बुगती की मौत के बाद मुशर्रफ ने यह घोषणा की थी की बलूचिस्तान का विद्रोह अब पाकिस्तान से समाप्त हो गया है, किन्तु ऐसा हुआ नहीं। बलूचिस्तान आज भी संघर्ष के दौर से गुजर रहा है।  

खान-ए-कलात और जिन्ना में विरोध  

खान-ए-कलात पाकिस्तान को विदेशी मामलों और संचार व्यवस्था की जिम्मेदारी ही देना चाहता था, बाकी सारे अधिकार वह कलात के पास ही रखना चाहता था, जबकि पाकिस्तान कलात का बिना शर्त विलय चाहता था।
खान-ए-कलात को अब जिन्ना का असली चेहरा देखने को मिला तो उसने जिन्ना के मंसूबों पर पानी फेरने के लिए तत्काल एक अंग्रेज डी.वाई. फेल को अपनी सेना की कमान थमा दी और उसे ही कलात का विदेश मंत्री बना दिया। 15 अगस्त, 1947 को खान ने कलात को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया। न्यूयॉर्क टाइम्स की रपट के अनुसार पाकिस्तान ने कलात को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता भी प्रदान
कर दी।
जनवरी, 1948 में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने कलात के रक्षा मंत्री से पेशावर में बातचीत की। जिन्ना ने भी अपनी सिबी यात्रा के दौरान खान-ए-कलात और अन्य कबीलाई सरदारों से मुलाकात की। 25 फरवरी को कलात नेशनल पार्टी ने पाकिस्तान में विलय के विरोध में कलात के निचले सदन 'ऐवाने आम' में प्रस्ताव पेश किया। विदेश और रक्षा मंत्री फेल सहायता की तलाश में लंदन यात्रा पर निकल गए। पाकिस्तानी अखबार 'डान' ने समाचार प्रकाशित किया कि 'खान-ए-कलात की अंग्रेजों से सीधी संधि है।'
पाकिस्तानी सेनाओं ने तत्काल कलात के बड़े हिस्से मकरान, खरन और लास्बेला पर कब्जा कर लिया। इसके बाद कलात की स्थिति काफी कमजोर हो गई। इस्लाम के नाम पर कलात को हड़पने की जिन्ना की चाल का अंदाजा खान-ए-कलात को बहुत देर से  चला। खान-ए-कलात अब जिन्ना के 'द्वि-राष्ट्र' सिद्धांत को धता बताकर पाकिस्तान से अलग होना चाहता था, किन्तु बलूचिस्तान के लिए देर हो चुकी थी। जिन्ना ने कश्मीर के लिए भी ऐसा ही स्वप्न देखा था। जिन्ना भारत में हैदराबाद के निजाम को भी इस्लाम के नाम पर चारा खिला रहा था। निजाम भारत के बीच रह कर पाकिस्तानी बनना चाहता था। जिन्ना ने उसे अंतिम समय तक भारत में विलय से रोके रखा।
 भारत में विलय का अनुरोध
27 मार्च, 1948 को आल इंडिया रेडियो से एक समाचार प्रसारित हुआ, ''…दो महीने पहले कलात सरकार ने भारत सरकार से भारत में विलय का अनुरोध किया था, किन्तु भारतीय सरकार ने भौगोलिक स्थितियों को ध्यान में रखकर इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया।'' इसी दिन खान-ए-कलात से जिन्ना ने बन्दूक की नोक पर पाकिस्तान में विलय संधि पर हस्ताक्षर करवा लिए थे, जिसकी घोषणा एक अप्रैल,1948 को की गई।
स्वतंत्रता संघर्ष की शुरुआत
कलात के पाकिस्तान में विलय के तत्काल बाद ही पाकिस्तान ने प्रिंस करीम, जो खान-ए-कलात का भाई था, को मकरान के गवर्नर के पद से हटा दिया। करीम भागकर अफगानिस्तान पहुंचा जहां उसने कबायली सेना इकट्ठी कर पाकिस्तान के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। उसने मलिक सईद और कादिर बख्श निजमानी को अपना दूत बना कर काबुल भेजा और अफगान सरकार से सैनिक सहायता की मांग की। अफगानिस्तान ने करीम को कंधार में बने रहने दिया, किन्तु उसे कोई सैनिक सहायता नहीं प्रदान की। चूंकि बलूच  काफी संख्या में पाकिस्तान के साथ लगी अफगान और ईरान सीमा में भी रहते हैं, अत: अफगानिस्तान और ईरान, पाकिस्तान में भड़की बलूची आग को अपने यहां नहीं आने देना चाहते थे।
पाकिस्तान ने खान-ए-कलात पर दबाव बनाया कि वह करीम को विद्रोही करार दे। पाकिस्तान ने करीम के विरुद्ध पंजाब, चमन, चस्मा और रास्ट्री इलाकों में सेना तैनात कर दी। खान-ए-कलात ने करीम को वापस बलूचिस्तान बुलाने का प्रयास किया, किन्तु जराक्जई कबीले के मीर गौहर खान जाहरी की मदद से करीम ने पाकिस्तानी सेना पर आक्रमण कर दिया। पाकिस्तान के मेजर जनरल अकबर खान ने उसे  साथियों के साथ 16 जून, 1948 को गिरफ्तार कर लिया। बलूचिस्तान के इस तथाकथित पहले विद्रोह में लगभग हजार से अधिक बलूच
शहीद हुए।
विद्रोह की असफलता

करीम के साथी खेमों में बंटे हुए थे। इस वजह से नेतृत्व में ही असमंजस की स्थिति बनी हुई थी। अफगानिस्तान और ईरान इस मसले में हाथ नहीं डालना चाहते थे। जिन्ना स्वयं को अमेरिका की गोद में बैठा चुके थे, बची-खुची कसर लियाकत अली खान ने यह कह कर पूरी कर दी थी कि पैसा और शस्त्र अमेरिका के, फौज पाकिस्तानी, ऐसे में अमेरिका इस पचड़े में दूर-दूर तक नहीं था। विद्रोह की इस शतरंजी बिसात में अंतरराष्ट्रीय खिलाडि़यों की कमी थी।
खान-ए-कलात का विद्रोह
1958 में खान-ए-कलात ने पाकिस्तान से छुटकारा पाने के लिए विद्रोह का बिगुल बजाया। तत्कालीन राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा ने खान-ए-कलात को गिरफ्तार करवा लिया और 7 अक्तूबर, 1958 को पाकिस्तान में मार्शल-ला लागू कर दिया। खान-ए-कलात के गिरफ्तार होते ही समूचे बलूचिस्तान में हिंसा फैल गई। यह दौर साल भर से अधिक चलता रहा। खान-ए-कलात के समर्थन में जरक्जई कबीले के सरदार बाबू नवरोज ने सशस्त्र विद्रोह किया। उसके हजारों सहयोगियों ने लेफ्टिनेंट कर्नल टिक्का खान (बूचर ऑफ बंगलादेश) के नेतृत्व वाली पाकिस्तानी फौज को कड़ी टक्कर दी। कहा जाता है कि टिक्का खान ने कुरान पर एतबार दिखलाकर नवरोज, उसके बेटों और भतीजों से आत्मसमर्पण करवा लिया। नवरोज के बेटों और भतीजों को हैदराबाद जेल में फांसी पर लटका दिया गया जबकि 90 वर्ष की आयु में नवरोज की मृत्यु हैदराबाद जेल में ही हुई। नवरोज के आत्मसमर्पण के बाद टिक्का खान ने कबीलों पर भीषण अत्याचार किए। बलूच  इतिहासकारों के अनुसार टिक्का खान ने कई हजार बेगुनाह बलूच नागरिकों की हत्या की।
भुट्टो और बलूचिस्तान
1970 में बलूचिस्तान के रूप में एक समन्वीकृत प्रांत के गठन को लेकर बलूच सरदारों और पाकिस्तान सरकार के बीच फिर मतभेद उभरे।1970 के चुनावों में मुजीबुर्रहमान की नेशनल अवामी पार्टी और जमीअत-उल-उलेमा-इस्लामी पार्टियों ने बहुमत हासिल कर लिया था। उन्हें पाकिस्तान में सरकार बनाने के लिए निमंत्रित किया जाना था, किन्तु अवसरवादी भुट्टो ने याहिया खान से गठजोड़ कर ऐसा नहीं होने दिया। उसने बलूचों द्वारा की जा रही स्वायत्तता और बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में बलूचिस्तान की रॉयल्टी की मांग को भी सिरे से खारिज करवा दिया।
पूर्वी पाकिस्तान और बलूचिस्तान में लगभग एक साथ ही विद्रोह की आंधी बहने लगी। बलूचिस्तान का यह विद्रोह खासा गंभीर रहा। भुट्टो ने छह महीने के अंतराल में बलूचिस्तान की दो सरकारों को गिरा दिया। प्रान्त के दो मुख्यमंत्रियों, दो गवर्नरों और 44 सीनेट सदस्यों को पाकिस्तान के विरुद्ध षड्यंत्र के आरोप में जेल में ठूंस दिया गया। बलूचिस्तान में मर्री, मेंगल, बुगती और जराक्जई कबीलों और पख्तूनों द्वारा शुरू किया गया असहयोग आन्दोलन शीघ्र ही सशस्त्र संघर्ष में बदल गया। बलूचिस्तान पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट के बैनर तले मीर हजार मर्री के नेतृत्व में यह बहुत बड़ा विद्रोह साबित हुआ। इसमें लगभग लाख की संख्या में सशस्त्र बलूच विद्रोहियों ने पाकिस्तान के दांतों से पसीना निकाल दिया। पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान से सहायता की गुहार लगाई।  परिणाम यह रहा कि ईरानी हवाई बम-वर्षकों और हेलिकाप्टरों की मदद से पाकिस्तान ने इस विद्रोह में लगभग 50,000 बलूचियों को शहीद किया।
पाकिस्तानी विघटन का केंद्र बिन्दु
भुट्टो को फांसी पर लटकाने के बाद जिया उल हक ने बलूचिस्तान पर ध्यान दिया और भारत के उत्तर प्रदेश में जन्मे जनरल रहीमुद्दीन खान को वहां का गवर्नर बना कर भेजा।
रहीमुद्दीन ने बलूचिस्तान के पूरे प्रशासन तंत्र को अपने हाथ में केन्द्रित कर लिया और प्रान्त में बड़ी कड़ाई के साथ शासन किया जिसकी वजह से काफी अलगाववादी इस आन्दोलन से टूट गए। अताउल्लाह मेंगल और नवाब अकबर खान बुगती, जो अब भी विद्रोह का झंडा उठाए हुए थे, खासे कमजोर पड़ गए। अफगानिस्तान में तालिबान के आने के बाद खैरबख्श मर्री और अताउल्लाह मेंगल जैसे बलूच विद्रोहियों को काबुल छोड़ना पड़ा। उन्होंने बेनजीर और नवाज शरीफ सरकारों द्वारा प्रस्तुत शांति प्रस्तावों को स्वीकार कर घर वापसी की।
पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में ढांचागत परिवर्तन प्रारंभ कर दिया। चीन-पाकिस्तान आर्थिक कारिडोर और ग्वादर बंदरगाह को चीन के अधिकार में दिए जाने को भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। बलूचिस्तान में भारी तादाद में पंजाबी और मोहाजिर मुसलमानों को स्थायी रूप से बसाया जा रहा है।  
वर्ष 2006 में नवाब अकबर अली खान बुगती की हत्या के बाद मुशर्रफ ने यह घोषणा की थी कि बलूचिस्तान का विद्रोह अब पाकिस्तान से समाप्त हो गया है, किन्तु ऐसा हुआ नहीं। बलूचिस्तान आज भी संघर्ष के दौर से गुजर रहा है। आने वाला समय निश्चित रूप से पाकिस्तान के पक्ष में नहीं है।  

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