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कश्मीरियों द्वारा चुने मुख्यमंत्री से संवाद कश्मीरियों से संवाद नहीं है। अगर महबूबा से संवाद काफी नहीं तो फिर किससे संवाद करना होगा? जाहिर है, इशारा उन अलगाववादियों की तरफ है जो नादान उम्र के मासूमों को पत्थरबाजी में झोंककर अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाना चाहते हैं
ल्ल आशुतोष भटनागर
बुरहान वानी की मौत को एक महीना पूरा हो गया। उसकी मौत को कश्मीरी अलगाववादियों ने अवसर के रूप में पहचाना और पाकिस्तान के इशारे पर पूरी घाटी में आंदोलन भड़क उठा। सुरक्षा बलों पर हमले, थानों से हथियारों की लूट और सड़कों पर पत्थरबाजी का सिलसिला शुरू हो गया जो आज तक जारी है।
फिलहाल अलगाववादियों ने 12 अगस्त तक का हड़ताल का कैलेंडर जारी किया है किन्तु उनके तेवर देखकर लगता है कि वे इसे न केवल भारत के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त तक बढ़ायेंगे बल्कि शायद इस बात की कोशिश भी करें कि इस दिन कोई बड़ी घटना हो जिसे वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भुना सकें।
अलगाववादी इस बात से खासे निराश हैं कि हमेशा की तरह केन्द्र सरकार ने उन्हें अब तक न तो वार्ता की मेज पर बुलाया है और न ही किसी जांच कमेटी की घोषणा हुई। इतिहास गवाह है कि इतने तनाव के बाद तो केन्द्र हमेशा एक मोटे पैकेज की घोषणा कर देता था। इस बार उसका भी कोई अता-पता नहीं है। ये पैकेज स्थानीय राजनैतिक दलों को भी रास आते थे। इसलिये इस बार पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती की अलगाववादियों से सहायता की अपील के बावजूद जब गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने श्रीनगर दौरे के समय अलगाववादियों को किसी प्रकार की तवज्जो नहीं दी तो उनके सामने आंदोलन को और लंबा खींचने और तेज करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा।
केन्द्र की योजना भी शायद उन्हें थका देने की ही है। लेकिन केन्द्र सरकार जितना दवाब सहने की स्थिति में है, उतनी क्षमता शायद राज्य सरकार की नहीं है। खास तौर पर तब जब मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती अपनी ही पार्टी में अकेली पड़ती जा रही हैं। यही कारण है कि उन्होंने स्वयं दिल्ली आकर बातचीत का आश्वासन पाने की कोशिश की। इसके लिये उन्होंने वाजपेयी द्वारा दिये गए कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत के मुहावरे को दोहराया।
यह सच है कि किसी भी समस्या का समाधान बातचीत से ही संभव है और जम्मू कश्मीर की समस्या इसका अपवाद नहीं है। लेकिन आज के इस माहौल में बात किससे की जाय, यह बड़ा सवाल है। विपक्ष के सभी दलों ने भी इसके राजनैतिक समाधान की बात कही है। संसद में भी इस पर चिन्ता व्यक्त की गई। मीडिया और बुद्घिजीवियों के एक वर्ग ने यह कहना शुरू कर दिया है कि घाटी के हालात सुधारने के लिये राजनैतिक प्रक्रिया को शुरू किया जाना जरूरी है। हालांकि कोई भी इस बात को स्पष्ट नहीं कर पा रहा है कि यह राजनैतिक प्रक्रिया क्या होगी।
जम्हूरियत के दायरे की बात जब भी होगी तो उसका रास्ता तो चुनाव ही है। राज्य में चुनाव हुए हैं, निष्पक्ष हुए हैं और जनता ने स्वतंत्र रूप से अपने मताधिकार का प्रयोग किया है। जिन्हें जनता ने चुना है, उन्होंने सत्ता संभाली है। अब इससे इतर जम्हूरियत क्या है? क्या राजनैतिक प्रक्रिया वह है जो अलगाववादी चाहते हैं अथवा पाकिस्तान चाहता है ? क्या जनादेश से पृथक भी कोई लोकतांत्रिक प्रकिया संभव है? और स्वयं महबूबा मुफ्ती को चुनाव जीते हुए बमुश्किल दो महीने हुए हैं। क्या यह उनकी सरकार के कामकाज की पुष्टि नहीं है?
जम्मू-कश्मीर एक राज्य इकाई है जिसका कश्मीर एक भाग है। क्या जम्मू और लद्दाख के चुने हुए प्रतिनिधि, लेह और करगिल हिल कांउसिल, स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों के चुने हुए सदस्य भी इस राजनैतिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं होंगे? बिना इनको साथ लिये कैसे राजनैतिक समाधान संभव होगा। और सबसे बड़ी बात, क्या यह राजनैतिक प्रक्रिया बुरहान जैसे आतंकियों के साथ शुरू होगी जिन्हें किसी व्यवस्था पर भरोसा ही नहीं है? क्या पत्थर फेंकते और थाने लूटते लोगों के साथ संवाद संभव है।
सज्जाद गनी लोन और कूकापरे जैसे लोग भी पहले उसी रास्ते पर थे लेकिन जब उन्होंने राजनैतिक प्रक्रिया में शामिल होने का निर्णय किया तो उसका सबने स्वागत ही किया। लेकिन हिंसा और राजनैतिक प्रक्रिया साथ-साथ नहीं चल सकते, इस बात को स्वीकार करना ही होगा।
इस सब के बीच जिस घटना की चर्चा नहीं हुईं, वह है पुलवामा जिले में स्थित 'हाल' में अथवा अनंतनाग के 'वेस्सू' में कश्मीरी पंडितों की बस्ती पर रात भर हुई पत्थरबाजी जिसके बाद उन्हें अपने घर छोड़कर भागना पड़ा। क्या उन पंडितों का भी इस राजनैतिक प्रक्रिया में कोई स्थान है? क्या जिस कश्मीरियत के दायरे की बात हो रही है, कश्मीरी पंडित उस दायरे से बाहर हैं? क्या हजारों सालों से चली आ रही कश्मीर की विरासत को सीमित कर दिया जायेगा और इस्लामी आक्रमण से पहले के सारे इतिहास को नकार दिया जायेगा? क्या अभिनव गुप्त और ललितादित्य कश्मीरियत की पहचान नहीं? अभिनव गुप्त की सहस्राब्दी मनाये जाने पर खूनखराबे की धमकी देने वाले लोग कश्मीरियत का मतलब भी समझते हैं?
अब बात इंसानियत की! इस इंसानियत की गवाही तो वे आंकड़े ही दे रहे हैं जो बताते हैं कि पिछले एक महीने में घायल होने वाले लोगों में पुलिस और सुरक्षाबल के जवान अधिक हैं और आंदोलनकारी कम। जो रायफल हाथ में होते हुए भी पत्थर की मार से घायल होकर अस्पताल में भर्ती है, उसे इंसानियत की दुहाई दी जा रही है। इंसानियत अनमोल है लेकिन गलत वक्त पर गलत लोगों के लिये इंसानियत की पैरोकारी ने ही जम्मू- कश्मीर की समस्या को नासूर बना दिया है।
महबूबा ने दिल्ली में पत्रकारों से कहा- केन्द्र सरकार को कश्मीरियों से बात करनी चाहिये, उनका दिल जीतना चाहिये! बहुत खूब! क्या कश्मीरियों द्वारा चुने मुख्यमंत्री से संवाद कश्मीरियों से संवाद नहीं है। अगर महबूबा से संवाद काफी नहीं तो फिर किससे संवाद करना होगा? जाहिर है, इशारा उन अलगाववादियों की तरफ है जो नादान उम्र के मासूमों को पत्थरबाजी में झोंककर अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाना चाहते हैं।
राजनैतिक मुद्दे का समाधान राजनैतिक प्रक्रिया से होना संभव है लेकिन पत्थरबाजी और थाने लूटने जैसी घटनाएं कानून-व्यवस्था का प्रश्न हैं और उनसे निबटने की जिम्मेदारी भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की है। इससे बेहतर स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती जब केन्द्र सरकार राज्य के साथ ढ़ाल बनकर खड़ी है। तीन हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मियों के घायल होने के बाद भी अराजक तत्वों से कड़ाई से निबटने के स्थान पर मामले को संभालने की जिम्मेदारी केन्द्र पर डालना कहां तक जायज है?
आज से पहले भी पूवार्ेत्तर भारत सहित देश के तमाम हिस्सों में वार्ताएं हुई हैं। हमेशा संघर्षविराम की शर्त पर। जनजीवन अस्त-व्यस्त रहे, पत्थर चलते रहें, शासन उसे नियंत्रित करने के बजाए गेंद केन्द्र के पाले में डाल खुद अलगाववादियों की नजरों में भला बना रहना चाहता है। इसे ही आगे बढ़ाते हुए महबूबा ने एक और टिप्पणी की। उनके अनुसार जम्मू-कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद के बजाय पुल बन सकता है। इसका क्या अर्थ है? पाकिस्तान के साथ सीमा-विवाद है जिस पर बात हो सकती है। लेकिन भारत के आन्तरिक मामले में पाकिस्तान से बात करने का क्या औचित्य है?
जम्मू-कश्मीर में चल रहे किसी भी आंदोलन को अगर देश के बाहर से समर्थन मिल रहा है तो उससे निबटने का तरीका वही नहीं हो सकता जो स्थानीय समस्या से उपजे आंदोलन के समाधान का। इसी तरह हिंसक आंदोलन से अहिंसक आंदोलनों के तौर-तरीकों से नहीं निबटा जा सकता। संवाद की किसी भी कोशिश से पहले उन्हें हिंसा बंद करने का कड़ा संदेश दिया जाना जरूरी है। वाजपेयी के मुहावरे को लागू करने की एकतरफा कोशिश पहले भी निरर्थक साबित हुई है। आगे भी इसके सफल होने की गुंजाइश तब तक नहीं है जब तक कि आंदोलनकारी स्वयं भी कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत के रास्ते पर एक कदम आगे बढ़ने को तैयार न हों।











