आवरण कथा/शिक्षा : शिक्षा में सुधार बनेगा प्रगति का आधार
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आवरण कथा/शिक्षा : शिक्षा में सुधार बनेगा प्रगति का आधार

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Aug 8, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 08 Aug 2016 13:41:22

शिक्षा आज मानव जीवन की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गयी है। आज पूरे विश्व में सभी तक शिक्षा को पहुंचाने के लिए विशेष अभियान चलाये जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने एशिया, अफ्रीका व दक्षिण अमेरिका के अविकसित भागों में शिक्षा प्रसार की योजनाओं के लिये अरबों-खरबों डॉलर खर्च किये हंै। मानव विकास के विभिन्न परिमाणों में शिक्षा एवं चिकित्सा को सबसे उच्च स्थान पर रखा गया हंै। 'सबके लिए शिक्षा' और 'सबके लिए स्वास्थ्य', विश्व के सभी देशों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती हैं।
आज भारत में हमने बहुत हद तक देश के दूरस्थ भागों में भी शिक्षा की सुविधायें पहुंचाने का प्रयास किया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में जन्म लेने वाले बालकों में से 95 प्रतिशत प्राथमिक शिक्षा में प्रवेश ले रहे। यह बालिकाओं, वनवासी तथा अन्य पिछडे़ वगार्ें के लिए निशुल्क शिक्षा, मध्याह्न भोजन जैसी योजनाओं तथा शिक्षा के अधिकार जैसे कानूनों से संभव हो पाया है। अभी भी अनेक बालक-बालिकाएं पांचवीं कक्षा से पूर्व ही शिक्षा छोड़ देती हैं। आठवी तक पहुंचते-पहुंचते आधे से अधिक छात्र-छात्राएं विद्यालयों से बाहर हो जाती हंै। किन्तु यदि इतनी सुविधाओं के बाद भी लोगों के शिक्षा से विमुख होने के कारणों का अध्ययन करें तो हम पायेंगे कि इन छात्रों ने स्वेच्छा से शिक्षा को नहीं छोड़ा है। हमने शिक्षा का तंत्र ही ऐसा बना दिया है कि न तो छात्र और न ही शिक्षक आनंद से विद्यालय में जाते हैं। शिक्षा इतनी नीरस हो गयी है कि विद्यालय में आनंद ही नहीं आता।
संपन्न घरों के अभिभावक भी अपने बच्चों को विद्यालयों से निकाल कर, घर में पढ़ा रहे हैं। आज यह एक फैशन सा बनता जा रहा है। ऐसे माता-पिता मानते हैं कि विद्यालयों में अच्छे अंक प्राप्त करने पर भी उनके बच्चों के व्यक्तित्व का विकास होने की बजाए अवनति हो रही है। गरीब घरों के अभिभावक बड़े परिश्रम से बच्चों को शिक्षा देने का प्रयास करते हैं, किन्तु गुणवत्ता के अभाव में बच्चे विद्यालय में नहीं टिकते। दूसरी ओर संपन्न घरों के अभिभावक इसी कारण से स्वत: बच्चों को विद्यालयों से निकाल रहे हैं।
शिक्षा ऐसी नीरस क्यों है? यदि हम इस बात पर विचार करें तो ध्यान आयेगा कि आज की शिक्षा व्यवस्था में छात्र की अभिरुचि का ध्यान नहीं रखा जाता। इस शिक्षा पद्धति में सबके लिए एक ही प्रकार की सपाट व्यवस्था है। बालक के अंदर जो जन्मजात क्षमताएं हैं, उनकी ओर उसे बढ़ने में सहयोग करने के स्थान पर आज की शिक्षा सभी को एक समान जानकारी याद करने के लिए मजबूर करती है। यदि कोई छात्र बिना समझे, बिना आत्मसात किये ही उन जानकारियों को रट लेता है तो वह भी कक्षा में अव्वल माना जाएगा। किन्तु उसे ज्ञान तो कुछ प्राप्त हुआ ही नहीं और ज्ञान के बिना आनंद संभव नहीं है। अभिरुचि के विपरीत तथा ज्ञान की अनुभूति से विरत होने के कारण आज की शिक्षा रसहीन हो गयी है। यंत्र के समान सभी को निश्चित समय के लिए एक समान जानकारियों की लगातार मार को सहना आज की शिक्षा पद्धति है। यदि कोई जन्मजात संगीतज्ञ होगा तो भी आज की शालेय शिक्षा के तहत उसे गणित, व्याकरण व विज्ञान के निरर्थक सूत्रों के साथ ही इतिहास की उबाऊ  तिथियों को भी याद करना पडे़गा। जिसका संभवत: कोई भी उपयोग उसके भावी जीवन में नहीं होगा। यही बात किसी जन्मजात खिलाड़ी, वैज्ञानिक, कलाकार के साथ भी होगी। आज की शिक्षा पद्धति सभी को सामान्य बनाने का असफल प्रयास करती है। यह बात केवल नीरस ही नहीं अपितु प्राकृतिक नियमों के भी विरुद्ध है। ईश्वर की सृष्टि में, प्रकृति में कोई भी दो रचनाएं एक समान नहीं हैं।  पेड़ के अनगिनत पत्तों में से कोई भी दो पूरी तरह एक समान नहीं होते। जब घास के दो तिनके भी एक जैसे नहीं होते तब मनुष्य कैसे सामान्य हो सकता है? प्रत्येक जीव अपने आप में अद्वितीय है, अनोखा है। उसके जैसा कोई दूसरा नहींं। फिर सबके लिए एक-सी यांत्रिक विधि कैसे अपनाई जा सकती है।
मानव की अद्वितीयता ही उसकी दिव्यता का लक्षण है। यही बात सिद्ध करती है कि प्रत्येक मनुष्य बीज रूप में साक्षात ब्रह्म स्वरूप है, पूर्ण है। शिक्षा का उदेश्य प्रत्येक के अंदर सुप्त रूप से विद्यमान दिव्यत्व, पूर्णत्व को अभिव्यक्त करना है। वर्तमान में झंुड बनाकर मस्तिष्क में जानकारियां ठूंसने वाली शिक्षा में दिव्यत्व के बीज का विकास होने के स्थान पर विपरीत परिणाम ही हो रहा है। संस्कारहीन, भावशून्य, केवल धन कमाने की मशीन के रूप में मानव संसाधनों का निर्माण करने वाले कारखाने जैसे
विद्यालयों, महाविद्यालयों के विद्यार्थी और शिक्षा नहीं टिकते तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है। यदि कोई छात्र इस व्यवस्था को, इस खेल को अच्छी तरह से सीख जाए, खेल मे प्रथम क्रमांक पर आ जाए तब भी उसके जीवन का  विकास होगा ही, इसकी कोई निश्चितता नही है।
छात्र और आचार्य दोनों को रस आये, आनंद आये साथ ही उनके व्यक्तित्व का पूर्ण विकास हो, ऐसी शिक्षा पद्धति संभव है क्या? प्रत्येक के मन में ऐसा प्रश्न आता ही है। हालांकि हमारे देश की अधिकतर समस्याओं की जड़ में कुछ बातें केवल आदर्श होती हैं, उनका व्यवहार में उतरना संभव नही होता। यह पश्चिमी विचार हर प्रकार के सैद्धांतिक समझौतों को जन्म देता है। किसी भी बात में 100 प्रतिशत आदर्श प्राप्त करने के स्थान पर बिना कष्ट के जितना हो सके उतना करने की मानसिकता है। इस मानसिकता का प्रारंभ शिक्षा से ही हो रहा है। शिक्षा व्यवस्था में जब जानकारियों को रट लेेने मात्र से छात्र 100 प्रतिशत अंक प्राप्त कर सकते हैं तब समग्र संपूर्ण ज्ञान का प्रयास कोई छात्र क्यों करेगा? सभी विषयों का संपूर्ण ज्ञान आनंद के साथ कराने वाली शिक्षा न केवल संभव है अपितु इस देश में अनादि काल से 150-200 वर्ष पूर्व तक इस प्रकार की व्यवस्था विद्यमान रही है। इस भारतीय शिक्षा ने ही भारत को जगद्गुरु के रूप में प्रस्थापित किया। सदियों तक विश्व भर के हजारों छात्र जीवन की शिक्षा प्राप्त करने के लिए भारत आते रहे थे।
इतना ही नहीं, यह देश विज्ञान तथा तकनीकी मे सारे विश्व में सवार्ेत्तम रहा। इस शिक्षा पद्धति ने भारत को न केवल योग, धर्म तथा अध्यात्म के क्षेत्र में विश्व का सवार्ेत्तम देश बनाया था, बल्कि विश्व के सबसे समृद्ध राष्ट्र के रूप में ही प्रतिष्ठित किया। जब तक इस भूमि पर भारतीय शिक्षा फल-फूल रही थी, तब तक यह देश सारे विश्व में सबसे संपन्न राष्ट्र रहा। विश्वविख्यात अर्थशास्त्री आंगुस मेडिसन ने छह वर्ष के गहन अध्ययन के पश्चात 'विश्व का आर्थिक इतिहास' नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें वे लिखते हैं, ''ईसा के जन्म से लेकर 15वीं शताब्दी मध्य तक विश्व के सकल उत्पाद में भारत की हिस्सेदारी 66 प्रतिशत  रही है। उसके बाद चीन के उदय के कारण भारत का हिस्सा थोड़ा घटा किन्तु फिर भी अंग्रेजों द्वारा अपनी सत्ता और नीतियों को लागू करने से पूर्व अर्थात् 19वीं शताब्दी के प्रारंभ तक विश्व के सकल उत्पादन में भारत का हिस्सा 23 प्रतिशत तक रहा है। यह भी सिद्ध है कि 1823 तक इस देश में एक समृद्ध तथा सर्वव्यापी शिक्षा व्यवस्था विद्यामान थी।'' इन दोनांे बातों को एक साथ समझने से स्पष्ट होता है कि जब तक हमारी शिक्षा व्यवस्था समृद्ध रही, तब तक यह देश भी समृद्ध रहा। इसका तात्पर्य यह हुआ कि आज भी यदि देश को समृद्ध बनाना है तो हमंे पुन: भारत की शिक्षा व्यवस्था को अपनाना होगा।

-मुकुल कानिटकर
(लेखक भारतीय शिक्षण मंडल, नागपुर के सह संगठन मंत्री हैं) 

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