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गौरवपूर्ण अतीत चुनौतीपूर्ण भविष्य

Written byArchiveArchive
Aug 1, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 01 Aug 2016 14:29:41

 

 

 

अरुण तिवारी
मनुष्य की आवाज की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह दिखाई नहीं देती, सिर्फ सुनाई देती है। तो आकाशवाणी की खूबी है कि इसके  पास बोलियों, भाषाओं, गायन, वादन, शैली, संस्कृति और श्रोताओं की जितनी विविधता मौजूद है,उतनी दुनिया के किसी अन्य जनसंचार माध्यम के पास नहीं है। सैकङ़ों टेलीविजन चैनल और इंटरनेट पर मौजूद अथाह सामग्री के बावजूद अपनी खूबी के कारण आकाशवाणी आज भी लोगों के दिलों में बसी है। 80 वषोंर् में आकाशवाणी भारतीय इतिहास के अनेकानेक गौरवपूर्ण पलों, संघषोंर् और अश्रुपूरित विदाई अवसरों की साक्षी बनी रही है।
गौरवपूर्ण इतिहास
भोर होने से पूर्व ही जगाने वाली आकाशवाणी की संकेत धुन, वंदेमातरम्, रामचरितमानस,  से लेकर लोकसंगीत की कई लोकप्रिय श्रव्य लहरियां, सिबाका गीतमाला, हवामहल, लहरें, घर-आंगन, मनभावन, महफिल, विविधा और भारतवाणी जैसे अनेक मशहूर कार्यक्रम अपनी शानदार 'कमेंट्री' और आकाशवाणी रिपोर्ताज के लिए वर्ष 1963 में पद्मश्री से सम्मानित मेलविल डि मेलो, स्वाधीनता दिवस, गणतंत्र दिवस और मैच के मौकों पर अपनी जोशीली कमेंट्री के लिए पहले पद्मश्री और फिर पद्मभूषण से सम्मानित सरदार जसदेव सिंह और 'आवाज की दुनिया के मेरे दोस्तो' कहकर आकाशवाणी के लिए दोस्तों की एक बङ़ी दुनिया जोड़ने वाले अमीन सयानी आज भी भुलाये नहीं भूलते। मुझे याद है कि दिल्ली में 1978 की भयंकर बाढ़ के वक्त एकमात्र आकाशवाणी ही थी, जो पूरी जिम्मेदारी के साथ हमें हर आधे घंटे पर यमुना के जलस्तर के बारे में आगाह करती थी।
जिस आकाशवाणी के कर्मचारियों में 'अब आप देवकीनंदन पांडेय से समाचार सुनिए' कहने वाली वजनदार गंभीर आवाज, बीबीसी में नाम कमाने वाले परवेज आलम, प्रख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर, नामी तेलुगु कवि श्रीरंगम श्रीनिवास राव, बंाग्ला कवि अरविंद कृष्ण महरोत्रा, कवियित्री अमृता प्रीतम, नामी साहित्यकार अमृतलाल नागर, हाल में दिवंगत प्रख्यात लेखक मुद्राराक्षस से लेकर, सेवानिवृत हो चुके प्रख्यात कवि लक्ष्मीशंकर बाजपेई तक साहित्य और सृजन की दुनिया के अनेक नामी हस्ताक्षर तथा बुखारी व केसकर जैसे अधिकारी रहे हों, उस आकाशवाणी पर हम गर्व न करें, तो क्या करें?
महत्ता बरकरार
मन की बात कहने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आकाशवाणी को ही चुना। इससे साफ है कि आकाशवाणी बीते वक्त का कोई चुका हुआ माध्यम नहीं है। इससे यह आशा भी बलवती होती है कि यदि रेडियो पर जम आई धूल को झाङ़-पांेछकर नये रुतबे के साथ पेश किया जायेे, तो फिर से जनसंवाद का एक बेहतरीन और व्यापक माध्यम बन सकता है।
चुनौती
यूं आप कह सकते हैं कि आज सैकङ़ों टी.वी. चैनल हैं, निजी एफएम चैनल हैं, सामुदायिक रेडियो हैं, लाखों अखबार हैं, करोड़ों मोबाइल हैं। सामाजिक संवाद के लिए सोशल मीडिया है। जो सुनना चाहंे, जानना चाहें, देखना चाहें तो इंटरनेट पर तो पूरी दुनिया ही पसरी है। ऐसे में आज कोई आकाशवाणी को क्यों सुने ? मेरा मानना है, यही वह प्रश्न है जो आकाशवाणी के सामने एक बङ़ी चुनौती रखता है और उसके लिए संभावनाएं भी पेश करता है।
तकनीक और तंत्र में मौजूद संभावना
चुनौती है कि यह कैसे हो कि दुनिया आकाशवाणी को सुनना चाहे। सुकून की बात यह है कि अपने खचोंर् के लिए आकाशवाणी किसी विज्ञापन या प्रायोजक की ओर ताकने को मजबूर नहीं है। सरकार उसके बजट की व्यवस्था करती है। अत: आकाशवाणी लोकप्रसारक की अपनी उस भूमिका के साथ न्याय कर सकती है, जिसे बाजार के दबाव में जनसंचार के दूसरे माध्यम नहीं निभा पा रहे। तकनीकी और भाषायी तौर पर आज जितनी विविधता और पहुंच आकाशवाणी की है, उतनी सिर्फ भारत नहीं, पूरे एशिया के किसी जनसंचार माध्यम की नहीं है। दुनिया में कोई और रेडियो अथवा टी.वी. चैनल समूह नहीं है, जिसके पास कर्नाटक अथवा भारतीय शास्त्रीय संगीत व वाद्य वृंद प्रस्तुतियों के प्रति समर्पित कोई चैनल हो। इसे घर में सुनें या खेत की जुताई करते हुए बैल के गले में टांगकर। रेडियो किसी अनपढ़ को भी खेती के गुर सिखा सकता है, रेडियो किसी अंधे को पढ़ा सकता है। दोतरफा संवाद का जितना सुगम और सस्ता माध्यम रेडियो है, कोई और नहीं।
कितनी तैयार आकाशवाणी ?

इन चुनौतियों से निबटने के लिए आकाशवाणी ने अपने 80 वर्ष के सफरनामे में कई तैयारियां की हैं। 23 जुलाई, 1927 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने जब पहले केन्द्र के रूप में मुंबई केन्द्र का उद्घाटन किया, तो उद्देश्य अंग्रेजी हुकूमत के औपनिवेशिक हितों को साधना ही था। मुंबई केन्द्र संचालन का लाइसेंस भी एक करार के तहत् साझा हुई इंडियन ब्रॉडकॉस्टिंग कंपनी  और एक निजी कंपनी को दिया गया था। रेडियो क्लब, मुंबई के नाम से शुरू हुए प्रसारण का नाम 8 जून, 1936 को बदलकर 'ऑल इंडिया रेडियो' हुआ। जब भारत आजाद हुआ, तो आकाशवाणी के पास कुल छह केन्द्र, 18 ट्रांसमीटर और देश के ढाई फीसद भौगोलिक और 11 फीसद लोगों तक पहुंच थी। लेकिन आज इसका व्याप बहुत बड़ा हो गया है। लेह-तवांग जैसे सुदूर क्षेत्र, कठिन सीमायें और हमारे जाबांज सैनिक भी इस जद में शामिल हैं, जिन्हे आकाशवाणी के अलावा और कोई जनसंचार माध्यम बाकी दुनिया से नहीं जोड़ता। इसके कार्यक्रम 23 भाषाओं और 146 बोलियों में प्रसारित होते हैं। सात भारतीय और 16 विदेशी भाषाओं के साथ आकाशवाणी की विदेश प्रसारण सेवा, दुनिया के 54 देशों में अपनी पहुंच रखती है।
चयन प्रक्रिया बदले
निर्माण सहायक, संपादकीय सहायक, उद्घोषक तो लंबे अरसे से आकस्मिक आधार पर अनुबंधित किए जाते रहे हैं, अब कार्यक्रम निष्पादकों से लेकर सहायक महानिदेशक तक के पद अनुबंध के ठेले पर चल रहे हैं। ऊंचे-ऊंचे पदों पर एक-एक व्यक्ति के पास कई विभागों की जिम्मेदारी है। कह सकते हैं कि आकाशवाणी का पूरा तंत्र ही सुधार व रफ्तार की मांग करता है।
कलात्मक समर्पण हो चयन का आधार
लिहाजा जरूरी यह है कि कला के लिए समर्पण और रचनात्मकता को परखा जाये, बाद में कागजी ज्ञान को। बेहतर होगा कि किसी अन्य चयन आयोग की बजाय आकाशवाणी स्वयं का चयन आयोग बनाए। चयन सिर्फ सबसे छोटे कलात्मक व दफतरी पदों पर प्रशिक्षुओं के लिए खुला हो। सफल प्रशिक्षुओं की नियुक्ति हो और उन्हीं को पदोन्न्त कर आगे के संबंधित कलात्मक व प्रशासनिक पदों पर भेजने का प्रावधान हो। पर यह सब उम्दा मार्गदर्शन और निष्पक्षता के साथ कैसे हो, यह चुनौती तो रहेगी।
सरकार का भोंपू बनने से मिले मुक्ति
1990 में प्रसार भारती कानून बनाकर यह संभावना जताई गई थी कि दूरदर्शन और आकाशवाणी भविष्य में शासन की प्रतिच्छाया बनकर नहीं रहेंगे। लोकसेवक की अपनी भूमिका में संवाद के लिए सरकार के पास सुदूर इलाकों में पहुंच रखने वाले जनसंचार माध्यम के नाम पर आकाशवाणी और दूरदर्शन के सिवा और क्या है? क्या कोई और अथवा निजी तंत्र है, जो शासकीय योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई दे रहा हो? शासकीय वेबसाइट, पोर्टल व सरकारी पत्रिकायें हैं। उनकी पहुंच सीमित तो है ही, वैसे गरीबों और हाशिये पर जी रहे लोगों की आवाज की उपस्थिति उनमें भी नहीं है।
लिहाजा आकाशवाणी के सामने एक लोक प्रसारक के रूप में सरकार व लोगों के बीच डाकिये तथा लोक निगरानी तंत्र की भूमिका निभाने के साथ ही 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' के अपने सूत्र वाक्य का सिरा पकड़कर उसे अंजाम तक पहुंचांने की चुनौती है। आकाशवाणी फिर अपने उसी जादुई अंदाज में भारतवासियों के किले पर राज करें तो इसे उसकी 80 वर्षीय यात्रा का सुफल ही कहा जाएगा।

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