सावन में शिव साधना
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सावन में शिव साधना

Written byArchiveArchive
Aug 1, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 01 Aug 2016 13:56:35

'हर हर महादेव' और 'बम बम भोले' की गूंज से सावन के महीने में भक्ति की ऐसी अविरल धारा चारों तरफ दिखाई देती है जिसमें हमारे कष्टों का निवारण होता है, मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। कांवड़यात्री साघन की शुरुआत तप से करते है, फिर सत्संग में ज्ञान चर्चा ओर जलाभिषेक के साथ आनंद का उत्सव। या एक सम्पूर्ण कल्याण यात्रा है शरीर को मन और मन को समष्टि के विस्तार से जोड़ने की। हमारे सनातन धर्म में यह माह अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी माना गया है। यहां तक कि मांसाहार करने वाले लोग भी इस मास में मांस का परित्याग कर देते हैं।

अजय विद्युत
भरतीय पौराणिक मान्यताओं में भगवान शंकर की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ  दिन महाशिवरात्रि, उसके बाद सावन के महीने में पड़ने वाला प्रत्येक सोमवार, फिर हर महीने पड़ने वाली शिवरात्रि और सोमवार का अति महत्व है। लेकिन भगवान को सावन यानी श्रावण का महीना बेहद प्रिय है जिसमें वे अपने भक्तों पर अतिशय कृपा बरसाते हैं।
पहले एक छोटी-सी भ्रांति दूर कर लें फिर आगे बात करते हैं। हम कहते हैं कि संपूर्ण प्रकृति, संपूर्ण संसार शिवमय है। वह शिवमय नहीं, शिव ही है। शिव को हम भूतनाथ कहते हैं, और देवादिदेव भी। भूतनाथ का मतलब संसार पंचभूतों से बना है-पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि और आकाश। और इन पंच महाभूतों के नाथ हैं शिव। सो संपूर्ण संसार और प्रकृति का संरक्षण ही वास्तविक शिवभक्ति है। भक्त दूर-दूर से पवित्र जल लाकर शिव का अभिषेक करते हैं। जल समस्त जगत के प्राणियों में जीवन का संचार करता है। वह जल स्वयं उस परमात्मा शिव का रूप है। इसीलिए जल का अपव्यय नहीं वरन् उसका महत्व समझकर उसकी पूजा करनी चाहिए।
शिव भक्ति और हम
प्रकृति तो शिव की अर्द्धांगिनी है। अपनी लालसाओं और सुविधाओं के लिए हम उसका जरूरत से ज्यादा दोहन करने में संकोच नहीं करते। हमारी विलासी लिप्साओं के शिकार होकर पहाड़ खिसक रहे हैं, जंगल साफ हो रहे हैं, नदियां सूख रही हैं, पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है तो शिव प्रसन्न कैसे होंगे? इससे तो हम उनके क्रोध को भड़का रहे हैं जिसका हल्का-सा रौद्र रूप हमने केदार घाटी और अन्य स्थानों पर त्रासदी के रूप में देखा है। अब तो धरती भी चाहे जब कंपित होकर डोलने लगती है, लोगों की सांसें अटक जाती हैं। हर बार कितने ही लोग अकाल मौत के शिकार होकर भूकंपों की भेंट चढ़ जाते हैं।
शिव ने जिस प्रकृति और जीव-जगत की रक्षा के लिए विष पिया, हम जाने-अनजाने उसी को बरबाद कर रहे हैं। तो ऐसे में हमारी शिव-पूजा निरर्थक है। वह मात्र ढोंग है। इससे शिव प्रसन्न कैसे होंगे? शिव ने दूसरों की भलाई के लिए विष पिया, लेकिन हम अपनी भलाई के लिए रोज न जाने कितनों को विष के पीने को मजबूर कर देते हैं। हमारा मन और बुद्धि यदि दूसरों के प्रति कल्याणकारी और मंगलमय भावनाओं व कृत्यों से ओत-प्रोत न हों तो हम खुद कभी शिव की कृपा के पात्र नहीं बन सकते। हम अपने स्वार्थांे, सुविधाओं व इच्छाओं के वशीभूत प्रकृति, इनसान और अन्य जीवों के दुश्मन बने रहेंगे तो कभी सुखी नहीं होंगे और न ही शिव हमारा कल्याण करेंगे। ऐसी शिव-पूजा बेमानी है जिसमें हम शिव भक्त बन कर शंकर जी की पिंडी का तो अभिषेक करें लेकिन हमारे अंदर दूसरों के सुख-चैन के प्रति ईर्ष्या-द्वेष पलता रहे। शिवपुराण में उल्लेख है कि भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से उनके अभिषेक के रूप में आराधना का उत्तमोत्तम फल है जिसमें कोई संशय नहीं है।
संजीवनं समस्तस्य जगत: सलिलात्मकम्।
भव इत्युच्यते रूपं भवस्य परमात्मन:॥
पुराणों में यह भी कहा गया है कि सावन के महीने में सोमवार के दिन शिवजी को एक बिल्व पत्र चढ़ाने से तीन जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। इसलिए इन दिनों शिव की उपासना का बहुत महत्व है।
जल से ही धरती का ताप दूर होता है। जो भक्त, श्रद्धालु भगवान शिव को जल चढ़ाते हैं उनके रोग-शोक, दु:ख दारिद्रय सभी नष्ट हो जाते हैं। भगवान शंकर को महादेव इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वह देव, दानव, यक्ष, किन्नर, नाग, मनुष्य सभी द्वारा पूजे जाते हैं।
सावन और शिव
सावन के महीने में सबसे अधिक बारिश होती है जो शिव यानी प्रकृति (धरती) के तपते शरीर को ठंडक प्रदान करती है। भगवान शंकर ने स्वयं सनतकुमारों को सावन की महिमा बताते हुए कहा है कि मेरे तीनों नेत्रों में दाहिने सूर्य, बांये चंद्र और मध्य नेत्र अग्नि है। जब सूर्य कर्क राशि में गोचर करता है, तब सावन महीने की शुरुआत होती है। सूर्य गर्म है जो ऊष्मा देता है जबकि चंद्रमा ठंडा है जो शीतलता प्रदान करता है। इसलिए सूर्य के कर्क राशि में आने से झमाझम बारिश होती है। इससे लोक कल्याण के लिए विष को पीने वाले भोले को ठंडक व सुकून मिलता है। इसलिए शिव का सावन से इतना गहरा लगाव है।
सावन मास में शिव भक्ति का पुराणों में भी उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो विष निकला उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसी से उनका नाम नीलकंठ महादेव पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का खास महत्व है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

साधना और सावन
सावन और साधना के बीच चंचल और अति चलायमान मन की एकाग्रता एक अहम
कड़ी है, जिसके बिना परम तत्व की प्राप्ति असंभव है।
साधक की साधना जब शुरू होती है, तब मन एक विकराल बाधा बनकर खड़ा हो जाता है। उसे नियंत्रित करना सहज नहीं होता। लिहाजा मन को ही साधने में साधक को लंबा और धैर्यपूर्ण सफर तय करना होता है। इसीलिए कहा गया है कि मन ही मोक्ष और बंधन का कारण है। यानी मन से ही मुक्ति है और मन ही बंधन का कारण है। भगवान शंकर ने मस्तक में ही चंद्रमा को दृढ़ कर रखा है, इसीलिए साधक की साधना बिना किसी बाधा के पूर्ण होती है।
यजुर्वेद के एक मंत्र में मन को बड़ा ही प्रबल और चंचल कहा गया है। मन जड़ होते हुए भी सोते-जागते कभी भी चैन नहीं लेता। हम जितनी देर जागते रहते हैं, उतनी देर यह कुछ न कुछ सोचता हुआ भटकता रहता है। मन की इसी अस्थिर गति को थामने और दृढ़ करने के लिए भगवान शंकर हमें सावन जैसा मास प्रदान करते हैं।
इसी सावन में साधना हर बाधाओं को पार कर आगे बढ़ती है। सावन, सोमवार और भगवान शंकर की आराधना सर्वथा कल्याणकारी है जिसमें भक्त मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं।

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