भारतीय मजदूर संघ के स्वर्णिम सफर
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भारतीय मजदूर संघ के स्वर्णिम सफर

Written byArchiveArchive
Aug 1, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 01 Aug 2016 13:36:10

 

भारतीय मजदूर संघ के 60 वर्ष

– सूर्य प्रकाश सेमवाल
भारतीय मजदूर संघ की स्थापना 23 जुलाई, 1955 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के व्रती स्वयंसेवक श्री दत्तापंत ठेंगड़ी ने की थी। संयोग से स्वराज्य की अवधारणा को पुष्ट करने वाले और देश की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले एवं गीता रहस्य के उद्गाता बाल गंगाधर तिलक का जन्मदिन भी इसी दिन पड़ता है। भारतीय मजदूर संघ से जुड़े श्रमिकों की संख्या करोड़ों में है। देश के विभिन्न कार्यस्थलों, कारखानों, उत्पादन केन्द्रों आदि से जुड़े 6000 से अधिक संगठन भारतीय मजदूर संघ से संबद्ध हैं। भारतीय मजदूर संघ देश-विदेश में अपनी कार्यप्रणाली के बल पर स्वतंत्र पहचान रखता है। भा.म.स. की आधारभूमि राष्ट्रवाद है। अन्य मजदूर संगठन अंतरराष्ट्रीय मजदूर संगठनों और राजनीतिक दलों से जुड़े रहते हैं किन्तु यहां ऐसा नहीं है। भा.म.सं. का लक्ष्य ही यह है कि पूर्ण रोजगार के माध्यम से मानव शक्ति और संसाधनों का पूर्ण उपयोग कर अधिक से अधिक उत्पादन पर जोर दिया जाए। भा.म.सं. लाभजनित उद्देश्य के स्थान पर सेवाजनित उद्देश्य आदर्श आर्थिक लोकतांत्रिक वितरण प्रणाली में विश्वास रखता है। प्रत्येक विषय और मुद्दे पर अंदोलन का मार्ग लेकिन समाज और राष्ट्र की मर्यादा को प्राथमिकता देते हुए।
23 जुलाई को देशभर के लगभग 600 स्थानों पर भा.म.सं. ने अपने 61वें स्थापना दिवस पर बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए। संघ के शीर्ष पदाधिकारी एक ही दिन में 86 स्थानों पर कार्यक्रमों में शामिल हुए। इन कार्यक्रमों में 1000 से 1500 तक की संख्या में लोग मौजूद रहे। राष्ट्रीय संगठन महामंत्री श्री कृष्णचन्द्र मिश्रा ने भारी वर्षा के वावजूद ओडिशा में 15000 लोगों को और राष्ट्रीय महामंत्री श्री वृजेश उपाध्याय ने हैदराबाद में 10,00 प्रतिभागियों को संबोधित किया। इसी प्रकार राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बैजनाथ राय ने हरिद्वार में पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सी.के. सज्जिनारायण ने चेन्नै में, संयुक्त संगठनमंत्री श्री बी. सुरेन्द्र ने रांची में और उपाध्यक्ष श्री हिरण्यमय पांड्या ने जयपुर में बड़े कार्यक्रमों में भाग लिया। मुख्य कार्यक्रम हरिद्वार में हुआ जहां जूना पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने 'दत्तोपंत ठेंगड़ी जीवनदर्शन' ग्रंथ के पांचवें व छठे भाग का लोकार्पण किया। उन्होंने भा.म.संघ के कार्य को निर्धन से भी निर्धन को सशक्त बनाने वाला और भारत के सांस्कृतिक जागरण का प्रतीक बताया। स्वामी जी ने कहा कि मैंने चाणक्य को नहीं देखा था लेकिन ठेंगड़ी जी के रूप में आधुनिक चाणक्य देखा। अध्यक्ष श्री वैजनाथ राय ने भा.म.संघ के कायोंर् पर प्रकाश डाला तो पुस्तक के लेखक श्री अमरनाथ डोगरा व भा.म.सं. उत्तर क्षेत्र के संगठन मंत्री श्री पवन कुमार ने अपने विचार रखे। इन समारोहों की शुरुआत लगभग  एक करोड़ घरों में भा.म.सं. का ध्वज फहराने तथा देशभर में भा.म.स. 60 लाख पौधे लगाने के साथ हुई। 550 से भी अधिक जिला मुख्यालयों में साइकिल व स्कूटर यात्राओं के 30 कार्यक्रम हुए। भा.म.संघ ने इस वर्ष 300 से भी अधिक पुस्तकों को डिजिटल करने की योजना बनाई है जिनमें ठेंगड़ी जी की भी 100 पुस्तकें  शामिल हैं।
भारतीय मजदूर संघ के उत्तर क्षेत्र संगठन मंत्री श्री पवन कुमार के अनुसार देश में एक भी ऐसा जिला नहीं है जहां भारतीय मजदूर संघ का पंजीकृत संगठन नहीं है। लगभग 600 जिलों में हमारी पंजीकृत यूनियन हैं। बेशक अभी तक हमने दमन और दीव तथा सिक्किम में कार्य शुरू नहीं किया है। सिक्किम में किसी भी यूनियन के पंजीकृत न होने का कारण यह है कि राज्य में श्रमिक संगठनों के पंजीकरण का प्रावधान नहीं है लेकिन हम शीघ्र ही दमन और दीव में काम बढ़ाने की कोशिश में हैं।'
निश्चित रूप से किसी भी संगठन या संस्था की स्थापना करने वाले व्यक्तित्व से उसकी गुणवत्ता व महत्ता का पता चलता है। आजीवन प्रचारक रहे राजर्षि दत्तोपंत ठेंगड़ी बहुवस्तुस्पर्शिनी प्रतिभा के धनी थे। मुखर हिन्दूवादी, चिंतक, विद्वान व कुशल संगठनकर्ता ठेंगड़ी जी ने भा.म.सं. के बाद स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय किसान संघ जैसे संगठनों की भी स्थापना की थी। उन्होंने अपने विचारों, आचरण और व्यवहार से आजादी के बाद देश की सत्ता में बैठी कांग्रेस पार्टी के साथ बड़े प्रतिष्ठानों और संस्थानों तथा मजदूर संगठनों में घुसे वामपंथियों के वर्चस्व को न केवल चुनौती दी बल्कि एक कुशल संगठनकर्ता के नाते अपनी वैचारिक भूमि को उर्वरा बनाते हुए देश के लोकतांत्रिक ढांचे में राष्ट्रवादी विचारों से भावों का व्यावहारिक क्रियान्वयन करवाया। साधारण रहन-सहन, गहन अध्ययन व चिंतन, विचारों की सुस्पष्टता, अपूर्व धैर्य और ध्येय प्राप्ति के लिए समर्पण भाव वाले गुणों से सम्पन्न इस तेजस्वी व्यक्तित्व को भारतीय मजदूर संघ का पर्यायपुरुष मानने में विरोधियों को भी अतिशयोक्ति नहीं लगती। दत्तात्रेय बापूराव ठेंगड़ी इन्हीं गुणों के चलते दत्तोपंत ठेंगड़ी नाम से प्रसिद्ध हुए। एक कुशल वकील और दार्शनिक दत्तोपंत ठेंगड़ी भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय रहे और आजादी के बाद 1950-51 में इंटक के संगठन महामंत्री भी रहे। वे कुछ समय वामपंथियों द्वारा संचालित पोस्टल एण्ड रेलवे वर्कर्स यूनियन से भी संबद्ध रहे। रा.स्व.संघ के द्वितीय सरसंघचालक पूज्य श्रीगुरुजी के प्रभाव में आकर उन्होंने समाज व देश के सभी वर्गों तक राष्ट्रवाद की अलख जगाने के लिए जब जो संकल्प लिया, उससे पीछे मुड़कर नहीं देखा। ठेंगड़ी जी पं. दीनदयाल उपाध्याय और डॉ. भीमराव आंबेडकर से भी व्यक्तिगत रूप से प्रभावित रहे। संभवत: इसी कारण उनके व्यक्तित्व में बहुविध विशेषज्ञता और व्यवहार में तदनुरूप कार्यप्रणाली परिलक्षित होती थी। वे सामाजिक समरसता के पक्षधर थे। 1964 से 1976 तक दो बार राज्यसभा सांसद का कार्यकाल पूरा करने वाले और साथ ही 1968 से 70 तक राज्यसभा के उपसभापति जैसे प्रभावशाली पद पर रहने के बावजूद दत्तोपंत ठेंगड़ी जी कभी भी सामान्य व्यक्तियों से अलग और दूर नहीं रहे। यही कारण है कि राष्ट्रभक्ति के संस्कारों से ओतप्रोत और सहज सरल किंतु एक प्रभावी संगठनशिल्पी ठेंगड़ी जी ने जो पौधे रोपे वे सुफलदायी सिद्ध हुए। इसी कारण ठेंगड़ी जी जैसे समर्पित जीवट व्यक्तित्वों से प्रेरित और ऊर्जस्वित कार्यकर्ता भारतीय मजदूर संघ के 61वें वर्ष में प्रवेश करने पर भी इस संगठन को लगातार नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई पड़ते हैं।
-साथ में प्रमोद कुमार 

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