| दिंनाक: 01 Aug 2016 12:12:06 |
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नेपाल का राजशाही को छोड़ पूरी तरह लोकशाही की ओर बढ़ना हालांकि हाल की ही बात है परंतु इस संक्षिप्त यात्रा की लगातार डगमग बताती है कि देश अब तक नई व्यवस्था का अभ्यस्त नहीं हो सका है।
ताजा लड़खड़ाहट प्रधानमंत्री के.पी. ओली के त्यागपत्र से उपजी है। किन्तु ऐसी लड़खड़ाहट पहली बार नहीं दिखी है। गत आठ वर्ष में नौ प्रधानमंत्री देख चुका नेपाल आज उस मोड़ पर है जहां जनता की आकांक्षाओं के स्पष्ट राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अभाव है। राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता और नेपाली राजनेताओं के लिए अब बीते दिनों की बात है। कलह, प्रतिद्वंद्विता और कुर्सी की छीना-झपटी का यह लंबा और उबाऊ दौर है। ऐसे में राजनीति भी उस राह बढ़ चली है जहां आगे किए जा रहे चेहरों के पीछे छिपे हुए मंतव्य हैं।
खतरनाक बात यह है कि इन मंतव्यों ने नेपाल की सुख-शांति को सत्ता के दांव पर लगा दिया है। एक ओर भारत के साथ सहज सांस्कृतिक संबंधों की डोर से बंधी नेपाली जनाकांक्षाएं हैं तो दूसरी ओर चीन के सत्ता-खूंटे से बंधे राजनीतिक एजेंडे। वामपंथी राजनीति ने दोहरी चाल चली। नेपाली जनता को पहाड़ी-मैदानी, मधेशी-गोरखा के खांचों में बांटने वाली वामपंथी राजनीति ने एक राष्ट्र के भीतर क्षेत्रीय दुराव तो पैदा किए ही, भारत के मुकाबले चीन के साथ संबंधों के फायदे गिनाने की अव्यावहारिक कोशिश भी की। अव्यावहारिक इसलिए क्योंकि नेपाल का भूगोल और उससे बढ़कर सांस्कृतिक जुड़ाव भारत के साथ उसका गर्भनाल—सा संबंध बनाते हैं। भारत के लिए आज सबसे बड़ा प्रश्न ओली या प्रचंड नहीं हैं। सवाल यह है कि दोनों में कोई भी हो या रहे, किन्तु नेपाली राजनीति की मंशा और मिजाज भारत के लिए कैसे रहेंगे? क्या उन स्थितियों में सुधार आएगा जो पिछले कई सालों से खराब ही होती गई हैं?
ओली का भारत के मुकाबले चीन के प्रति झुकाव साफ रहा। मधेशी आंदोलन और इसके चलते भारत से नेपाल जाने वाले ट्रकों के सीमा पर अटक जाने के दौरान यह झुकाव और तल्खी सबने देखी भी थी। इसके बाद राष्ट्रपति विद्या भंडारी की यात्रा को टाल देना और भारत से अपने राजदूत दीप कुमार उपाध्याय को वापस बुलाने का काम करते हुए उन्होंने अपनी राजनीतिक सोच और स्पष्टता दुनिया के सामने रख भी दी।
दूसरी ओर सत्ता के नए केंद्र पुष्पकमल दहल 'प्रचंड' हैं। माओवाद और चीन के प्रति नजरिए को लेकर उनका रुझान एकदम साफ है। वे कुछ समय से भले पर्दे के पीछे रहे हों लेकिन उनकी सक्रियता कभी कम नहीं रही। बल्कि वामपंथी विचार (खासकर हिंसक क्रांति) को बढ़ाने में वे कइयों से आगे रहे हैं। दरअसल दो पालों में झूलती, परंतु चीन प्रेम की राह पर बढ़ती नेपाली राजनीति की इस उथल-पुथल को यहां वामपंथी राजनीति की फांकों और इनमें आपसी टकराहट के तौर पर समझना जरूरी है।
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत माओ- लेनिनवादी) के नेता के.पी. शर्मा ओली पर आत्मकेंद्रित और अहंकारी होने तथा सरकार पर प्रतिबद्धताएं पूरी करने का आरोप आखिर एक माओवादी पार्टी ने ही तो लगाया है! कड़वी किन्तु सबको साफ दिखने वाली बात यह है कि हिंसा और माओवादी आंदोलनों को नेपाली राजनीति के सुखद अध्याय का प्रारंभ बताने वाले गलत साबित हुए हैं। स्थापित राजनैतिक ढर्रे को छिन्न-भिन्न करने के बाद नेपाल में वामपंथी राजनीति किसी ठोस विकल्प के तौर पर स्थापित नहीं हो सकी है। जब प्रचंड की पार्टी, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) और नेपाली कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर हाथ मिलाए तो ओली का भविष्य तभी तय हो गया था। लेकिन जिस बात पर अब तक अनिश्चय है वह है नेपाली जनभावनाओं का राजनीति में सामंजस्य।
अनिश्चय कैसे समाप्त होगा? सामंजस्य कैसे होगा? वामपंथी राजनीति और हिंसक आंदोलनों ने नेपाल को दोहरा दर्द दिया है इसलिए यह काम ज्यादा मुश्किल है।