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''धांधली रोकेंगे, बिजली मिलेगी सबको''

Written byArchiveArchive
Jul 25, 2016, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 25 Jul 2016 15:30:43

 

आजादी मिले 70 साल हो चुके हैं पर अभी भी 18,000 से ज्यादा ऐसे गांव हैं जहां बिजली तो दूर की बात, बिजली का खंभा भी नहीं लगा है। राजग सरकार आने के बाद से यह तस्वीर बदली है। मंत्रालय ने अब तक करीब 7,000 गांवों में बिजली पहुंचाने में सफलता प्राप्त की है। ऊर्जा मंत्रालय ग्रामोदय से भारत उदय के पं.दीनदयाल उपाध्याय के स्वप्न को साकार करने में लगा है। प्रस्तुत हैं केंद्रीय विद्युत, कोयला और नई एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री श्री पीयूष गोयल से उनके जुड़े कामों पर पाञ्चजन्य के सहयोगी संपादक आलोक गोस्वामी एवं संवाददाता अश्वनी मिश्र की विस्तृत बातचीत के प्रमुख अंश:-

राजग सरकार के कार्यकाल के दो वर्ष पूरे हुए हैं। आपके मंत्रालय की इस दौरान क्या उपलब्धियां रहीं?

राजग सरकार बनने के बाद से एक बात साफ देखने में आई कि लोगों की सोच में परिवर्तन आया है। लोगों को लगने लगा है कि यह सरकार लंबे समय से चली आ रही लचर व्यवस्था में परिवर्तन ला सकती है। पहले एक कंपनी 6 लाख एलईडी बल्ब एक साल में बेचती थी लेकिन अब वही कंपनी 6 लाख बल्ब कुछ दिन में ही बेच देती है। बिजली से वंचित 7,108 गांवों में 2015-16 के दौरान बिजली पहुंचाई गई जो पहले के 3 सालों से 37 फीसद ज्यादा है। वहीं मौजूदा पारंपरिक ऊर्जा क्षमता में दो साल में पांचवें हिस्से (46,543 मेगावाट) की वृद्धि हुई है। साथ ही 2008-09 में बिजली के घाटे की दर जो 11.1 फीसद थी, वह घटकर 2015-16 में 2.1 फीसद हुई है।
ल्ल कोयला खदान आवंटन यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार का चरम दिखाता था। आपने प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए क्या प्रयास किए हैं?
पिछली सरकार में कोयले की खदानों के आवंटन में बेहद धांधली हुई थी। उससे देश को बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ था। लेकिन इस बार 74 कोयला खदानों की पारदर्शी नीलामी और आवंटन से सभी कोयलाधारी राज्यों को खदानों के जीवनकाल के दौरान 3.44 लाख करोड़ रुपये का संभावित लाभ हुआ, जो अपने आप में एक बड़ी बात है। साथ ही कोयले के उत्पादन में 2014-16 के दो वर्षों में कोल इंडिया द्वारा 7.4 करोड़ टन की आज तक की सर्वाधिक वृद्धि हुई है।

वैकल्पिक ऊर्जा में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के क्षेत्र मंे हम कितना आगे बढ़ पाए हैं?
सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भी हम काफी आगे बढ़े हैं। 2014 से सौर ऊर्जा क्षमता में 4,132 मेगावाट की 157 फीसद वृद्धि दर्ज की गई। पवन ऊर्जा क्षमता में भी 2015-16 में 3,423 मेगावाट का इजाफा हुआ है।

आजादी के 70 साल बाद, बहुत गांव हैं जहां बिजली नहीं पहुंची है। इस दिशा में मंत्रालय क्या प्रयास कर रहा है?
हमने इन गांवों को प्राथमिकता पर लेते हुए काम शुरू किया है क्योंकि प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त, 2015 को लाल किले की प्राचीर से आह्वान किया था कि 18,452 गांवों में बिजली के खंभे, तार और बिजली पहुंचाने का का लक्ष्य अगले 1 हजार दिन में हासिल कर लिया जाएगा। सबसे पहले तो हम बता दें कि दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत 2,800 के शुरुआती लक्ष्य की तुलना में हमने 2015-16 में 7,108 गांवों में बिजली पहुंचा दी है। यानी 40 फीसद गांव बिजली से जुड़ चुके हैं। लेकिन हां, अभी बहुत से ऐसे गांव हैं जहां बिजली की तारें ही नहीं पहुंची हैं तो जब तारें ही नहीं हैं तो बिजली आना तो दूर की बात। सबसे पहले हर गांव में बिजली की लाइन पहुंचाने की बात होनी चाहिए। हमने राज्यों के सहयोग से 18,452 गांवों को चिह्नित किया है, जहां आज तक बिजली पहुंची ही नहीं है। दूसरी बात ये सभी गांव राज्य सरकारों ने खुद चिह्नित किये हैं क्योंकि हमारे पास तो सीमित कर्मचारी हैं। हम राज्यों के दिए ब्योरों पर चल रहे हैं। केन्द्र के दूसरे कुछ काम होते हैं। जैसे, राज्यों को अनुदान देना, योजनाओं पर निगरानी करना, जो पिछले समय में बहुत ही कम हुआ। इसलिए हमने बहुत ही सख्ती के साथ इसकी निगरानी शुरू की है और जमीनी स्तर पर भी सूचनाओं का आदान-प्रदान शुरू किया है। हमने उनसे कहा है कि जिन भी गांवों में बिजली पहुंच रही है उनका पूरा रिकार्ड लो, फोटो लो ताकि कहीं कोई गड़बड़ी न होने पाए। इसके लिए हमने एक मोबाइल ऐप 'गर्व' (ँ३३स्र://ॅं१५.ॅङ्म५.्रल्ल) भी तैयार किया है, जो कहीं भी, किसी को भी इन चीजों की पूरी जानकारी देता है। आप खुद इस पर जाकर जानकारी पा सकते हैं कि किन-किन गांवों में बिजली पहुंच चुकी है। इस ऐप में आपको राज्यों की पूरी जानकारी मिलेगी कि किस राज्य में कितने गांवों में अभी बिजली नहीं पहुंची है। साथ ही गांव में बिजली के संबंध में क्या-क्या काम हुआ, कितने घरों में कनेक्शन दिए, कौन जिम्मेदार व्यक्ति है, और क्या-क्या उपकरण लगे। साथ ही उसकी तस्वीर भी दिखती है क्योंकि तस्वीर और वीडियो तो झूठ नहीं बोल सकते। इसलिए यह सभी कुछ हमने ऑनलाइन किया है ताकि पूरी तरह से चीजों में पारदर्शिता रहे। इससे होगा ये कि अगर कहीं हम गलत होते हैं तो हमें आईना देखने को मिलेगा और राज्य गलत होंगे तो जनता उनसे भी सवाल पूछेगी।

क्या पवन ऊर्जा का पूरा उपयोग हो पा रहा है?
हां, हम पवन ऊर्जा का पूरा उपयोग कर रहे हैं और नए क्षेत्रों पर भी गौर कर रहे हैं। फिलहाल इस क्षेत्र में भारत का विश्व में चौथा नंबर है। अगर हम सौर ऊर्जा को देखें तो सूर्य की किरणें सभी जगह पहुंचती हैं लेकिन पवन ऊर्जा के मामले में ऐसा नहीं है। जहां तेज हवा बहती हो, वहीं इसका उत्पादन होगा और हवा नहीं है तो उत्पादन नहीं होगा। सौर ऊर्जा का हमें थोड़ा सा पता रहता है कि दिन में सूर्य की रोशनी मिलेगी तो ही सौर ऊर्जा से बिजली का उत्पादन होगा और शाम को सूर्य के जाते ही यह काम खत्म। लेकिन हवा का तो पता ही नहीं होता कि कब बहेगी, कब तक रहेगी। यानी यहां पूरी तरह से अनिश्चितता है और इसका पूर्वानुमान लगा पाना भी बहुत ही मुश्किल है। इसके समाधान के लिए हम 'ग्रिड बैलेंसिंग पॉलिसी' लेकर आए हैं। दूसरी बात हमने समुद्र में हवा के संयंत्र लगाए हैं-'ऑफ शोर विंड पावर प्रोजेक्ट'। ऐसे दो संयंत्र लग रहे हैं। एक गुजरात के पास, दूसरा तमिलनाडु में। बहुत जल्द गुजरात वाले संयंत्र का काम पूरा होने का अनुमान है।

जब हम ऊर्जा की बात करते हैं तो आमतौर पर तीन चीजें हैं, जिनसे हम ऊर्जा बनाते हैं-कोयला, धूप और हवा। इनके अलावा भी कोई ऐसा क्षेत्र है, जहां हम ऊर्जा का निर्माण कर सकने में सक्षम हो सके हैं?
हां, जैसे प्राकृतिक गैस से उत्पन्न ऊर्जा की वृद्धि के लिए सरकार ने कई 'स्ट्राण्डेड' गैस आधारित बिजली उत्पादन संयंत्रों को पुनर्जीवित किया है। हम आयातित तरलीकृत प्राकृतिक गैस(एलएनजी) की नीलामी कर रहे हैं ताकि वे अपनी क्षमता को उपयोग करने में सक्षम हो सकें। इन संयंत्रों से दक्षिणी ग्रिड में बिजली की उपलब्धता में सुधार होगा। साथ ही हम बायोगैस और पन बिजली ऊर्जा को बढ़ावा दे रहे हैं।

 

राजग सरकार के कार्यकाल के दो वर्ष पूरे हुए हैं। आपके मंत्रालय की इस दौरान क्या उपलब्धियां रहीं?
राजग सरकार बनने के बाद से एक बात साफ देखने में आई कि लोगों की सोच में परिवर्तन आया है। लोगों को लगने लगा है कि यह सरकार लंबे समय से चली आ रही लचर व्यवस्था में परिवर्तन ला सकती है। पहले एक कंपनी 6 लाख एलईडी बल्ब एक साल में बेचती थी लेकिन अब वही कंपनी 6 लाख बल्ब कुछ दिन में ही बेच देती है। बिजली से वंचित 7,108 गांवों में 2015-16 के दौरान बिजली पहुंचाई गई जो पहले के 3 सालों से 37 फीसद ज्यादा है। वहीं मौजूदा पारंपरिक ऊर्जा क्षमता में दो साल में पांचवें हिस्से (46,543 मेगावाट) की वृद्धि हुई है। साथ ही 2008-09 में बिजली के घाटे की दर जो 11.1 फीसद थी, वह घटकर 2015-16 में 2.1 फीसद हुई है।

कोयला खदान आवंटन यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार का चरम दिखाता था। आपने प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए क्या प्रयास किए हैं?
पिछली सरकार में कोयले की खदानों के आवंटन में बेहद धांधली हुई थी। उससे देश को बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ था। लेकिन इस बार 74 कोयला खदानों की पारदर्शी नीलामी और आवंटन से सभी कोयलाधारी राज्यों को खदानों के जीवनकाल के दौरान 3.44 लाख करोड़ रुपये का संभावित लाभ हुआ, जो अपने आप में एक बड़ी बात है। साथ ही कोयले के उत्पादन में 2014-16 के दो वर्षों में कोल इंडिया द्वारा 7.4 करोड़ टन की आज तक की सर्वाधिक वृद्धि हुई है।

वैकल्पिक ऊर्जा में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के क्षेत्र मंे हम कितना आगे बढ़ पाए हैं?
सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भी हम काफी आगे बढ़े हैं। 2014 से सौर ऊर्जा क्षमता में 4,132 मेगावाट की 157 फीसद वृद्धि दर्ज की गई। पवन ऊर्जा क्षमता में भी 2015-16 में 3,423 मेगावाट का इजाफा हुआ है।

आजादी के 70 साल बाद, बहुत गांव हैं जहां बिजली नहीं पहुंची है। इस दिशा में मंत्रालय क्या प्रयास कर रहा है?
हमने इन गांवों को प्राथमिकता पर लेते हुए काम शुरू किया है क्योंकि प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त, 2015 को लाल किले की प्राचीर से आह्वान किया था कि 18,452 गांवों में बिजली के खंभे, तार और बिजली पहुंचाने का का लक्ष्य अगले 1 हजार दिन में हासिल कर लिया जाएगा। सबसे पहले तो हम बता दें कि दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत 2,800 के शुरुआती लक्ष्य की तुलना में हमने 2015-16 में 7,108 गांवों में बिजली पहुंचा दी है। यानी 40 फीसद गांव बिजली से जुड़ चुके हैं। लेकिन हां, अभी बहुत से ऐसे गांव हैं जहां बिजली की तारें ही नहीं पहुंची हैं तो जब तारें ही नहीं हैं तो बिजली आना तो दूर की बात। सबसे पहले हर गांव में बिजली की लाइन पहुंचाने की बात होनी चाहिए। हमने राज्यों के सहयोग से 18,452 गांवों को चिह्नित किया है, जहां आज तक बिजली पहुंची ही नहीं है। दूसरी बात ये सभी गांव राज्य सरकारों ने खुद चिह्नित किये हैं क्योंकि हमारे पास तो सीमित कर्मचारी हैं। हम राज्यों के दिए ब्योरों पर चल रहे हैं। केन्द्र के दूसरे कुछ काम होते हैं। जैसे, राज्यों को अनुदान देना, योजनाओं पर निगरानी करना, जो पिछले समय में बहुत ही कम हुआ। इसलिए हमने बहुत ही सख्ती के साथ इसकी निगरानी शुरू की है और जमीनी स्तर पर भी सूचनाओं का आदान-प्रदान शुरू किया है। हमने उनसे कहा है कि जिन भी गांवों में बिजली पहुंच रही है उनका पूरा रिकार्ड लो, फोटो लो ताकि कहीं कोई गड़बड़ी न होने पाए। इसके लिए हमने एक मोबाइल ऐप 'गर्व' (ँ३३स्र://ॅं१५.ॅङ्म५.्रल्ल) भी तैयार किया है, जो कहीं भी, किसी को भी इन चीजों की पूरी जानकारी देता है। आप खुद इस पर जाकर जानकारी पा सकते हैं कि किन-किन गांवों में बिजली पहुंच चुकी है। इस ऐप में आपको राज्यों की पूरी जानकारी मिलेगी कि किस राज्य में कितने गांवों में अभी बिजली नहीं पहुंची है। साथ ही गांव में बिजली के संबंध में क्या-क्या काम हुआ, कितने घरों में कनेक्शन दिए, कौन जिम्मेदार व्यक्ति है, और क्या-क्या उपकरण लगे। साथ ही उसकी तस्वीर भी दिखती है क्योंकि तस्वीर और वीडियो तो झूठ नहीं बोल सकते। इसलिए यह सभी कुछ हमने ऑनलाइन किया है ताकि पूरी तरह से चीजों में पारदर्शिता रहे। इससे होगा ये कि अगर कहीं हम गलत होते हैं तो हमें आईना देखने को मिलेगा और राज्य गलत होंगे तो जनता उनसे भी सवाल पूछेगी।

क्या पवन ऊर्जा का पूरा उपयोग हो पा रहा है?
हां, हम पवन ऊर्जा का पूरा उपयोग कर रहे हैं और नए क्षेत्रों पर भी गौर कर रहे हैं। फिलहाल इस क्षेत्र में भारत का विश्व में चौथा नंबर है। अगर हम सौर ऊर्जा को देखें तो सूर्य की किरणें सभी जगह पहुंचती हैं लेकिन पवन ऊर्जा के मामले में ऐसा नहीं है। जहां तेज हवा बहती हो, वहीं इसका उत्पादन होगा और हवा नहीं है तो उत्पादन नहीं होगा। सौर ऊर्जा का हमें थोड़ा सा पता रहता है कि दिन में सूर्य की रोशनी मिलेगी तो ही सौर ऊर्जा से बिजली का उत्पादन होगा और शाम को सूर्य के जाते ही यह काम खत्म। लेकिन हवा का तो पता ही नहीं होता कि कब बहेगी, कब तक रहेगी। यानी यहां पूरी तरह से अनिश्चितता है और इसका पूर्वानुमान लगा पाना भी बहुत ही मुश्किल है। इसके समाधान के लिए हम 'ग्रिड बैलेंसिंग पॉलिसी' लेकर आए हैं। दूसरी बात हमने समुद्र में हवा के संयंत्र लगाए हैं-'ऑफ शोर विंड पावर प्रोजेक्ट'। ऐसे दो संयंत्र लग रहे हैं। एक गुजरात के पास, दूसरा तमिलनाडु में। बहुत जल्द गुजरात वाले संयंत्र का काम पूरा होने का अनुमान है।

जब हम ऊर्जा की बात करते हैं तो आमतौर पर तीन चीजें हैं, जिनसे हम ऊर्जा बनाते हैं-कोयला, धूप और हवा। इनके अलावा भी कोई ऐसा क्षेत्र है, जहां हम ऊर्जा का निर्माण कर सकने में सक्षम हो सके हैं?
हां, जैसे प्राकृतिक गैस से उत्पन्न ऊर्जा की वृद्धि के लिए सरकार ने कई 'स्ट्राण्डेड' गैस आधारित बिजली उत्पादन संयंत्रों को पुनर्जीवित किया है। हम आयातित तरलीकृत प्राकृतिक गैस(एलएनजी) की नीलामी कर रहे हैं ताकि वे अपनी क्षमता को उपयोग करने में सक्षम हो सकें। इन संयंत्रों से दक्षिणी ग्रिड में बिजली की उपलब्धता में सुधार होगा। साथ ही हम बायोगैस और पन बिजली ऊर्जा को बढ़ावा दे रहे हैं।

  राजग सरकार के कार्यकाल के दो वर्ष पूरे हुए हैं। आपके मंत्रालय की इस दौरान क्या उपलब्धियां रहीं?
 राजग सरकार बनने के बाद से एक बात साफ देखने में आई कि लोगों की सोच में परिवर्तन आया है। लोगों को लगने लगा है कि यह सरकार लंबे समय से चली आ रही लचर व्यवस्था में परिवर्तन ला सकती है। पहले एक कंपनी 6 लाख एलईडी बल्ब एक साल में बेचती थी लेकिन अब वही कंपनी 6 लाख बल्ब कुछ दिन में ही बेच देती है। बिजली से वंचित 7,108 गांवों में 2015-16 के दौरान बिजली पहुंचाई गई जो पहले के 3 सालों से 37 फीसद ज्यादा है। वहीं मौजूदा पारंपरिक ऊर्जा क्षमता में दो साल में पांचवें हस्सिे (46,543 मेगावाट) की वृद्धि हुई है। साथ ही 2008-09 में बिजली के घाटे की दर जो 11.1 फीसद थी, वह घटकर 2015-16 में 2.1 फीसद हुई है।
ल्ल    कोयला खदान आवंटन यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार का चरम दिखाता था। आपने प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए क्या प्रयास किए हैं?
  पिछली सरकार में कोयले की खदानों के आवंटन में बेहद धांधली हुई थी। उससे देश को बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ था। लेकिन इस बार 74 कोयला खदानों की पारदर्शी नीलामी और आवंटन से सभी कोयलाधारी राज्यों को खदानों के जीवनकाल के दौरान 3.44 लाख करोड़ रुपये का संभावित लाभ हुआ, जो अपने आप में एक बड़ी बात है। साथ ही कोयले के उत्पादन में 2014-16 के दो वर्षों में कोल इंडिया द्वारा 7.4 करोड़ टन की आज तक की सर्वाधिक वृद्धि हुई है।
ल्ल    वैकल्पिक ऊर्जा में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के क्षेत्र मंे हम कितना आगे बढ़ पाए हैं?
सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भी हम काफी आगे बढ़े हैं। 2014 से सौर ऊर्जा क्षमता में 4,132 मेगावाट की 157 फीसद वृद्धि दर्ज की गई। पवन ऊर्जा क्षमता में भी 2015-16 में 3,423 मेगावाट का इजाफा हुआ है।
ल्ल    आजादी के 70 साल बाद, बहुत गांव हैं जहां बिजली नहीं पहुंची है। इस दिशा में मंत्रालय क्या प्रयास कर रहा है?
हमने इन गांवों को प्राथमिकता पर लेते हुए काम शुरू किया है क्योंकि प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त, 2015 को लाल किले की प्राचीर से आह्वान किया था कि 18,452 गांवों में बिजली के खंभे, तार और बिजली पहुंचाने का का लक्ष्य अगले 1 हजार दिन में हासिल कर लिया जाएगा। सबसे पहले तो हम बता दें कि दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत 2,800 के शुरुआती लक्ष्य की तुलना में हमने 2015-16 में 7,108 गांवों में बिजली पहुंचा दी है। यानी 40 फीसद गांव बिजली से जुड़ चुके हैं। लेकिन हां, अभी बहुत से ऐसे गांव हैं जहां बिजली की तारें ही नहीं पहुंची हैं तो जब तारें ही नहीं हैं तो बिजली आना तो दूर की बात। सबसे पहले हर गांव में बिजली की लाइन पहुंचाने की बात होनी चाहिए। हमने राज्यों के सहयोग से 18,452 गांवों को चह्निति किया है, जहां आज तक बिजली पहुंची ही नहीं है। दूसरी बात ये सभी गांव राज्य सरकारों ने खुद चह्निति किये हैं क्योंकि हमारे पास तो सीमित कर्मचारी हैं। हम राज्यों के दिए ब्योरों पर चल रहे हैं। केन्द्र के दूसरे कुछ काम होते हैं। जैसे, राज्यों को अनुदान देना, योजनाओं पर निगरानी करना, जो पिछले समय में बहुत ही कम हुआ। इसलिए हमने बहुत ही सख्ती के साथ इसकी निगरानी शुरू की है और जमीनी स्तर पर भी सूचनाओं का आदान-प्रदान शुरू किया है। हमने उनसे कहा है कि जिन भी गांवों में बिजली पहुंच रही है उनका पूरा रिकार्ड लो, फोटो लो ताकि कहीं कोई गड़बड़ी न होने पाए। इसके लिए हमने एक मोबाइल ऐप 'गर्व' (ँ३३स्र://ॅं१५.ॅङ्म५.्रल्ल) भी तैयार किया है, जो कहीं भी, किसी को भी इन चीजों की पूरी जानकारी देता है। आप खुद इस पर जाकर जानकारी पा सकते हैं कि किन-किन गांवों में बिजली पहुंच चुकी है। इस ऐप में आपको राज्यों की पूरी जानकारी मिलेगी कि किस राज्य में कितने गांवों में अभी बिजली नहीं पहुंची है। साथ ही गांव में बिजली के संबंध में क्या-क्या काम हुआ, कितने घरों में कनेक्शन दिए, कौन जम्मिेदार व्यक्ति है, और क्या-क्या उपकरण लगे। साथ ही उसकी तस्वीर भी दिखती है क्योंकि तस्वीर और वीडियो तो झूठ नहीं बोल सकते। इसलिए यह सभी कुछ हमने ऑनलाइन किया है ताकि पूरी तरह से चीजों में पारदर्शिता रहे। इससे होगा ये कि अगर कहीं हम गलत होते हैं तो हमें आईना देखने को मिलेगा और राज्य गलत होंगे तो जनता उनसे भी सवाल पूछेगी।

    क्या पवन ऊर्जा का पूरा उपयोग हो पा रहा है?
हां, हम पवन ऊर्जा का पूरा उपयोग कर रहे हैं और नए क्षेत्रों पर भी गौर कर रहे हैं। फिलहाल इस क्षेत्र में भारत का वश्वि में चौथा नंबर है। अगर हम सौर ऊर्जा को देखें तो सूर्य की किरणें सभी जगह पहुंचती हैं लेकिन पवन ऊर्जा के मामले में ऐसा नहीं है। जहां तेज हवा बहती हो, वहीं इसका उत्पादन होगा और हवा नहीं है तो उत्पादन नहीं होगा। सौर ऊर्जा का हमें थोड़ा सा पता रहता है कि दिन में सूर्य की रोशनी मिलेगी तो ही सौर ऊर्जा से बिजली का उत्पादन होगा और शाम को सूर्य के जाते ही यह काम खत्म। लेकिन हवा का तो पता ही नहीं होता कि  कब बहेगी, कब तक रहेगी। यानी यहां पूरी तरह से अनश्चितिता है और इसका पूर्वानुमान लगा पाना भी बहुत ही मुश्किल है। इसके समाधान के लिए हम 'ग्रिड बैलेंसिंग पॉलिसी' लेकर आए हैं। दूसरी बात हमने समुद्र में हवा के संयंत्र लगाए हैं-'ऑफ शोर विंड पावर प्रोजेक्ट'। ऐसे दो संयंत्र लग रहे हैं। एक गुजरात के पास, दूसरा तमिलनाडु में। बहुत जल्द गुजरात वाले संयंत्र का काम पूरा होने का अनुमान है।

    जब हम ऊर्जा की बात करते हैं तो आमतौर पर तीन चीजें हैं, जिनसे हम ऊर्जा बनाते हैं-कोयला, धूप और हवा। इनके अलावा भी कोई ऐसा क्षेत्र है, जहां हम ऊर्जा का नर्मिाण कर सकने में सक्षम हो सके हैं?
हां, जैसे प्राकृतिक गैस से उत्पन्न ऊर्जा की वृद्धि के लिए सरकार ने कई 'स्ट्राण्डेड' गैस आधारित बिजली उत्पादन संयंत्रों को पुनर्जीवित किया है। हम आयातित तरलीकृत प्राकृतिक गैस(एलएनजी)  की नीलामी कर रहे हैं ताकि वे अपनी क्षमता को उपयोग करने में सक्षम हो सकें। इन संयंत्रों से दक्षिणी ग्रिड में बिजली की उपलब्धता में सुधार होगा। साथ ही हम बायोगैस और पन बिजली ऊर्जा को बढ़ावा दे रहे हैं।  
 

    कचरे से भी ऊर्जा बनाने की बात आई। क्या इस पर कोई काम आगे बढ़ा है, कुछ शोध हो रहे हंै?
पहले सौर ऊर्जा की कीमत ज्यादा थी पर अब कम हो गई है। यही हाल कचरे और बेकार चीजों से ऊर्जा उत्पादन का है। पहले यह भी अधिक खर्चीली होगी और अगर कोई कंपनी संयंत्र लगाये और उसकी ऊर्जा बिके नहीं तो उसका नुकसान होगा और वह कंपनी बंद हो जाएगी। तो हमने कहा कि कचरा भी शहर से आना है और बिजली भी शहर को देनी है। हमने निर्धारित किया कि जो शहर की बिजली कंपनियां हैं उनके द्वारा जो कूड़े-कचरे से ऊर्जा उत्पन्न होगी। उसे एक तय कीमत पर बेेचंे। इससे कूड़े-कचरे से ऊर्जा बनाने वाले संयंत्रों को बल मिल गया कि हमारी बिजली बिक सकेगी और हमें खरीदार भी मिल जाएगा। दूसरा मुद्दा आया कि इन संयंत्रों में पानी की बहुत ही खपत होती है। हमने कहा कि जो सीवेज का पानी है। उस पानी को शोधित करके उसे प्रयोग करें। इससे यह होगा कि जो शहर का गंदा पानी है वह यहां शोधित हो जाएगा, अच्छे पानी का प्रयोग होना बंद हो जायेगा। साथ ही जो गंदा पानी यहां से शोधित होगा वह जिस नदी में मिलेगा उसे भी नुकसान नहीं होगा।

    आपके मंत्रालय ने कुछ एप्स लांच किये हैं जिनकी काफी चर्चा है। उनके बारे में कुछ बताएं?
सबसे पहले तो मैं यह बताना चाहूंगा कि इन एप्स का एक ही उद्देश्य है-अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता। जैसे ग्रामीण विद्युतीकरण को ट्रैक करने के लिए गर्व (ॅं१५.ॅङ्म५.्रल्ल)  एप्लिकेशन। वास्तविक समय में बिजली की कीमत और उपलब्धता की निगरानी के लिए विद्युत प्रवाह (६६६.५्रि८४३स्र१ं५ंँ.्रल्ल)।एप। ठीक ऐसी ही एलईडी वितरण की निगरानी के लिए उजाला (६६६.४्नं'ं.ॅङ्म५.्रल्ल)।एप। हमारा आग्रह है कि 09220036666 पर मिस्ड काल देकर हमारे सभी एप डाउनलोड करें। रही बात गांवों में बिजली पहुंचाने की तो जैसा कि प्रधानमंत्री जी का आह्वान था कि 1000 दिन तक में सभी गांवों में बिजली पहुंचानी है।  यह लक्ष्य अगस्त, 2014 में निर्धारित हुआ था और मई, 2018 तक इसको पूरा करना है। लेकिन जिस गति से हमारा काम चला है, उससे यही लगता है कि मई,2017 तक सभी गांव बिजली से जगमगा उठेंगे। लेकिन उसके बाद भी ऐसे कई घर हैं जहां गांव में तो बिजली आ गई है लेकिन घर में बिजली नहीं है। यहां तक शहरों में भी ऐसे कुछ घर हैं जिन्हें कनेक्शन नहीं मिला है। इसलिए हमारा प्रयास है कि हर घर में बिजली पहुंचाएं। इसके लिए हमने अभी हाल ही में गोवा में सभी राज्यों के ऊर्जा मंत्रियों के साथ बैठक की और उसमें बातचीत हुई कि 2018 तक सभी घरों में बिजली पहुंचा दी जाए। हमने राज्यों से पूर्ण सहयोग की बात की है। हमारी कोशिश है कि राज्य सरकारें भी इसमें पूरे मनोयोग से खड़ी हों और हर गांव में बिजली पहुंचाने के लिए कार्य करें।

    केन्द्र सरकार कहती है, गांवों तक में 24 घंटे बिजली आएगी। लेकिन उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश के  शहरी इलाकों  में ही बिजली रोजाना 4 से 5 घंटे के लिए जाती ही है। ऐसे में केन्द्र के वादे का क्या?
पहले राज्य और केन्द्र एक दूसरे पर काम न होने का ठीकरा फोड़ते रहते थे कि ये काम राज्य ने नहीं किया और राज्य केन्द्र के बारे में ऐसी बात कहता रहता था। अब हमने बिलकुल स्पष्ट रूप से निर्धारित कर दिया है कि क्या-क्या काम केन्द्र करता है और क्या-क्या राज्य। अभी जैसे कोयले की आपूर्ति हमारा काम है, क्योंकि कोल इंडिया भारत सरकार के अधीन कार्य करती है। इसलिए अगर कोयला नहीं बना तो हमारी गलती है। यानी केन्द्र के अधीन जो भी काम हैं अगर वे नहीं हो पा रहे हैं तो हमारी गलती है। लेकिन अगर राज्य के पास ऊर्जा की उपलब्धता है और बाजार में सस्ती बिजली भी है। अब राज्य ये बिजली नहीं खरीद रहा तो इसमेें केन्द्र की गलती नहीं है, राज्य की गलती है। हमारा विद्युत प्रवाह एप (६६६.५्रि८४३स्र१ं५ंँ.्रल्ल) यही दिखाता है कि राज्य में कितनी ऊर्जा की उपलब्धता और किस कीमत पर है। हमारे पास बिजली पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है लेकिन कोई राज्य न खरीदे, अपने नागरिकों को परेशान रखना चाहे तो इसमें केन्द्र की नहीं, राज्य सरकार की गलती है। हम नागरिकों को यही बात समझाना चाहते हैं। मीडिया को इसके बारे में आम नागरिकों को बताना होगा।

    लेकिन आम आदमी तो बिजली न आने पर केन्द्र सरकार को जिम्मेदार मानता है।
हां, यह समस्या तो जरूर है। हमने एप्स इसीलिए शुरू किये हैं ताकि लोग जान सकें कि केन्द्र क्या काम कर रहा है और राज्य सरकार क्या कर रही है। जैसे हमारे पास उत्तर प्रदेश के लिए उसके हिस्से की बिजली है लेकिन फिर भी वह केन्द्र से बिजली नहीं खरीदता। कुछ राज्यों को छोड़ दें तो सभी अपनी जरूरत के अनुरूप बिजली खरीदते हैं। बस समस्या बिहार और उत्तर प्रदेश की है। देखिए, एक चीज को बड़े स्पष्ट रूप से समझने की जरूरत है कि बिजली  वितरण राज्य का विषय है और राज्य सरकार ही तय करती है कि कहां कितनी बिजली देनी है।  इसमें होना यह चाहिए कि दोनों
ओर से दबाव होना चाहिए। साथ ही मीडिया को भी इसमें लोगों को जागरूक करना होगा। तो उदय का कार्य यही है कि राज्य अपने कार्य में विश्वसनीयता लाएं और जो संवैधानिक तरीके हैं, उनके अनुसार चलते हुए कार्य करें।

    भविष्य की क्या योजानाएं हैं?
एक तो उदय को लागू करना। दूसरा, पवन ऊर्जा पर अधिक से अधिक काम करना और इसे विकसित करना। तीसरा, हाइड्रो के क्षेत्र में काम करना है। अभी इस दिशा में बहुत ज्यादा काम नहीं हुआ है। वहीं बायोगैस, बायोमास जैसे और भी क्षेत्र हैं जहां हम कार्य कर रहे हैं। साथ ही हम प्रधानमंत्री जी का सपना-24 घंटे सस्ती बिजली-पूर्ण करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

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