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गुवाहाटी में हुए 12वें दक्षिण एशियाई खेलों में वैसे तो भारत की महिला-पुरुष दोनों ही टीमों ने खो-खो में सोने पर कब्जा जमाया। लेकिन खास उपलब्धि थी देश की महिला खो-खो टीम की जिसमें अधिकतर खिलाड़ी साधारण परिवार की लड़कियां हैं जिन्होंने स्वर्ण पदक जीतकर अपने परिवार के साथ-साथ देश का भी नाम रोशन कर दिया। पहली बार में ही किसी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में स्वर्ण जीतने की खुशी इन लड़कियों के चेहरे पर देखते ही बनती है।
दक्षिण दिल्ली में बदरपुर का मथुरा रोड, जहां सिब्बल सिनेमा के साथ वाली गली में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय महिला खो-खो टीम की उप-कप्तान 18 वर्षीय परवीन निशा के बड़े-बड़े होर्डिंग लगे हुए हैं। बदरपुर के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय नंबर-3 में पढ़ने वाली छात्रा परवीन को कल तक कोई नहीं जानता था, लेकिन आज देश का नाम रोशन करने पर इलाके में रहने वालों की जुबान पर वह चर्चा का विषय बनी हुई है। एकाएक किसी को विश्वास नहीं हो रहा कि छोटी-सी गली में किराये के मकान में रहने वाली यह लड़की स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम की सदस्य है। दिल्ली सरकार में खेल विभाग की उप-शिक्षा निदेशक आशा अग्रवाल कहती हैं, ''साधारण घर की यह लड़की उस जैसे दूसरे युवाओं के लिए मिसाल बन गई है।'' निशा माता-पिता और छह बहनों, दो भाइयों के साथ रहती हैं। परिवार की सीमित आय के बावजूद उसने अपने बेहतर प्रदर्शन से उत्तर भारत से भारतीय टीम की अकेली सदस्य होने का गौरव प्राप्त किया है। किराये के मकान में रहने वाली निशा के घर जब 'पाञ्चजन्य' पहंुचा तो आठ बाई दस के दो कमरों में किसी तरह गुजर करने वाले परिवार के सदस्यों की संख्या देखकर आश्चर्य हुआ कि परिवार आखिर किस तरह उस छोटी-सी जगह में रहता होगा लेकिन भारतीय टीम की जीत की चमक से कौंध रही निशा की गर्वीली मुस्कान के सामने सबकुछ फीका था। निशा का उत्साह देखते ही बनता था। भारतीय खो-खो टीम की डे्रस और गले में मैडल को चूमती निशा बताती हैं कि उनकी दो बड़ी बहनें भी खो-खो की खिलाड़ी रही हैं। निशा को इस खेल की प्रेरणा उन्हीं से मिली। वे कहती हैं, ''बदरपुर खो-खो सेंटर पर मुझे कक्षा की साथियों के साथ कोच सुमित भाटिया ने देखा था और तभी उन्होंने पूछा था कि क्या तुम खो-खो में दिलचस्पी रखती हो। तभी से मैं खो-खो की रेगुलर प्रैक्टिस करने लगी। इसके बाद जोन, इंटर जोन और स्टेट के बाद नेशनल टीम की सदस्य चुनी गई।'' निशा के पिता मो. जुम्मन बदरपुर में ही बिरयानी बेचकर मुश्किल से पूरे दिन में 200 रुपए कमा पाते हैं। बेटी की सफलता पर वे फूले नहीं समा रहे हैं, ''आज निशा ने बेटी होकर भी एक बेटे का फर्ज अदा कर दिया। मेरे जीवन में इससे बड़ी खुशी की बात नहीं हो सकती। मैं बेटी को पढ़ाने में कोई कसर बाकी नहीं छोडूंगा।'' खो-खो फेडरेशन ऑफ इंडिया के महासचिव सुरेश शर्मा कहते हैं कि पुरुष और महिला टीम को मिली जीत का श्रेय खिलाडि़यों, उनके कोच और टीम मैनेजर को जाता है।
पश्चिम बंगाल के हुगली की दीपिका चौधरी भी साधारण परिवार से संबंध रखती हैं। इनके पिता मजदूरी करते हैं जबकि मां दूसरों के घरों का कामकाज करती हैं। दीपिका ने अपने भाई को खो-खो खेलते देखा तो उनमें भी इस खेल की ललक जग गई। आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होने पर भी दीपिका ने मेहनत के बल पर अपनी पहचान कायम की। वे कहती हैं, ''मुझे खुशी है कि खो-खो टीम में भारत की ओर से खेलने का मौका मिला। भारतीय टीम की जीत और स्वर्ण पदक पाने का अपना अलग सुख है।'' दीपिका के पिता रंजन चौधरी कहते हैं, ''मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन बेटी भारतीय टीम में शामिल होकर स्वर्ण पदक जीतेगी। दीपिका का पिता होने से मुझे पहचान मिली, और मेरा सम्मान बढ़ा है।'' दीपिका कहती हैं कि उनके माता-पिता ने उन्हें खेलने से कभी नहीं रोका। अभी वे श्रीगोपाल बनर्जी कॉलेज से फिजिकल एजुकेशन द्वितीय वर्ष की पढ़ाई कर रही हैं और कहती हैं कि ''आगे भी खेल में बेहतर प्रदर्शन कर देश और परिवार का नाम ऊंचा करूंगी। मेरा सपना है कि सरकारी नौकरी पाकर अपने परिवार की जिम्मेदारी संभाल सकूं।''
छत्तीसगढ़ के भिलाई की यशोदा साहू भी भारतीय महिला खो-खो टीम की सदस्य हैं, और बीपीएड कर रही हैं। माता-पिता के साथ उनके परिवार में चार बहनें भी हैं। पिता घनाराम साहू भिलाई स्टील प्लांट में क्रेन ऑपरेटर हैं। यशोदा बताती हैं कि पांचवीं कक्षा में पढ़ने के समय से ही वे खो-खो खेल रही हैं। स्कूल में पीटीआई (अब नहीं रहे) निर्मलकरजी को वे अपना प्रेरणास्रोत मानती हैं जिनके कारण आज वे भारतीय टीम तक पहंुच पाईं। यशोदा 15 बार राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा ले चुकी हैं। 2010 में दाएं पांव के घुटने की सर्जरी होने पर दो वर्ष तक वे खो-खो से दूर रहीं और स्वस्थ होने पर फिर खेल में वापसी की। महाराष्ट्र के सोलापुर में आयोजित 49वें सीनियर नेशनल खो-खो टूर्नामेंट में उनका भारतीय टीम में चयन हो गया। वे कहती हैं, ''अंतरराष्ट्रीय खेलांे में खो-खो का शामिल होना और भारत का स्वर्ण पदक जीतना सोने पर सुहागा है। मेरा यही सपना था कि भारतीय टीम की सदस्य बनकर देश का नाम कर सकूं, जो अब पूरा हो गया।'' सामान्य परिवारों में पली-बढ़ी ये लड़कियां दूसरी युवा लड़कियों के लिए मिसाल बनकर सामने आई हैं। आज जरूरत है देश की गांव-गलियों में रहने वाली ऐसी खेल प्रतिभाओं को निखारने की। राहुल शर्मा
उत्तर भारत से खो-खो महिला टीम में शामिल होने वाली परवीन निशा अकेली सदस्य थी। वह भारतीय टीम की सदस्य बनी और स्वर्ण पदक प्राप्त किया, यह मेरे लिए सबसे खुशी की बात है।
-सुमित भाटिया, कोच बदरपुर खो-खो सेंटर, स्पोर्ट्स ब्रांच, छत्रसाल स्टेडियम, दिल्ली
गुवाहाटी की जीत रियो ओलंपिक की राह
दक्षिण एशियाई खेलों में महिला मैराथन में कविता राउत ने स्वर्ण पदक जीतकर रियो ओलंपिक 2016 के लिए क्वालीफाई कर लिया। 12वें दक्षिण एशियाई खेलों से रियो गेम्स में शामिल होने वाली वे एकमात्र महिला धावक हैं। पेश हैं आदिवासी क्षेत्र से अतंरराष्ट्रीय प्रतियोगितों में हिस्सा लेने जा रही कविता से ऑर्गनाइजर के संवाददाता निशांत आजाद की बातचीत के अंश :
मैराथन में स्वर्ण पदक जीतने पर कैसा महसूस हो रहा है?
गुवाहाटी में स्वर्ण पदक जीतने से मुझे बेहद खुशी है। रियो ओलंपिक '16 में क्वालीफाई करना मेरा सपना था।
रियो महिला मैराथन के लिए चुनी जाने वाली आप चौथी भारतीय महिला बनी हैं, कैसा लग रहा है?
गर्व हो रहा है कि मैं भारत की ओर से रियो ओलंपिक में हिस्सा लूंगी। दक्षिण एशियाई खेलों में 02:38:38 का प्रदर्शन इस वर्ष मेरा सबसे बढि़या प्रदर्शन रहा।
आप जहां पली–बढ़ीं वहां ज्यादा मौके नहीं थे। आपने स्वयं को इस स्तर के लिए कैसे तैयार किया?
मैं ग्रामीण आदिवासी क्षेत्र से संबंध रखती हूं, जहां मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है। मैं थानापाड़ा के सरकारी बोर्डिंग स्कूल में पढ़ी, उसके बाद हरसुल के विश्व हिन्दू बोर्डिंग स्कूल में प्रवेश लेकर मैंने स्कूल में आयोजित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। वहां मेरी प्रतिभा को देखकर कोच विजेन्द्र सिंह ने खेल में भविष्य बनाने की सलाह दी। उन्हें मेरे माता-पिता को समझाने में करीब दो वर्ष लग गए। प्रशिक्षण लेने की अनुमति मिल गई। इसके बाद सबसे बड़ी समस्या नासिक में रहने की थी। फिर कोच मुझे अपने घर रहने ले गए और वहां परिवार के सदस्य की तरह अपने बच्चों के साथ रखा। मैं तीन माह में ही मेहनत कर नेशनल चैम्पियन बन गई । इसके बाद मुझे बेंगलुरू में आयोजित नेशनल कैंप में जाने का अवसर मिला। 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में मेरा प्रदर्शन अच्छा रहा।
2013 में विवाह के बाद आप दोहरी जिम्मेदारी कैसे निभा पाती हैं?
मैं पति महेश कुमार वामन तुंगार और ससुराल पक्ष की आभारी हूं जिन्होंने हर स्थिति में मुझे पूरा सहयोग दिया। मैं मानती हूं कि एक शादीशुदा महिला के लिए इससे अच्छा उदाहरण और कोई नहीं है।
ल्ल वनवासी कल्याण आश्रम की ओर से किस प्रकार से मदद की गई?
जैसा कि मैंने बताया, मैं एक आदिवासी परिवार से हूं। मेरे विवाह से पूर्व माता-पिता और कोच काफी चिंतित रहते थे। लेकिन वनवासी कल्याण आश्रम के प्रतिनिधियों ने मेरी हर समय मदद की और हमेशा मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उनकी शुभकामनाओं से ही मुझे भारत की ओर से अतंरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों में प्रदर्शन करने का अवसर मिला है।










