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सुनिए, सुनिए, सुनिए! हर तरह के अपराधियों के लिए जबरदस्त खुशखबरी! हत्यारों, बलात्कारियों से लेकर फुटपाथ पर सोते लोगों को दारू के नशे में कार से कुचल देने वालों तक के लिए, सैकड़ों निरपराध लोगों को आरडीएक्स जैसे शक्तिशाली विध्वंसकों का प्रयोग करके रेलगाड़ी के सफर के दौरान उड़ा देनेवालों के लिए, देश के गद्दारों से लेकर तस्करी, डकैती तक के धुरंधरों के लिए, चोरी से लेकर गिरहकटी तक के छुटभैयों के लिए, जुआघर चलाने वालों से लेकर जिस्मफरोशी करनेवालों तक के लिए बहुत बड़ी खुशखबरी सुनिए। फांसी और जेल से डरने के दिन अब समाप्त हुए। मुनादी की जाती है कि खुद भारतीय दंड संहिता को बहुत जल्दी फांसी के फंदे पर लटका दिया जाएगा। आजीवन कारावास भुगतने वालों को जेल से बाहर निकाल कर हर्जाने के तौर पर सितारा होटलों में रखा जाएगा। बुद्धिजीवियों के बूटों तले रौंदी जाकर घायल हुई भारतीय दंड संहिता को अब जल्द ही जीने की यातना से मुक्ति मिलेगी। उसकी जगह लेगी भारतीय क्षमा संहिता।
खूंखार हों, आदत से मजबूर हों या शौकिया अपराध का लुत्फ उठाने वाले हों, सभी को सूचित किया जाता है कि भारतीय क्षमा संहिता के लागू होने तक हर तरह का कायदा कानून निलंबित रहेगा। नया कानून संसद में पास होने तक अभी चल रहे सारे मुकदमें बिना निर्णय लिए निलंबित रहेंगे। सुनिए, सुनिए, सुनिए!
ढोल पीटकर की जा रही इस मुनादी पर मुझे विश्वास नहीं हुआ। पहले तो यह घोषणा ही बिलकुल हवाई लगी कि संसद में इस तरह का, बल्कि किसी भी तरह का कोई कानून बन सकता है। वे जमाने कभी के लद गए जब संसद के अन्दर जनप्रतिनिधि कानून बनाने के लिए एकत्रित होते थे। पहले उस कानून की आवश्यकता समझाई जाती थी। फिर विरोध करने वालों को अपनी बात कहने का अवसर दिया जाता था। अब जब किसी की बात सुनने का रिवाज ही समाप्त हो गया तो कानून बने कैसे? मुठ्ठीभर सदस्य तय कर लें कि वे कानून नहीं बनने देंगे तो दिखा दे कोई माई का लाल कानून बना के! शायद ऐसी विकट स्थिति से तंग आकर ही सरकार ने निर्णय लिया हो कि पुराने कानूनों को भी उठाकर ताक पर रख दिया जाए। नए कानून बन ही न पायें और पुराने कानूनों को निलंबित कर दिया जाए तभी तो पता चलेगा कि देश को पूर्ण स्वराज्य मिल गया है।
हमारे स्थानीय नेता जी की, भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों और चुनाव आचार संहिता से लेकर सामान्य फौजदारी तक,सभी तरह के कानूनों से पुरानी अदावत है। कुछ महीने पहले संदिग्ध परिस्थितियों में पत्नी की मृत्यु के बाद से वे फांसी की सजा के खिलाफ मुहिम तो चला ही रहे थे। इधर जब से उनके दल के जमे हुए मंत्रियों के खिलाफ सीबीआई ने कई मुकदमें भ्रष्टाचार निरोधक कानून के अंतर्गत दायर किये हैं वे हर प्रकार की सजा के विरोधी हो गए हैं। कहते हैं हमारे शास्त्रों में कन्यादान से बढ़कर कौन कर्तव्य है? जो कानून बेटी के विवाह की अनदेखी करके अपने काम में लगा रहे उसे तुरंत हटा देना चाहिए।
नेता जी से मैंने इस मुनादी के विषय में पूछा तो बोले ‘सही कदम है। सजाएं हट जायेंगी तो पुलिस को अपराधों की तफ्तीश करने में कितनी आसानी होगी। अभी जुर्म इतने होते हैं पर सालों तक अपराधी का पता ही नहीं चलता। पुलिस के पास न वैज्ञानिक उपकरण हैं न सही प्रशिक्षण। भारतीय दंड संहिता में दर्ज अधिकांश कानून तो पुलिस स्वयं तहकीकात करने में ही तोड़ देती है। तहकीकात का अर्थ है थाने में बंद करके तब तक पिटाई करना जब तक पिटने वाला अपराध कबूल न कर ले, चाहे उसने अपराध किया हो या नहीं। तफ्तीश में ही इतनी ठुकाई-पिटाई हो जाने के बाद अपराध के लिए सजा देने की क्या आवश्यकता?’
मैंने पूछा, ‘आप भले असंतुष्ट हों पर पुलिसवाले, मारपीट के बिना तहकीकात कैसे करेंगे? ‘वे बोले ‘बिलकुल करेंगे। क्षमा संहिता लागू होने के बाद पुलिसवाले अपना चेहरा अपराधी के सामने लाकर कहेंगे मुझे थप्पड़ लगा, तब तक लगाता रह जब तक मुझ पर पसीजकर अपना जुर्म स्वीकार नहीं कर लेता। उसके बाद क्षमा संहिता के अंतर्गत अदालत तुझे छोड़ ही देगी। फिर तू भी चैन से सो सकेगा और हम भी!
मैंने कहा, ‘सही कहते हैं आप। अभी इतने लोगों को अदालतों द्वारा अपराधी घोषित कर दिए जाने से क्या फर्क पड़ गया है। भ्रष्टाचार के बड़े से बड़े अपराध सिद्ध हो जाने के बाद जो खुद चुनाव नहीं लड़ सकते वे अपने पूरे खानदान को चुनाव लड़वाते हैं। जेल की चक्की पीसने के बजाय चुनावी भाषणों की चक्की चलाते हैं। उनकी चक्की से आटे की बजाय जातिवादी युद्ध का आह्वान निकलता है। आतंकवादियों के मृत्युदंड के खिलाफ आवाजें उठाने वालों को कौम का फरिश्ता समझा जाता है। ऐसे में किसी सजा का मिलना न मिलना कोई मायने रखता है क्या? बेहतर होगा कि भारतीय क्षमा संहिता लागू करके हर जुर्म को सजा के दायरे से मुक्त कर दिया जाए’। अरुणेन्द्र नाथ वर्मा











