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अपने भीतर खुशियों की चाबी

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Jun 13, 2015, 12:00 am IST
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दिंनाक: 13 Jun 2015 14:19:44

 पाञ्चजन्य ब्यूरो
जीवन और समष्टि की वैज्ञानिक व्याख्या करने वाला सनातन धर्म भारतीय संस्कृति का मूल है और शायद इसी कारण भारतीय संस्कृति का हर पहलू एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। कैसे बैठें, कैसे उठें, कैसे सोयें, क्या और कैसे खाएं ताकि शरीर स्वस्थ, मन शांत और आत्मा को प्रफुल्लित रख सकें… इसकी पूरी वैज्ञानिक मीमांसा की है हमारे ऋषियों ने। यह वह ज्ञान है जिसे अब आधुनिक विज्ञान मानने लगा है।
भारतीय संस्कृति में रमे-बसे प्रसिद्ध लेखक अमीश त्रिपाठी कहते हैं, 'बहुत अच्छा लग रहा है और मैं रोमांचित हूं कि 21 जून को अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस के जरिये पूरी दुनिया ऐसी शुरुआत कर रही है जो हमारे मनीषियों की 'सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:' के सूत्र की वैश्विक पुष्टि है। बेशक योग सनातन धर्म से उत्पन्न हुआ है, लेकिन यह हम भारतीय लोगों की तरफ से दुनिया को एक भेंट है। योग साधना करने से इन्सान के तन, मन और आत्मा को शांति मिलती है।'
योेग सिर्फ एक व्यायाम नहीं है बल्कि इसका एक सांस्कृतिक आयाम है। यह जीवन को रूपांतरित कर देता है। आधुनिक जीवनशैली से हमने जितनी खराबियां बटोरी हैं, यह उनको दूर करता है और हमें सुख व प्रसन्नता देने वाला है। शुरुआत बेशक शरीर से होती है लेकिन प्राणऊर्जा के प्रसार के साथ यह जीवन के तमाम पहलुओं को निखारता है।
वर्षांे से योग पर अनुसंधान कर रहे देश के जाने-माने एन्डोक्रनोलॉजिस्ट डॉ. विपिन मिश्रा योग को एक स्वस्थ, समझदार, शांतिप्रिय और उदार दुनिया बनाने का प्रमुख उपकरण मानते हैं। बताते हैं, ' योग, ध्यान, प्राणायाम करने से व्यक्ति अच्छा व्यक्ति भी बनता है। उसका चरित्र बदल जाता है। बुरा आदमी निश्चित तौर पर अच्छा बन सकता है। आखिर यह समझना पड़ेगा कि जो आदमी झूठ बोलता है, चोरी करता है, भ्रष्टाचार में लिप्त है वह आखिर ऐसा क्यों है? वह ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने जीवन से असंतुष्ट है। उसको जीवन में ऐसा कुछ चाहिए जो उसे बाहर से मिलता हुआ दिखता है। जो आदमी योग करता है वह अपने आंतरिक (कोर), अपने अंतरतम से जुड़ जाता है और वहां पर नैसर्गिक प्रसन्नता है, नैसर्गिक आनंद है।'
भले मैगी, पिज्जा, कोक-पेप्सी का सेवन करने से पहले कोई नहीं पूछता कि मैं इसे क्यों लूं। लेकिन योग के बारे में सवाल उठाये जाते हैं कि हम योग क्यों करें, इसे करने से मेरा क्या फायदा होगा? दरअसल योग को हम समग्र चिकित्सा या होलिस्टिक थेरेपी कह सकते हैं, जो शरीर और मन के हर तल पर निश्चित फायदा करता है। डॉ. मिश्रा कहते हैं कि हर इन्सान को योग करना चाहिए। योग करने का केवल एक कारण है कि आप इन्सान हैं इसलिए आप योग करें। योग के बिना इन्सान अपूर्ण है। योग शरीर को मजबूत बनाता है, दिमाग को सेहतमंद रखता है, तरह-तरह के तनाव, चिंता, अवसाद आदि को दूर करता है और आयु लम्बी होती है।
भारत की पहल पर पूरी दुनिया ने जितनी जल्दी योग को अपनाने की हामी भरी उससे तो यही लगता है कि लोग किसी के आवाज उठाने का इंतजार कर रहे थे और जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की बात रखी तो 90 दिनों के भीतर ही पूरी दुनिया ने योग को गले लगा लिया जो अपने आप में एक कीर्तिमान है। इस तरह 21 जून को भारत समेत पूरी दुनिया एक साथ योग करती नजर आएगी जो शायद मनुष्यता के इतिहास में अब तक का सबसे भव्य नजारा होगा। यह करिश्मा इसलिए भी हुआ कि एक योगी के प्रेम, समर्पण, संकल्प और आस्था से हर वह व्यक्ति कायल हुआ जो उसके संपर्क में आया। दुनियाभर के लोगों और नेताओं ने जब मोदी में योग के प्रभाव का अनुभव किया तो उसे नकारना मुश्किल था। आप जानकारी को, सूचना को, उपदेश को तो नकार सकते हैं कि पता नहीं ऐसा होगा या नहीं, लेकिन अनुभव में आ गया, फिर वह आपके लिए सत्य बन जाता है।
क्या आप रोज योग करते हैं? आपने योग का प्रभाव महसूस किया है? अमीश त्रिपाठी बहुत भावुक होकर बताते हैं, 'मेरे बाबा (पिताजी के पिताजी) काशी में पंडित थे। उन्होंने ही हम सब को हमारे धर्म और शास्त्र के बारे में सिखाया। पता नहीं मैं योग ठीक से सीख पाया कि नहीं, लेकिन हां, मैं योग साधना करता हूं। इससे मेरे शरीर को लाभ हुआ है और मन को भी शांति मिलती है। इतना कुछ लिखना-जानना और दोस्तों-परिवार और खुद को भी खुश रख पाना योग के बिना शायद संभव न हो पाता। मैं इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता।
एक तो हुआ व्यायाम वाला योग जिसमें कुछ आसन होते हैं। यह योग का एक छोटा सा हिस्सा है जिसे ज्यादातर लोग करते हैं। फिर प्राणायाम आदि से मन की अवस्था को जाग्रत और सजग रखा जा सकता है। लेकिन यह योग संपूर्णता में एक पूरा सांस्कृतिक आयाम है जो पूरे समाज और वातावरण को प्रसन्नता व ऊर्जा से भर देता है। जलवायु तक पर पड़े दुष्प्रभावों को कम करता है। योग के आठ अंग हैं। अमीश को नई पीढ़ी के साथियों से कहना है, 'एक चीज है आजकल कि लोग योग को सिर्फ एक व्यायाम का तरीका समझने लगे हैं। लेकिन योग सिर्फ आपके शरीर के स्वास्थ्य के लिए नहीं है। योग से इन्सान के मन और आत्मा को भी शांति मिल सकती है। तो मेरा सुझाव यह होगा कि अगर आप योग करें, तो पूरी तरह से करें।'
एक सच्चा वाकया सुनिए। बिन्दु 32 वर्ष की है और इस समय ब्ेांगलुरु में रहती है। बड़ा बेटा चार साल और छोटी बेटी छह महीने की है। दूसरी बार गर्भधारण के दौरान उसके साथ कई घटनाएं घटीं। दुनिया की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी आईटी फर्म में अच्छे पद पर होने के बावजूद उसे सिर्फ इसलिए हटा दिया गया कि उसके गर्भवती होने से कंपनी को एतराज था। अचानक ही वह भयंकर अवसाद में चली गई। परसों उसने खुद ही फोन पर बताया, 'अगर उस समय आप मुझे देखते तो पहचान ही नहीं पाते। मुझे अपना कोई होश नहीं रहता था। न बच्चों की देखभाल कर पाती थी, न पति की। अपने शरीर का ख्याल तक नहीं रखती थी। जिंदगी से बुरी तरह ऊब चुकी थी। बेंगलुरु में मानसिक रोगों के प्रसिद्ध निम्हेंस हॉस्पिटल में मैं भर्ती रही और डॉक्टरों का कहना था कि मेरा घर में बच्चे के साथ रहना बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है। मैं कुछ भी कर सकती थी। ऐसी बुरी हालत हो गई थी मेरी।' 

ी।'
यह जानना ज्यादा जरूरी था कि वह इस हालत से उबरी कैसे? बिन्दु ने बताया, 'निम्हेंस के डॉक्टर मुझे अस्पताल से छुट्टी देने को राजी नहीं थे। फिर मेरे पति के यह कहने पर कि वे दिल्ली में घर पर नर्स रखकर मेरी देखभाल करेंगे, मुझे छुट्टी दे दी गई। उन्होंने पति से लिखवाया कि वे अपनी मर्जी से मुझे अस्पताल से जबरदस्ती छुट्टी दिलाकर ले जा रहे हैं। तमाम दवाएं साथ थीं।… कोई चार महीने पहले मैं संगीता दीदी के संपर्क में आई और उन्होंने मुझे योग- प्राणायाम सिखाया। मेरे लिए वह देवदूत के समान हैं। कोई छह दिन बाद ही मुझमें फर्क आने लगा और आज मैं अपने पूरे परिवार की पूरी देखभाल करती हूं, समाजसेवा भी करती हूं और बहुत-बहुत खुश हूं। इसलिए मैं इतना जानती हूं कि योग से ज्यादा शक्तिशाली दुनिया में कुछ भी नहीं है।'
यह बात आपको प्रचार जैसी भले लग रही हो लेकिन जिसके जीवन में घटी है उसके लिए सत्य का अनुभव है। बस कुछ भ्रांतियों से बचिएगा। जैसे इसे बीमारी दूर करने भर का जरिया मत मान लीजिएगा। बीमार हों तो इलाज मत त्यागिएगा। साथ में योग अपनाएंगे तो यह स्वास्थ्य से साथ ऐसी खुशी और पूर्णता भी देगा जो जीवन में आती है तो टिकती भी है। आप दूसरों में खुशी लाने के संवाहक बन जाते हैं। योग का सबसे गहरा सूत्र है कि हम केवल मन नहीं हैं, शरीर नहीं हैं। सब कुछ बदल रहा है लेकिन अंदर कुछ ऐसा है जो आज भी वैसा ही है, जैसा एक साल की उम्र में था और जब हम मां के पेट में थे तब भी वैसा ही था। उस 'कॉमन थ्रेड' की पहचान तक पहुंचने का मार्ग           है योग।
योग की महत्ता के कुछ उदाहरण और देखते हैं। सहज मुनि और हीरा रतन मानेक किसी भी प्रकार का भोजन लिए बिना साल-साल बिता देते हैं। इस पर भारत के वैज्ञानिकों ने कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन अमरीका के वैज्ञानिक, न्यूरोलॉजिस्ट, ऑपथाल्मोलॉजिस्ट आदि 8 विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों की निगरानी में रखने के बाद मानेक को नासा के वैज्ञानिक अपने साथ ले गए। स्वामी दयानंद ने चार घोड़ों के रथ को हाथ से पकड़कर चलने नहीं दिया था। गंधबाबा स्वामी विशुद्धानन्द कोई भी गंध या स्थूल वस्तु शून्य से प्रकट कर देते थे और स्वामी प्रणवानन्द एक साथ दो स्थानों पर देखे गए थे (योगी कथामृत, परमहंस योगानन्द)। अनेक योगियों के आकाशगमन के किस्से पढ़ने-सुनने को मिल जाते हैं । क्या योग जादूगरी है? क्या सम्मोहन या शैतानी विद्या है? (कुछ वर्ष पूर्व वेटिकन के प्रमुख ने ऐसा कहा था)
अनेक प्रसिद्ध नामों और उनके मानने वालों के असीम विश्वास के बीच हम किस योग को ठीक, प्रामाणिक और उच्चतर मानें, ये सहज जिज्ञासा मन में उठती है। प्रत्यक्ष प्रमाण होता है; और अनुभव कर के आए हुए व्यक्ति का कथन (आप्त वचन) और शास्त्र प्रमाण होता है – प्रत्यक्ष अनुमान आगमा: प्रमाणानि। शास्त्र कहता है योगी कल्पनातीत शक्तियों का स्वामी होता है, अनेक रूप धारण कर सकता है। एक तरफ सांप को छड़ी और छड़ी को सांप में बदलने जैसी बातों को स्वामी दयानंद बाजीगरी का तमाशा कहते हैं। दूसरी तरफ वही स्वामी दयानंद पद्मासन में स्थित हो हवा में, अधर देखे गए । रोमांच से भरपूर योग अधिकांश लोगों के लिए आज भी रहस्य ही है। आखिर क्या ठीक है, क्या गलत? योग के आदि प्रणेताओं ने इसे किस रूप में बताया? किस उद्देश्य से बताया? योग में चमत्कार का क्या स्थान बताया? योग के क्या क्या भेद बताए? क्या आज का योग और पुरातन योग अलग अलग हैं? इन प्रश्नों के उत्तर प्राचीन ऋषियों की वाणी से लेना ही अधिक प्रामाणिक होगा।
महर्षि पतंजलि ने कहा- द्रष्टा का, आत्मा का, अपने स्वरूप में अवस्थित होना योग है। महर्षि व्यास ने कहा- योग समाधि है। अन्यत्र कहा- जीवात्मा और परमात्मा की एकरूपता समाधि है और कहा- समाधि ही योग है। वहां केवल सत्य ज्ञान युक्त प्रज्ञा है। प्रज्ञा यानी ज्ञान, जिसको जानने के बाद कुछ जानना शेष न रहे, योग की स्थिति है। संपूर्ण बोध हो जाना योग है। बुद्ध हो जाना योग है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि समाधि तक पहुंचने के लिए ज्ञान योग का आश्रय लिया या कर्म योग का। क्योंकि एक में सम्यक् टिका हुआ साधक अनायास ही दोनों का अभ्यास करता है अत: दोनों के फल- समाधि को, संसार बंधन से मुक्ति को, मोक्ष या निर्वाण को प्राप्त करता है। आत्मोपलब्धि या मोक्ष ही योग साधना का उद्देश्य है। जो शिक्षक आपको इस उद्देश्य के लिए प्रेरित नहीं करता या जिक्र नहीं करता, वह या तो स्वयं अंधेरे में है या आपको अनधिकारी/अनिच्छुक समझ रहा है। स्वस्थ शरीर में ही परमात्मा प्राप्ति संभव है। इसलिए शरीर को रोगमुक्त बनाने और स्वस्थ बनाए रखने के उपाय योग में बताए गए हैं। आरोग्य और स्वास्थ्य प्राप्ति के बाद योग की सही मायने में शुरुआत होती है, इसीलिए स्वामी विवेकानंद ने कहा-भारत को मंदिरों से ज्यादा फुटबॉल के मैदानों की जरूरत है। श्रीमद् भगवद्गीता में कहा है- न अयं आत्मा बलहीनेन् लभ्य:। यह आत्मा बलहीन को प्राप्त नहीं होती, आत्म तत्व की उपलब्धि बलहीन को नहीं होती। इसी उपलब्धि के मार्ग में माया लालच का टुकड़ा (सिद्धियां – विशिष्ट शक्तियां) देती है। गुरुनिष्ठ साधक उन्हें परमात्मा को समर्पित कर देता है जबकि अहंकारी अपने अहंकार को और बढ़ा लेता है। साधक शक्तियों को दिखाता नहीं, लोग देख लेते हैं।
प्राणायाम की उच्च अवस्थाओं में शरीर गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होकर ऊपर उठ जाता है जिसे लोगों ने देखा है। (आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी छोटी वस्तुओं को गुरुत्वाकर्षण से मुक्त करने में कुछ हद तक सफलता प्राप्त कर ली है)। ब्रह्मचर्य पर व्याख्यान देते हुए स्वामी दयानंद ने चुनौती सुनकर भी व्याख्यान जारी रखा लेकिन बाद में चार घोड़ों के रथ को रोक कर दो बातें बगैर कहे कह दीं । ब्रह्मचर्य पर जो बताया उसकी महत्ता अधिक है और बाद में ब्रह्मचर्य की शक्ति को दिखा भी दिया जिससे किसी बात पर संदेह न रहे। परंपरा से दो स्थितियों में चमत्कार दिखाया जाता है, शिष्य के मन का संदेह दूर कर उसे उच्चतर साधना के लिए प्रेरित करने के लिए और विषय को स्पष्टता से समझाने के लिए। अपने आप को बड़ा या महान दिखाना शक्ति प्रदर्शन का उद्देश्य नहीं होता। यदि कोई ऐसा करता है तो वह भ्रमित है और मान, मोह, लोभ के पाश में बंधा हुआ है।
इच्छाएं तो बंधन हैं, योगी मुक्ति चाहता है। जिसको कुछ नहीं चाहिए वही शहंशाह है। महर्षि पतञ्जलि ने कहा- समाधौ उपसर्गा: व्युत्थाने सिद्धय: – वे (इच्छाएं) समाधि (के मार्ग) में व्यवधान हैं और संसार में विशिष्ट शक्तियां हैं।

पतंजलि योग की ही
शाखा-प्रशाखाएं हैं सारे योग

योग एक ही है जो पतंजलि ने एक विज्ञान के रूप में विकसित किया है। उन्होंने परिभाषित किया कि यह अष्टांग योग है जिसके आठ भाग होते हैं:
1-यम    2-नियम
3-प्राणायाम     4-प्रत्याहार
5- आसन     6- धारणा
7-ध्यान     8-समाधि।
अब यह लोगों को समझ में आने लगा और लोग इसे अपनाने लगे। अपनाना, करना आसान हो गया। बाद में इसी को लोगों ने अपने हिसाब से सुधार कर अपने नाम से बाजार में उतारा है। आत्मा या सार सभी का वही है जिसे पतंजलि ने दिया। सारे योग पूरी तरह वैज्ञानिक हैं।
'पॉवर' योग
इसके प्रवर्तक भरत ठाकुर हैं। इसके अंतर्गत एक हॉल में हीटर जला दिया जाता है और हॉल के तापमान को चालीस से छियालिस डिग्री तक ले जाया जाता है। इस तापमान पर योग करवाया जाता है ताकि खूब पसीना आए। इस में पसीने पर जोर दिया जाता है यानी पसीना खूब आना चाहिए।
विक्रम योग
इसके प्रवर्तक बिक्रम चौधरी हैं। यह 'पॉवर' योग का ही अमरीकी रूप है। अंतर सिर्फ इतना है कि यह अमरीका में चलाया जा रहा है। चौधरी ने योग का एक खास पैकेज तैयार किया है, जिसे वह अपने नाम से पेटेंट करना चाहते हैं। इस पर तमाम भारतीय ऋषि-मुनियों ने आपत्ति प्रकट की है।
शिवानंद योग
इसमें ध्यान पर अधिक जोर दिया जाता है। यहां ध्यान और अध्यात्म मुख्य हैं। इसके अलावा इसमें षट्कर्म, शोधन क्रिया भी करवाई जाती है। इस योग में प्राणायाम वगैरह भी करवाए जाते हैं।
अयंगर योग
इसमें खास तरह की रस्सी, कुर्सी, लकड़ी, मूढ़ा, गेंद, गद्दा, चटाई और ड्रेस के माध्यम से योग करवाया जाता है। जैसे किसी व्यक्ति के पैरों में कोई तकलीफ है और वह जमीन पर नहीं बैठ सकता तो यहां उसके लिए खास तरह की कुर्सी है, जिस पर बैठ कर वह आसन कर सकता है। इसमें खास तरह की तकनीक द्वारा योग करवाया जाता है इसलिए इसे 'इंस्ट्रूमेंटल योग' भी कहा जाता है। इसमें जिम और फीजियोथैरेपी को मिला दिया गया है। पश्चिमी देशों में योग के नए भारतीय रूप को प्रचलित करने में इस योग के प्रवर्तक बीकेएस अयंगर का बहुत बड़ा योगदान है।
रामदेव योग
इसमें मुख्य जोर कपालभाति और अनुलोम-विलोम पर दिया जाता है। यहां योग, आयुर्वेद और नेचुरोपैथी तीनों को शामिल किया गया है। उचित खान-पान और सही जीवन शैली अपनाने पर ध्यान दिया जाता है।
श्री श्री योग
श्री श्री रविशंकर प्रवर्तित आर्ट ऑफ लिविंग की ओर से श्री श्री योग शुरू किया गया है, जिसमें तीन दिन के शिविर में योगासन और प्राणायाम आधारित क्रियाएं कराई जाती हैं विशेषत: सूर्य नमस्कार। यह सभी तरह के योग पैकेजों का समन्वित रूप है यहां 'रिजिडिटी' कम है। खुलापन अधिक है।

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