| दिंनाक: 25 Apr 2015 13:55:17 |
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प्रशांत बाजपेई
स्रब घाटी के मुठ्ठी भर अलगाववादियों के तमाशों से भरपूर जलसों पर फ्लैश चमका रहे मीडिया के कैमरे अप्रैल की गर्मी को और बढ़ा रहे थे, उसी समय सरहद के दूसरी ओर नवाज शरीफ और जिनपिंग कैमरों की चकाचौंध में हाथ मिलाते हुए चीन और पाकिस्तान की 'पर्वतों से ऊंची-समुद्र से गहरी और शहद से मीठी' दोस्ती की दुहाई दे रहे थे। सीमा के दूसरी ओर हुई इस मुलाकात के कश्मीर और क्षेत्रीय स्थिरता से कहीं गहरे सरोकार हैं, क्योंकि इस दौरे में चीन और पाकिस्तान ने जिस 'चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर' के निर्माण के लिए निर्णयात्मक कदम बढ़ाया है, वह जम्मू कश्मीर के उस हिस्से से होकर गुजरता है जो 1948 के बाद से पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है। पहले से ही इस क्षेत्र में काराकोरम राजमार्ग की मरम्मत की आड़ में 10,000 चीनी सैनिक डेरा जमाये हुए हैं।
खनन एवं निर्माण संबंधी दूसरे कार्य भी चीनी कर रहे हैं। ऐसे में इस कॉरिडोर, जिसे चीन 21 वीं सदी का नया रेशम मार्ग कह रहा है, के अस्तित्व में आने के बाद सामरिक और रणनीतिक नीतियों में बड़ा उलटफेर होने जा रहा है। 46 अरब अमरीकी डॉलर के समझौतों पर हस्ताक्षर भी हुए हैं, जिसमें ईरान-पाकिस्तान गैस पाइप लाइन, सौर ऊर्जा और जल ऊर्जा प्रोजेक्ट, रेलवे आधारभूत ढ़ांचा, मोटर-वे आदि शामिल हैं। चीन ने पाकिस्तान को 5 अरब डॉलर की 8 पनडुब्बियां बेचने पर भी मोहर लगा दी है।
ये चीन के इतिहास की सबसे बड़ी हथियार बिक्री है। अरब सागर के तट पर पाकिस्तान का नौसैनिक बंदरगाह ग्वादर, जिसे चीन ने विकसित किया है, 2015 से चीन को 40 साल के पट्टे पर दे दिया गया है। इसी बंदरगाह को रेल और सड़क मार्ग से पश्चिमी चीन के कशगर से जोड़ा जा रहा है। इतिहास में पहली बार चीन भारत के पश्चिमी तट पर दस्तक देने की तैयारी में है। इसीलिए चीन और पाकिस्तान के बीच जो कुछ भी पक रहा है, उस पर भारत गहराई से नजर रखे हुए है।
फिलहाल बीजिंग मोदी का स्वागत करने को आतुर दिखाई पड़ रहा है। ये एक ऐसा दौर है जब भारत और चीन दोनों के नेतृत्व आक्रामक विदेशनीति, सामरिक-रणनीतिक समीकरणों और वैश्विक व्यापार संबंधों का संतुलन को साधने में जुटे हुए हैं। प्रधानमंत्री नरंेद्र मोदी ने इन आयामों को धार तो दी ही है, साथ ही सांस्कृतिक संबंधों का नया आयाम भी जोड़ा है। भारत नई चाल और नई छवि के साथ दुनिया के सामने आया है। चीन शक्ति का सम्मान करता है। लेकिन चीन में बदलाव धीमे-धीमे होते है। इन्हीं दोनों सम्भावनाओं के बीच मोदी चीन जा रहे हैं।