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हनुमान जयंती के अवसर पर मध्य प्रदेश के नीमच जिले में हिन्दू श्रद्धालुओं पर मुसलमानों द्वारा किए गए हमले की घटना पर खुद को सेकुलर कहने वाले मीडिया ने परदा डाल दिया। यह वही मीडिया है, जो कि किसी चर्च पर एक पत्थर भी उछलने पर उसे 'ईसाई और ईसाइयत' पर बड़ा हमला बताकर अल्पसंख्यकों का पक्षकार बनता है। कुछ समय पूर्व कोलकाता के वेल्लुर मठ पर भी जिहादियों ने हमला किया था, उस समय भी मीडिया ने खबरों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया था।
नीमच में हनुमान जयंती के अवसर पर शोभा यात्रा शांतिपूर्ण तरीके से निकाली जा रही थी। श्रद्धालु जब खुर्रा चौक की मस्जिद को पार कर आगे बढ़ने लगे तो वहां पहले से मौजूद मुसलमानों की भीड़ ने उन पर हमला बोल दिया। लोगों ने अपने घरों की छत से पथराव शुरू कर दिया जिसके बाद अफरातफरी मच गई। मुसलमान हथियार लिए हुए थे जिन्होंने मौके पर पहंुचे पुलिसकर्मियों को भी घायल कर दिया। पुलिस के पहंुचने तक हिन्दू श्रद्धालुओं को निर्ममता के साथ पीटा गया। इस हमले में 50 से अधिक श्रद्धालु घायल हो गए। इनमें छह पुलिसकर्मी भी शामिल हैं। घायलों को जावड़ के सरकारी अस्पताल में दाखिल कराया गया।
पुलिस ने दंगा भड़काने के आरोप में 35 लोगों को गिरफ्तार किया है। जानकारी के अनुसार हनुमान जयंती की शोभा यात्रा सुबह दस बजे शुरू हुई थी और शहर के विभिन्न हिस्सों में होकर खुर्रा चौक पहंुची थी। वहां सुनियोजित तरीके से मुसलमानों की भीड़ पहले से जुटी हुई थी और काफी मात्रा में ईंट, पत्थर, लोहे की राड और हथियार जुटाकर रखे गए थे।
शोभा यात्रा को बाधित करने के उद्देश्य से दर्जभर पर दुकानों और वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। आरोप है कि पुलिस भी स्थिति बिगड़ने के बाद काफी देरी से घटनास्थल पर पहंुची थी। इस दौरान उपद्रवियों ने श्रद्धालुओं को चुन-चुन कर अपना निशाना बनाया। होली के अवसर पर भी नीमच में हिन्दू त्योहार के पर मुसलमानों ने हिंसा फैलाई थी। विश्व हिन्दू परिषद नीमच जिले के अध्यक्ष बाबूलाल नागड़ा ने कहा कि शोभा यात्रा से पूर्व ही पुलिस अधीक्षक को मुसलमानों द्वारा उपद्रव मचाने की आशंका जताते हुए एक पत्र लिखा गया था, लेकिन पुलिस ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने कहा कि श्रद्धालु भजन गाकर शांतिपूर्ण तरीके से जा रहे थे कि तभी भीड़ ने निहत्थे लोगों पर हमला बोल दिया। उनका आरोप है कि पुलिस इस संबंध में आवश्यक कदम उठाने में असफल रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि भीड़ में आए लोग बाहरी तत्व थे और तीन-चार दिन पहले ही बसों के माध्यम से वे लोग यहां पहंुच चुके थे।
हैरानी की बात यह है कि इस सब के बावजूद भी मीडिया ने जानबूझकर हिन्दू श्रद्धालुओं पर हुए हमले की खबर को दबा दिया,जबकि यही मीडिया अल्पसंख्यकों से जुड़ी छोटी से छोटी बात पर आए दिन विवाद खड़ा कर देता है। ल्ल प्रतिनिधि
निजी विद्यालयों में पढें़गे गरीब बच्चे
शिक्षा का अधिकार सभी बच्चों का है, इसके लिए अमीर व गरीब का पैमाना नहीं होता। बेशक अमीर परिवार में जन्मे बच्चे अच्छे से अच्छे स्कूल में अपनी व परिजनों की इच्छानुसार प्रवेश ले लेते हैं। लेकिन आर्थिक तंगी से अनेक बालक प्रतिभावान होते हुए भी मायूस होकर ही रह जाते हैं। हरियाणा सरकार ने अब इसके लिए कमर कस ली है और उच्च न्यायालय के आदेश को पूरी तरह लागू करने का मन बना लिया है। इसके लिए निजी स्कूल संचालकों को आदेशानुसार संबंधित उन 10 फीसद बच्चों को प्रवेश देने की बात कही गई है, जो इसके पात्र हैं। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा का अधिकार पूरी तरह अमल में लाया जाएगा और उच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन होगा, ताकि प्रदेश में आर्थिक रूप से कमजोर कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। हाल ही में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार के विद्यालय शिक्षा नियम 134-ए को वैध ठहराया और निजी स्कूलों की उस पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें निजी विद्यालयों का पक्ष था कि आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को सरकारी स्कूलों के बराबर फीस पर दाखिला देना संभव नहीं है। यह मामला 5 साल से लम्बित था जिसमें समय-समय पर 17 आदेश भी जारी हुए थे। न्यायाधीश सतीश कुमार मित्तल व न्यायाधीश एच. एस. सिद्ध की खंडपीठ ने कहा कि याची संस्था की आड़ में प्रदेश के सभी निजी स्कूलों को लाभ नहीं दिया जा सकता। ऐसे में शुरुआती कक्षा में 25 फीसद और दूसरी कक्षा से लेकर आठवीं कक्षा तक 10 फीसद बच्चों के फीस की भरपाई की जाए। खंडपीठ का कहना है कि गरीब बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा का लाभ मिलना चाहिए, क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को महज गरीबी के चलते शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। उधर राज्य सरकार जहां न्यायालय के आदेश को लागू करने का निजी विद्यालय के संचालकों को आदेश दे रही है, वहीं ये संचालक अपनी जिद पर अड़े हैं। ल्ल गणेश दत्त वत्स
क्रासर
उच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार के विद्यालय शिक्षा नियम 134-ए को वैध ठहराया
एनजीओ पर सख्ती
देश में लगातार प्रबुद्ध लोगों द्वारा गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) के रुपयों के लेन-देन में मिलने वाली शिकायतों के बाद केन्द्र सरकार ने कड़ा निर्णय करते हुए 'मनी लांड्रिंग' पर शिकंजा कस दिया है।
चंदे या दान के नाम पर 'मनी लांडिं्रग' में लिप्त करीब 200 से ज्यादा दानकर्ताओं पर सुरक्षा एजेंसियों की विशेष नजर है। इन सभी एनजीओ पर काले धन को वैध करने का आरोप है। ये लोग गैर कानूनी कार्य लंबे समय से करते आ रहे हैं। गौरतलब है कि इस प्रक्रिया में केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसियों की आर्थिक शाखा ने 150 से अधिक विदेशी दानकर्ताओं के नाम वाली एक सूची गृह मंत्रालय एवं वित्त मंत्रालय को सौंप दी है। साथ यह सूची प्रर्वतन निदेशालय और सीबीडीटी को भी सौंप दी है।
जानकारी के अनुसार लंबे समय से केन्द्र सरकार को इस तरह की शिकायतें मिल रही थी, उन्हीं पर संज्ञान लेते हुए सरकार ने सख्त कदम उठाया है। माना जा रहा है कि जांच के दौरान कई बड़ी मछलियों के नाम उजागर होंगे और सैकड़ों एनजीओ का पर्दाफाश होगा। ल्ल
उत्तर प्रदेश में राज्य स्तरीय सवार्ेच्च एवं महत्वपूर्ण पदों पर चयन के लिये आयोजित पीसीएस प्रारम्भिक परीक्षा 2015 का प्रश्नपत्र लीक होने की घटना के बाद प्रतियोगी छात्रों द्वारा चलाये जा रहे आंदोलनों के बीच जिस तरह एक के बाद एक नये तथ्य सामने आ रहे हैं उससे साफ है कि आयोग में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। सभी नियमों को दर किनार कर आयोग के अधिकारी अपनी मनमानी कर रहें हैं जिसके कारण आयोग की पूरी कार्यप्रणाली सदेंह के घेरे में हैं।
प्रतियोगी छात्र अब परीक्षा के दूसरे प्रश्नपत्र को भी रद्द करने की मांग कर रहें है क्योंकि कई स्थानों पर इसकी बिना सील लगी बुकलेट प्राप्त हुई हैं। छात्रों के संगठन के साथ मिल कर भाजपा अब आयोग की छवि बनाये रखने के लिये लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अनिल यादव को तत्काल हटाने की मांग कर रहें हैं। प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित पीसीएस प्रारम्भिक परीक्षा 2015 के लिए इस बार कुल 4,43,079 परीक्षार्थियों द्वारा आवेदन किया गया था। इसके लिए 20 जिलों में परीक्षा केन्द्र बनाए गये थे, जबकि वर्ष 2013 में इन्हीं अध्यक्ष के कार्यकाल में पीसीएस प्रारम्भिक परीक्षा के लिये कुल 4,40,500 आवेदन आयोग को प्राप्त हुए थे और आयोग ने 21 जिलों में परीक्षा केन्द्र बनाने तय किए थे, लेकिन परीक्षा से दो सप्ताह पूर्व आयोग नें प्रदेश के तीन अन्य जिले-मैनपुरी, मुजफ्फरनगर एवं मथुरा को भी शामिल कर लिया। इसके पीछे तर्क दिया गया था कि परीक्षार्थियों की संख्या अधिक हो गई है। आयोग ने 2013 में 24 जिलों में कुल 558 केन्द्र बनाए थे। इस बार परीक्षार्थियों की संख्या उस वर्ष की तुलना में 54,617 अधिक थी, लेकिन आयोग ने मात्र 20 जिलों में 917 केन्द्रों पर परीक्षा आयोजित की। अधिक केन्द्र बनाने के फेरे में जब शहरी क्षेत्र में विद्यालय नहीं मिले तो शहर से दूर ग्रामीण इलाकों में केन्द्र बनाया गया, जो मानक के अनुरूप नहीं था। परीक्षार्थियों की संख्या बढ़ जाने के कारण परीक्षा केन्द्र वाले जिलों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए थी, लेकिन आयोग ने तो केन्द्र्र बढ़ा दिए, भले ही वह मानक से परे हो।
दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह कि आयोग में बैठे जिम्मेदार लोग मानकों की अनदेखी कर केन्द्र बना रहे हैं। इसके पीछे क्या कारण है? यह आयोग स्पष्ट नही कर रहा है। इस बार जिस विद्यालय से प्रश्नपत्र लीक हुआ वह निजी विद्यालय है और अभी तक उसे मान्यता प्राप्त नहीं है। यहां तक कि जिला विद्यालय निरीक्षक ने उसे केन्द्र बनाए जाने की संस्तुति ही नहीं की। साथ ही प्रतियोगी छात्रों के पास दूसरे प्रश्नपत्र की एक ऐसी बुकलेट है जिसमें सील ही नहीं लगी थी। छात्रों का आरोप है कि प्रश्नपत्र जानकर लीक किया गया। आयोग द्वारा आयोजित होने वाली परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों पर एक ऐसी सील लगी होती है जिसे खोला या निकाला नहीं जा सकता है ।
यदि इसे खोलने का प्रयास किया जाएगा तो प्रश्नपत्र फट जाएगा। इस बार पीसीएस प्रारंभिक परीक्षा के पहले पर्चे पर हरे और दूसरे पर पीले रंग की सील लगाई थी। वाराणसी, फैजाबाद और लखनऊ के प्रतियोगी छात्रों ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके पहले प्रश्नपत्र की सील खुली हुई थी। यह प्रश्नपत्र लीक हो जाने के कारण आयोग द्वारा इसे रद्द किया जा चुका है। आंदोलन के बीच जब दूसरे प्रश्नपत्र में यह चूक पाई गई तो छात्र भड़क गए ,वह इस मामले को भी उच्च न्यायालय ले जाएंगे और दूसरे प्रश्नपत्र को भी निरस्त कराने की मांग करेंगे ।जलेवार कृषि सम्मेलन होंगे। ल्ल हरि मंगल
पैतृक स्थान पर बसेंगे कश्मीरी पंडित
राजग सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में शामिल घाटी में कश्मीरी पंडितों की घर वापसी पर अलगाववादियों ने एक बार फिर अपने फन उठाकर इस योजना का विरोध किया है। अलगाववादी संगठन जेकेएलएफ ने इसे लेकर कश्मीर बंद का आह्वान भी किया। वहीं राज्य सरकार ने इस पूरे मामले पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि कश्मीरी पंडित जम्मू-कश्मीर की साझा संस्कृति के अभिन्न अंग हैं।
सरकार ने साफ कर दिया कि उन सभी कश्मीरी पंडितों को बहुत जल्द ही उनके पैतृक स्थान पर बसाया जाएगा। सरकार की मंशा कश्मीरी पंडितों को फिर से कश्मीर की संस्कृति में पिरोया जाएगा। गौरतलब है कि केन्द्र के प्रस्ताव के तहत श्रीनगर के ग्रामीण क्षेत्रों और आसपास के क्षेत्रों को मिलाकर शहर बसाने की रणनीति बनाई गई है। इस संबंध में हाल ही में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने जम्मूू-कश्मीर के राज्यपाल एन. एन. वोहरा को भी पत्र लिखा था। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने केन्द्र को इस संबंध में भूमि देने का पूरा भरोसा दिलाया है। घाटी में विस्थापित 62 हजार कश्मीरी पंडित परिवारों की ससम्मान वापसी भाजपा-पीडीपी की साझा सरकार के प्रमुख बिंदुओं में से एक है।
अलगाववादी नेता यासीन मलिक ने भड़काऊ बयान देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री घाटी में मजहब के नाम पर नफरत पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। कॉलोनियों को स्थापित करना एक षड्यंत्र है।
क्रासर
-घाटी में 62 हजार कश्मीरी विस्थापितों को बसाया जाना है
-अलगाववादियों ने विरोध प्रकट कर कश्मीर बंद का किया आह्वान
सेना को विशेषाधिकार
अरुणाचल प्रदेश में उग्रवादियों की बढ़ती गतिविधियों पर संज्ञान लेते हुए केन्द्र सरकार ने सेना को अरुणाचल से लगती तिब्बत सीमा पर उग्रवादियों को देखते ही गोली मारने का अधिकार दे दिया है, जबकि पूर्वात्तर के अन्य राज्यों में सेना को पहले ही से यह (अफस्पा) विशेषाधिकार प्राप्त है।
्रहाल के दिनों में देखने में आया है कि पूर्वोत्तर के राज्यों मे विभिन्न अलगाववादी संगठन देशद्रोही गतिविधियों में लिप्त होकर सेना को निशाना ही नहीं बना रहे, बल्कि संपूर्ण पूर्वोत्तर की शांति में बाधा डाल रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले ही सेना के ऊपर उग्रवादियों के हमले में तीन सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे। गृह मंत्रालय के सूत्रों की मानें तो अफस्पा से ही एक मात्र विकल्प है जिससे कि उग्रवादियों से निपटा जा सकता है। इस अधिकार को देने से सेना का मनोबल भी बढ़ जाएगा।











