जम्मू-कश्मीर में नई सरकार की संभावनाखोजने होंगे सुखद भविष्य के सूत्र
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जम्मू-कश्मीर में नई सरकार की संभावनाखोजने होंगे सुखद भविष्य के सूत्र

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Feb 9, 2015, 12:00 am IST
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दिंनाक: 09 Feb 2015 12:48:31

विआशुतोष भटनागर
धानसभा चुनाव का परिणाम आने के बाद जम्मू-कश्मीर मेंे भावनाओं का जो अतिरेक दिखाई दे रहा था वह अब शांत होता दिखता है। यह अतिरेक कुछ मात्रा में भावात्मक था तो ज्यादा अतिरंजित भी। डेढ़ महीने बाद अब यह स्थिति आती दिखती है कि संयमित सोच के साथ सरकार गठन की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। दोबारा चुनाव से बचने का एकमात्र उपाय है कि जनादेश का आदर करते हुए भाजपा और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) गठबंधन कर सरकार बनाएं।
इस पर लंबी चर्चा हो चुकी है और अब यह प्राय: सर्वस्वीकृत है कि लगभग छह वर्ष तक सत्ता में रहे कांग्रेस-नेशनल कांफ्रेंस गठबंधन को राज्य की जनता ने नकार दिया है। इनके विरुद्ध जम्मू ने भाजपा को, तो कश्मीर घाटी ने पीडीपी को एकतरफा समर्थन देकर विधानसभा गठन के लिए अभूतपूर्व राजनीतिक परिस्थिति उत्पन्न कर दी। आशावादी दृष्टि से विचार करें तो लगता है कि यह अभूतपूर्व परिस्थति ही अभूतपूर्व परिणाम लेकर आएगी।
यह सत्य है कि भाजपा और पीडीपी, दोनों दलों के बीच वैचारिक दूरी बहुत है जिसको पाटने के लिए गंभीर प्रयत्न करने होंगे। साथ ही, जब तक सहमति न बने, तब तक दोनों को ही कुछ मुद्दों को ठंडे बस्ते में डालना होगा। लेकिन यही जनादेश है जिसका पालन करने की जिम्मेदारी नागरिकों ने दोनों दलों को दी है। यह प्राय: निश्चित है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पटरी से उतारने के लिए अलगाववादी तत्व ही नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीतिक दल भी कमर कस कर तैयार होंगे। लेकिन इसमें से रास्ता निकालने की जिम्मेदारी उन्हीं की है जिन्हें जनादेश मिला है।
पीडीपी के मुखिया मुफ्ती मुहम्मद सईद हालांकि परिवारवाद के चंगुल से तो बाहर नहीं निकल सके हैं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि घाटी के राजनेताओं की पुरानी पीढ़ी में वे सबसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता हैं। केन्द्र में गृहमंत्री रहते हुए उन्होंने देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था का अनुभव भी लिया है। संभवत: यह अनुभव ही उनके लिए चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टी के भीतर और बाहर से पड़ने वाले दबाव के बीच भी जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय धैर्यपूर्वक आगे बढ़ने में सहायक हुआ।
भाजपा के पास मुफ्ती जितने अनुभव वाला राजनेता भले ही न हो, किन्तु उसमें ऊर्जा और क्षमता से भरे जुझारू नेतृत्व की कमी नहीं है। हाल के चुनावों में जहां मोदी की राष्ट्रव्यापी अपील थी, वहीं स्थानीय स्तर पर भाजपा के प्रत्याशियों की संघर्षशीलता ने मतदाताओं को प्रभावित किया। दोनों के संयोग ने विजय का मार्ग प्रशस्त किया।
स्थिर सरकार देने के लिए जरूरी है कि गठबंधन से पहले ही न्यूनतम साझा कार्यक्रम और सरकार की संरचना पर स्पष्ट नीति का निर्धारण हो जाए। दोनों दल यह सुनिश्चित करें कि दल के मुखिया ही नहीं, बल्कि उसके जमीनी कार्यकर्ता भी न्यूनतम साझा कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में मदद करें और असहमति के मुद्दों को समय से पहले उठाने की जल्दबाजी न करें। जम्मू में भाजपा और घाटी में पीडीपी को मिला समर्थन यह भी सुनिश्चित करने की मांग करता है कि दोनों दलों को एक-दूसरे को उनके प्रभाव क्षेत्र के संबंध में होने वाले निर्णयों में स्वतंत्रता देनी होगी। दोनों ही दलों को यह भी स्मरण रखना होगा कि प्रतिनिधित्व की दृष्टि से नगण्य होते हुए भी लद्दाख के पिछड़ेपन, संसाधनों के अभाव, भौगोलिक विस्तार और रणनीतिक महत्व को ध्यान में रख कर वहां के लिए विशेष योजनाएं बनानी होंगी और उनके समयबद्ध क्रियान्वयन पर ध्यान देना होगा।
सीमावर्ती राज्य होने के कारण पाकिस्तान और चीन दोनों की ही कुदृष्टि जम्मू-कश्मीर पर रहती है। अमरीकी सेना की अफगानिस्तान से वापसी के बाद उसका क्या प्रभाव राज्य पर पड़ेगा, यह अभी देखना बाकी है। पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में चल रहे आतंकवादी शिविर, गिलगित-बाल्टिस्तान पर कसता चीनी शिकंजा आदि विषय भी शेष देश में कम, लेकिन जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में अधिक महत्व रखते हैं। सीमा की सुरक्षा चाक-चौबंद करने के लिए यदि सरकार द्वारा प्रभावी कदम उठाए जाएंगे तो निश्चय ही इन प्रश्नों से भी सामना होगा।
चुनाव में मिला जनादेश राज्य में शांति की इच्छा की अभिव्यक्ति है। दशकों तक चले कथित 'भारत बनाम कश्मीर' के संघर्ष को सही परिप्रेक्ष्य में समझने और हल करने की चुनौती भी नई सरकार के सामने है। पिछली सरकारों ने अलगाववाद, आतंकवाद और इस्लामिक कट्टरवाद को एक ही पलड़े में रखकर स्थिति को जटिल बनाया है। ये तीनों अलग हैं और इनसे पृथक रूप से निपटना होगा। इसके लिए दोनों दलों को परस्पर सहमति से नीति निर्धारण करना होगा।
राज्य में विस्थापितों और शरणार्थियों का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। पिछली सरकार द्वारा गठित संयुक्त संसदीय समिति की संस्तुतियां प्राप्त हो चुकी हैं जिनका क्रियान्वयन बाकी है। यद्यपि इसका बड़ा हिस्सा केन्द्र सरकार को करना है, लेकिन राज्य की सकारात्मक भूमिका समस्या के समाधान में सहायक होगी। विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं की वापसी का मुद्दा भी समान महत्व का है। राज्य में शांति व्यवस्था पटरी पर आ गई है, यह हिन्दुओं की सुरक्षित और सम्मानपूर्ण वापसी से ही सिद्ध हो सकेगा।

भाजपा ने तो चुनाव को विकास के मुद्दे पर ही केन्द्रित किया था। सरकार के गठन की स्थिति में भी न्यूनतम साझा कार्यक्रम का केन्द्र-बिन्दु विकास ही हो सकता है। इसलिए संभावित सरकार को विकास को प्राथमिकता देनी होगी। एक ओर राज्य में बड़ा निवेश आए इसके लिए प्रयास करने होंगे, वहीं दूसरी ओर पूरे राज्य में लघु और कुटीर उद्योगों का जाल बिछाना होगा। आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन, उचित कराधान नीति और सस्ते ऋण की व्यवस्था भी करनी होगी। सड़क, परिवहन, पर्याप्त बिजली आपूर्ति जैसे आधारभूत अवयवों को मजबूत बनाना होगा। इसी प्रकार से नियंत्रण रेखा के दोनों ओर से चल रहे व्यापार को मजबूती देकर न केवल स्थानीय उद्योगों को सशक्त किया जा सकता है, अपितु नियंत्रण रेखा के दोनों ओर परस्पर-पूरकता को बल देकर विश्वास बहाली के प्रयासों को गति दी जा सकती है।
पर्यटन की अपार संभावनाएं जम्मू-कश्मीर में हैं। कश्मीर घाटी के श्रीनगर, गुलमर्ग और पहलगांव जैसे गिने-चुने स्थानों को छोड़ कर राज्य के अधिकांश स्थान आज भी पर्यटकों के लिए अपरिचित हैं। कश्मीर घाटी के गुरेज जैसे क्षेत्र और जम्मू और लद्दाख के अधिकांश क्षेत्र प्राकृतिक सुषमा से संपन्न होने के बावजूद सड़क और यातायात के साधनों, रखरखाव और सौन्दर्यीकरण की कमी तथा उचित प्रोत्साहन के अभाव से जूझ रहे हैं। उचित नीतियां बना कर न केवल घरेलू, बल्कि विदेशी पर्यटकों को बड़ी संख्या में आकर्षित किया जा सकता है और इसके आधार पर रोजगार और विकास का एक नया अध्याय लिखा जा सकता है। साहसिक पर्यटन, ग्रामीण पर्यटन, पैराग्लाइडिंग, पर्वतारोहण, आदि के द्वारा इसमें नए आयाम भी जोड़े जा सकते हैं।
कश्मीर का पेपर मैशे, बसहोली की मिनियेचर पेन्टिंग, लद्दाख का पश्मीना जैसे तमाम कुटीर उद्योग और हस्तशिल्प, जो परम्परा से इन क्षेत्रों में आजीविका का साधन बने हुए हैं, सैकड़ों-हजारों वषोंर् की विरासत को अपने आप में संजोए हैं। नई सरकार का प्रोत्साहन इन्हें नया जीवन दे सकता है और रोजगार के अवसर भी। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में इन कलाओं और शिल्प के प्रदर्शन के अवसर मिलें तो अपने अनूठेपन के कारण दुनियाभर में धूम मचाने में समर्थ हैं।
औषधीय पौधों की खेती की दृष्टि से पूरा राज्य अनुकूल है। सैकड़ों प्रकार की वनस्पतियां यहां प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होती हैं जिनकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़ी मांग है। व्यावसायिक स्तर पर इनकी खेती कर विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्र को समृद्ध बनाया जा सकता है। इसके साथ ही योग और आयुर्वेद को जोड़कर राज्य को 'मेडिकल टूरिज्म' के केन्द्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
उपरोक्त सारी विकास योजनाएं तैयार करना सहज है, किन्तु उन्हें लागू करना कठिन। इसके लिए जहां केन्द्र और राज्य में सहयोग की भावना आवश्यक है, वहीं गठबंधन के साझीदारों के बीच परस्पर विश्वास। यह दोनों होने के बाद भी जनता के सक्रिय सहभाग के बिना यह असंभव है। दशकों की अराजकता ने नागरिकों का आत्मविश्वास छीन लिया है जिसे बहाल करना नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगा। इसके लिए पेशेवर राजनेताओं और अलगाववादियों के स्वयंभू मसीहाओं को किनारे कर नागरिकों के साथ सीधा संवाद स्थापित करना होगा। उन्हें विश्वास दिलाना होगा कि ठेकेदारों के भरोसे जनता को हांकने के दिन जा चुके हैं।
नई सरकार के सामने चुनौतियां अनेक हैं, किन्तु लक्ष्य एक। राज्य के प्रत्येक नागरिक के कल्याण का विचार करना और इस प्रक्रिया में प्रत्येक की सहभागिता सुनिश्चित करना। राज्य में जम्मू, कश्मीर व लद्दाख जैसे तीन भौगोलिक क्षेत्र हैं, वहीं हिन्दू, मुस्लिम, सिख और बौद्घ जैसे प्रमुख जनसांख्यिकी समूह। इनके अतिरिक्त शीना, बल्ती आदि अनेक ऐसे समूह भी हैं जो इस्लाम और ईसा के आगमन के पहले से इस क्षेत्र में रह रहे हैं और आज भी अपनी भाषा, लिपि और परम्पराओं को जीवित रखे हुए हैं। संख्या कम हो या अधिक, सभी को यह अनुभव होना ही चाहिए कि परिवर्तन सबके लिए आया है। दशकों बाद मिला यह सुअवसर व्यर्थ न जाए इसके लिए सबके विकास का लक्ष्य सामने रखकर और सबको साथ लेकर सुखद भविष्य के सूत्र खोजने होंगे।

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