|
पाञ्चजन्य के पन्नों से
वर्ष: 9 अंक: 38
16 अप्रैल,1956
जनसंघ प्रत्याशी की भारी जीत
मीरजापुर। स्थानीय नगर कांग्रेस कमेटी के मंत्री श्री राधेश्याम दुबे की 16 वर्षीय कन्या का अपहरण कर लिया गया है। बताया जाता है कि इस अपहरण में युवक कांग्रेस के प्रमुख सदस्यों तथा स्थानीय एम.एल.ए. के पुत्र का सीधा-सीधा हाथ है।
उक्त घटना को घटित हुए अब काफी समय व्यतीत हो गया है और सरकारी अधिकारियों तथा कांग्रेस पदाधिकारियों ने श्री दुबे की कोई सहायता नहीं की, उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया। बात को इस हद तक बढ़ते देखकर उ.प्र. कांग्रेस कमेटी ने आचार्य बीरबल,एम.पी. को समस्त काण्ड की छानबीन करने के लिए यहां भेजा।
आचार्य जी ने सर्वश्री सिद्धनाथ पाण्डेय,रमानाथ दुबे, वासुदेव गौड़, विश्वनाथ हलवाई,…इन लोगों ने,बताया जाता है,स्पष्ट शब्दों में कहा युवक कांग्रेस के प्रमुख कार्यकर्ता श्री कमलाकान्त मिश्र उर्फ छोटे (आप यहां के कांग्रेसी एम.एल.ए. श्री ब्रजभूषण मिश्र के सुपुत्र हैं),श्री त्यागमूर्ति नाई,श्री फूलचन्द्र वर्मा तथा पप्पी श्री दुबे के यहां जाया करते थे और उनकी पत्नी से प्राय: घुलमिल कर बातचीत किया करते थे। उन्होंने यह भी बताया कि जिस दिन लड़की को भगाया गया उस दिन ये लोग उसके साथ स्टेशन पर भी थे। पप्पी लड़की को लेकर गाड़ी में बैठा था। उस समय भी श्री वर्मा,कमलाकान्त मिश्र तथा श्री सत्यमूर्ति नाई प्लेटफार्म पर टहल रहे थे और उस समय तक टहलते रहे जबतक की गाड़ी चली नहीं गई।
आचार्य जी ने श्री वर्मा,श्री मिश्र तथा श्री सत्यमूर्ति को बुलाया था,किन्तु वो नहीं आये,जिसके कारण जनता का संदेह और भी गहन रूप धारण करता जा रहा है। अब तक न तो लड़की का ही पता है और न ही पप्पी नामक व्यक्ति ही लौटकर आया है। …
पाक-एजेण्टों के देशव्यापी षड्यंत्र
कड़ी निगाह रखने की आवश्यकता
देश में कुछ दिनों से मुसलमानों की अराष्ट्रीय कार्यवाहियां पुन: जोरशोर से शुरू हो गई हैं। उ.प्र. के मुख्यमंत्री डा.सम्पूर्णानंद ने तो इस सत्य का भी उद्घाटन किया था कि मुसलमानों ने सऊदी अरब के बादशाह के पास भी इस प्रकार का स्मृति – पत्र भेजा था कि भारत के मुसलमानों के खिलाफ जेहाद छिड़ी हुई है और उन्हें हर प्रकार से धर्मपरिवर्तन के लिए विवश किया जा रहा है। इस समस्त मामले को कोई बुद्धिमान व्यक्ति कुछ लोगों का मतिभ्रम या सिरफिरापन कह कर नहीं टाल सकता।
पीलीभीत काण्ड : खैर,यह घटना तो काफी पुरानी हो गई,किन्तु अब पुन: भारत में यत्र-तत्र मुसलमानों के कुचक्र जोरशोर से शुरू हो गए हैं। इन कुचक्रों का दौर भारत पर पाक-आक्रमण के साथ और तीव्र हुआ है। होली के अवसर पर उ.प्र. के पीलीभीत नगर में सुनियोजित दंगों की योजना पाकिस्तानी एजेन्टों तथा स्थानीय मुसलमानों द्वारा की गई। न केवल होली खेलने वालों पर ही भीषण आघात किए गए,वरन स्थानीय आयुर्वेद कालेज को लूटने तथा वहां रहने वाले विद्यार्थियों को आहत करने का भी प्रयास किया गया। यदि स्थानीय अधिकारियों ने सतर्कता नहीं बरती होती,तो शायद निरपराध छात्रों की जानें जातीं और शहर में दंगों ने भीषण रूप धारण कर लिया होता। पीलीभीत के अतिरिक्त भी उ.प्र. में अनेक स्थानों पर इस प्रकार के दंगे करने का प्रयास किया गया है। आजमगढ़ के सिहतुल नवी के जलसे में पाकिस्तान से आए हुए आगंतुकों (एजेण्टों) द्वारा जिस प्रकार हिन्दुओं के खिलाफ विषवमन किया गया और हिन्दुओं के खिलाफ मुसलमानों को भड़काने का प्रयास किया गया, वह भी साधारण बात कहकर टाली नहीं जा सकती।
भोपाल कांड : किन्तु इससे भी अधिक भीषण कांड भोपाल में हुआ है,जहां मुसलमानों ने एक हिन्दू मंदिर को भ्रष्ट किया और जब हिन्दुओं ने मुसलमानों के इस कृत्य के विरुद्ध एक जुलूस का आयोजन किया,तो उस पर सोडावाटर बोतल और पत्थरों से आक्रमण किया गया। स्थिति को अत्यन्त भीषण रूप धारण करते देखकर पुलिस को रिवाल्वरों से गोलियां चलानी पड़ीं। परिणामस्वरूप कई व्यक्ति घायल हुए।
बिना लाइसेंस का ट्रांसमीटर : इस उपद्रव के सम्बन्ध में तीन पाकिस्तानी गिरफ्तार किए गए हैं। पुलिस का कहना है कि इन पाकिस्तानी एजेण्टों ने उपद्रव की योजना बनाई थी। बताया यह भी जाता है कि इन लोगों के पास बिना लाइसेंस के ट्रांसमीटर भी बरामद हुआ है। इस ट्रांसमीटर से वे लोग भारत के समाचार पाकिस्तान भेजते होंगे और वहां से निर्देश प्राप्त करते होंगे,यह कोई बताने की बात नहीं है।
असम प्रदेश में पाक एजेन्ट: लोकसभा में हुई बहस के समय एक तथ्य अभी हाल में सामने आया कि असम प्रदेश में अनेक पाकिस्तानी एजेण्ट घुस आए हैं और वो प्रदेश के एक भाग को पाकिस्तान में सम्मिलित कराने के लिए वातावरण तैयार कर रहे हैं…
दिशाबोध
राष्ट्रभाव से समझौता नहीं -श्रीगुरुजी
जब मन में विचार करता हूं तो ऐसा लगता है कि किसी परिस्थिति से अभिभूत होने के कारण मन में ऐसा विचार आना यानी पराभव स्वीकार करना है। और एक बार परिस्थिति के सम्मुख जिसने पराभव स्वीकार कर लिया,वह परिस्थिति को परिवर्तित करने की क्षमता और शक्ति किस प्रकार रख सकेगा? क्योंकि परिस्थिति जैसी है वैसी ही है।
अपनी भूमि में जो प्रजातंत्र आया, उसके कारण एक प्रकार का महत्व अल्पसंख्या में होते हुए भी अहिंदू समाज को मिल सकता है। परन्तु क्या उस महत्व को ध्यान में रखते हुए और उसका लाभ उठाने के लिए अपने शब्दों में परिवर्तन करने की आवश्यकता है? इसी प्रकार 20-25 वर्ष तक स्थाई रूप से चलता रहा तो यह भी भाव निर्माण होना संभव है कि 'हिंदू' शब्द के आग्रह का कोई कारण नहीं। यह वायुमंडल सर्वथा संभवनीय है। ऐसा हो सकता है। तो अपने को क्या करना चाहिए? जब लोग कहते थे कि हमारे हृदय में तो हिंदूपन ही है, तो हमारा यही उत्तर था कि हृदय तो दिखता नहीं, वाणी और कृति के द्वारा हिंदूपन का परिचय होना चाहिए। व्यक्त रूप से यदि सामान्य लोगों को यह दिखाई दे तो वो मानेंगे, केवल हृदय में होने से समाधान नहीं होगा-ऐसा उत्तर भी देते थे। जो आज नहीं मानते, वो भी मानेंगे। उनके संदेह दूर करेंगे।
-श्रीगुरुजी समग्र: खण्ड 2 पृष्ठ 227











