| दिंनाक: 27 Dec 2014 14:57:52 |
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कुछ लोग सम्मान पाकर गौरवान्वित होते हैं और कुछ लोगों को सम्मान देकर सम्मानित करने वाली संस्था गौरवान्वित होती है। महामना मदन मोहन मालवीय ऐसे ही महामानव थे। मोदी सरकार ने उन्हें और अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित कर स्वयं को गौरवान्वित किया है। दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी सरकार ने कांग्रेस की संकीर्ण सोच वाली सम्मान परंपरा को एक उदार धरातल पर ला खड़ा किया है। कांग्रेस के शासनकाल में यह सूची प्राय: महात्मा गांधी से शुरू होकर नेहरू गांधी परिवार तक अथवा कांग्रेसियों तक ही सीमित रहती थी। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र निर्माण में निरपेक्ष भाव से अपने पूरे जीवन की आहुति देनेवाले महापुरुषों की आजाद भारत में एक हद तक उपेक्षा ही की गई। कई महापुरुषों को तो उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर भी याद करने की जरूरत नहीं महसूस की जाती थी। मालवीय जी को उनकी 154 वीं जयंती पर इस सम्मान के साथ श्रद्घांजलि दी जा रही है। उनके अवदान के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जा रही है। भाजपा सरकार इसके लिए साधुवाद की पात्र है।
महामना मालवीय जी एक सुलझे हुए निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकार, अध्यापक, अधिवता, समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनकी इच्छाशक्ति इतनी प्रबल थी कि जो ठान लेते थे उसे किसी भी कीमत पर पूरा करते थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय इसका ज्वलंत उदाहरण है। सिर्फ जन सहयोग की बदौलत इतना बड़ा संस्थान खड़ा कर लेना किसी करिश्मे या दिवास्वप्न की तरह ही है। इसके निर्माण में एक रिक्शाचालक से लेकर उद्योगपति तक का आर्थिक सहयोग था। इसीलिए मालवीय जी को फकीरों का बादशाह कहा जाता था। वर्ष 1904 में उनके मन में इस तरह के विश्वविद्यालय की स्थापना की इच्छा जागृत हुई और 1916 को बसंत पंचमी के दिन महात्मा गांधी की मौजूदगी में इसका शिलान्यास किया गया। आज इसे एशिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय माना जाता है और इसमें करीब 30 हजार छात्र-छात्राओं को शिक्षा दी जा रही है। इसमें प्राच्य विद्याओं के साथ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा भी दी जा रही है।
मालवीय जी का जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुआ था लेकिन उनकी कर्मस्थली बनारस रही। वे भारत माता के सच्चे सपूत थे। उन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन एक अध्यापक के रूप में शुरू किया था। फिर वकालत के पेशे में आए। इलाहाबाद हाइकोर्ट में जब वह वकालत करते थे तो कभी भी फर्जी मुकदमों की पैरवी नहीं करते थे। सच के लिए लड़ते थे। वह अपने हाथ से पैसा नहीं छूते थे। इस बीच उन्होंने समाजसेवा का कार्य करते हुए शिक्षण संस्थानों, पुस्तकालयों और गोशालाओं की स्थापना की। वकालत को पेशे के रूप में जरूर अपनाया लेकिन पूरा ध्यान समाजसेवा में केंद्रित रहा। इस कारण कुछ ही समय बाद वकालत छोड़ दी। एक लंबे अंतराल के बाद दुबारा चौरीचौरा में फांसी की सजा पा चुके 150 स्वतंत्रता सेनानियों को बचाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे और उन्हें बचाने में सफल रहे। जब वे 25 वर्ष के थे तो 1986 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में अपने गुरु आदित्यराम भट्टाचार्य के साथ शरीक हुए और अपना जीवन देश की स्वाधीनता के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया। उन्होंने कांग्रेस के कई जिम्मेवार पदों को सुशोभित किया। उन्होंने इलाहाबाद में हिंदू समाज, साहित्य सभा और पुस्तकालय की स्थापना की। काशी विश्वनाथ मंदिर में हरिजनों के प्रवेश के लिए उनके नेतृत्व में जबर्दस्त आंदोलन हुआ था। उन्होंने गंगा महासभा की स्थापना कर अंग्रेजों को गंगा की अविरल धारा को बरकरार रखने के लिए समझौता करने को बाध्य किया। उनकी प्रेरणा से मथुरा वृंदावन में गोशालाएं स्थापित हुईं।
पत्रकारिता के क्षेत्र में मालवीय जी के योगदान को हमेशा याद किया जाएगा। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के कालाकांकर से उन्होंने हिंदोस्थान नामक दैनिक अखबार का संपादन किया। संपादक की स्वतंत्रता और गरिमा के वे प्रबल पक्षधर थे। एक बार कालाकांकर के राजा ने शराब के नशे में उनसे बात की, इससे नाराज होकर उन्होंने हिन्दुस्थान के संपादक पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद इंडियन ओपीनियन,लीडर, मर्यादा, सनातन धर्म, अभ्युदय आदि पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। मालवीय जी भारतीय पत्रकारिता के अग्रदूत रहे हैं। श्रीमद्भागवत और गीता के व्याख्याकार के रूप में भी उनकी धार्मिक और आध्यात्मिक ऊर्जा संचालित होती रही। वह भारतीय मनीषा के प्रतीक थे। मालवीय जी को दलगत राजनीति के आइने से देखना गलत होगा। वह कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में शामिल रहे हैं। इसके बावजूद कांग्रेस सरकार के किसी भी कार्यकाल में उनके योगदान को याद करने या उन्हें सम्मानित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। भाजपा सरकार ने उन्हें सम्मानित करने का निर्णय लेकर दरअसल देश की मिट्टी के प्रति उनके समर्पण को सम्मानित करने और देश के लोगों की भावनाओं का मान रखने का काम किया है। उम्मीद की जाती है कि मोदी सरकार उन तमाम महापुरुषों को उचित सम्मान प्रदान करेगी जिन्हें कांग्रेस की संकीर्ण मानसिकता के तहत उपेक्षित रखा गया है और जिनके योगदान को वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचने से रोक रखा गया है। -राजेश सिंह
लेखक महामनामालवीय द्वारा स्थापित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में जनसंपर्क अधिकारी (कार्यकारी) हैं।