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हमारा मन वृन्दावन सा हो जाए, घर-दफ्तर सभी जगह जीवन एक रास बन जाए… अगर हेतु यह है तो इस बार पर्यटन नहीं, सांस्कृतिक पर्यटन पर निकलिए। नया इतना कुछ है जानने को कि मन का हर अंधेरा कोना प्रकाश और ज्ञान से आपूरित हो जाएगा। पाकिस्तान में शिवभक्ति और यक्ष-युधिष्ठिर प्रसंग का गवाह कटासराज तथा 51 शक्तिपीठों में एक हिंगलाज भवानी या कम्बोडिया में दुनिया का सबसे बड़ा धर्मस्थल अंगकोरवाट, नेपाल में पशुपतिनाथ या म्यांमार के भव्य और दिव्य स्तूप… विकल्प कई हैं आपके पास। तो प्रारंभ करते हैं नैमिष से, जहां सतयुग में ही हमारी आज की सभी समस्याएं सुलझाने की विधि तैयार की गई थी, जो ज्ञान, संस्कृति और जीवन की गंगोत्री है…
आपने सतयुग देखा?
जवाब 'हां' तो हो नहीं सकता!
लेकिन उसके बारे में जानने की ललक तो है…?
बस, इस ललक की खातिर नैमिषारण्य जाएं। मैं कहूंगा कि नैमिषारण्य कोई तीर्थ नहीं है और हिन्दू तीर्थ तो कतई नहीं है। नैमिष ने तीर्थ बनाए हैं, उनकी आधारशिला रखी है। पूरे विश्व में मानव कैसे सुखी और संतुष्ट रहे, इसका ज्ञान-विज्ञान तैयार किया है। यहां सतयुग में ही कलयुग में होने वाले खतरों की आहट पहचानते हुए ज्ञान की 'आपदा प्रबंधन प्रणाली' विकसित की गई थी। यहां वेद-उपनिषद रचे गए। इसीलिए श्रीसत्यनारायण की कथा से लेकर तमाम पुराणों में आप पढ़ते सुनते आए होंगे- एकदा नैमिषारण्ये… यहां 88 सहस्र ऋषियों के ज्ञान की सभा हुई थी। कोई सत्संग नहीं था जिसमें साधारण जनों का तांता हो, एक से एक ज्ञानी विज्ञानी आए थे। दुनिया में कहीं किसी और समाज या देश में ऐसी व्यापक चर्चा होने का कोई कपोल-कल्पित उल्लेख भी नहीं मिलता।
सतयुगं नैमिषारण्ये त्रेतायां च पुष्करे।
द्वापरे कुरुक्षेत्रे कलौ गंगा प्रवर्तते।।
पुराणों की इस उक्ति के अनुसार नैमिषारण्य की महिमा सतयुग से चली आ रही है। त्रेता युग से पुष्कर तीर्थ की, द्वापर युग से कुरुक्षेत्र की तथा कलयुग में गंगा की महिमा हुई।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सड़क मार्ग से जाएंगे तो दो घंटे के भीतर पहुंच जाएंगे। राज्य सड़क परिवहन निगम की बस ढाई-पौने तीन घंटे में पहुंचा देती है। नैमिषारण्य, सीतापुर जि़ले में गोमती नदी का तटवर्ती एक प्राचीन तीर्थस्थल है। पुराणों, रामायण तथा महाभारत में इसका हवाला मिलता है। नैमिषारण्य वह पुण्य स्थान है, जहां शौनकादि 88 सहस्र ऋषीश्वरों को वेदव्यास के शिष्य सूत ने महाभारत तथा पुराणों की कथाएं सुनाई थीं। मनु-शतरूपा ने कठिन तप कर कर्मनिष्ठा और फिर मुक्ति की अमूल्य धरोहर मानव-जाति को सौंपी। यहां चक्रतीर्थ, व्यास गद्दी, मनु-सतरूपा तपोभूमि और हनुमान गढ़ी प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं।
चक्रतीर्थ पर बद्रीनारायण मंदिर के प्रबंधकर्ता आचार्य संतोष दीक्षित ने बताया कि महर्षि शौनक के मन में दीर्घकालव्यापी ज्ञान सत्र करने की इच्छा थी। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर विष्णु भगवान ने उन्हें ब्रह्ममनोमय नाम का एक चक्र दिया और कहा कि इसे चलाते हुए चले जाओ। जहां पर इस चक्र की नेमि (धुरी) गिर जाए, उसी स्थल को पवित्र समझना और वहीं आश्रम बनाकर ज्ञान सत्र करना। शौनक के साथ 88 सहस्र ऋषि थे। वे सब उस चक्र के पीछे घूमने लगे। गोमती नदी के किनारे एक वन में चक्र की नेमि गिर गई और वहीं पर वह चक्र भूमि में प्रवेश कर गया। चक्र की नेमि गिरने से वह क्षेत्र नैमिष कहा गया। इसी को नैमिषारण्य कहते हैं और जहां पर चक्र की नेमि गिरी वह स्थान चक्रतीर्थ हो गया।
यहां एक सरोवर है, जिसका मध्यभाग गोलाकार है और उससे बराबर जल निकलता रहता है। उस मध्य के घेरे के बाहर स्नान करने का घेरा है। यहीं नैमिषारण्य का मुख्य तीर्थ है। इसके किनारे अनेक मंदिर हैं। मुख्य मंदिर भूतनाथ महादेव का है। चक्रतीर्थ की बड़ी महिमा है। जब ब्रह्ममनोमय चक्र की नेमि गिरी वहीँ से जल की तेज धारा निरंतर प्रवाहित होने लगी। जब पूरा क्षेत्र इस जल से आप्लावित होने लगा तो ऋषि मुनियों ने ब्रह्मा जी से जल के इस तीव्र प्रवाह को रोकने के लिए प्रार्थना की। फिर ब्रह्मा जी के कहने पर आदि शक्ति ललिता देवी ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करके इस चक्र को वहां पर स्थापित करके जल के तीव्र प्रवाह को रोका। तभी से जल का प्रवाह बराबर हो रहा है। ललिता देवी की यहां विशेष मान्यता है। कहा जाता है कि सर्वप्रथम यहां पर अरण्य (जंगल) था। यहां तीन ही चीजें थीं- गोमती नदी, अरण्य और आदि शक्ति श्री ललिता देवी।
द्वापर में श्रीबलरामजी यहां पधारे थे। भूल से उनके द्वारा रोमहर्षण सूत की मृत्यु हो गयी। बलराम जी ने उनके पुत्र उग्रश्रवा को वरदान दिया कि वे पुराणों के वक्ता हों और ऋषियों को सताने वाले राक्षस बल्वल का वध किया। संपूर्ण भारत की तीर्थयात्रा करके बलराम जी फिर नैमिषारण्य आये और यहां उन्होंने यज्ञ किया।
हनुमान गढ़ी
चक्रतीर्थ से पंद्रह मिनट के पैदल रास्ते पर हनुमान गढ़ी है। यहां बहुत बड़े पत्थर पर गढ़ी गयी हनुमान जी की विशाल मूर्ति है। बताया जाता है कि रावण के कहने पर पाताल का राजा अहिरावण रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी को पाताल चुरा कर ले गया था। तब पाताल लोक पहुंच कर अहिरावण पर विजय प्राप्त करके लौटते समय हनुमान जी ने सर्वप्रथम इसी स्थान पर विश्राम किया था। हनुमान मंदिर के सामने ही श्री रामदरबार है जहां श्रीराम ,लक्ष्मण और सीता जी की प्रतिमा है।
ललिता देवी मंदिर
यह बहुत प्राचीन मंदिर है। दीक्षित जी ने बताया कि ब्रह्मा के आदेशानुसार देवासुर के संग्राम में असुरों के सर्वनाश के लिए देवी इसी स्थान पर प्रकट हुई थीं। मंदिर के बाहर माता पर चढ़ाने के लिए पुष्प, पुष्प मालाएं, प्रसाद, चुन्नी व अन्य चढ़ावे का सामान आदि से सजी हुई दुकानें हैं। पूरे नैमिष क्षेत्र के लोग ललिता देवी की आराधना से ही अपने सारे मंगल कार्य शुरू करते हैं और यह मानते हैं कि उन्हीं की कृपा से उनका पालन-पोषण हो पा रहा है।
वेदव्यास गद्दी
व्यास गद्दी गोमती नदी के तट पर है। यह चार वेद, छह शास्त्र, 18 पुराण, गीता, श्रीमद्भागवत, महाभारत और श्री सत्यनारायण कथा की उद्गम स्थली है। वेदव्यास जी ने यहीं पर उनकी रचना की। सत्यनारायण की कथा, जो भारत में घर-घर कही-सुनी जाती है, के प्रथम स्कंध की शुरुआत ही यहां से होती है- एकदा नैमिषारण्ये…
मनु-सतरूपा तपस्थल
इसके समीप ही मनु-सतरूपा का तपस्या स्थल है। पुरातन वट वृक्ष है जहां मनु-सतरूपा ने गोमती नदी में स्नान कर तेईस हजार वर्ष तक तपस्या करके मनु ने भगवान को पुत्र रूप में प्राप्त होने का वरदान मांगा था। राजा मनु और रानी सतरूपा के दो पुत्र और तीन कन्याएं थीं। पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपद तथा कन्याएं आकृति, देवहुति और प्रसूति। बाद में उन्होंने राजपाट का भार प्रियव्रत को सौंप दिया और तपस्या करने निकल पड़े। आगे उल्लेख है कि मनु-सतरूपा ने कई हजार वर्ष तक यहां तपस्या की। पर यह तपस्या कुछ पाने की नहीं थी। तप केवल तप के लिए था। यह कठिन तप भी दोनों का आनंद बन चुका था। अविनाशी आनंद। तभी तो, उनकी कठिन तपस्या को देखकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश इस पृथ्वी पर कई बार पधारे और कहा कि वरदान मांगो, हम तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हैं। फिर भी वे अपनी तपस्या से नहीं डिगे।कथा बताती है कि कई बार के अनुरोध के बाद भगवान विष्णु चतुर्भुज रूप में बालक बनकर उनके पास आए और किसी प्रकार उनकी तपस्या पूर्ण कराई। फिर वर मांगने को कहा, लेकिन दोनों ने कुछ भी वर नहीं मांगा। भगवान के बहुत जोर देने पर मनु ने कहा कि आप बालक रूप में यहां आए हैं। हम यही चाहते हैं कि आगे आपके समान ही मेरा पुत्र हो। भगवान ने वर दे दिया किंतु कहा कि मैं अपने समान पुत्र खोजने कहां जाऊं। हमारे समान तो इस भूमण्डल पर कोई और नहीं है। मैं ही आपके यहां जन्म लूंगा।
इसके बाद भगवान ने सतरूपा से कहा कि देवी, आप भी वरदान मांगें। इस पर सतरूपा ने कहा कि हमारे पति ने जो वरदान मांगा है, वही हमको भी अतिशय प्रिय है। फिर भगवान बोलते हैं- जब तुम अयोध्यापुरी के राजा दशरथ और तुम रानी कौशल्या होगी, तब मैं तुम्हारे यहां पुत्र के रूप में अवतार लूंगा।
यहां हमारे लिए यही सीख है कि फल की इच्छा के बिना की गई तपस्या सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि तब भगवान स्वयं सर्वश्रेष्ठ ही देने को आतुर हो जाते हैं। यह उनकी आनंददायक विवशता है।
दूसरी बात कि हमें किसी से मांगते समय शालीनता का भी ध्यान रखना चाहिए। राजा मनु भगवान को भी पुत्ररूप में मांग सकते थे। लेकिन उन्होंने सोचा कि यह उचित नहीं होगा कि मैं अपने प्रभु को ही मांग लूं। तो उन्होंने भगवान समान पुत्र मांगा और स्वयं भगवान ने स्वेच्छा से उनका पुत्र बनना स्वीकार किया।
सूतजी का स्थान
यही वह स्थान है जहां पर सूतजी ने शौनक जी समेत 88 सहस्र ऋषियों को अठारहों पुराणों की कथा सुनायी थी। यहां एक साधारण सा मंदिर है जिसमें सूतजी और भगवान कृष्ण, राधाजी तथा बलराम जी विराजमान हैं। यहां आकर आपको ऊर्जा का स्तर स्वयं ही अनुभव करा देता है कि मन के विचार धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं, एक शांति सी आ रही है।
दधीचि कुंड
चक्रतीर्थ से ग्यारह किलोमीटर की दूरी पर दधीचि कुंड है। यहीं उन्होंने अपनी अस्थियां दान दी थीं।
वृत्तासुर राक्षस के वध के लिए वज्रायुध के निर्माण हेतु जब इन्द्रादि देवताओं और ऋषियों ने महर्षि दधीचि से उनकी अस्थियों की मांग की तो उन्होंने कहा कि मेरी इच्छा है कि मैं सभी देवताओं, तीर्थांे का दर्शन कर लूं और पवित्र सरोवरों में स्नान कर लूं। उसके बाद ही मैं शरीर छोड़ पाऊंगा।
ऋषियों ने कहा कि इसमें तो बहुत समय लग जाएगा और तब तक यह राक्षस ऋषियों और आमजन का काफी नुकसान कर चुका होगा। लेकिन दधीचि की इच्छा की पूर्ति भी आवश्यक थी। इसलिए सभी तीर्थांे, देवताओं और पवित्र नदियों-सरोवरों को नैमिष आने का आमंत्रण दिया गया। वे सभी आ गए।
एक सरोवर में सभी पवित्र तीर्थां के सरोवरों का जल मिलाया गया। अस्थिदान से पूर्व महर्षि दधीचि ने इस सरोवर में स्नान किया था। उसके बाद तीर्थां और देवताओं की दधीचि ने परिक्रमा की। सभी तीर्थों से पवित्र नदियों के जल को लाकर एक ही स्थान पर इसी मानसरोवर में मिलाया गया था, इसलिए यह स्थान मिश्रित या फिर मिश्रिख के नाम से जाना जाता है और फाल्गुनी पूर्णिमा को महर्षि ने परमार्थ में अपनी अस्थियां दान में दे दीं!
दधीचि के देहदान की कहानी भी अद्भुत है। उन्होंने सरोवर में स्नान किया और शरीर पर दही-नमक लगाकर मांस-मांस गौओं को खिला दिया। जब हड्डियां शेष रह गईं तो उनका वज्र बना। प्रस्तुति : अजय विद्युत










