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दो सौ मीटर की दूरी ज्यादा नहीं है, मगर दस वर्ष के बच्चे के लिए यह फासला भी मायने रखता है। खासकर तब जब, आस-पास उसके यारों-प्यारों की लाशें गिरी हों, कानों के पास से सनसनाती गोलियां निकल रही हों।
अपने दोस्त डेनियल का हाथ पकड़े स्कूल के पिछले दरवाजे की तरफ दौड़ते इरफान के लिए यह रास्ता 200 मीटर का नहीं, जिंदगी, और मौत के बीच का ऐसा अंतर था जिसका हर क्षण उसे जीवन भर याद रहेगा। उखड़ती सांसों, घबराहट में टूटती आवाज और आतंकी हमले से बच निकलने के काफी देर बाद तक कांपते इरफान का हाल बता रहा था कि स्कूल के भीतर बच्चों पर क्या बीती होगी! …पाकिस्तान के पेशावर आर्मी स्कूल पर तहरीक-ए-तालिबान द्वारा किए गए आतंकी हमले के लिए 'भर्त्सना' बहुत हल्का और अहिंसक शब्द है।
इस घटना ने पूरे विश्व को दहला दिया। मगर यह भी सच है कि बर्बरता और इस्लाम का जो गर्भनाल संबंध है, यह हमला उसी कबायली सोच का नतीजा है। सच यह भी है कि खुद पाकिस्तान के गाल पर वहाबी पागलपन का यह पहला ऐसा तमाचा है जो उसे महसूस हुआ है। सुन्नी मुसलमानों के अलावा अन्य किसी की हत्या जहां सत्ता और समाज को नहीं झकझोरती। शिया,अहमदिया या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को जो समाज निगलता जाता है, वहां इस हमले के बाद उस पूरे देश और समाज में सिहरन दिखती है।
बहरहाल, उस पूरे देश के लिए यह हमला 'करनी के फल' से ज्यादा सोचने का मौका लेकर आया है। पेशावर हमले के तार उसी तरह अफगानिस्तान से जुड़े हैं जिस तरह मुम्बई हमले के सूत्र पाकिस्तान से जुड़े हैं। तालिबानी कमांडर उमर ने उसी तरह अफगानिस्तान में बैठकर आतंकी साजिश रची जिस तरह हाफिज सईद ने पाकिस्तान में बैठकर मुम्बई पर हमले को कार्यरूप दिया।
उमर और तालिबानी सरगना मुल्ला फजलुल्लाह को पाकिस्तान के हवाले किए जाने की मांग लेकर अफगानिस्तान पहुंचे पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ के लिए यह अपने गिरेबान में झांकने का समय है। यह फजलुल्लाह और हाफिज सईद जैसों को उनकी सही जगह दिखाने का समय है।
दुनिया के लिए यह समय इस्लाम को मानवता की कसौटी पर परखने का है। इस्लाम स्वीकार न करने पर गुरु तेगबहादुर का शीश उतार लेने वाला औरंगजेब, गुरु गोबिंद सिंह के बेटों को जिंदा दीवार में चिनवा देने वाला वजीर खान या आर्मी स्कूल में बच्चों की लाशें बिछा देने वाला फजलुल्लाह, फर्क क्या है? क्या सभ्य दुनिया में मजहबी राक्षसों की मनमानी जारी रह सकती है? क्या इस्लाम को उन मुल्लाओं के भरोसे छोड़ा जा सकता है जो खुद 'एक किताब' पढ़कर स्कूलों को बर्बाद करने निकले हैं?
यह तथ्य है कि स्कूल और बच्चे पाकिस्तान और इससे बाहर भी इस्लामी आतंक का शिकार पहली बार नहीं बने। मलाला जैसे बच्चों के स्कूलों को बर्बाद करने वाले उन्मादियों की कहानी सिर्फ पाकिस्तानी सेना के प्रति पेशावर में पलटवार और तहरीक-ए-तालिबान पर नकेल कसने से थम जाएगी, यह मानना मूर्खता होगी। दरअसल, कोठरियों में बंद इस्लाम कठमुल्लाओं की पूंजी है और इसी से दुनियाभर में उनकी दुकान चल रही है। सुधार, प्रतिकार या नए विचार के लिए इन अंधेरी कोठरियों में दरार भर भी रास्ता नहीं है।
'सेटेनिक वर्सेस' के लेखक सलमान रुश्दी, कुरान में शैतानी आयतों की मिलावट की अपनी अवधारणा के चलते कठमुल्लों के निशाने पर हैं। लेकिन आर्मी स्कूल पर हमले के बाद रुश्दी के आलोचक क्या कहेंगे?
स्वचालित राइफलों से बच्चों को भूनते 'इस्लामी शैतान' आखिर किन मदरसों में कौन सी कुरान पढ़कर निकले हैं?
रुश्दी और 'सेटेनिक वर्सेस' को एक ओर रख भी दें तो आज मुल्लाओं से साफ-साफ पूछा जाने वाला सवाल यह है कि क्या तहरीक-ए-तालिबान के इन आत्मघाती जिहादियों को जन्नत में हूरें मिलेंगी? घृणा और बर्बरता का हर सूत्र कुरान से खोजकर लाने वाले मुल्लाओं और उनके द्वारा उद्धृत जहरीली आयतों को इन 132 बच्चों की हत्या के बाद भी क्या यह दुनिया बर्दाश्त करेगी?











