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'इस विजयादशमी से अगली विजयादशमी तक', इस मासिक स्तंभ के जरिए झांकिए भारतीय इतिहास के कुछ अनुपम नायकों के जीवन में। ऐसे नायक जिनके अनुकरणीय कार्य-व्यवहार ने हमें दिए विजय और गौरव की अनुभूति के स्वर्णिम पल।
प्रशांत बाजपेई
15वीं ईसवी में पुर्तगाली यात्री डॉ. मिनिंगो पीज ने राजा कृष्णदेवराय के शासन काल में महान विजयनगर साम्राज्य का भ्रमण किया और उसका आखों देखा हाल लिखा। विजयनगर साम्राज्य के बारे में वह लिखता है-ऐसा लगता है, ये शहर रोम जितना बड़ा है, और बहुत सुंदर है। तालाबों, झीलों नहरों और उद्यानों से भरा पूरा है। फलदार वृक्षों के मानो जंगल हैं। दो विशाल हौदों से सारे शहर में जल आपूर्ति होती है। शहर में असंख्य लोग निवास करते हैं, लेकिन कोई नियम नहीं तोड़ता। ये विश्व का सर्वाधिक सुविधायुक्त शहर है। इस नगर में आपको दुनिया के हर देश का व्यापारी मिलेगा। यहां अन्न के विशाल भंडार और बड़ी दुकानें हैं। सामान बहुत सस्ता है। हाट बाजार अत्यंत व्यवस्थित हैं, लेकिन (व्यापारिक गतिविधियों के कारण) चलना मुश्किल है। इतने स्वच्छ पालतू पशु दुनिया में कहीं और नहीं दिखते। फलों की भरमार और दूध, मक्खन तथा तेल की गुणवत्ता का कहना ही क्या।''
विजयनगर के बारे में अन्य पुर्तगाली यात्री फरनाओ नून्स, वेनिस के व्यापारी निकोलो दि कोन्ती तथा फारसी यात्री अब्दुल रज्जाक ने भी प्रशंसा के शब्द लिखे हैं। परंतु विजयनगर की महानता सिर्फ उसकी भव्यता, समृद्घि और सुशासन तक सीमित नहीं है, जितना परदेसी आंखें देख समझ सकीं। विजयनगर के जन्म में ही समस्याओं के काल सुसंगत उत्तर ढूंढने की हिंदू जीवन दृष्टि का आधार मौजूद है।
14 वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध। भारत की जनता इस्लामिक आक्रमणकारियों के हमलों और अत्याचारों से हलाकान है। मठ-मंदिर, गौ, धर्म, सम्मान सभी पर स्थान-स्थान पर आक्रमण हो रहे हैं। इसी बीच वारंगल के राजा प्रताप रुद्र और मोहम्मद बिन तुगलक की सेनाओं का युद्घ के मैदान में आमना-सामना होता है। वारंगल की सेना पराजित होती है, राजा प्रताप रुद्र मारे जाते हैं। सम्मान बचाने के लिए हजारों स्त्रियां जौहर कर मृत्यु का वरण करती हैं। मोहम्मद बिन तुगलक की उन्मादी सेना लूटपाट और नरसंहार करती है। कुछ प्रमुख लोगों को बंदी बनाकर दिल्ली ले जाया जाता है और तलवार की नोक पर इस्लाम कुबूल करवाया जाता है। इन विवश लोगों में वारंगल की सेना के दो नायक और भाई हक्क तथा बुक्क भी शामिल हैं। वे परिस्थितियों को देखते हुए मुस्लिम पहचान तो स्वीकार कर लेते हैं लेकिन हृदय में स्वधर्म और अपनी संस्कृति की अलख जगती रहती है। एक दिन दोनों पहरेदारों की आंख से बचते हुए भाग निकलते हैं। कंपिली के जंगल में उन्हें महान तपस्वी विद्यारण्य स्वामी मिलते हैं। स्वधर्म से हीन हक्क बुक्क के खण्डित मनों को वे ढांढस बंधाते हैं। दोनों का शुद्घिकरण करके पुन: हिंदुत्व की गोद में ले आते हैं, और उन्हें स्मरण दिलाते हैं कि धर्म कर्मकाण्डों और बाह्य क्रियाकलापों तक सीमित नहीं हैं और जब तक हृदय शुद्घ है धर्म भ्रष्ट नही हो सकता। उत्साह और ऊर्जा से भरे हक्क और बुक्क पुन: सेना संगठित करते हैं, जिसमें संत समाज भी उनका सहयोग करता है। निरंतर संघषार्ें के पश्चात विजयनगर साम्राज्य के रूप में उन सबके स्वप्न साकार होते हैं।
विजयनगर साम्राज्य के अस्तित्व में आने के बाद दक्षिण भारत में इस्लामी आक्रांताओं की बढ़त रुक गई। निरंतर युद्घों में उलझे रहने के बाद भी विजयनगर की सुव्यवस्था और समृद्घि बढ़ती चली गई। राजा कृष्णदेवराय के समय ये साम्राज्य अपने वैभव के शिखर पर पहुंच गया। जब शासकीय धन का गबन करके भागे एक मुगल व्यापारी को उनके प्रतिस्पर्द्धी आदिलशाह ने अपने यहां राजकीय शरण दी, और उसे सौंपने को तैयार नहीं हुआ, तब कृष्णदेवराय ने सवा सात लाख सैनिकों की विशाल सेना के साथ आदिलशाह पर आक्रमण कर दिया। परंतु इसके पूर्व इस चतुर कूटनीतिज्ञ शासक ने बरार, बीदर और गोलकुंडा के सुल्तानों को आदिलशाह का साथ न देने पर राजी कर लिया, जबकि सभी स्थानीय हिंदू शक्तियों को अपने पक्ष में लामबंद करने में भी सफल रहे। फलस्वरूप आदिलशाह पराजित हुआ, और दक्षिण भारत का सुल्तान बनने का उसका स्वप्न भी चकनाचूर हो गया। दक्षिण भारत में विजयनगर की धाक जम गई। सभी शासक कृष्णदेवराय की मित्रता को इच्छुक हो गए। पुर्तगाली भी खुशामद में लग गए।
विजयनगर साम्राज्य में संस्कृत, कन्नड़, तमिल तथा तेलुगू साहित्य का विकास हुआ। कृष्णदेवराय ने अनेक भव्य देवालयों का निर्माण करवाया, जिनमें कृष्णा स्वामी, रामा स्वामी और विट्ठल स्वामी मंदिर प्रमुख हैैं। उन्हांेने संत विद्यारण्य की स्मृति में बने हम्पी मंदिर को विकसित किया। विद्यारण्य स्वामी विजयनगर साम्राज्य के प्रणेता तो थे ही, साथ ही उच्चकोटि के आध्यात्मिक पुरुष और प्रकांड विद्वान भी थे। उन्होंने छ: वषोंर् तक श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य के रूप में समाज का मार्गदर्शन किया। उन्होंने पाराशर माधवीय और सर्वदर्शन संग्रह की रचना की। सत्य की अनवरत खोज और समाज में समन्वय के उनके प्रयासों की झलक उनके द्वारा उस समय प्रचलित सोलह दर्शन धाराओं की व्याख्या के रूप में मिलती है। उन्होंने जिन 16 धाराओं को समाज के सामने सुलझाकर रखा वे इस प्रकार हैं – चार्वाक, बौद्घ , जैन, पुराण प्रज्ञा, नकुलिसा-पशुपता, शैव, प्रत्यभिज्ञान, रसेश्वर, वैशेषिक, न्याय, जैमिनी, पाणिनी, सांख्य, पतञ्जलि और वेदांत।
118 वर्ष की आयु में जब इस तपस्वी ने देहत्याग किया, तब प्रजा ने उनकी भव्य प्रतिमा हम्पी के विरूपाक्ष मंदिर में स्थापित की।
अबकी बार, जब हम्पी जाएं तो विजयनगर साम्राज्य की उपलब्धियों पर गर्व कीजिए। हक्क-बुक्क और कृष्णदेव राय की महान विरासत का स्मरण कीजिए और विद्यारण्य स्वामी की इस कर्मभूमि में खड़े होकर हिंदुत्व के सनातन प्रवाह की धारा से चेतना के कुछ घूंट भी पीकर आइये। पीले – धूसर प्रस्तर शिल्पों पर कान लगाएंगे तो मन्त्र का कम्पन मिलेगा-'धमार्े रक्षति रक्षित:।'ल्ल











