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संस्कृति पर आघात- साजिश के केन्द्र में 'येल'

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Jun 14, 2014, 12:00 am IST
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दिंनाक: 14 Jun 2014 15:07:47

अभी कुछ दिन पहले तक केंद्र में जो सरकार थी वह ऐसे लोगों के समर्थन पर टिकी थी जो आतंकवादियों का कईर् अवसरों पर समर्थन करते दिखते थे। इसलिए आतंकवादियों को नियंत्रित करने का मनोबल ही उस सरकार के पास नहीं था,लेकिन अब मोदी सरकार के आने के बाद सिर्फ सरकारी कामकाज में ही बदलाव नहीं आया है,बल्कि सरकार को अपना वोट देने वाले मतदाताओं को भी सत्ता पक्ष से उम्मीदें जगी हैं। इस देश में जो आतंकवादी एकजुट होकर यहां युद्घ जैसी स्थिति निर्माण करते रहे थे उनके दीर्घकालीन इरादे क्या हैं, इसका विचार कर उन पर नियंत्रण करने में प्रत्येक नागरिक का सहभाग महत्वपूर्ण है। इन आतंकवादियों के हमलों के पीछे इस देश में अनेक सदियों तक लूट करने का उद्देश्य है, यह तो स्पष्ट है। ब्रिटिश हुकूमत ने विवाद के बीज बहुत गहरे तक बोए थे, इसलिए उन बीजों को उखाड़ने के लिए उसी तरह के दूरदर्शी प्रयासों की आवश्यकता है।
पिछलेे दस सालों में देश को तोड़ने एवं आतंक फैलाने वाली जिहादी कार्रवाइयों के उजागर होते रहने के बावजूद पिछली केंद्र सरकार कोई भी अहम निर्णय लेने की स्थिति में नहीं दिखती थी,लेकिन आज जो सरकार है वह प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवादियों के समर्थकों पर निर्भर नहीं है। इसलिए इस देश के करोड़ों मतदाताओं में सत्ता से आतंकवादी तत्वों पर कर्रवाई होने की आस जगना स्वाभाविक है। देश की समस्याओं के निराकरण के लिए पहले जितने यत्न करने का अंदाजा था उससे अधिक यत्न करना होगा, इसका भी अहसास हो रहा है, लेकिन आज नजरिए में एक बदलाव तो दिख रहा है। हमारी मातृभूमि को 'परम् वैभव' के स्थान पर ले जाने एवं उसके लिए चाहे जो कीमत चुकानी हो वह चुकाने की जिम्मेदारी हमारी ही है।
पिछले 65 वषोंर् में यह भूमि आतंकवादियों को ऐसी लगती थी जहां वे चाहे जो कर सकते हैं। ये एक चुनौती थी,क्योंकि आतंकवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं। आमतौर पर इस देश की भविष्य की समस्याओं का आकलन स्वतंत्रता के बाद पैदा हुईं समस्याओं की तुलना में किया जाता है, इसलिए बहुत पीछे लौटकर देखने की चिंता नहीं की जाती। लेकिन 200 वषोंर् तक अंग्रेजों के राज, 400 वषोंर् तक मुगलों के राज और उससे पूर्व गजनी से आए महमूद के हमलों के इतिहास की पृष्ठभूमि में आतंक होने के कारण काफी गहरे तक जा चुकीं आतंकवाद की जड़ंे तुरंत उखाड़ पाना संभव नही है, किंतु यह वस्तुस्थिति है कि संदर्भ बदल रहे हैं।
आतंकवाद के संदर्भ में अंग्रेजों, गजनी के मुहम्मद एवं बाबर से चली आ रही मुगलों की परंपरा का जिक्र करने का कारण यह है कि आज एकजुट होकर हमला करने वाले आतंकवादी इस देश पर पिछले एक हजार वषोंर् से चली आ रही लूट का अभियान कायम रखना चाहते है, इसलिए वे बार बार हमले करते हैं।
मुगलों के समय में, ब्रिटिश हुकूमत के समय में कितनी लूट हुई उसको लेकर विभिन्न मत हंै़ लेकिन पिछले 60-65 वषोंर् में इस देश का जितना पैसा काले धन के रूप में स्विस बैंकों में जमा किया गया है, उसकी तुलना में ब्रिटिश, गजनी के मुहम्मद से लेकर मुगलों के समय तक की लूट कितनी जबरदस्त हो सकती है, इसका कुछ अंदाजा मिलता है। बाबा रामदेव तथा अन्य जानकार लोगों के मत में आज भारत के 350 लाख करोड़ रुपये काले धन के रूप में विदेशों में जमा हंै। यह तो केवल काला धन है, लूट तो उससे अधिक ही होगी। पिछले एक हजार वर्ष में आतंकवादियों ने सिर्फ लूट ही नहीं मचाई, बल्कि बडे़ पैमाने पर नरसंहार किया एवं यहां ज्ञान की उपासना करने वाले विश्वविद्यालय ध्वस्त कर दिए।
इसका उल्लेख करने का कारण यह है कि इस देश पर हमले करने वाले आतंकवादी बंदरगाहों पर हमले करने वाले दस्यु नहीं हैं। पिछली कुछ सदियों में उन्होंने जिस तरह की लूट की, उसी तरह आने वाली अनेक सदियों तक उसे जारी रखा जा सके, इसलिए आज आतंकवादियों के संयुक्त हमले जारी हैं। भारत को लूटने का ब्रिटेन का पिछले 150 वर्ष का 'अधिकार' कायम रहे इसके लिए, भले ही भारत स्वतंत्र हो गया हो, तो भी इस देश का बार बार विभाजन हो और फिर से यहां वर्चस्व स्थापित कर लिया जाय, ऐसी मंशा रहती है। देश में ब्रिटिश लोगों ने कई तरह के विवाद खड़े किए हैं,जैसे, आर्य-अनार्य, आर्य- द्रविड़, आर्य-तमिल,तमिल-सिंहली और आर्य-लेमूरी। इन सभी विवादों का केन्द्र लंबे समय तक ब्रिटेन में था, उसके बाद वह यूरोप के अन्य देशों में रहा। आज वह मुख्य रूप से अमरीकी विश्वविद्यालयों में है।
ब्रिटिश लोगों का भारत पर राज था। वह राज यहां रेलवे, डाक व्यवस्था लाने, तहसीलदार व्यवस्था लाने या भरतीय दण्ड संहिता बनाने के लिए नहीं था, बल्कि यहां सतत लूट करने के लिए था। कम से कम इतिहास का अध्ययन करने पर तो यह समझ आना ही चाहिए। वास्तव में आज की युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन आतंकवादियों पर नियंत्रण कैसे हो। उन्होंने यहां कितनी लूट की, इसका अंदाजा लगाएं तो वे और कितनी करने वाले हैं, इसका अंदाजा लग जाएगा। डकैती करने वाली टोली भी डकैती डालने से पहले उस स्थान की जानकारी, लूटने की सामग्री, उसके लिए शस्त्र, समय एवं अचानक हमला करने की पद्घति का विचार करती है। फिर पिछले 200-300 वर्र्ष तक विश्व के 50 से ज्यादा देशों में जिन्होंने लूट मचाई है, उन्होंने इसका कितनी बारीकी से विचार किया होगा, इसका अंदाजा लग जाएगा। विदेशी शक्तियों को अभी और लूट मचानी है, यह कहा जाए तो नई पीढ़ी को यह तुरंत मंजूर नहीं होगा। 'जो हुआ सो हुआ, अब अगर आए तो हम देख लेंगे,' यह उनका उत्तर होगा। लेकिन भारत की लूट अनेक सदियों तक जारी रह सके, इसलिए इस तरह का दुष्प्रचार करने की कुटिल चाल चली गई कि भारत का इतिहास यूरोप से ही श्ुारू हुआ है। इसके पीछे का कारण समझ लेना आवश्यक है। यह कुटिलता 'आर्य यूरोप से आए' यही फैलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यूरोप से आने वाले आर्य एवं दक्षिणी द्वीपोंं से आने वाले लेमूरी लोगों के वंशज, तमिलों के संघर्ष से भारत की रचना हुई है, यह दिखाने का प्रयास भी ब्रिटिश लोगों ने किया। डीएनए नामक विज्ञान को खंगालें तो ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा 'आर्य यूरोप से आए' एवं 'लेमूरी लोग मैडागास्कर एवं इंडोनेशिया की कुछ जनजातियांें से आए', यह दिखाने का जो प्रयास किया गया वह पूरी तरह से बेबुनियाद है। वह प्रयास यद्यपि ब्रिटिशों का था लेकिन आज भी उसकी धुरी अमरीका में है।

यूरोप एवं अमरीका मुख्य रूप से यूरोपीय नस्ल के गोरे लोगों की बहुसंख्या वाला देश है।़ फिर भी उन्होंने गैर-श्वेत लोगों के इलाकों में इस आड़ में ऐसे कई केंद्र विकसित किए हैं जो दिखाते हंै कि वहां के विश्वविद्यालयों में अन्य देशों के समाजों के विकास की योजनाएं तैयार की जा रही हैं। ब्रिटिशों के राज में उन्होंने तमिलनाडु के पाठ्यक्रमों, प्रशासन, संस्थानात्मक जीवन और वहां के सांस्कृतिक जीवन में भी सत्ता के माध्यम से कई बातें सरकारी कामकाज का हिस्सा बना दी हैं। यहां ब्रिटिश सत्ता की समाप्ति के बाद अमरीकी विश्वविद्यालयों से ये बातें शुरू हुई थीं। अमरीका के 'येल' विश्वविद्यालय में तमिल भाषा के माध्यम से आतंक फैलाने की योजनाओं को आकार दिया गया है। यह दिखाने का प्रयास किया गया कि 'तमिल भाषा के शब्दों का मूल भारतीय नहीं' एवं 'अफ्रीका होते हुए वे यूरोप तक पहुंचे'। इसी तरह हार्वर्ड विश्वविद्यालय की जो योजना है वह यह है कि 'तमिल इस देश के मूल निवासी हैं'। पिछले 20 वषोंर् से मूल निवासी आंदोलन माओवादियों के माध्यम से पूरे देश में फैलाने का प्रयास जारी है। बर्कले विश्वविद्यालय में तो 'तमिल एक स्वतंत्र राष्ट्र है', ऐसा बताकर इस झूठ को परिपुष्ट करने की योजना पिछले 20 वषोंर् से जारी है। तमिल साहित्य का संबंध लेमूरी संस्कृति के माध्यम से अफ्रीका से है, अफ्रीका के कारण यूरोप की ईसाई संस्कृति से संबंध है, दक्षिण-पूर्व एशिया की कुछ चीजों से संबंध है, लेकिन उसका उत्तर भारत से संबंध नहीं है, यह दिखाने के प्रयास हुऐ हैं। लंबे समय तक ब्रिटिश हुकूमत होने के कारण उसे जनजीवन में न केवल मान्यता प्राप्त हो गई, बल्कि उसके आधार पर हिंसक आंदोलन चल रहे हैं।
ब्रिटिश लोगों, ईसाई मिशनरियों और अमरीकी विश्वविद्यालयों ने मिलकर इस विषय का जो प्रतिपादन किया है वह किसी युद्घ की तैयारी की दृष्टि से किया है। भारतीय समाज की विशेषता यह है कि कुल के देवता, कुल, कुल की देवी, कुल की उपासना, कुल-संस्कार तथा कुल-संस्कृति एक होते हैं। स्थानीय भाषा एवं स्थानीय मौसम के अनुसार कुछ अंतर छोड़ दें तो अनेक बातें ज्यों की त्यों हैं।
पहले पहल ब्रिटिश लोगों ने दक्षिण में 'वनवास भोगने वाले राम की संस्कृति आर्य थी एवं रावण की संस्कृति अनार्य थी', यह दिखाने का प्रयास किया, पर वह सफल नहीं हो पाया। इसलिए श्रीलंका में थिओसाफिकल सोसायटी और लेमूूरिया संस्कृति का मिश्रण इस तरह किया गया कि मैडागास्कर से आए हुए शब्द स्थानीय के रूप में स्वीकृत करने के लिए बाध्य किया गया, लेकिन मंदिर संस्कृति एवं संगीत संस्कृति की एकरूपता स्पष्ट दिखते हुए भी उसे आक्रमण करार दिया गया।
इस सबका बारीकी से अध्ययन करने की आवश्यकता इसलिए है कि कल तक हम जो इतिहास पढ़ रहे थे और आज जो पढ़ रहे हैं़, इसमें विवरण का कोई अंतर न होकर भी दृष्टिकोण का अंतर निश्चित है। इसमें एक बात ध्यान देने योग्य है कि इतिहास का अध्ययन, आक्रामकों की हिंसा की परिसीमा, ये मुद्दे चाहे जितने सच हों, पर आवश्यक नहीं कि केवल उसी आधार पर सामने वाला व्यक्ति उससे सहमत हो। अंग्रेजों ने सत्ता के माध्यम से इस तरह की बातें फैलाईं एवं उसे सच मानने वालों की संख्या भी काफी होने के बावजूद उसे सच न मानने वालों की संख्या उससे बड़ी है। आज की स्थिति में भी इस विषय को स्वीकारे जाने के लिए आत्मबल ही उपयोगी साबित होगा।

– मोरेश्वर जोशी

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