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23 मई को अफगानिस्तान के हेरात स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास पर आतंकवादियों ने हमला किया। दूतावास में तैनात आई.टी.बी.पी. के बहादुर जवानों और अफगानी सुरक्षाबलों ने मिलकर आतंकवादियों का मुकाबला किया और चारों आतंकवादियों को मार गिराया। इस हमले की जिम्मेदारी किसी भी आतंकवादी संगठन ने नहीं ली है, लेकिन अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई ने कहा है कि इसके पीछे लश्कर का हाथ हो सकता है।
माना जा रहा है कि आतंकवादियों ने यह हमला हामिद करजई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में नई दिल्ली आने से रोकने के लिए किया था। हालांकि इसके पहले काबुल और जलालाबाद में भी भारतीय दूतावासों पर हमले हो चुके हैं। उल्लेखनीय है कि भारत अफगानिस्तान के नवनिर्माण में तन,मन और धन से लगा हुआ है। पूरे अफगानिस्तान में भारतीय मदद से कई बड़ी-बड़ी योजनाएं काम कर रही हैं। कहीं बिजली के लिए बांध बन रहे हैं, कहीं व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों का काम चल रहा है,तो कहीं सड़कें बनाई जा रही हैं। इनमें काम करने वालों में भारतीयों की भी संख्या अच्छी-खासी है। पश्चिमी अफगानिस्तान के हेरात के आसपास भी अनेक परियोजनाएं काम कर रही हैं। अफगानिस्तान में भारतीयों का रहना या यह भी कह सकते हैं कि किसी भी विदेशी का रहना आतंकवादी संगठनों को बर्दाश्त नहीं है। यही वजह है कि अफगानिस्तान में सभी दूतावासों में सम्बंधित देशों के सुरक्षाकर्मी भारी संख्या में तैनात हैं। हेरात के भारतीय दूतावास में आई.टी.बी.पी. के 200 सुरक्षाकर्मी तैनात हैं।
यह हाल तब है जब अफगानिस्तान में अमरीका के लगभग 35,000 सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। 2014 के अन्त तक ये सभी सुरक्षाकर्मी अमरीका लौट जाएंगे। इसके
बाद अफगानिस्तान में क्या होगा,
इसे लेकर चिन्ता गहराती जा रही है। हालांकि इधर एक खबर यह भी आ रही है कि अमरीका 2014 के बाद भी अपने 10,000 सैनिकों को अफगानिस्तान में रखना चाहता है,लेकिन हामिद करजई इसके लिए तैयार नहीं हैं।











