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-संदीप देव-
शुक्रवार 11 अप्रैल 2014 को सेकुलर दलों में बहुत बेचैनी थी! टेलीविजन पर टकटकी लगाए बैठे इन दलों के नेता सुबह से ही बेचैन थे! उनका प्रतिनिधित्व करते हुए अधिवक्ता फातिमा ने गुजरात के मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए लोकसभा चुनाव से ठीक पहले एक नए सेकुलर चक्रव्यूह की रचना की थी! लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने कांग्रेस सहित सभी सेकुलर नेताओं और पूर्वाग्रही मीडियाकर्मियों को एकदम से खामोश कर दिया! निर्णय आते ही भाजपा को छोड़ कर अन्य सभी राजनैतिक दलों के कार्यालयों के अंदर सन्नाटा पसरा था। वर्ष 2002 के गुजरात दंगों की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) की जांच पर सवाल उठाने वाली और जांच दल के पुनर्गठन की मांग करने वाली याचिका को देश की सर्वोच्च अदालत ने सुनने से ही इनकार कर दिया, जिसके बाद अधिवक्ता फातिमा ने अपनी वह याचिका वापस ले ली।
अधिवक्ता फातिमा ने एसआईटी की जांच और उसके बाद निचली अदालत से निर्दोष साबित हो चुके नरेंद्र मोदी को फिर से घेरने के लिए सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह किया था कि अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों और अल्पसंख्यक समुदाय के एक व्यक्ति को शामिल कर विशेष जांच दल का पुनर्गठन किया जाए। लेकिन न्यायमूर्ति एच़ एल़ दत्तू और न्यायमूर्ति एस़ ए़ बोबड़े की पीठ ने उनके इस आग्रह पर विचार करने से साफ मना करते हुए कहा कि अभी यह करना उचित नहीं होगा। फातिमा के जरिए उन सेकुलर राजनैतिक दलों की कोशिश गुजरात दंगे को लेकर गठित सीबीआई के पूर्व निदेशक आर. के़ राघवन के नेतृत्व वाली एसआईटी, उसकी पूरी जांच प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों के आधार पर आए ह्यफास्ट ट्रैक कोर्टह्ण के निर्णय को खारिज करने की थी ताकि नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी पर सवाल उठाते हुए देश की जनता को भ्रमित रखा जा सके, लेकिन सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर से उन सभी की मंशाओं को ध्वस्त कर दिया!
अदालती आदेश में निर्दोष नरेंद्र मोदी
गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने 27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में हुए रामभक्तों के नरसंहार सहित उसके बाद गुजरात में भड़के दंगों के कुल नौ मामलों की जांच की है। एसआईटी ने जांच के बाद बनाई हजारों पन्नों की अपनी रिपोर्ट को निरीक्षण के लिए पहले सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पेश किया। न्यायालय ने एसआईटी को निर्देश दिया कि वह इस ह्यक्लोजर रिपोर्टह्ण को मामले से संबंधित ह्यफास्ट ट्रैक कोर्टह्ण में दाखिल करे। एसआईटी ने 8 अप्रैल 2012 को संबंधित अदालत में गुजरात दंगे में नरेंद्र मोदी की किसी भी प्रकार की संलिप्तता से इनकार करते हुए ह्यक्लोजर रिपोर्टह्ण दाखिल की। एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाने का कोई आधार नहीं है। संजीव भट्ट व कुछ अन्य पुलिस अधिकारियों के द्वारा दंगाइयों के खिलाफ मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पुलिस को कार्रवाई नहीं करने देने संबंधी दिया गया बयान केवल एक मनगढ़ंत कहानी है, जिसे तथाकथित मानवाधिकारी कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ आदि ने मिलकर गढ़ा है।
एसआईटी रिपोर्ट का निरीक्षण करने के बाद 11 अप्रैल 2012 को अदालत ने कहा, ह्यएसआईटी को मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी एवं आरोपी बनाए गए 57 अन्य लोगों के खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है, जिससे यह साबित होता हो कि उन्होंने किसी तरह का कोई आपराधिक षड्यंत्र किया है।ह्ण
इस ह्यक्लोजर रिपोर्टह्ण के सामने आते ही तीस्ता सीतलवाड़ बौखला गइंर् और उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में चली एसआईटी की पूरी जांच पर सवाल उठाते हुए इसके प्रति अविश्वास जता दिया। तीस्ता ने एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी के साथ मिलकर इस ह्यक्लोजर रिपोर्टह्ण के खिलाफ 15 अप्रैल 2013 को 514 पन्नों की एक याचिका दायर की, जिसमें यह मांग की गई कि गुलबर्ग सोसायटी मामले में नरेंद्र मोदी के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया जाए।
इस पर सुनवाई के दौरान 27 अप्रैल 2013 को एसआईटी ने इस याचिका को मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने की एक और कोशिश करार दिया। एसआईटी के वकील आऱ एस. जमुआर ने अदालत में कहा, ह्यक्या जाकिया जाफरी ये चाहती थीं कि नरेंद्र मोदी एके-47 बंदूक अपने हाथ में लेकर दंगों पर नियंत्रण करते?ह्णआखिर 26 दिसंबर 2013 को अमदाबाद की ह्यफास्ट ट्रैक कोर्टह्ण ने एसआईटी की ह्यक्लोजर रिपोर्टह्ण को सही ठहराते हुए नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगे के सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। चूंकि तीस्ता सीतलवाड़ इस बार खुद जांच के दायरे में हैं, उन पर दंगा पीडि़तों की राहत के लिए मिले दान के धन का अपने निजी फायदे के लिए उपयोग करने का आपराधिक मामला चल रहा है, बार-बार उच्च व सर्वोच्च अदालत से गुहार लगाने के बावजूद उन्हें अग्रिम जमानत नहीं मिल रही है, ऐसे में सेकुलर बिरादरी की अगुआई करती हुईं अधिवक्ता फातिमा आगे आईं और पुनर्गठन के नाम पर एक नई एसआईटी बनाने की मांग कर दी। लेकिन कानून ने उनकी व उनके जरिए पूरी सेकुलर बिरादरी की मंशओं पर पानी फेर दिया!
सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में हुई जांच
गोधरा व उसके बाद गुजरात में नौ बड़े सांप्रदायिक दंगे हुए जबकि बाकी छिटपुट हिंसा की घटनाएं थीं। दंगे के एक वर्ष बाद 2003 में सभी बड़े नौ मामलों की सुनवाई शुरू हुई। अधिकांश मामलों में अदालत के फैसले आने लगे। अदालत के निर्णय एनजीओ व तथाकथित मानवाधिकारवादी गुट के हिसाब से नहीं आ रहे थे। इससे असंतुष्ट होकर यह गुट सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया और गुजरात पुलिस की जांच के प्रति अविश्वास प्रदर्शित करते हुए किसी अन्य एजेंसी से इसकी जांच कराने की मांग की। सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल सभी मामलों की अदालती कार्यवाही पर रोक लगा दी। न्यायालय ने गोधरा कांड सहित नौ मामलों की सुनवाई के लिए गुजरात उच्च न्यायालय को निर्देश दिया कि वह ह्यफास्ट ट्रैक कोर्टह्ण का गठन करे। अदालती कार्यवाही रुकने के करीब छह वर्ष बाद दंगों की सुनवाई के लिए ह्यफास्ट ट्रैक कोर्टह्ण का गठन किया गया। सभी नौ मामलों के लिए छह ह्यफास्ट ट्रैक कोर्टह्ण बनीं, जिनमें वर्ष 2009 से प्रतिदिन के हिसाब से सुनवाई चली।
सर्वोच्च न्यायालय ने एनजीओ-तथाकथित मानवाधिकारवादियों की मांग पर इन सभी नौ मामलों की जांच के लिए सीबीआई के पूर्व निदेशक आऱ के़ राघवन के नेतृत्व में विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया, जिसने सभी मामलों की जांच दोबारा शुरू की। बिलकिस बानो और बेस्ट बेकरी मामलों को छोड़कर अन्य सभी मुकदमे अमदाबाद, मेहसाणा, साबरकांठा और आणंद में गठित ह्यफास्ट ट्रैक कोर्टह्ण में ही चले। पांच मामलों में फैसला आ चुका है जबकि चार मामलों में सुनवाई जारी है। अप्रैल 2013 तक 249 लोगों को सजा हो चुकी है, जिसमें 184 हिंदू व 65 मुसलमान हैं। गोधरा में रामभक्तों के नरसंहार में सजा पाने वालों में सभी 31 अपराधी मुसलमान हैं। इन 31 मुसलमानों में कांग्रेस के तीन पदाधिकारी व कार्यकर्ता भी शामिल हैं, जिसमें से एक को फांसी की और दो को उम्र कैद की सजा हुई है।
गुलबर्ग सोसायटी के नाम पर
खेला गया खेल
गुलबर्ग सोसायटी में 28 फरवरी 2002 को कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी सहित 69 लोगों की हत्या कर दी गई। उस समय वहां करीब 250 लोग उपस्थित थे। गुजरात पुलिस ने एहसान की पत्नी जाकिया जाफरी सहित करीब 180 लोगों को बचाकर वहां से निकाला। अपनी पहली एफआईआर में जाकिया ने इसे दर्ज भी कराया है। घटना के चार साल बाद तीस्ता सीतलवाड़ के साथ मिलकर जाकिया जाफरी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सहित 57 अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करायी। नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया गया कि ह्यउन्होंने गोधरा से लौटने के बाद 27 फरवरी को एक बैठक में गुजरात पुलिस को निर्देश दिया कि वह हिंदुओं को अपना गुस्सा जाहिर करने देह्ण। इसमें निलंबित आईपीएस संजीव भट्ट एवं गुजरात के पूर्व डीजीपी श्रीकुमार के बयान को आधार बनाया गया। जांच के बाद एसआईटी ने दोनों के बयानों को झूठा पाया।
एसआईटी ने इस मामले में नरेंद्र मोदी एवं अन्य 57 लोगों के खिलाफ 8 अप्रैल 2012 को ह्यक्लोजर रिपोर्टह्ण दाखिल कर दी। 11 अप्रैल 2012 को एसआईटी की ह्यक्लोजर रिपोर्टह्ण के आधार पर अदालत ने फैसला दिया कि नरेंद्र मोदी एवं अन्य लोगों के खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है, जिससे यह साबित होता हो कि उन्होंने किसी तरह का कोई आपराधिक षड्यंत्र किया है। इसे तीस्ता व जाकिया ने चुनौती दी, जिस पर 26 दिसंबर 2013 को ह्यफास्ट ट्रैकह्ण अदालत ने निर्णय सुनाते हुए नरेंद्र मोदी को सभी तरह के आरोपों से मुक्त करते हुए उन्हें निर्दोष करार दिया है।
एसआईटी का निष्कर्ष
गुलबर्ग सोसायटी और नरोदा पाटिया सहित अन्य सभी बड़े मामलों की जांच और उसके आधार पर आए अदालती आदेश में बजरंग दल के बाबू बजरंगी, गुजरात सरकार की पूर्व मंत्री माया कोडनानी व कांग्रेस के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों सहित ढेर सारे दोषियों को सजा हुई है। लेकिन एसआईटी ने जो रिपोर्ट अदालत में जमा की है, उसके निष्कर्ष को पढ़कर स्पष्ट हो जाता है कि नरेंद्र मोदी और गुजरात को बदनाम करने के लिए मीडिया, सामाजिक कार्यकर्ता, तथाकथित मानवाधिकारवादी और सेकुलर बिरादरी ने मिलकर एक घिनौना खेल खेला था, जिसका कानूनी पटाक्षेप तो कब का हो चुका है, लेकिन जिसे लेकर राजनैतिक दुष्प्रचार अभियान आज तक जारी है!
एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ह्यतीस्ता सीतलवाड़ व अन्य एनजीओ ने पहले हिंसा की कई झूठी घटनाओं की खिचड़ी पकाई और बाद में उसे मसालेदार बनाकर पेश कर दिया।ह्ण एसआईटी ने अदालत में कहा, ह्यकल्पना के आधार पर गढ़ी गई कहानियों को सच साबित करने के लिए 22 लोगों को प्रत्यक्षदर्शी बनाकर अदालत में झूठी गवाही दिलाई गई। उन्हें झूठी गवाही देने के लिए बाकायदा प्रशिक्षित किया गया। इन 22 झूठे गवाहों से विभिन्न अदालतों के समक्ष झूठा शपथ पत्र दिलवाया गया। वास्तव में इनमें से कोई भी गवाह घटना का प्रत्यक्षदर्शी था ही नहीं, बल्कि इन्हें घुट्टी पिला कर अदालत के समक्ष लाया गया था। इन सभी का शपथ पत्र एक जैसा था, जिसे तीस्ता सीतलवाड़ ने तैयार कराया था।











