प्रेरक जीवन : काश ! संत विनोबा भावे के आदर्शों को राज्यों ने अपनाया होता
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प्रेरक जीवन : काश ! संत विनोबा भावे के आदर्शों को राज्यों ने अपनाया होता

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Sep 21, 2013, 12:00 am IST
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दिंनाक: 21 Sep 2013 15:52:48

अहिंसा के प्रबल हिमायती और भूदान आंदोलन के प्रणेता और संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे आचार्य विनोबा भावे। उन्होंने समाज के धनी लोगों खासकर बड़े भूमिधरों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे अपनी जमीन का छठवां हिस्सा उन लोगों को दान कर दें जिनके पास जमीन नहीं है ताकि उन्हें खेती के जरिए जीविकोपार्जन का सहारा मिल सके। उनका यह आंदोलन कुछ हद तक सफल भी रहा, लेकिन राज्य सरकारों ने समय रहते उनके इस भूदान आंदोलन को वाजिब तरजीह नहीं दी, अन्यथा आज देश की तस्वीर कुछ और होती। शायद इस देश में किसी भी हिस्से में भूमिहीन नहीं होते। वैसी विषमता भी न होती जैसी आज है। उन्होंने वंचितों और दलितों के उत्थान के लिए कार्य करने में ही पूरी जिन्दगी समर्पित कर दी। उनकी सेवाओं को देखते हुए सन् 1983 में मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न से नवाजा गया। यही नहीं उनके दो और भाइयों ने भी समाज सेवा को ही जीवन का मुख्य उद्देश्य मानकर उम्र बिताई।विनोबा भावे का असली नाम विनायक नरहरि भावे था। उनका जन्म 11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के घागोडे गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम नरहरि शंभूराव और मां का नाम रुक्मिणी देवी था। घागोडे में ही उनका बचपन बीता। उनकी पढ़ाई बडा़ैदा में हुई। भागवतगीता, महाभारत और रामायण का उन्होंने कम उम्र में ही अध्ययन किया। इन ग्रंथों से वे बहुत प्रभावित हुए।  विनोबा 8 अप्रैल 1921 को महात्मा गांधी से मिलने पहुंचे। इससे पूर्व आठ साल तक वे महात्मा गांधी से पत्राचार करते रहे थे। गांधीजी से मुलाकात के बाद वे वर्धा में गांधी आश्रम की शुरुआत करने गए। वर्धा में उन्होंने अपने विचारों को विस्तार देने के उद्देश्य से मराठी में एक पत्रिका निकाली जिसका नाम था महाराष्ट्र धर्म। इसमें वे उपनिषदों पर निबंध लिखते थे ताकि उनका मर्म पाठकों तक पहुंचाया जा सके। कुछ वर्षों मे ही गांधीजी से उनके रिश्ते प्रगाढ़ बन गए। तब उन्होंने गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों को भी जनता के बीच में और प्रभावी ढंग से लागू करने का काम शुरू कर दिया। सन् 1932 मे ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। उन पर ब्रिटिश शासन की नीतियों के विरोध में काम करने का आरोप लगा। उन्हें छह महीने तक धुले की जेल में बंद रखा गया। इस दौरान उन्होंने जेल में बंद साथी कैदियों को भगवत गीता के प्रवचन मराठी में सुनाए। जेल में उन्होंने जो प्रवचन सुनाए थे उन्हें सनेहगुरुजी ने संग्रहीत कर लिया जो बाद में एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित की गईं। सन 1940 के पहले तक विनोबा भावेजी गांधीजी के अनुयायियों के बीच ही जाने जाते थे। 5 अक्टूबर 1940 को जब महात्मा गांधी ने उन्हें पहला वैयक्तिक सत्याग्रही घोषित किया तो पूरा देश उन्हें जान गया। विनोबा भावे ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी बढ़़चढ़कर हिस्सा लिया। लेकिन उनकी पहचान आध्यात्मिक गुरु के रूप मंे रही। इसका कारण यह था कि वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और स्वतंत्रता सेनानियों को आध्यात्मिक रूप से जागरूक करने के कार्य में ही लगे रहते थे। समाज के वंचित तबकों की पीड़ा उन्हें बहुत सालती थी। वे हमेशा वंचितों के हितों की पैरवी करते रहते थे। उन्होंने वंचितों के हितों को ध्यान में रखकर ही भूदान आंदोलन शुरू किया। भूदान आंदोलन और वंचितों के हित में किए गए कार्यों की वजह से विनोबा भावे को सन् 1958 में रैमन मैगसेसे अवार्ड प्रदान किया गया। यह पुरस्कार हासिल करने वाले वे पहले भारतीय थे। विनोबा भावे कुछ समय तक महात्मा गांधी के साबरमती स्थित आश्रम पर भी रुके थे। वहां विनोबाजी के नाम पर एक कुटिया का निर्माण किया गया था जिसमें में वे रहा करते थे।विनोबाजी ब्रह्मचर्य के सिद्घांतों में अटूट आस्था रखते थे। इसका उन्होंने ताउम्र पालन किया। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भी प्रमुखता से हिस्सा लिया। अपने आंदोलन को विस्तार देने की खातिर उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सो में आश्रम बनाए। वे आदि श्ंाकराचार्य के चार धामों की तर्ज पर बनाए गए। भगवत गीता का उन्होंने मराठी में अनुवाद भी किया। उन्होंने माना कि गीता उनकी सांस है। उन्होंने इसेंस आफ कुराऩ इसेंस आफ क्रिश्चियन टीचिंग़ थाटस आफ एजुकेशऩ स्वराज्यशास्त्र नामक ग्रंथ भी लिखे। इस महान आचार्य ने 15 नवंबर 1982 को आखिरी सांस ली। उमेश शुक्ल 

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