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हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा। लालकिले पर प्रधानमंत्री तिरंगा झंडा फहराएँगे और भाषण देंगे। आकाश में तिरंगे गुब्बारे उड़ाए जाएँगे। कुछ बड़े दफ्तरों और विद्यालयों में भी ध्वजारोहण की रस्म होगी। कहीं-कहीं मिठाई भी बाँटी जाएगी। चौराहों पर कुछ भिखारी छोटे-छोटे झंडे बेचकर भीख माँगते दिखाई देंगे। औऱ.़ उस दिन छुट्टी रहेगी।
…छुट्टी का वह दिन लोग अपने-अपने ढंग से बिताएँगे। टी़वी. के लगभग सभी चैनल एक या दो फि़ल्म दिखाएंगे। पहले कई वर्ष तक, जब दूरदर्शन पर सरकारी राज था, स्वतंत्रता दिवस के दिन कोई शहीदों का स्मरण कराने वाली या राष्ट्रीय भावना वाली फि़ल्म दिखाई जाती थी। लेकिन अब ऐसी चालू फि़ल्में ही दिखाई जाती हैं जो अच्छा ह्यबिज़नसह्ण कर सकें-उनकी टी़ आऱ पी़ बढ़ा सकें।
अब जनता के लिए स्वतंत्रता दिवस का मतलब है, छुट्टी का दिन। इस दिन अधिकांश वेतन-भोगी आराम फ़रमाते हैं और विद्यार्थी ह्यमस्ती-दिवसह्ण मनाते हैं। हाँ, जिन व्यापारियों की दुकानें बंद रहती हैं और जो लोग दिहाड़ी पर काम करते हैं उन्हें लगता है कि अकारण ही उनके पेट पर लात मारी जा रही है।
पिछले छियासठ वर्षों में स्वतंत्रता के प्रति दृष्टिकोण में आमूल परिवर्तन हुआ है। आज आप नयी पीढ़ी के किसी भी प्रतिनिधि से पूछकर देखिए कि देश की स्वतंत्रता का क्या अर्थ है तो क्या पता कुछ लोग यह भी कहते मिल जाएँ कि आज हम जो चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं।
बड़ी कीमत चुकाई गई
आज आपको कम ही लोग मिलेंगे जो देश की आज़ादी को आत्म-सम्मान से और राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़कर देखते हों। यह देश का दुर्भाग्य है़.़ और इस दुर्भाग्य की नींव स्वतंत्रता प्राप्त होने के साथ ही पड़ गई थी। जब 1947 में देश की स्वतंत्रता का ह्यउत्सवह्ण मनाया जा रहा था उस समय देशवासी इस शोक में डूबे हुए थे कि आज़ादी उन्हें देश के विभाजन-स्वरूप एक बहुत बड़ी क़ीमत चुकाकर मिली थी। देश का 23-24 प्रतिशत भाग भारत-भूमि से कटकर अलग हो गया था। अधिकांश तत्कालीन मुसलमान नेता, जो भारतीय होने का दम भरते थे और हिन्दुओं के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर अंगेज़ों के विरुद्घ खड़े होते थे, आज़ादी की भनक पड़ते ही मुसलमानों के लिए अलग ज़मीन की माँग पर अड़ गए। उनके अंतर्मन में मात्र यह था कि अंगेज़ों के आने से पहले वे हिन्दुस्थान के शासक थे और अंग्रेज़ों ने उनसे हिन्दुस्थान का राज छीना था। इसलिए जब अंगे्रज वापस जाएँ तो देश का राज उन्हें वापस मिलना चाहिए। किन्तु वे यह भी जानते थे कि इस बीच संसार भर में व्यवस्था बदल गई है। प्रजातांत्रिक प्रणाली का युग आ गया है। इस बदले परिदृश्य में उन्हें लगा कि देश पर बहुसंख्यक हिन्दुओं का शासन हो जाएगा-उन हिन्दुओं का, जो सदियों तक उनके ग़ुलाम थे।
मुसलमानों के इस अडि़यल रुख़ का कहीं कोई तोड़ नहीं निकला। देश विभाजित हुआ और इस दुर्भाग्य के साथ ही अनेक दुर्भाग्य जुड़ते चले गए।
तब गाँधी जी देश के जाने-माने, वयोवृद्घ नेता थे। और संयोग यह कि उनके मन में पण्डित जवाहरलाल नेहरू के लिए विशेष अनुराग था। देश के अधिकांश नेता देश की बागडोर सम्हालने के लिए नेतृत्व सरदार वल्लभ भाई पटेल को देने के पक्ष में थे किन्तु गाँधीजी के व्यक्तिगत अनुरोध के कारण पटेल स्वयं ही पीछे हट गए।
फिर दुर्भाग्य यह कि नेहरूजी का लालन-पालन एक अत्यंत अमीर घराने में हुआ था और उनकी शिक्षा-दीक्षा, अंगे्रजों के बीच अंगे्रज़ों के देश इंगलैण्ड में हुई थी। उनके लिए देश की आज़ादी का अर्थ यही था कि भारत में भारतीयों का राज हो और देश का आर्थिक विकास हो। लोगों का जीवन-स्तर अंग्रेजों जैसा हो़.़ उनकी जीवन-शैली अंग्रेज़ों-जैसी हो जाए-वैसी ही, जैसी कि वे विलायत में देखकर आए थे।
देश का दुर्भाग्य यह भी कि उन्होंने अपने ही हम-ख़्याल डॉ़ अम्बेडकर को भारतीय संविधान के रचनाकारों की समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया। डॉ़ अम्बेडकर भी बड़े अरमान के बाद जैसे-तैसे इंगलैण्ड घूमकर आए थे और वहाँ के रहन-सहन से बहुत प्रभावित होकर लौटे थे। फलस्वरूप जो लम्बा चौड़ा संविधान बनकर तैयार हुआ, वह मूलरूप से अंग्रेज़ों के संविधान की ही प्रतिच्छाया था। पिछले छ: दशकों में हम उसमें सौ से अधिक संशोधन कर चुके हैं किन्तु अभी उसमें शायद और भी दो सौ संशोधनों की आवश्यकता है।
दुर्भाग्य का दलदल
नेहरूजी ने अपने पूर्वाग्रहों के कारण कुछ ऐसे आधारभूत निर्णय लिए जो देश को दुर्भाग्य के दलदल की ओर ठेलते चले गए। उनमें से एक था कश्मीर में आक्रमणकारियों के साथ युद्घ-विराम। सुना जाता है कि सरदार पटेल इस निर्णय के बिलकुल विरुद्घ थे और नेहरूजी की इस घोषणा के बाद उन्होंने कहा था कि ह्यह्यनेहरू रोएगा़.़ह्णह्ण। सरदार पटेल की भविष्यवाणी यदि ग़लत थी तो बस इतनी कि शायद नेहरू स्वयं तो नहीं रोए, किन्तु सारा देश तब से निरन्तर रो रहा है.़ और जाने कब तक रोता रहेगा!
नेहरूजी की व्यक्तिगत मानसिकता के कारण ही देश को एक भाषा नहीं मिल पाई। प्रारम्भ में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए 51 प्रतिशत बहुमत प्राप्त था किन्तु नेहरू जी ने कहा कि अभी हिन्दी को पूरी तरह विकसित होने के लिए समय चाहिए। तब पन्द्रह वर्ष के लिए राष्ट्रभाषा का मुद्दा टाल दिया गया, यह कह कि इस बीच हिन्दी का इतना विकास किया जाएगा कि देश के अहिन्दी भाषी क्षेत्र भी उसे स्वयं ही अपना लें। किन्तु पन्द्रह वर्ष बाद जब तत्कालीन गृहमंत्री पंडित गोविन्द वल्लभ पंत राष्ट्रभाषा सम्बन्धी फ़ाइल लेकर नेहरूजी के पास गये तो नेहरूजी ने क्रोध में वह फ़ाइल फेंक दी। सुना जाता है कि इस घटना के बाद ही पंडित पंत को पक्षाघात का दौरा पड़ा जिससे वे कभी उबर नहीं पाये।
पण्डित नेहरू के ही प्रभुत्व के कारण देश का नाम इंडिया पड़ा, जिसने अनजाने ही देश की जनता को भारतीय आत्मसम्मान से वंचित किया। मुसलमानों के प्रति उनकी अतिरिक्त सहानुभूति ने स्वयं मुसलमानों के मन में एक विशेष अपेक्षा उत्पन्न की। मुसलमान समाज इस मनोभावना को भुनाते रहने का अभ्यस्त होकर देश का एक विशेष वर्ग बनता चला गया और कालान्तर में धीरे-धीरे अन्य सभी राजनीतिक दल भी मुसलमानों की अलग पहचान को भुनाने के प्रयास में लग गए। देखते ही देखते, आज देश का मुसलमान एक सशक्त वोट-बैंक बनकर देश को नाकों चने चबाने के लिए विवश कर रहा है।
तर्क-संगत तो बस यह था कि, यदि देश का विभाजन होना ही था, जहाँ मुसलमानों के लिए अलग देश बन रहा था तो वहीं सारे मुसलमान चले जाते और शेष भूमि पर 90-95 प्रतिशत हिन्दुओं का राज्य स्थापित होता।
किन्तु नये भारत में जन्मी व्यवस्था ने मुसलमानों की सोच को एक विशेष आक्रामकता प्रदान की। वे बात-बात पर यह मुद्दा उठाने लगे कि मुसलमान होने के कारण ही उनके साथ अन्याय हो रहा है।
इसी मानसिकता के चलते, देश का दुर्भाग्य, कि एक अल्प-संख्यक आयोग बना। हाँ, परिभाषा के कारण तब उसमें ईसाई, सिख, बौद्घ आदि को भी जोड़ना पड़ गया। इस व्यवस्था में देशवासी टुकड़ों में बंटते चले गए।
जड़ों पर कुठाराघात
देश को कोई अपनी भाषा न देकर जो हमारी जड़ों पर कुठाराघात किया गया था उस पर नमक छिड़कने का काम यह हुआ कि हमारे शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद बनाए गए। यह भी दुर्भाग्य कि देश के तत्कालीन कर्णधारों को शिक्षा के महत्व का कोई ज्ञान नहीं था। नेहरू जी के लिए शिक्षा नौकरी पाने का और उसके द्वारा आर्थिक संपन्नता प्राप्त करने का सोपान मात्र था। निश्चित रूप से वे यह नहीं जानते थे कि शिक्षा का सम्बन्ध आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास से भी है और नैतिकता से भी। परिणाम-स्वरूप देश का बहुसंख्यक समाज अपनी जड़ों से कटता चला गया और वातावरण ऐसा बनता चला गया कि यदि कोई अपने को हिन्दू कहे या देश के गौरव अथवा भारतीय परम्परा की बात करे तो उस पर तुरन्त ह्यसाम्प्रदायिकह्ण का ठप्पा लगा दिया जाता था।
स्वतंत्रता के बाद अचानक देश में रूस के साहित्य की भरमार दिखाई दी, विशेषकर बच्चों के लिए चमकदार रंगीन छपाई में सस्ते मूल्य की पुस्तकों की बाज़ार में जैसे बाढ़ आ गई थी। साहित्य, कला, सिनेमा, पत्रकारिता आदि से सम्बद्घ व्यक्तियों के लिए ह्यसोवियत लैण्ड नेहरू सम्मानह्ण की स्थापना हुई थी जिसकी चमक से देश के सैकड़ों रचनाकार जुड़े थे। देश में एक विशेष विचारधारा को प्रश्रय मिल रहा था।
गुलामों की नई प्रजाति
वहीं कुछ इंगलैण्ड-रिटर्न बुद्घिजीवी अपनी रचनाओं के माध्यम से इस विचारधारा का प्रचार-प्रसार कर रहे थे कि भारत को एक सूत्र में तो अंगे्रज़ों ने बाँधा था। पहले तो भारत आपस में लड़ने वाले सैकड़ों रजवाड़ों में बँटा था। अंग्रेज़ों ने हमें सड़कें दीं, रेल दी, बिजली दी और यहाँ के असभ्य जंगली लोगों को सभ्यता का पाठ पढ़ाया। सम्भवत: यही सब देख-सुन कर तब अकबर इलाहाबादी ने कहा था – ह्यहम ऐसी सब किताबें क़ाबिले-ज़प्ती समझते हैं, जिन्हें पढ़-पढ़ के बच्चे बाप को खफ्ती समझते हैं।ह्ण हमारी तत्कालीन शिक्षानीति ने मूल भारतीय संस्कृति, ज्ञान, कला, शिल्प, संगीत, नक्षत्र विद्या, चिकित्सा प्रणाली आदि के विद्वानों को हाशिये पर फेंक दिया। भारतीय ज्ञान-विज्ञान की बात करने वाले दकियानूसी और पुरातनपंथी कहलाने लगे।
इस बीच राजनीतिकरण के नये दौर में लगभग सभी क्षेत्रों में, विशेषकर तमिलनाडु में, हिन्दी का प्रखर विरोध हुआ। तब देश के लिए एक अपनी भाषा के महव को समझते हुए बच्चों के लिए त्रिभाषाई नियम का विधान हुआ। एक क्षेत्रीय भाषा, दूसरी हिन्दी और तीसरी अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढ़ाने की योजना बनी। किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस योजना से हिन्दी का प्रचार-प्रसार तो सीमित ही रहा, किन्तु अंग्रेज़ी का महव तेज़ी से बढ़ा।
हमारी शिक्षानीति ने वह काम कर दिखाया जो लगभग दो सौ वर्ष पूर्व मैकाले ने प्रारम्भ किया था। देश को अंग्रेजी देकर भारत में ग़ु़लामों की ऐसी प्रजाति बनाने का, जो हर प्रकार अंगे्रज़ों की नक़ल करे और हमेशा उनकी ग़ु़लाम बनी रहे।
अंगे्रज़ी यदि अन्य विदेशी भाषाओं की भाँति ही सिखाई जाती तो कोई हानि नहीं थी और हाँ, कुछ हद तक विश्व की सम्पर्क भाषा होने के नाते, यदि कुछ विद्यार्थी अंग्रेज़ी पढ़ना चाहते तो उनके लिए अंग्रेज़ी एक वैकल्पिक भाषा के रूप में भी पढ़ाई जा सकती थी। किन्तु प्रारम्भिक कक्षाओं से ही अंग्रेज़ी को अनिवार्य भाषा के रूप में पढ़ाकर हमारी शिक्षा पद्यति ने समाज का बड़ा अहित किया। आज भी, मध्यम एवं निम्न वर्ग के परिवारों के बच्चे, जिनके घरों में अथवा पास-पड़ोस में, जहाँ अंग्रेज़ी का कोई वातावरण नहीं है, अंग्रेज़ी तो नहीं सीख पाते, बस अंग्रेजि़यत सीखकर रह जाते हैं।
समाज में अंग्रेजि़यत का बोलाबाला इसी नीति का परिणाम है। बाज़ार में, दुकानों आदि पर ह्यगुड मार्निंग सरह्ण, थैक्यू सरह्ण ह्यगुड वाय सरह्ण जैसे अल्प वाक्य धड़ल्ले से सुनाई देते हैं। वस्तुओं के दाम अंग्रेज़ी में बताए जाते हैं। बस, शेष सम्वाद अपनी भाषा में। सड़क पर रिक्शे वाले, और सब्ज़ी वाले भी टेलिफ़ोन नम्बर अंग्रेज़ी में बताते सुनाई देंगे। यदि आप किसी को हिन्दी के अंकों में अपना फ़ोन नम्बर बताएँ तो सुनने वाला खीजकर कहेगा-ह्यइंगलिस में बताओ, साब।ह्ण
अपनी भाषा में पचास प्रतिशत शब्द अंगे्रजी के मिलाए बिना कोई बात करने वाला आज हमें नहीं मिलता। ह्यफादर सैटरडे को आएंगे़.़ बाई टे्रऩ.़ मौर्निंग में।ह्ण ह्यसिस्टर की डेथ हो गई़.़ ये हमारा नेफ्यू हैैै।ह्ण ऐसी भाषा हमारे ठंडे खू़न में आ बैठी है। लोगों को यदि विश्वास न हो तो शायद 1947 से पहले बनी फिल्में देखकर विश्वास हो जाए कि तब बच्चे अपने बड़ों को, माताजी, पिताजी, चाचाजी, काका, भइया आदि कहकर सम्बोधित करते थे और पैर छूकर अथवा प्रणाम, नमस्कार आदि कहकर आदर देते थे। किन्तु अब घर-घर में, नौकरों-चाकरों और मज़दूर के घरों में भी, मम्मी-पापा का सम्बोधन घर कर गया है। उत्सवों के अवसर पर भी हमें ह्यहैप्पी होली़.़ह्ण ह्यहैप्पी दिवाली, सऱ.़ह्ण जैसे स्वर ही सुनाई देते हैं।
पश्चिम की नकल
भाषा तो भाषा, हम आँखें मूदकर पश्चिमी देशों की नक़ल करते जा रहे हैं। इंगलैण्ड-अमेरिका की बदलती शब्दावली के साथ हमारी भाषा बदलती है। वे यस कहते थे तो हम भी ह्ययसह्ण कहने लगे। वे यस की जगह ह्ययाह्ण कहने लगे तो हम भी ह्ययाह्ण कहने लगे। हम उनके खाने-पीने-पीत्ज़ा, कोक आदि को हम तुरन्त अपनाते हैं। उनके वस्त्राभूषण की दौड़कर ज्यों-की-त्यों नक़ल करते हैं। इसी प्रकार, जन्म दिन पर केट काटने की प्रथा भी है। शुभ अवसर पर लोग मिठाई बाँटें, यह समझ में आता है। किन्तु पश्चिमी देशों में मिठाइयों का प्रचलन नहीं है इसलिए मिठाई के नाम पर वहाँ केक का प्रचलन है। वे जन्मदिन पर मित्रों में बाँटने के लिए केक काटते हैं। प्रथा यह भी है कि वे आयु के जितने वर्ष बीत गए उतनी मोमबत्तियाँ जलाकर बुझाते हैं। हमारे यहाँ दीप जलाने की प्रथा है, बुझाने की नहीं। किन्तु आज हर फि़ल्म में, हर धारावाहिक में़.़ और देखादेखी हर घर में, केक काटने और मोमबत्ती बुझाने की नक़ल होती है। तिकोनी टोपी पहनकर ह्यहैप्पी बर्थ डे टु यूह्ण गाना आवश्यक हो गया है।
नयी गु़लामी की यह व्यापक मानसिकता, हमारे गाँधी, नेहरू, अम्बेदकर-जैसे तत्कालीन नेताओं की अदूरदर्शिता का परिणाम है। देश की उन्नति के लिए आर्थिक विकास की पंचवर्षीय योजनाओं का प्रावधान तो किया किन्तु, देशवासियों में आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास उत्पन्न करके, उनके नैतिक विकास के लिए कभी कोई प्रयास नहीं किया गया। पिछले षष्ठाधिक दशकों में देश में आर्थिक विकास तो हुआ है किन्तु हमारी समस्याएँ भी निरन्तर बढ़ी हैं। यदि इस विकास के क्रम में जो काम हुआ वह पूरी ईमानदारी के साथ हुआ होता तो आज देश प्रगति के अनेक सोपान चढ़कर बहुत अधिक समृद्घ हो चुका होता।
डॉ़ सीतेश आलोक
सुप्रसिद्ध साहित्यकार











