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संगम तट पर चल रहे हिन्दुओं के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन कुंभ के प्रमुख स्नान पर्व 'मौनी अमावस्या' पर संगम में स्नान कर पुण्य प्राप्ति की लालसा में आये करीब तीन दर्जन श्रद्धालुओं को प्रशासनिक अव्यवस्था के कारण अपनी जान गंवानी पड़ी, जबकि 40 से ज्यादा गंभीर रूप से घायलों को इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में भर्ती किया गया है। गत 10 फरवरी को इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर हुयी भगदड़ से श्रद्धालुओं की आकस्मिक मृत्यु, घायलों से इतर तमाम ऐसे लोग भी हैं जो घटना के बाद गुम हुये अपने परिजनों को खोज रहे हैं जो न तो घर पहुंचे हैं और न उनका नाम मृतकों या घायलों की सूची में है। हैरानी की बात है कि इस हृदय विदारक घटना के बाद भी मेला प्रशासन, जिला प्रशासन तथा रेलवे प्रशासन में कहीं भी सामंजस्य नहीं हो पाया है जिसके कारण तमाम परिजनों को परेशानी उठानी पड़ रही है।
10 फरवरी के प्रमुख स्नान पर्व पर तीन करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं के प्रयाग आने का अनुमान कर प्रशासन और रेलवे ने अपनी व्यवस्थायें किये जाने का खूब प्रचार किया था। बेहतर व्यवस्था का प्रचार, अनुकूल मौसम, 147 वर्ष बाद अमावस्या में बने ग्रहों के दुर्लभ संयोग और विशिष्ट योग के साथ संगम स्नान की आस्था ने सचमुच संगम तट पर विराट हिन्दू विश्व की झलक दिखायी। लोग जिस उल्लास से स्नान को आये थे उससे कई गुना खुशियां लेकर घर वापस लौटने के लिए बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर सुबह से ही पहुंचने लगे। लेकिन दोपहर तक बसों और रेलों से जाने वाले यात्रियों की संख्या इतनी अधिक हो गयी कि स्टेशन पर खड़े होने की जगह तक नहीं बची। कहीं कोई भीड़ को व्यवस्थित करने या उन्हें गंतव्य तक भेजने की व्यवस्था करने वाला नहीं था। स्नान करके निकली श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ रही थी, क्योंकि मेला प्रशासन बराबर यह घोषणा कर रहा था कि लौटने वाले लोग स्टेशन पर पहुंच जायें, उनकी गाड़ियां वहां खड़ी हैं, लेकिन जिस अनुपात में श्रद्धालुओं की भीड़ स्टेशन पर पहुंच रही थी उस अनुपात में गाड़ियां नहीं थीं। श्रद्धालुओं की भीड़ प्लेटफार्म, पुल तथा सीढ़ियों पर जम गयी।
शाम साढ़े छह बजे पुल से प्लेटफार्म सं. 6 पर जाने के लिए यात्रियों में धक्का-मुक्की शुरू हुयी और मात्र 5 मिनट में भयानक अफरातफरी मच गई। लोग एक दूसरे पर गिरते-पड़ते सुरक्षित स्थान की तलश में भागने लगे। उधर पुलिसकर्मियों ने लाठियां चला दीं तो स्थिति और भयावह हो गयी। किसी के सिर में चोट आयी तो किसी के पेट और सीने में। लोग मदद की गुहार लगा रहे थे, लेकिन कौन सुने? सबको अपनी जान बचाने की पड़ी थी। कौन मदद करे? कैसी मदद करे? क्योंकि ज्यादातर लोग दूसरों शहरों/राज्यों से आये थे। उन्हें न तो अस्पताल पता था और न रास्ता? क्योंकि सारे रास्तों पर भीड़ ही भीड़ थी। परिणाम इतना भयावह हुआ कि लोग इलाज के अभाव में दम तोड़ने लगे। एक घंटे के अन्दर 8 लोगों ने दम तोड़ दिया लेकिन मदद के लिये दो घंटे तक कोई नहीं पहुंचा। इसी बीच प्लेटफार्म नं. 6 के अंतिम छोर पर ठीक ऐसा ही हादसा हो गया और वहां देखते-देखते 16 लोगों ने इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया।
पूरे तीन घंटे तक स्टेशन पर हाहाकार मचा था लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों का कहीं पता नहीं था। सूचना के बाद कई अधिकारियों ने तो अपने मोबाइल ही बंद कर लिये। रेलवे की ओर से व्यवस्था के नाम पर रेलवे पुलिस बल के कुल दो जवान आए लेकिन उनके पास स्ट्रेचर नहीं था, परिजनों से चादर और कम्बल मांग कर उसी में पीड़ितों को रेलवे अस्पताल की ओर लेकर भागे, जो स्टेशन से मात्र 250 मीटर दूर है। इसी तरह अन्य लोग भी घायलों को लेकर दौड़े। एक नर्स प्राथमिक चिकित्सा के लिए आई और निढाल पड़े लोगों की नब्ज देखने लगी, पर उदास सा चेहरा बना कर इशारा किया कि फलां तो मर चुके हैं।
इस हादसे में घायल हुए लोगों के इलाज की व्यवस्था और मृतकों को ओढ़ाने के लिए सफेद चादरें साथ-साथ आईं। हर कोई हतप्रभ था कि क्या रेलवे ने पहले से ही दुर्घटना की कल्पना करके इन चादरों की व्यवस्था कर रखी थी?
स्टेशन पर हादसा, पीड़ितों के इलाज की व्यवस्था में देरी के बाद, अब बताते हैं रेलवे के केन्द्रीय अस्पताल का हाल, जहां सबसे पहले घायल पहुंचाये गये। केन्द्रीय अस्पताल में प्राथमिक उपचार की कोई भी सुचारु व्यवस्था नहीं थी। डाक्टर और अन्य कर्मचारी एक-दूसरे को अवाक् से देख रहे थे। ऐसे मौके पर आगे आये स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल के प्राचार्य डा. एस.पी. सिंह। अपने दल सहित आये डा. सिंह रेलवे अस्पताल में प्राथमिक उपचार के बाद सबको अपने अस्पताल लेकर आये, तब जाकर घायलों का समुचित उपचार शुरू हो सका।
इस हादसे के बाद हर जिम्मेदार अपना दामन साफ बताते हुये दूसरे पर ठीकरा फोड़ रहा है। रेलवे के डीआरएम हरीन्द्र राव कहते हैं कि उन्होंने दोपहर में जिला प्रशासन को स्टेशन पर भीड़ बढ़ने तथा नियंत्रित करने के लिए कहा था, लेकिन जिला प्रशासन ने कोई व्यवस्था नहीं की। लेकिन डीआरएम के पास इस प्रश्न का जवाब नहीं है कि जब तीन दिनों से जीआरपीएफ और आरपीएफ के जवान स्टेशन के पास अवरोधक लगाकर भीड़ को दिशा दे रहे थे तो मुख्य पर्व के दिन उन लोगों ने अपना अवरोधक क्यों हटा लिया?
वास्तविकता यह है कि इस हादसे के लिए सामूहिक रूप से मेला प्रशासन, जिला प्रशासन और रेलवे प्रशासन जिम्मेदार है। इतने बड़े आयोजन के लिए इन तीनों ने आपस में कहीं भी सामंजस्य नहीं बैठाया। यदि तालमेल होता तो भीड़ को मेले से निकाल कर स्कूल, कालेज या मेला क्षेत्र के बाहर खाली स्थानों में रोक कर उन्हें धीरे-धीरे स्टेशन की ओर भेजा जाता, लेकिन आपसी सहयोग के अभाव में ऐसा नहीं हो सका।
कुंभ स्नान को आये श्रद्धालुओं के साथ हुए हादसे ने एक और तथ्य की पुष्टि कर दी है। अभी तक केन्द्र और राज्य सरकार की लड़ाई ही जगजाहिर थी, लेकिन अब दोनों के अधिकारी भी इसमें शामिल हो गये हैं। दोनों सरकारें न केवल हादसे के जिम्मेदार अपने अधिकारियों का बचाव कर रही हैं, अपितु उनकी पीठ थपथपा रही हैं। रेल मंत्री पवन बंसल ने यहां आकर कहा कि इसके लिये रेलवे के अधिकारी दोषी नहीं हैं, क्योंकि उनका काम रेलों का संचालन करना है, भीड़ को व्यवस्थित करना नहीं। रेल मंत्री का यह बयान रेल अधिकारियों का सीधा-सीधा बचाव करता है। लेकिन हैरानी की बात है कि इधर अखिलेश सरकार ने मृतकों के परिजनों को 7 लाख, गंभीर रूप से घायलों को डेढ़ लाख तथा सामान्य घायलों को एक लाख रु. राहत राशि देने की घोषणा की है तो उधर रेल विभाग ने भी पीड़ितों को राहत राशि देने की घोषणाएं की हैं। लेकिन दुर्घटना की जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं है। न केन्द्र, न राज्य।
प्रयाग आये मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि और राज्य सरकार के मंत्री बलराम सिंह यादव तो बंसल से भी आगे निकल गये। उन्होंने कहा कि स्नान तो सकुशल सम्पन्न हो गया, हादसा तो स्टेशन पर हुआ। अभी तक केन्द्र या राज्य सरकार का कोई अधिकारी न तो दोषी माना गया और किसी के विरुद्ध कोई भी कार्यवाही हुई है।
सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि केन्द्र सरकार कुंभ आयोजन को लेकर कभी गंभीर ही नहीं थी। बजट का प्रश्न आया तो तब तक उसे अवमुक्त नहीं किया गया जब तक राष्ट्रपति के चुनाव मेंं सपा ने कांग्रेस का साथ नहीं दिया था।
फिलहाल हादसे के बाद भी जिम्मेदार विभागों में कोई तालमेल नहीं है। उन पीड़ितजन को सांत्वना या सहायता देने वाला कोई नहीं है, जिनके परिजन हादसे के बाद से लापता हैं। शहपुरा (बलिया) की गिरजा देवी (65 वर्ष) हादसे के बाद से लापता हैं। उनके परिजन अस्पताल में लगी मृतकों और घायलों की सूची में नाम न पाकर बेहद आहत हैं। रेलवे अस्पताल में विनोद अपने मित्र की मां चिंता देवी को खोज रहे थे जो दिल्ली से अपनी टोली के साथ आयी थीं, लेकिन उनका पता नहीं चल रहा है।
रा.स्व.संघ के अ.भा. सह सम्पर्क प्रमुख श्री राममाधव ने दुर्घटना में मृत श्रद्धालुओं के प्रति शोक व्यक्त करते हुए कहा कि कुछ लोगों की लापरवाही से दर्जनों लोगों का यूं मर जाना पीड़ादायक है। 2001 में राज्य की तत्कालीन भाजपा सरकार ने कुंभ को सुव्यवस्थित तरीके से सम्पन्न कराया था। इस दुर्घटना के बाद न तो उ.प्र. के मुख्यमंत्री और न ही रेलमंत्री, कोई इसकी जिम्मेदारी नहीं ले रहा। कुंभ संपूर्ण भारत की एकजुटता को प्रतिबिम्बित करता है। पूरी दुनिया से लाखों-करोड़ों श्रद्धालु इसमें सम्मिलित होते हैं। 'मौनी अमावस्या' पर श्रद्धालुओं की संख्या का अनुमान होने के बावजूद, प्रयाग से मिली जानकारी के अनुसार, न स्थानीय प्रशासन ने वैसी व्यवस्था की, न रेलवे पुलिस ने। रेल विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा।











