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संस्मरण
'श्वेत (दुग्ध) क्रांति के जनक' कहे जाने वाले डा. वर्गीज कुरियन का गत 10 सितम्बर को नाडियाड (गुजरात) में निधन हो गया। उनके निधन का समाचार मिलते ही 22 वर्ष पूर्व का वह संस्मरण अनायास याद हो आया जब डा. कुरियन ने हरिद्वार में 12 मई, 1990 को भारत माता मंदिर के संस्थापक महामंडलेश्वर स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी के हाथों 'समन्वय पुरस्कार' ग्रहण किया था। तब उन्होंने भावविभोर होकर कहा था–
'मेरा सौभाग्य है कि हिन्दुओं के सर्वाधिक पवित्र तीर्थस्थल हरिद्वार आने का सुअवसर प्राप्त हुआ। इससे भी अधिक आनन्द हुआ भारत माता मन्दिर के दर्शन करके। पूज्य स्वामी जी ने ऐसे अद्वितीय मन्दिर का निर्माण किया है जिसमें राष्ट्र के विविध स्वरूपों के दर्शन के साथ–साथ एकत्व की भावना के दर्शन होते हैं। इस मन्दिर की कोई मिशाल नहीं है। ऐसी कल्पना स्वामी जी जैसे विशाल हृदय वाला सन्त ही कर सकता है, जिन्होंने समन्वय को अपने जीवन के साथ मिला लिया है।
मैं ईसाई होते हुए हिन्दुओं के पुनीत तीर्थस्थल हरिद्वार में समन्वय पुरस्कार से सम्मानित होकर अत्यन्त सुख का अनुभव कर रहा हूं। मुझे देश–विदेश में अनेक सम्मान प्राप्त हुए, किन्तु उन सब में समन्वय पुरस्कार का विशिष्ट महत्व है। भारतमाता मन्दिर परिसर में एक हिन्दू धर्माचार्य द्वारा एक ईसाई मतावलम्बी को दिया गया पुरस्कार अविस्मरणीय पुरस्कार है। यह भारतमाता मन्दिर की स्थापना और समन्वय भावना की वास्तविक अभिव्यक्ति है।
यह मन्दिर देश की विविधता और एकता दोनों का वास्तव में प्रतिनिधित्व करता है। मैं स्वामी जी के चरणों में प्रणाम करता हूं। उनका हृदय से अभार मानता हूं।'
श्री कुरियन ने पुरस्कार ग्रहण करने के बाद जब स्वामी सत्यमित्रानंद जी महाराज के श्रीचरणों में नमन किया तो वे भावभिोर हो उठे थे। 'भारत माता मंदिर' के दर्शन करने के उपरांत उनके मुख से बरबस निकला था– 'यह राष्ट्रीय व धार्मिक एकता का मूर्तिमन्त स्वरूप है।'
उन दिनों मैं हरिद्वार में था तथा इस भव्य समारोह का साक्षी बनने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ था। बातचीत के दौरान श्री कुरियन ने गोवंश की हत्या जारी रहने पर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा था- 'पशुओं, विशेषकर गोवंश की रक्षा व संवर्धन भारतवासियों का राष्ट्रीय कर्तव्य होना चाहिए।' भारत की प्राचीन संस्कृति के प्रति यह डा. वर्गीज कुरियन की आस्था ही थी कि ईसाई मताबलम्बी होने के बावजूद उन्होंने यह इच्छा व्यक्त की थी कि मृत्यु के बाद हिन्दू रीति से उनका दाह-संस्कार हो और उन्हें उनका नाती मुखाग्नि दे। उनकी इच्छा के अनुरूप ही आणंद में उनका अंतिम संस्कार किया गया।










