देहदान मानवता की दिशा मेंएक महान योगदान
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देहदान मानवता की दिशा में
स्वयं भी देहदान का संकल्प लें तथा समाज के लोगों को भी इसके लिए जागरूक करें। स्वयं भी देहदान का संकल्प लें तथा समाज के लोगों को भी इसके लिए जागरूक करें।
डा. हर्ष वर्धन
गत लेखों में शरीर के अंगों के दान पर हमने चर्चा की थी। नि:संदेह अंग दान कर हम अपने जीवन में एक असमय अस्त होते जीवन को नया जीवन देकर बहुत बड़ा परोपकार कर सकते हैं। कुछ अंगदान तो हम जीते जी भी कर सकते हैं अर्थात हम अंगदान कर स्वयं जी सकते हैं और जिसको अंग दान दिये हैं उस व्यक्ति को भी अपनी आंखों के समक्ष जीते देख सकते हैं।
अंगदान लेख की शुरुआत में हमने चर्चा की थी कि अंगदान पर चर्चा के साथ-साथ अंगदान में सहयोग करने वाली संस्थाओं के बारे में भी जानकारी दी जाएगी। इस दिशा में एक संस्था ऑर्गन रिट्रीवल बैंकिंग आर्गनाइजेशन (आर्बो) कार्य कर रही है। देश में एक नोडल सेन्टर के रूप में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में इसे स्थापित किया गया है। अंगदान के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना, अंगों का निष्पक्ष एवं समान वितरण तथा मानव अंग का अधिकतम सदुपयोग संस्था का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्था का प्रमुख कार्य-अंग प्रत्यारोपण हेतु मरीजों की प्रतीक्षा सूची तैयार करना, अंगदानकर्ताओं का पंजीकरण करना, अंगदानकर्ताओं का अंग प्राप्तकर्ताओं के साथ मिलान करना, अंग प्राप्त करने से लेकर प्रत्यारोपण करने तक सहयोग करना, सभी संबंधित अस्पतालों, संस्थाओं तथा व्यक्तियों को जानकारी प्रदान करना, लोगों में अंग दान के लिए जागरूकता पैदा करना, अंगदान व प्रत्यारोपण क्रियाकलापों को प्रोत्साहित करना है। अंगदान करने के लिए एक फार्म भरना होता है तथा उस पर दो गवाहों (कम से कम एक गवाह परिवार का सदस्य हो) के हस्ताक्षर होने चाहिए। इसके पश्चात् फार्म को संस्था कार्यालय में जमा करना पड़ता है। समुचित जानकारी ऑर्बो की वेबसाइट www.orbo.org.in पर भी उपलब्ध है। ईमेल % orboindia@ yahoo.com है। इस संस्था से 1060 (24 घंटे हेल्प लाइन), 26593444 तथा 26588360 पर संपर्क किया जा सकता है। इस संस्था की प्रमुख डॉ. आरती विज से भी विस्तृत जानकारी ली जा सकती है। अंगदान करने से पूर्व इस संदर्भ में यह बेहतर होगा कि अपने परिवार के सदस्यों के साथ विचार-विमर्श कर लें। इससे अंगदान संबंधी इच्छा की पूर्ति की प्रक्रिया में उनका पूरा सहयोग मिलेगा।
अंग दान के उपरांत देह दान आता है। देह दान की समस्त प्रक्रिया जीते जी परिवारजनों से सलाह करके पूरी करनी चाहिए। देहदान से नये चिकित्सक तैयार करने में मदद मिलती है। 'कैडेवर' (मानव का मृत शरीर) पर ही नये चिकित्सा छात्र चिकित्सकीय अध्ययन करते हैं और एक योग्य चिकित्सक बनते हैं। देश के मेडिकल कालेजों में भारत में बढ़ती जनसंख्या के बावजूद 'कैडेवर' की भारी कमी को देख रहा हूं। मुझे स्मरण है कि 70 के दशक में जब मैं मेडिकल छात्र था, एक 'कैडेवर' पर 8 चिकित्सा छात्र अध्ययन करते थे तथा नौ माह के उपरांत उन्हें दूसरा 'कैडेवर' मिल जाता था। लेकिन अब 'कैडेवर' की भारी कमी हो गयी है। एक 'कैडेवर' पर कभी कभी पूरी कक्षा को ही अध्ययन करना पड़ता है। दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कालेज में एक 'कैडेवर' पर 25 छात्रों को अध्ययन करना पड़ता है। जब मैं दिल्ली में भाजपा की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री था, उस दौरान मुझे अनेक मेडिकल कालेजों में जाने का अवसर मिला। कालेजों के प्राचार्य और अध्यापकों की यही सबसे बड़ी चिन्ता थी कि 'कैडेवर' जितनी मात्रा में चाहिए कालेजों को उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। इस कारण नये चिकित्सा विद्यार्थियों को अध्ययन में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। हरियाणा के अग्रोहा मेडिकल कालेज में जब मैं गया तो वहां अन्य सभी मुद्दों से बड़ा एक मुद्दा था 'कैडेवर' की अनुपलब्धता तथा वहां के प्राचार्य ने विशेष तौर पर 'कैडेवर' उपलब्ध कराने के लिए कुछ ठोस कार्य करने के लिए मुझसे आग्रह किया।
इस घटना के बाद 1996 में देहदान/अंगदान करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए मैंने दिल्ली में दधीचि देह दान समिति की स्थापना में सहयोग दिया तथा इसका पहला कार्यक्रम दीन दयाल शोध संस्थान, नई दिल्ली में आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता भारत में प्रथम हृदय प्रत्यारोपित करने वाले चिकित्सक डॉ. वेणुगोपाल ने की थी। नानाजी देशमुख जैसे महान स्वयंसेवक के साथ मैंने तथा मेरी पत्नी ने अपना देहदान का संकल्प उसी कार्यक्रम में लिया। इस कार्यक्रम में सुश्री उमा भारती तथा मौलाना आजाद मेडिकल कालेज के एनॉटमी विभाग की प्रो. जे.एम. कौल भी उपस्थित थीं। इस कार्यक्रम मैंने अपनी इच्छा व्यक्त की कि मेरी मृत्यु के उपरांत मेरे शरीर को मेरी मातृ शिक्षण संस्था गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल मेडिकल कालेज, कानपुर को सौंपा जाये। कुछ समय पूर्व नानाजी देशमुख का शरीर उनकी मृत्यु के उपरांत अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को सुपुर्द कर दिया गया। आज दधीचि देह दान समिति के सहयोग से दिल्ली के मेडिकल कालेजों को आवश्यकतानुसार समय-समय पर 'कैडेवर' प्राप्त हो रहा है। दधीचि देह दान समिति अपने अथक प्रयासों से हर साल दिल्ली में अनेक लोगों को इस दिशा में जागरूक कर देहदान की कानूनी प्रक्रिया को पूरा करवाती है। दधीचि देह दान समिति से डब्ल्यू-99, ग्रेटर कैलाश पार्ट-1, नई दिल्ली में दूरभाष नं. 9811598598, 9810127735, 9811106331 पर संपर्क किया जा सकता है। इस समिति के माध्यम से पिछले लगभग 16-17 वर्षों में 71 देहदानियों का शरीर मेडिकल कालेज को समर्पित किया जा चुका है। मेरे विचार में यह संख्या आवश्यकता से काफी अपर्याप्त है और इस दिशा में अनेक कार्यकर्ताओं एवं स्वयंसेवी संस्थाओं को अपना योगदान देने की आवश्यकता है।
देहदान करने के इच्छुक व्यक्ति अपने प्रदेश के किसी भी मेडिकल कालेज के एनॉटमी विभाग में संपर्क कर जानकारी ले सकते हैं। वहां पर देहदान संबंधी कानूनी प्रक्रिया की भी पूरी जानकारी दी जाती है। दिल्ली के लोगों के लिए यह प्रासंगिक होगा कि वह अपने परिवार में मृत्यु होने पर देहदान के लिए मौलाना आजाद मेडिकल कालेज की एनॉटमी विभाग की अध्यक्षा प्रो. (डा.) जे.एम. कौल से संपर्क कर सकते हैं, जिनका दूरभाष नं. 9968604202, कार्या. 23239271, नि. 26460174 है। मौलाना आजाद मेडिकल कालेज के द्वारा एक वाहन केवल इसी काम के लिए समर्पित है जो सूचना मिलने पर मृतक के शरीर को मौलाना आजाद मेडिकल कालेज तक उनके घर से लाता है। दिल्ली में देहदान को आंदोलन बनाने की प्रक्रिया में प्रो. जे.एम. कौल तथा दधीचि देह दान समिति के श्री आलोक कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
वस्तुत: देहदान एक भावनात्मक विषय है। साथ ही भारतवर्ष एक धर्म प्रधान देश होने के नाते देहदान के रास्ते में कुछ लोगों के मन में धार्मिक पक्ष भी अड़चन पैदा करता है। कई बार व्यक्ति अज्ञानतावश धर्म संबंधी गलत जानकारियों से कुछ ज्यादा बंधा होता है, जिसके कारण देहदान के लिए वह अपने को तैयार नहीं कर पाता है। ऐसे लोगों को देहदान के लिए तैयार करना थोड़ा कठिन सा हो जाता है। इसके लिए जरूरी यह है कि विविध मत-पंथों के गुरु/मौलवी/फादर इत्यादि लोगों का मार्गदर्शन करें तथा उन्हें यह बतायें कि देहदान करने में कोई धार्मिक बाधा नहीं है तथा मानवता के कार्य में धर्म कभी नहीं रोकता है तो देश में बहुत सारे लोग सहज ही देहदान करने के लिए प्रोत्साहित होंगे।
देहदान की दिशा में सरकारी संस्थायें कारगर सिद्ध नहीं हो पायेंगी, क्योंकि सरकारी संस्थाओं की कार्यप्रणाली में अनेक बाधायें आती हैं। देहदान के लिए निरंतर प्रोत्साहन तथा मृत दान शरीर को संबंधित मेडिकल कालेज में निर्धारित समय के अंदर पहुंचाने के लिए अत्यंत तत्परता की आवश्यकता होती है। यद्यपि इसमें परिजनों की भी जिम्मेदारी होती है लेकिन जब परिवार के किसी सदस्य का निधन होता है तो समूचे परिजन शोकसंतप्त हो जाते हैं तथा इस परिस्थिति में मृत शरीर को संबंधित स्थान पर अनेक कारणों से पहुंचा पाना उनके लिए संभव नहीं हो पाता है। ऐसे में समूचे देश में ऐसी गैर सरकारी संस्थाओं का गठन होना चाहिए जो 24×7 कार्य करें तथा उनके पास मृत शरीर को संबंधित मेडिकल कालेज में मृत्यु होने के उपरांत निर्धारित समय के भीतर पहुंचाने की समुचित सुविधा उपलब्ध हो।
अत: पाठकों से आग्रह है कि देहदान मानवता की दिशा में किया गया एक महान योगदान है, इसलिए स्वयं भी देहदान का संकल्प लें तथा समाज के लोगों को भी इसके लिए जागरूक करें। मृत शरीर को खाक में मिलना निश्चित है, जिससे किसी को कोई लाभ नहीं होना है लेकिन यदि देहदान कर दिया तो इस शरीर की सहायता से भारत को अनेक योग्य चिकित्सक आने वाले भविष्य में उपलब्ध हो सकेंगे।
(लेखक से उनकी वेबसाइट www. drharshvardhan.com तथा ईमेल drhrshvardhan@ gmail.com के माध्यम से भी सम्पर्क किया जा सकता है।)










