क्या सेना जैसी मिसाल दे पाएगा भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र?
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नरेन्द्र सहगल
हाल ही में सैन्य अदालत ने भ्रष्टाचार के अरोप में ले.जनरल अवधेश प्रकाश को बर्खास्त करके एक समयोचित आदर्श प्रस्तुत किया है। राजनीतिक नेताओं के भ्रष्टाचार, विदेशी तिजोरियों में बंद कालेधन, बड़े-बड़े घपले घोटालों के साथ एक शक्तिशाली लोकपाल बिल पर हो रही गरमा गरम चर्चा के दौरान सैन्य अदालत का यह फैसला क्या हमारे देश के भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र को कोई सबक सिखाएगा? सरकार, राजनीतिक दलों, न्यायालयों और समस्त जनता के समक्ष एक ज्वलंत प्रश्न खड़ा हो गया है कि यदि देश की सीमाओं के रक्षक किसी सेनाधिकारी को उनके थोड़े से भी भ्रष्ट आचरण पर सजा हो सकती है तो नागरिकों के अधिकारों की रक्षक सरकार भ्रष्ट राजनेताओं को संरक्षण क्यों देती है? क्यों बच जाते हैं राजनीतिक नेता?
सैन्य अदालत का ऐतिहासिक फैसला
गत तीन दिसम्बर को पूर्व सैन्य सचिव ले.जनरल अवधेश प्रकाश को सुकना भूमि घोटाले का दोषी ठहराते हुए सेना के जनरल कोर्ट मार्शल ने सैन्य कानून की धारा 45 (पद का दुरुपयोग) और 52 (धोखाधड़ी) का दोषी साबित किया है। हालांकि 61 वर्षीय सेनाधिकारी अवधेश प्रकाश जनवरी 2010 में सेवानिवृत्त हो चुके हैं तो भी इन्हें सजा सुनाकर सैन्य अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया को बल प्रदान किया है। जनरल के सारे सैन्य पदक वापस ले लिए गए हैं। उनके पास अब ले.जनरल का खिताब भी नहीं रहेगा और पेंशन इत्यादि सभी लाभों से वे वंचित हो गए हैं।
इस महत्वपूर्ण फैसले से पहले भी सैन्य अदालतों ने सेना के दो प्रमुख अधिकारियों को उनके भ्रष्ट आचरण के लिए सजाएं दी हैं। बहुचर्चित राशन घोटाले में जम्मू-कश्मीर में तैनात ले.जनरल (अब सेवानिवृत्त) एस.के.साहनी को सैन्य अदालत ने बर्खास्त कर दिया था। इन पर सियाचिन में सैन्य जवानों के लिए सूखे राशन की खरीद का आरोप था। इसी तरह सुकना भूमि घोटाले में ही ले.जनरल पी.के.रथ को भी दोषी साबित करके सैन्य कोर्ट मार्शल ने पद से हटा दिया था। सेनाधिकारियों के साथ कई साधारण अफसरों और जवानों को भी सजा मिलती रही है।
जनांदोलन विरोधी कांग्रेसी सरकार
सैन्य अदालतें तो अपना कर्तव्य यथासमय निभाती हैं। किसी भी बाह्य राजनीतिक दबाव से प्राय: मुक्त “सैन्य कोर्ट मार्शल व्यवस्था” अपना काम सुचारू ढंग से निपटाने में सक्षम होती है। परंतु राजनीतिक भ्रष्टाचार की नाक में नकेल डालने वाली कोई सुचारू व्यवस्था देश में कहीं नजर नहीं आती। इसी भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र पर अंकुश लगाने के लिए अण्णा हजारे जैसे गांधीवादी समाजसेवी नेताओं ने जन लोकपाल के मुद्दे पर देशव्यापी सत्याग्रह प्रारंभ किया। राजनीतिक भ्रष्टाचार की संतान कालेधन को विदेशों से वापस लाने के मुद्दे पर स्वामी रामदेव ने देशव्यापी जनजागरण करके सत्ताधारियों को ललकारा।
भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों की संरक्षक सरकार ने इन दोनों गैर राजनीतिक जननेताओं द्वारा प्रारंभ किए गए जनांदोलनों को साम दाम दंड भेद से कुचल डालने की साजिशें रचीं। योग गुरु स्वामी रामदेव के कालाधन वापसी आंदोलन को तो सरकार ने पुलिसिया कहर से दबाने की जघन्य कुचेष्टा कर डाली और समाजसेवी अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को घटिया राजनीति का शिकार बनाकर बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है। यह अलग बात है कि देश के सभी राष्ट्रवादी दलों और संगठनों सहित सारी जनता इनकी शक्ति है।
भ्रष्टाचार की जन्मदाता कांग्रेस
यह एक ध्रुव सत्य है कि देश का सबसे पुराना और बड़ा राजनीतिक दल कांग्रेस ही सिद्धांतहीन राजनीति का जनक है। भ्रष्ट राजनीतिक आचरण की जन्मदाता, पोषक और संरक्षक कांग्रेस पार्टी ने ही भ्रष्ट राजतंत्र की शुरुआत की है। सत्ता की ताकत का इस्तेमाल करके धन बटोरने का यह राजनीतिक सिलसिला देश के प्रथम कांग्रेसी प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के जमाने में ही प्रारंभ हो गया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार नेहरू जी के कार्यकाल में ही उस समय के केन्द्र के निगरानी विभाग ने भ्रष्टाचार के लगभग 90 हजार मामले सरकार को सौंपे थे। प्राय: सभी मामले राजनीतिक दबाव के नीचे दबा दिए गए।
रक्षामंत्री कृष्ण मेनन का जीप घोटाला, वित्तमंत्री टी.टी.कृष्णमाचारी का मूदड़ा कांड और एक बड़े उद्योगपति धर्मतेजा द्वारा लिया गया 20 करोड़ का कर्ज इत्यादि सभी घपले ठंडे बस्ते में जा पहुंचे। इन दोनों केन्द्रीय मंत्रियों का कुछ नहीं बिगड़ा। दोनों ही मंत्री पदों पर विराजमान रहे। प्रधानमंत्री सहित सारी सरकार का कथित वरद्हस्त इनकी पीठ पर था। उद्योगपति धर्मतेजा को बिना जांच पड़ताल के भारी भरकम कर्ज दिलाने में पंडित नेहरू भी चर्चा में रहे। पंडित जी के मंत्रिमंडल में शामिल तेल एवं उद्योग मंत्री केशवदेव मालवीय भी जब तेल घोटाले में फंसते हुए नजर आए तो कांग्रेस के सत्ताधारी हाथ ने उन्हें बचा लिया। इन मंत्रियों के विरोध में उमड़े जनाक्रोश को कानून के कूड़ेदान में फेंककर उस समय के कांग्रेसी सत्ताधारी ऐश करते रहे।
सत्ता बचाने के भ्रष्ट प्रयास
कानून को कुर्सी के नीचे दबाकर धन बटोरने और सत्ता बचाने की परंपरा इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री कालखंड में और भी ज्यादा मजबूत हो गई। नागरवाला को स्टेट बैंक आफ इंडिया से 60 लाख रुपये निकलवाने में इंदिरा गांधी के कथित फोन ने काम किया। जब नागरवाला ने इस घोटाले की पुन: जांच की मांग उठाई तो रहस्यमय परिस्थितियों में नागरवाला और जांच करने वाली टीम के प्रमुख पुलिस अफसर की मौत हो गई। इसी तरह कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के घर पर एक बड़े शेयर दलाल हर्षद मेहता द्वारा एक करोड़ रुपये से भरी अटैची ले जाने का कांड भी रहस्यमयी राजनीति का शिकार हो गया। ये सभी घपले सत्ता के आश्रय में हुए।
इस प्रकार के राजनीतिक भ्रष्टाचार के बाद तो कांग्रेसियों ने अपनी सत्ता को बचाने के लिए “वोट के बदले नोट” के हथियार का इस्तेमाल करना प्रारंभ कर दिया। नरसिम्हा राव एवं डा.मनमोहन सिंह ने सदन में विश्वास मत प्राप्त करने के लिए इस अवसरवादी, सिद्धांतहीन और सत्तालोलुप राजनीति का सहारा लेकर अपनी सत्ता बचाई। समझ में नहीं आता कि वर्तमान प्रधानमंत्री किस मुंह से भ्रष्टाचार के विरुद्ध जंग लड़ने की दुहाई दे रहे हैं जबकि उनके मंत्रिमंडल के ही कई सदस्य भ्रष्टाचार के मामलों में कानून के शिकंजे में फंस चुके हैं। यह राजनीतिक पाखंड नहीं तो और क्या है? यह सत्तानिष्ठ पाखंड ही तो भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र बन रहा है। भ्रष्टाचार की असली जड़ तो वही है जिसे उखाड़ फेंकने के लिए जनांदोलन हो रहे हैं।
भ्रष्टाचार और राजनीतिक संरक्षण
अब तो कांग्रेस द्वारा प्रचारित किए जाने वाले भारत के भावी प्रधानमंत्री “युवराज” राहुल गांधी ने भी भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए युवाओं से आगे आने की अपील की है। यह अपील राजनीतिक अवसरवादिता के सिवाय और कुछ नहीं है। राहुल से पूछा जाना चाहिए कि बोफर्स तोप दलाली घोटाले में पूरी तरह फंसे उनके पिताश्री पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी को कानून की गिरफ्त से निकालने का काम किसने किया? नरसिम्हा राव ने, मनमोहन सिंह ने या फिर पर्दे के पीछे से कठपुतली सरकार को नचा रहीं सोनिया गांधी ने?
भ्रष्टाचार से लबालब भरे अपने गिरेबान में झांकने की बजाए दूसरों को शिष्टाचार और शुद्ध राजनीति का उपदेश देने वाले कांग्रेसी नेता यह क्यों भूल जाते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देश की सत्ता पर 56 वर्ष तक तो उनके ही दल का कब्जा रहा है। लाल बहादुर शास्त्री को छोड़कर एक भी कांग्रेसी प्रधानमंत्री ऐसा नहीं है जो भ्रष्टाचार के आरोपों की लपेट में न आया है। उल्लेखनीय है कि स्वयं ईमानदारी का ड्रामा करके भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने वाला भी भ्रष्टाचारी ही होता है। भ्रष्टाचार की यह परिभाषा सभी पर लागू होती है, सत्ताधारी एवं विपक्ष दोनों पर। राजनीतिक संरक्षण से ही भ्रष्टाचार पनपता है।
भ्रष्टाचार या राजनीतिक शिष्टाचार
सत्ताधारियों के इसी सत्तालोलुप संरक्षण के कारण भ्रष्ट राष्ट्रों की सूची में भारत का नाम मिटने की बजाए और भी ज्यादा गहरा होता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय संस्था “ट्रांसपरेसी इंटरनेशनल” के ताजा सर्वेक्षण के अनुसार भारत में भ्रष्टाचार समाप्त होने के बजाए उलटा बढ़ रहा है। भ्रष्ट देशों की सूची में भारत का नाम पहले 87वें स्थान पर था, अब लुढ़ककर 95वें पर आ गया है। इसका सीधा अर्थ तो यही निकलता है कि भ्रष्टाचार से लड़ने के सभी सरकारी दावे मात्र राजनीतिक दांवपेंच के सिवाय और कुछ भी नहीं हैं। भ्रष्टाचारियों पर लगाम कसने की सरकारी तैयारियां झूठ का पुलिंदा साबित हो रही हैं।
अण्णा हजारे, स्वामी रामदेव, राष्ट्रवादी राजनीतिक दलों एवं सामाजिक संगठनों द्वारा लगातार प्रयत्नों के बावजूद एक भी ऐसा कदम नहीं उठाया गया जिससे भ्रष्ट राजनेताओं पर अंकुश लगे। जिन मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं और वे कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं, वे न्यायालय की सख्ती से दोषी माने जा रहे हैं, न कि सरकार की सक्रियता से। वास्तव में सरकारी संरक्षण अथवा कमजोर मानसिकता के कारण ही आज भ्रष्टाचार राजनीतिक शिष्टाचार में बदल गया है।
जनभावनाओं से हुआ खिलवाड़
भ्रष्टाचार और भ्रष्ट शासकीय तंत्र की प्रतिक्रिया स्वरूप पिछले दिनों हुए प्रचंड जनजागरण के कारण डा.मनमोहन सिंह की सरकार एक सक्षम लोकपाल बिल लाने के लिए मजबूर तो हुई है, परंतु लोकपाल की सक्षमता को कम करने के इंतजाम भी किए जा रहे हैं ताकि राजनीतिक संरक्षण में पल रहे भ्रष्टाचारी कांग्रेसी नेताओं को सुरक्षा कवच दिया जा सके। संसदीय समिति द्वारा लोकपाल बिल पर तैयार की गई रपट से पता चलता है कि कांग्रेस पार्टी और संप्रग सरकार दोनों ही भ्रष्टाचार को समाप्त करने में ईमानदार नहीं हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि यदि सशक्त, निष्पक्ष और सतर्क लोकपाल व्यवस्था बन गई तो डा.मनमोहन सिंह सहित लगभग सारा मंत्रिमंडल जेल के सीखचों में बंद होगा।
संसदीय समिति द्वारा पेश की गई रपट के अनुसार निचले स्तर की नौकरशाही से लेकर प्रधानमंत्री तक को लोकपाल के दायरे में नहीं लाया जा सकेगा। कुछ शर्तों के साथ ही प्रधानमंत्री को इस निगरानी परिधि में रखा जा सकेगा। जबकि संसद के दोनों सदनों में यह बात सर्वसम्मति से कही गई थी कि निचले स्तर से लेकर ऊपर तक भ्रष्टाचार मिटाने में मजबूत लोकपाल व्यवस्था बनाई जा सकेगी। जाहिर है कि संसद की भावना/गरिमा को ताक पर रखकर जिस लोकपाल बिल को संसद में पेश करने की चर्चा है वह जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ है।
जनता जनार्दन बनाम राजहठ
संसदीय समिति ने जिस ढीले ढाले लोकपाल की व्यवस्था करने की सिफारिश की है वह 10 जनपथ एवं 7 रेसकोर्स के इशारे पर तैयार की गई लगती है। सीबीआई को लोकपाल के वर्चस्व से बचाने का प्रयास किया गया है। सत्ताधारी राजनेता सीबीआई जैसी संस्थाओं को अपने कब्जे में ही रखना चाहते हैं। लोकपाल व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा देने पर सहमति होने के बावजूद इसे सीबीआई के काम में हस्तक्षेप अथवा निगरानी का अधिकार नहीं होगा। जाहिर है कि लोकपाल को भी सत्ताधारी अपनी मुट्ठी में कसना चाहते हैं।
समय रहते सरकार और कांग्रेस पार्टी विशेषतया सोनिया गांधी, डा.मनमोहन सिंह और भावी प्रधानमंत्री की स्वप्निल दुनिया में जी रहे राहुल गांधी को वास्तविकता को पहचानना चाहिए। चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री तक भ्रष्टाचार मुक्त राजनीतिक व्यवस्था के लिए देश की जनता मांग कर रही है। संसद से सड़क तक संघर्ष के बिगुल बज रहे हैं। निचले एवं उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार की अनदेखी कर रही केन्द्र सरकार ने यदि अपना राजहठ न छोड़ा तो जनता जनार्दन का आक्रोश अनियंत्रित हो जाएगा। द
राजनीतिक दबाव से पूर्णतया मुक्त सैन्य अदालत ने भ्रष्ट सेनाधिकारियों को सजा देकर राजनीतिक संरक्षण में पल रहे राजनेताओं को भी तुरंत सजा देने की समयोचित आवश्यकता की भूमिका तैयार की है।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध संसद से सड़क तक उमड़ रहे जनाक्रोश की अनदेखी यदि सरकार करती रही तो परिणाम भयंकर होंगे। जनता जनार्दन के आगे एक न एक दिन राजहठ को झुकना ही पड़ेगा।











