सरोकार
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चूल्हे का संस्कार
मृदुला सिन्हा
चूल्हा तो चूल्हा ही है। जिसका मुंह ही काला होता है। जिसके अंदर आग रहती है। चूल्हा मिट्टी का हो या लोहे का, उसमें लकड़ी जले या कोयला। क्या फर्क पड़ता है। हम तो यही समझते थे कि उस पर पकाये जाने वाले सुस्वादु भोजन का ही महत्त्व था। जोरों की भूख लगी हो तो कच्ची-पक्की सब्जी और वैसी ही रोटियां निकल आएं, बस। उसके बाद चूल्हे का क्या काम। दादी और मां भी अजीब जीव थीं, वे चूल्हे के बारे में भी हमारे नन्हें मन में न जाने किन-किन धारणाओं का बीजारोपण कर गईं।
हमारे बचपन में तो मिट्टी के ही चूल्हे होते थे। दादी ही चूल्हे पारा (बनाया) करती थीं। चूल्हे पारने की विषेशज्ञ थीं। इसलिए टोले-मुहल्ले में भी उनकी मांग थी। चूल्हे के लिए मिट्टी लाने के लिए चरवाहे को न जाने क्या-क्या हिदायतें देती थीं। यह भी बात अपनी समझ से परे थी। मिट्टी तो मिट्टी है। उसमें क्या भेद। दादी करती थीं भेद। चूल्हे के लिए उन्हें साफ-सुथरी पवित्र मिट्टी चाहिए होती थी। इस खेत की नहीं, उस खेत की नहीं। यह तो हुई मिट्टी की स्वच्छता की बात। पर चूल्हे के लिए विशेष प्रकार की मिट्टी चाहिए होती है। उसमें लस होनी चाहिए। भुरभुरी मिट्टी से चूल्हा नहीं बन सकता था। गांव के लोगों ने चूल्हे के लिए मिट्टी का भी काफी अध्ययन किया हुआ है। किसी खास नदी-तालाब या खेत की मिट्टी से ही चूल्हे बनाए जाते थे। गूंथती थी दादी। भिन्न-भिन्न आकार प्रकार के चूल्हे की मापतौल भी दादी को मालूम थी। उसी माप से पट्टा ठोकतीं थीं। चूल्हा पारने (प्रारंभ करने) की भी शुभ तिथि देखी जाती थी। उस पट्टे को उठाकर खड़ा करतीं, फिर उसमें मिट्टी लगाई जाती। चूल्हे का मुंह बिल्कुल गोल होना चाहिए। धूप में अच्छी तरह सुखा कर ही रसोई घर में चूल्हा लाया जाता। बारिश आने के पूर्व कई चूल्हे बनाकर रख लिए जाते थे। रसोईघर में चूल्हे को प्रस्थापित कर उसकी पूजा करके ही उस पर पहली बार खीर पकाई जाती थी।
प्रति सुबह चूल्हा जलाने से पूर्व मां उसे प्रणाम करती थीं। खाना बनाने के बाद पके हुए भोजन के सभी पदार्थों से थोड़ा-थोड़ा निकालकर चूल्हे की अग्नि में डालतीं। भोजन करने के लिए हम भाई-बहन कितने भी उतावले हो रहे हों, जबतक पके हुए भोजन का अंश अग्नि में नहीं डाला जाता, तब तक हमें भोजन नहीं मिलता था।
मेरे पिताजी ने नया घर बनाया था। गृहप्रवेश होना था। पूजा अर्चना हुई। पंडित जी ने कहा-“अब जाइए। आपलोग चूल्हा जलाइए।” उन्होंने यह भी कहा- “दरअसल गृहप्रवेश का मतलब ही चूल्हा जलाना है।” सभी महिलाएं वहां एकत्रित हुईं, जहां चूल्हा जलाना था। मां चूल्हा जलाने के लिए आगे बढ़ीं। दादी ने सभी महिलाओं से कहा-“तुम लोग खूब जोर से हंसो।” सब हंसने लगीं। हंसी तो मैं भी, पर मेरी समझ में बात नहीं आई। मैंने बड़ी होकर दादी से पूछा -“दादी चूल्हा जलाते समय क्यों हंसे सब?”
“पहले दिन ही हंस-हंस कर चूल्हा जलाएंगे तो सब दिन हंसते रहेंगे। दरअसल चूल्हा जलाते समय और भोजन बनाते समय हमेशा खुश रहना चाहिए। तभी स्वादिष्ट भोजन बनता है। और वैसा ही भोजन खाने से घर के लोग स्वस्थ्य रहते हैं। हंसते-हंसते भोजन बनाने से चूल्हे का संस्कार बनता है।” दादी एक सांस में कह गईं। बात मेरे गले नहीं उतरी। दादी तो मिट्टी के चूल्हे में भी संस्कार ही डालती थीं। उनके लिए हमसे भी महत्त्वपूर्ण चूल्हे होते थे।
चूल्हे की आग बुझाने के लिए उसके अंदर पानी नहीं डाला जाता है। अशुभ होता है। चूल्हे का मुंह उत्तर या दक्षिण दिशा की ओर नहीं होता है। ये सारी बातें आज हमें भले ही हास्यास्पद लगें, पर इनके गूढ़ अर्थ हैं। चूल्हे की दोनों शाम लिपाई होती थी। एकबार खाना बन जाने के बाद जूठा हो जाता था चूल्हा। स्वच्छता की ही तो बात थी। चूल्हे में जलने वाली लकड़ियां भी पवित्र या अपवित्र होती थीं।
चूल्हे का श्रृंगार उसमें अग्नि का प्रज्ज्वलित होना है। उसका संस्कार गर्म रहना है। इसलिए “चूल्हा ठंडा है” मुहावरा बन गया। जिस घर में चूल्हा ठंडा है, वहां भोजन नहीं बना। चूल्हा जलते रहना, समृद्धि का प्रतीक है। जहां दिनभर चूल्हा जलता रहता है, उस घर में धन भी है और जन भी। धन और जन के होने से ही एक सुखी घर कहलाता है। मिट्टी का चूल्हा पवित्र माना जाता रहा है। लोहे के चूल्हे पर भी मिट्टी का लेप लगाकर जलाया जाता था। गैस के चूल्हे ने जहां लकड़ी और कोयले के चूल्हे की जगह ले ली, बहुत से पुराने संस्कार समाप्त हो गए। फिर भी चूल्हा तो चूल्हा है। नया चूल्हा जलाना प्रारंभ करते हुए मैंने भी अपनी बहू से कहा-“जोर से हंसो।” वह चौंक गई। पूछा- “क्यों?” मैंने कहा-“”यह सवाल सनातन है। कुछ ऐसे सनातनी सवालों के जबाव नहीं होते। बस! करते आए हैं, करती रहो।”
इस बहाने भी हम अपनी दादी और मां को स्मरण करते रहते हैं। अब इतनी सी बात तो स्पष्ट हो गई है कि चूल्हा जलाने का अर्थ ही भोजन पकाना होता है। भोजन शरीर और मन के लिए भी आवश्यक है। बेमन से या रोते हुए, चिंता करते हुए भोजन पकाने से भोजन का संस्कार बिगड़ जाता है। “जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन” वाली कहावत चरितार्थ होती है। चूल्हे का अपना संस्कार होता है तो भोजन का भी अपना संस्कार। घर में सदस्यों के अधिक बीमार पड़ने पर अन्न उपजाने वाले तक के संस्कार का परीक्षण होता था। बीमारी का कारण वहां पता चलता था। सब लोग जानते थे कि किस खेत का अन्न है, उस खेत में कौन-कौन से खाद डाले गए, किसने कटाई की, किसने कूटा-पीसा, किसने भोजन बनाया। सब छानबीन हो जाती थी। खेत के संस्कार से लेकर चूल्हे के संस्कार तक। दादी मां की इन संस्कारों को देने और परीक्षण करते रहने से ही फुर्सत नहीं मिलती थी।
आज हमारे घरों में चूल्हे हैं। पर वे जलते कम हैं। घरों में जलाए जाने वाले चूल्हों की संख्या से होटलों की संख्या अधिक हो गई। घर के भोजन से अधिक स्वाद होटलों के भोजन में मिलता है। घर में चूल्हा जलाने वालियों के हाथों में भी कलम है, माउस है और भी ढेर सारे उपकरण। वे चूल्हा कैसे जलाएं? इसलिए तो बड़े महंगे फ्लैटों में चूल्हे जलते नहीं। भोजन के संस्कार की भी छानबीन नहीं होती। इतनी फुर्सत कहां है कि चूल्हे के संस्कार ढूंढते रहें। इतनी भी फुर्सत नहीं कि चूल्हे में संस्कार डालें।
आज भी लकड़ी और कोयले के चूल्हे जलते हैं। उनमें संस्कार डाले जाते हैं। विविधतापूर्ण समाज जो है। चूल्हे में संस्कार ढूंढने वाले लोग भी हैं। और तभी हम हैं, हम रहेंगे। दादी कहा करती थीं – “चूल्हा उपास रह गया।”
कहने का अभिप्राय तो अब समझ में आता है कि घर में खाना नहीं बना। घर के सदस्यों से पूर्व चूल्हे का उपवास हो गया। चूल्हे का नहीं जलना, परिवार के दुर्भाग्य की निशानी है। चूल्हा फूंकना भी एक कला है। सभी औरतें चूल्हा ठीक से नहीं जला पातीं। उन्हें प्रशिक्षण लेना पड़ता है। चूल्हे में लकड़ियों को रखने का विशेष ढंग होता है। धूआं पैदा करने वाली लकड़ियों को निकाल दिया जाता है। जिस औरत के हाथ से चूल्हे में आग नहीं धधके, उसे फूहर या अशुभ माना जाता था। क्योंकि भोजन बनाना ही शुभ कार्य है, कल्याणकारी। चूल्हे से बढ़कर कल्याणकारी कौन उपकरण होगा। चूल्हे के उपकरणों के नाम भी हम भूलते जा रहे हैं। खोड़नी, फूंकनी, उठगन जैसे शब्द खोते जा रहे हैं। चूल्हा फूंकना नहीं पड़ता, अब चूल्हे जलते हैं।
जलें या फूंके जाएं, चूल्हों के संस्कार जीवित रहने चाहिए। क्योंकि पूरी मानवता को जीवित रखते हैं चूल्हे। दोनों परस्पर पूरक हैं। चूल्हा-संस्कार से जीवन, तो मानव के संस्कार से चूल्हा जीवित रहता आया है, रहना चाहिए।











