| दिंनाक: 05 Aug 2005 00:00:00 |
|
हर पखवाड़े स्त्रियों का अपना स्तम्भविधु गंजूर की अजब दीवानगीकश्मीरी की कानी कलाप्रतिनिधिविधु गंजूरकानी जामावार शालों का नाम सुना है आपने? कानी शालों के बारे में जानना हो तो बात 14वीं शताब्दी पीछे तक जाती है। वृहत्तर श्रीनगर क्षेत्र के पास संगम गांव है, जो पिछले 700 वर्षों से कानी कला का केन्द्र है। कानी शालों को बनाने की कला जीवित रहे, इसके लिए विधु गंजूर ने बीड़ा उठाया है।संगम गांव में कानी शाल बुनाई के कुछ दृश्यकानी शाल की डिजाइन व बुनाई के बादाीमती विधु गंजूर मूलत: कश्मीर की रहने वाली हैं और फिलहाल दिल्ली में रहती हैं। उनके संवेदना न्यास ने इस कार्य के लिए संगम गांव को अपनाया है। इस कला के प्रचार-प्रसार तथा इस संदर्भ में लोक जागरण के लिए पिछले दिनों नई दिल्ली में एक प्रदर्शनी लगायी गयी तथा चर्चा सत्र का आयोजन भी किया गया। चर्चा में पूर्व मंत्रिमंडलीय सचिव तथा अमरीका में भारत के पूर्व राजदूत श्री पी.के. कौल, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र की पूर्व अध्यक्षा श्रीमती कपिला वात्स्यायन, पर्यटन व संस्कृति मंत्रालय में संयुक्त सचिव श्री के. जयकुमार, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (दिल्ली) में वस्त्र विभाग में व्याख्याता श्री एम.एल. गुलराजानी, फ्रांस के भारत स्थित राजदूत की पत्नी श्रीमती गेरार्ड सहित अनेक दूतावासों में कार्यरत समाजसेवी भी उपस्थित थे।कानी जामावार बुनाई कला के संरक्षण की मुहिम में जुटीं श्रीमती विधु गंजूर ने बताया कि कानी जामावार एक अनूठी बुनाई कला है, जो श्रीनगर से गुलमर्ग जाने वाले मार्ग के किनारे बसे कुछ गांवों तक ही सीमित है। कानीहामा, मजहामा, बारीपोरा और संगम गांवों के लोग इस कला के माहिर हैं। एक कानी जामावार शाल बनाने में कभी-कभी एक कारीगर को 6 महीने तक का समय लग जाता है, इसीलिए यह शाल बहुत मंहगी होती हैं। इसकी कीमत 1 लाख रु. से लेकर 4 लाख रु. तक होती है। बदले जमाने में यह कला समाप्त होती जा रही थी, इसीलिए इसे बचाने के लिए संगम गांव को केन्द्र बनाकर इस कला का प्रचार-प्रसार तथा संरक्षण किया जा रहा है। इसमें अब केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्रालय का भी सहयोग प्राप्त होने लगा है।प्रतिनिधिNEWS