| दिंनाक: 07 Mar 2005 00:00:00 |
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जहां शहीद हुए थे जनरल जोरावर-प्रो. इन्द्रसेन शर्माकैलास-मानसरोवर यात्रा प्रारम्भ करने से पूर्व 17 जून, 2004 को विदेश मंत्रालय के प्रांगण में हुई बैठक के दौरान मैंने जनरल जोरावर सिंह की समाधि पर जाने और श्रद्धाञ्जलि अर्पित करने की अनुमति प्राप्त कर ली थी। कैलास-मानसरोवर की परिक्रमा समाप्त करने के पश्चात हम लोग 8 जुलाई को समाधि स्थल पर गए।जनरल जोरावर सिंह की समाधि तकलाकोट से 4-5 किलोमीटर की दूरी पर तोयो नामक एक गांव में स्थित है। हम सब बस से उतर कर समाधि के समीप गए और समाधि पर अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित की। इसके पश्चात भारत माता की जय, भोले शंकर की जय आदि नारे लगाए। सभी ने दो मिनट का मौन भी रखा और जनरल जोरावर सिंह की जय के जोरदार नारे लगाए। खुले तौर पर तो किसी ने कुछ नहीं कहा, हां, एक दो “सेकुलर” भाइयों ने पीछे से खुसर-पुसर की थी कि हमें भारत माता की जय के नारे नहीं लगाने चाहिए, क्योंकि चीन की सरकार हमें पकड़ कर जेल में डाल सकती थी।जनरल जोरावर सिंह की समाधि के सामने प्रो. इन्द्रसेन शर्मा (दाएं)।12 दिसम्बर, 1841 में जनरल जोरावर सिंह इसी स्थान पर शहीद हुए थेजनरल जोरावर सिंह जम्मू-कश्मीर के महाराजा गुलाब सिंह के सेनापति थे, जिन्होंने राज्य के विस्तार के लिए हरसम्भव प्रयास किए और गिलगित, वजीरिस्तान, लद्दाख, काराकोरम आदि क्षेत्रों को जीतकर राज्य की सीमाओं को बढ़ाया था।जोरावर सिंह का बचपन का नाम जुहार सिंह था। जम्मू और कश्मीर के महाराजा गुलाब सिंह की सेना में भर्ती होने के बाद इनकी योग्यता के आधार पर महाराजा ने इनको सेनापति नियुक्त किया था। जनरल जोरावर सिंह का जन्म हिमाचल प्रदेश में जिला बिलासपुर के कलहूर नामक ग्राम में हुआ था। उनके सैन्य नेतृत्व में महाराजा गुलाब सिंह के राज्य की सीमाएं मध्य एशिया में काराकोरम तक फैलीं। उन्होंने पश्चिमी तिब्बत में कैलास मानसरोवर का पूरा क्षेत्र जीतकर इस देव भूमि को हिन्दू श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षित कर दिया था। उन्होंने आस-पास के विभिन्न क्षेत्रों को जीतने के पश्चात एक नए सैन्य अभियान का बीड़ा उठाया। मई, 1841 ई. को जनरल जोरावर सिंह ने 6-7 हजार सैनिक, जिनमें बाल्टी, लद्दाखी, किश्तवारी और डोगरा शामिल थे, लेकर पश्चिमी तिब्बत के आली क्षेत्र, जिसमें पवित्र कैलास मानसरोवर स्थित है, पर चढ़ाई की। 5 जून, 1841 को रूडोक जीत लिया। फिर गारटोक पर धावा बोला। तिब्बती सेनापति मैदान छोड़कर तकलाकोट की ओर भाग गया। जोरावर सिंह ने उसका पीछा किया और 6 सितम्बर, 1841 को तकलाकोट के दुर्ग पर कब्जा कर लिया। उसके पश्चात् पवित्र कैलास-मानसरोवर का क्षेत्र जीतकर अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मानसरोवर में स्नान करके श्री कैलास के चरणों में सोने की देव-मूर्ति अर्पित की।जोरावर सिंह ने कई छोटे-छोटे दुर्ग बनवाकर उन पर सैनिक टुकड़ियां बैठाईं। चीथांग में पत्थर का किला बनवाकर कर्नल बस्ती राम को वहां का कमांडर नियुक्त किया। इसके पश्चात् उनकी योजना ल्हासा की तरफ बढ़ने की थी।तोयो का युद्ध15,000 फुट की ऊंचाई पर दिसम्बर मास की भीषण सर्दी और भयंकर हिमपात से बचने के लिए जोरावर सिंह के सैनिकों के पास उपयुक्त वस्त्र आदि नहीं थे। इन परिस्थितियों में 12 दिसम्बर, 1841 को चीनी और तिब्बती सेना ने अचानक एक साथ मिलकर आक्रमण कर दिया। जोरावर सिंह ने बड़ी बहादुरी से उनका मुकाबला किया, घायल होने पर भी वीरता से लड़ते रहे। तिब्बती समझते थे कि वह कोई तांत्रिक है और उसके पास कोई दैवी शक्ति है एवं वह साधारण गोली से नहीं मरने वाला। एक किंवदन्ति के अनुसार इसीलिए उन्होंने एक विशेष सोने की गोली बनवाकर एक मकवोन (पटवारी) के घर से चलाई। इस प्रकार शूरवीर जनरल जोरावर सिंह लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए।तोयो गांव के कुछ वृद्धों के अनुसार जनरल जोरावर सिंह का एक सेवक उनसे रुष्ट था। तोयो के पास निशस्त्र देखकर उसने जोरावर सिंह को छुरे से मार डाला। जो भी हो, जोरावर सिंह के बाद सब कुछ समाप्त हो गया। जीत हार में बदल गई। केवल कर्नल बस्ती राम, जो तोयो के युद्ध में शामिल नहीं थे, 127 सैनिकों के साथ बचकर अल्मोड़ा पहुंचे, जो बाद में (1847-61) जांस्कार के गवर्नर बने।जोरावर सिंह की वीरता से प्रभावित होकर तिब्बतियों ने तोयो नामक ग्राम के समीप उनकी स्मृति में एक स्मारक बनवाया। विश्व के इतिहास में यह एक अनूठा उदाहरण है कि किसी ने अपने शत्रु की स्मृति में स्मारक बनाया हो।NEWS