के.जी.बी. का पैसाइस तरह हुई सत्ता अधिष्ठान में घुसपैठआलोक गोस्वामीवेसिली मित्रोखिनपूर्ववर्ती सोवियत
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के.जी.बी. का पैसाइस तरह हुई सत्ता अधिष्ठान में घुसपैठआलोक गोस्वामीवेसिली मित्रोखिनपूर्ववर्ती सोवियत

Written byArchiveArchive
Feb 10, 2005, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 10 Feb 2005 00:00:00

के.जी.बी. का पैसाइस तरह हुई सत्ता अधिष्ठान में घुसपैठआलोक गोस्वामीवेसिली मित्रोखिनपूर्ववर्ती सोवियत संघ की गुप्तचर संस्था के.जी.बी. ने “70 के दशक में इंदिरा गांधी शासन के दौरान भारत के सत्ता अधिष्ठान में किस सीमा तक घुसपैठ की थी, इसका खुलासा भारत के राजनीतिक दलों, विशेषकर कांग्रेस और भाकपा को भीतर तक झकझोर गया है। यह खुलासा हुआ है पेंग्विन द्वारा शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली पुस्तक “द मित्रोखिन आरकाइव, खंड-2 के.जी.बी. एंड द वल्र्ड” में। पुस्तक के कुछ अंश गत 18 सितम्बर को द टाइम्स (लंदन) ने प्रकाशित किए हैं। पुस्तक में के.जी.बी. के वरिष्ठ अधिकारी, जो बाद में निर्वासित होकर लंदन आ गए थे, वेसिली मित्रोखिन द्वारा के.जी.बी. के दस्तावेजों का हवाला देते हुए भारत के राजनीतिज्ञों को बड़ी मात्रा में पैसा पहुंचाने, के.जी.बी. की सहायता करने, भारत में मास्को के पसंदीदा राजनीतिक वातावरण को बनाए रखने और कांग्रेस और भाकपा तंत्र को पैसा पहुंचाने का रहस्योद्घाटन है। क्रेमलिन ने भारत में जड़ें जमाने के लिए प्रेस, पुलिस, मंत्रियों और इंदिरा गांधी पर ढेरों पैसा बहाया था।कम्युनिज्म के पतन के बाद मास्को से बाहर पहुंचा दिए गए के.जी.बी. के दस्तावेजों ने खुलासा किया है कि 1970 में भारत उन देशों में से एक था जहां सोवियत गुप्तचरों ने सफल घुसपैठ की थी। के.जी.बी. के कई अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि इंदिरा गांधी के अधीन भारत इसका प्रमुख लक्ष्य था। ओलेग केलुजिन ने बताया, “भारत के खुफिया, प्रतिरक्षा, विदेश मंत्रालय और पुलिस में हमारे सूत्रों की भरमार थी। भारत “तीसरी दुनिया की सत्ता” में के.जी.बी. घुसपैठ का एक आदर्श बन चुका था।” दिल्ली ने पूर्व में इस तरह के दावों को भले ही खारिज कर दिया हो, लेकिन के.जी.बी. के दस्तावेजों का रहस्योद्घाटन अब तक के शायद सबसे बड़े खुफिया आपरेशन की बानगी है।मित्रोखिन के अनुसार, “के.जी.बी. इंदिरा गांधी शासन में गहराई तक जमे भ्रष्टाचार का फायदा उठाना चाहता था। श्रीमती गांधी की सादा जीवनशैली के बावजूद नोटों की गड्डियों से भरे सूटकेस कांग्रेस पार्टी के लिए आए दिन पहुंचाए जाते थे। कांग्रेस के कोष का आकार बढ़ाने वाले ये सूटकेस मास्को से के.जी.बी. के जरिए पहुंचते थे। पार्टी के लिए पैसा इकट्ठा करने का जिम्मा ललित नारायण मिश्र के पास था जो बखूबी जानते थे कि वह सोवियत पैसा था।पुस्तक के अनुसार, “श्रीमती गांधी के सोवियत संघ के साथ शांति, मैत्री और सहयोग की संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद तो के.जी.बी. उन्हें हर कीमत पर गद्दी पर बनाए रखना चाहता था। सोवियत प्रभाव के क्षेत्र के बाहर दिल्ली की “रेसीडेंसी” (के.जी.बी.मुख्यालय) दुनिया के किसी भी मुल्क में बनी सबसे बड़ी के.जी.बी. “रेसीडेंसी” थी, जिसे “सेन्टर” (मास्को में के.जी.बी. मुख्यालय) ने मुख्य रेसीडेंसी का दर्जा देकर गौरव प्रदान किया था। भारत ने भी अनेक सोवियत राजनयिकों और व्यापारिक अधिकारियों से देशभर में प्रतिबंध हटा लिया और के.जी.बी. को कई छुपे हुए अड्डे उपलब्ध हो गए थे। दिल्ली में के.जी.बी. के राजनीतिक गुप्तचरी के प्रमुख व्याचेसलेव त्रुबनिकोव, जिनको पदोन्नत करके रूसी विदेश गुप्तचरी का अध्यक्ष बना दिया गया था, राष्ट्रपति पुतिन के विश्वासपात्र बन गए और पिछले साल दिल्ली में रूस के राजदूत बनाए गए।””रूसी भारतीय सोच को प्रभावित करने में बहुत अधिक सक्रिय थे। के.जी.बी. 1973 में 10 भारतीय अखबारों और एक प्रेस एजेंसी को बाकायदा वेतन पहुंचाती थी। 1972 में के.जी.बी. ने भारतीय अखबारों में 3,789 आलेख प्रकाशित करवाए थे, जो शायद गैर-कम्युनिस्ट दुनिया के किसी देश में सबसे अधिक थे। 1975 आते-आते इसके द्वारा प्रायोजित आलेखों की संख्या 5,510 तक पहुंच गई थी। प्रमुख सोवियत संगठनों के लिए भारत एक बेहद दोस्ती भरा वातावरण उपलब्ध कराता था।”मित्रोखिन की इस किताब में आक्सफोर्ड के इतिहासकार क्रिस्टोफर एंड्रयु का भी लम्बा-चौड़ा उल्लेख मिलता है। क्रिस्टोफर ने मित्रोखिन की उस समय सहायता की थी जब वे निर्वासित होकर ब्रिटेन गए थे। क्रिस्टोफर कहते हैं, “के.जी.बी. 1975 में भारत में आपातकाल लगने के बाद श्रीमती गांधी के विरुद्ध उपजे रोष का पूर्वानुमान करने में असफल रही थी। दिल्ली के के.जी.बी. दफ्तर की रपट थी कि उसने आपातकाल लगाने के लिए श्रीमती गांधी पर अपने लोगों से दबाव डलवाया था। मास्को के लिए “इंदिरा” ही “इंडिया” हो गई थीं। मास्को ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पर बार-बार दबाव डाला कि वह श्रीमती गांधी को पूरा-पूरा समर्थन दे। इसमें 10.6 मिलियन रूबल (उस समय लगभग 10 मिलियन पौंड के बराबर) खपा देने और इंदिरा गांधी के पक्ष में तथा उनके विरोधियों के विरुद्ध हवा का रुख मोड़ने के बावजूद मास्को आपातकाल का अचानक अंत होने का भी पूर्वानुमान नहीं कर पाया। 1977 में इंदिरा गांधी की जबरदस्त हार के बाद के.जी.बी. के धुर विरोधी मोरारजी देसाई सत्ता में आए।”1992 में 70 वर्षीय वेसिली मित्रोखिन, उनका परिवार और के.जी.बी. दस्तावेजों से भरे 6 बड़े भारी बक्से ब्रिटिश गुप्तचरों ने रूस से बाहर निकाले थे। के.जी.बी. के ये दस्तावेज मित्रोखिन ने 12 साल के दौरान गुपचुप छायाप्रतियां करके जमा किए थे। मित्रोखिन का पिछले साल ही ब्रिटेन में निधन हुआ है। पुस्तक में कांग्रेस और भाकपा के नेताओं को भारी मात्रा में पैसा पहुचाने, इंदिरा सरकार पर पूरी तरह दबदबा कायम करने, कम्युनिस्टों को अपने इशारे पर नचाने के के.जी.बी. के अनेक दस्तावेजों का खुलासा मौजूद है। यह पुस्तक अगले माह प्रकाशित होगी।- आलोक गोस्वामीNEWS

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